शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

मैं कहता तू जागत रहियो तू जाता है सोई रे

तेरा मेरा मनवा कैसे एक होइ रे ।
मैं कहता हों आंखन देखी तू कहता कागद की लेखी ।
मैं कहता सुरझावन हारी तू राखयो अरुझाई रे ॥
मैं कहता तू जागत रहियो तू जाता है सोई रे ।
मैं कहता निरमोही रहियो तू जाता है मोहि रे ॥
जुगन जुगन समझावत हारा कहा न मानत कोई रे ।
तू तो रंगी फिरे बिहंगी सब धन डारा खोई रे ॥
सतगुरू धारा निर्मल बाहे बामे काया धोई रे ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो तब ही वैसा होई रे ॥

तैंतीस कोट देवता मरिहे

साधो ये मुरदों का गांव
पीर मरे पैगम्बर मरिहे मरिहे जिन्दा जोगी
राजा मरिहे परजा मरिहे मरिहे बैद और रोगी
चंदा मरिहे सूरज मरिहे मरिहे धरण आकासा
चौदह भुवन के चौधरी मरिहे इन्हू की का आसा
नौहू मरिहे दसहू मरिहे मरिहे सहज अठ्ठासी
तैंतीस कोट देवता मरिहे बड़ी काल की बाजी
नाम अनाम अनंत रहत है दूजा तत्व न होइकहत कबीर सुनो भाई साधो भटक मरो ना कोई

सुन मेरे साजन, सुन मेरे मीता

रे दिल गाफिल गफलत मत कर एक दिना जम आवेगा ॥सौदा करने या जग आया पूंजी लाया, मूल गंवाया प्रेमनगर का अन्त न पाया ज्यों आया त्यों जावेगा ॥ सुन मेरे साजन, सुन मेरे मीता या जीवन में क्या क्या कीता, सिर पाहन का बोझा लीता आगे कौन छुडावेगा ॥ परलि पार तेरा मीता खडिया उस मिलने का ध्यान न धरिया, टूटी नाव उपर जा बैठा गाफिल गोता खावेगा ॥ दास कबीर कहे समुझाई, अन्त समय तेरा कौन सहाई चला अकेला संग न कोई कीया अपना पावेगा ॥

जल में अगन रही अधिकाई

राम बिनु तन को ताप न जाई । जल में अगन रही अधिकाई ॥राम बिनु तन को ताप न जाई ॥तुम जलनिधि मैं जलकर मीना ।जल में रहहि जलहि बिनु जीना ॥राम बिनु तन को ताप न जाई ॥तुम पिंजरा मैं सुवना तोरा ।दरसन देहु भाग बड़ मोरा ॥राम बिनु तन को ताप न जाई ॥तुम सद्गुरु मैं प्रीतम चेला ।कहे कबीर राम रमूं अकेला ॥राम बिनु तन को ताप न जाई ॥

यह संसार कागद की पुडि़या

रहना नहीं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुडि़या बूंद पड़े घुल जाना है।
यह संसार कांट की बाड़ी उलझ पुलझ मर जाना है।
यह संसार झाड़ और झांखर आग लगे बर जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो सतगुरू नाम ठिकाना है।

वेश्या ओढे़ खासा मखमल

निरंजन धन तुम्हरो दरबार ।जहाँ न तनिक न्याय विचार ।।रंगमहल में बसें मसखरे पास तेरे सरदार ।धूर धूप में साधो विराजे होये भवनिधि पार ।।वेश्या ओढे़ खासा मखमल गल मोतिन का हार ।पतिव्रता को मिले न खादी सूखा ग्रास अहार ।।पाखंडी को जग में आदर सन्त को कहें लबार ।अज्ञानी को परम‌ ब्रहम ज्ञानी को मूढ़ गंवार ।।सांच कहे जग मारन धावे झूठन को इतबार ।कहत कबीर फकीर पुकारी जग उल्टा व्यवहार ।।निरंजन धन तुम्हरो दरबार ।

साहिब तुम मत भूलियो

नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार ॥साहिब तुम मत भूलियो लाख लो भूलग जाये ।हम से तुमरे और हैं तुम सा हमरा नाहिं ।अंतरयामी एक तुम आतम के आधार ।जो तुम छोड़ो हाथ प्रभुजी कौन उतारे पार ॥गुरु बिन कैसे लागे पार ॥मैं अपराधी जन्म को मन में भरा विकार ।तुम दाता दुख भंजन मेरी करो सम्हार ।अवगुन दास कबीर के बहुत गरीब निवाज़ ।जो मैं पूत कपूत हूं कहों पिता की लाज ॥गुरु बिन कैसे लागे पार ॥

ना मैं बकरी ना मैं भेडी

मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे ।
ना मैं बकरी ना मैं भेडी ना मैं छुरी गंडास में ।
नही खाल में नही पूंछ में ना हड्डी ना मांस में ॥
ना मै देवल ना मै मसजिद ना काबे कैलाश में ।
ना तो कोनी क्रिया कर्म में नही जोग बैराग मे ॥
खोजी होय तुरंते मिलिहो पल भर की तलास मे
मै तो रहों सहर के बाहर मेरी पुरी मवास मे
क्हे कबीर सुनो भाई साधो सब सांसो की सांस मे ॥

ना मैं किरिया करम में रहता

मोको कहां ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास मेंना तीरथ मे ना मूरत में ना एकान्त निवास मेंना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलास मेंमैं तो तेरे पास में बन्दे मैं तो तेरे पास मेंना मैं जप में ना मैं तप में ना मैं बरत उपास मेंना मैं किरिया करम में रहता नहिं जोग सन्यास मेंनहि प्राण में नहि पिंड में ना ब्रह्याण्ड आकाश मेंना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में नहिं स्वांसों की स्वांस मेंखोजि होए तुरत मिल जाउं इक पल की तालास मेंकहत कबीर सुनो भई साधो मैं तो हूं विश्वास में

यह चुनरी मेरे मैके ते आयी

मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया।पांच तत की बनी चुनरिया सोरह सौ बैद लाग किया।यह चुनरी मेरे मैके ते आयी ससुरे में मनवा खोय दिया।मल मल धोये दाग न छूटे ग्यान का साबुन लाये पिया।कहत कबीर दाग तब छुटि है जब साहब अपनाय लिया।

भगतन की भगतिन वे बैठी

माया महा ठगनी हम जानी।।तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरे बानी।।केसव के कमला वे बैठी शिव के भवन भवानी।।पंडा के मूरत वे बैठीं तीरथ में भई पानी।।योगी के योगन वे बैठी राजा के घर रानी।।काहू के हीरा वे बैठी काहू के कौड़ी कानी।।भगतन की भगतिन वे बैठी बृह्मा के बृह्माणी।।कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी।।

काम जराए जोगी होए गैले हिजड़ा

मन ना रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा ।।
आसन मारि मंदिर में बैठे ब्रम्ह छाड़ि पूजन लगे पथरा ।।
कनवा फड़ाय जटवा बढ़ौले दाढ़ी बढ़ाय जोगी होई गेले बकरा ।।
जंगल जाये जोगी धुनिया रमौले काम जराए जोगी होए गैले हिजड़ा ।।
मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ो रंगौले गीता बांच के होय गैले लबरा ।।
कहहि कबीर सुनो भाई साधो, जम दरवजवा बांधल जैबे पकड़ा ।।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।हीरा पायो गांठ गंठियायो, बार बार वाको क्यों खोले।हलकी थी तब चढी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोले।सुरत कलाली भई मतवाली, मधवा पी गई बिन तोले।हंसा पायो मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोले।तेरा साहब है घर माहीं बाहर नैना क्यों खोले।कहे कबीर सुनो भई साधो, साहब मिल गए तिल ओले॥

प्रेम नगर में रहनी हमारी

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥जो सुख पाऊँ राम भजन में सो सुख नाहिं अमीरी में मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥भला बुरा सब का सुन लीजे कर गुजरान गरीबी मेंमन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥आखिर यह तन छार मिलेगा कहाँ फिरत मग़रूरी मेंमन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥प्रेम नगर में रहनी हमारी साहिब मिले सबूरी मेंमन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥कहत कबीर सुनो भयी साधो साहिब मिले सबूरी मेंमन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

क्यों सोया पैर पसार के तेरे सर पर मौत खङी है

क्यों सोया पैर पसार के तेरे सर पर मौत खङी है .
आज बात तू कहता कहाँ की थोङा सा दिन रह गया बाकी
कौङी टका पास नहि राखी चल दयो पगङी झार के
तोरी किसने बुद्धि हरी है...क्यों..
भौ सागर ये अगम अपारा कैसे नाव लगे उस पारा
ठाङे करते सोच विचारा नहि मल्लाह नहि गांव है
फ़िर बीते घङी घङी है...क्यों
आगे कठिन परत है झाङी कैसे राह मिलेगी सादरी
मती भूलना निपट अनाङी धरना पैर संभार के
पानी से नाव भरी है...क्यों
कह कबीर जम मांगे लेखा मानुष जन्म नही मिलने का
करनी घटी तो जमों घर देखा दिये नरक में डार के
मुगदर की मार परी है ...क्यों ..

उठो सखी री मांग संवारो

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।चंदन काठ के बनल खटोला ता पर दुलहिन सूतल हो। उठो सखी री मांग संवारो दुलहा मो से रूठल हो। आये जम राजा पलंग चढ़ बैठा नैनन अंसुवा टूटल हो चार जाने मिल खाट उठाइन चहुं दिसि धूं धूं उठल हो कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता छूटल हो

केहि समुझावो सब जग अन्धा

केहि समुझावो सब जग अन्धा
इक दुइ होय उनहें समुझावो सबहि भुलाने पेटके धन्धा ।पानी घोड पवन असवरवा ढरक परे जस ओस को बुन्दा ॥ गहरी नदी अगम बहे धरवा खेवन हार के पडिगा फन्दा ।घर की वस्तु नजर नहि आवत दियना बारि के ढूंढत अन्धा ॥ लागी आग सबे बन जरिगा बिन गुरु ज्ञान भटक गा बन्दा ।कहे कबीर सुनो भाई साधो जाय लंगोटी झार के बन्दा ॥

करम गति टारे नाहिं टरी

करम गति टारे नाहिं टरी ॥मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी सिधि के लगन धरी ।सीता हरन मरन दसरथ को, वन में बिपत परी ॥ कहं वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहं वह मिरग चरी ।कोटि गाय नित पुन्य करत नृग गिरगिट जोन परि ॥ पाण्डव जिनके आप सारथी, तिन पर बिपति परी ।कहत कबीर सुनो भई साधो होने होके रही ॥

जल में नलिनी तोर निवास।

काहे री नलिनी तू कुमलानी।तेरे ही नाल सरोवर पानी॥जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।ना तलि तपत न ऊपर आग तोर हेतु कहु कासन लाग॥कहे कबीर जे उदकि समान, ते नहिं मुए हमारे जान।

ओढ के मैली कीनी चदरिया

झीनी झीनी बीनी चदरियाकाहे के ताना काहे के भरनी कौन तार से बीनी चदरिया ॥ इडा पिंगला ताना भरनी सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ आठ कंवल दल चरखा डोले पांच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ जा को सियत मास दस लागे ठोंक ठोंक के बीनी चदरिया ॥ सो चादर सुर नर मुनि ओढी ओढ के मैली कीनी चदरिया ॥ दास कबीर जतन कर ओढी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया ॥

हम है इश्क मस्ताना

हम है इश्क मस्ताना हम को होशियारी क्या
रहें आजाद या जग से हमें दुनिया से यारी क्या
जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दरबदर फिरते
हमारा यार है हम में हम को इंतजारी क्या
खलक सब नाम अपने को बहुत कर सिर पटकता है
हमन गुरनाम सांचा है हमन दुनिया से यारी क्या
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हम को बेकरारी क्या
कबीरा इश्क का माता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है, हम सिर बोझ भारी क्या

धन जोबन का गरब न कीजे

घूंघट का पट खोल रे तोको पीव मिलेंगे।
घट घट मे वह सांई रमता कटुक वचन मत बोल रे॥
धन जोबन का गरब न कीजे झूठा पचरंग चोल रे।
सुन्न महल मे दियना बारले आसन सों मत डोल रे।।
जागू जुगुत सों रंगमहल में पिय पायो अनमोल रे।
कह कबीर आनंद भयो है बाजत अनहद ढोल रे॥

जब यौवन तब मान घना रे

बीत गये दिन भजन बिना रे भजन बिना रे भजन बिना रे ॥बाल अवस्था खेल गवांयो जब यौवन तब मान घना रे ॥लाहे कारण मूल गवांयो अजहु न गयी मन की तृष्णा रे ॥कहत कबीर सुनो भई साधो पार उतर गये संत जना रे ॥

जप तप साधन नहिं कछु लागत

भजो रे भैया राम गोविंद हरी ।राम गोविंद हरी भजो रे भैया राम गोविंद हरी ॥जप तप साधन नहिं कछु लागत खरचत नहिं गठरी ॥संतत संपत सुख के कारन जासे भूल परी ॥कहत कबीर राम नहीं जा मुख ता मुख धूल भरी

पहला जनम भूत का पइहो

दिवाने मन भजन बिना दुख पैहो ॥ पहला जनम भूत का पइहो सात जनम पछतहयो ।कांटा पर का पानी पैहो प्यासन ही मर जैहो ॥दूजा जनम सुवा का पैहो बाग बसेरा लैहो ।टूटे पंख मंडराने अधफड प्रान गवैहो ॥बाजीगर के बानर होइ हो लकडिन नाच नचैहो ।ऊंच नीच से हाथ पसरि हो मांगे भीख न पैहो ॥तेली के घर बैला होइहो आंखन ढांप ढंपैहयो । कोस पचास घरे मा चलहो बाहर होन न पैहो ॥पंचवा जनम ऊंट का पैहो बिन तोलन बोझ लदैहो ।बैठे से तो उठन न पैहो खुरच खुरच मर जैहो ॥धोबी घर गदहा होइहो कटी घास नहिं पैहो ।लदी लाद आपु चढ बैठे ले घाटे पहुंचैहो ॥पंछिन मां तो कौवा होइहो करर करर गुहरैहो ।उडि के जाय बैठि मैले थल गहरे चोंच लगैहो ॥सत्तनाम की हेर न करिहो मन ही मन पछतहयो ।कहे कबीर सुनो भई साधो नरक नसेनी पैहो ॥

जो जो गए बहुर नहि आए

बहुरि नहिं आवना या देस जो जो गए बहुर नहि आए पठवत नाहिं संदेस ॥ सुर नर मुनि अरु पीर औलिया देवी देव गनेस ॥ धर धर जनम सबे भरमे हैं ब्रह्मा विष्णु महेस ॥ जोगी जंगम ओ संन्यासी दीगंबर दरवेस ॥ चुंडित मुंडित पंडित लोई सरग रसातल सेस ॥ ज्ञानी गुनी चतुर अरु कविता राजा रंक नरेस ॥ कोइ राम कोइ रहिम बखाने कोइ कहे आदेस ॥ नाना भेष बनाय सबे मिल ढूंढ फिरें चहु देस ॥ कहे कबीर अंत ना पैहो बिन सतगुरु उपदेश ॥

अवधूता युगन युगन हम योगी ,

अवधूता युगन युगन हम योगी ,
आवे ना जाय मिटे ना कबहूं सबद अनाहत भोगी
सभी ठौर जमात हमरी सब ही ठौर पर मेला
,हम सब माय सब है हम माय हम है बहुरी अकेला
हम ही सिद्ध समाधि हम ही हम मौनी हम बोले
रूप सरूप अरूप दिखा के हम ही हम तो खेले
कहे कबीर सुनो भाई साधो ना ही कोई इच्छाअपनी मढ़ी में आप मैं डोलूं खेलू सहज स्वेच्छा

प्रेम नगर का अंत न पाया

अरे दिल
प्रेम नगर का अंत न पाया ज्‍यों आया त्‍यों जावेगा।।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता या जीवन में क्‍या क्‍या बीता।।
सिर पाहन का बोझा ल‍ीता आगे कौन छुड़ावेगा।।
परली पार मेरा मीता खडि़या उस मिलने का ध्‍यान न धरिया।।
टूटी नाव, उपर जो बैठा गाफिल गोता खावेगा ।।
दास कबीर कहे समझाई अंतकाल तेरा कौन सहाई।।
चला अकेला संग न कोई किया अपना पावेगा।

बुधवार, अप्रैल 28, 2010

कि जी भर के संभोग sex करो तो

मेरे एक मित्र हैं राधारमण गौतम और अब तो मेरे गुरुभाई भी हैं ये इस समय तो आगरा में रह रहे हैं लेकिन कुछ समय पहले भरतपुर में रहते थे . राधारमण मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री में प्रयासरत थे और इनको सीरियल में काम भी मिलने लगा था कि तभी इनके फ़ादर लिवरोसिस नामक बीमारी से पीङित हो गये और लगभग सारी जमापूंजी उनके इलाज में खर्च हो गयी और राधारमण को अपना कैरियर बीच में ही छोङकर घर आना पङा क्योंकि राधारमण के
छोटे छोटे चार बच्चे हैं और घर पर जिम्मेदारी संभालने वाला कोई नहीं है . मुझसे बातचीत के दौरान राधारमण ने एक दिलचस्प बात
बताई कि भरतपुर के उनके दोस्त रजनीश के संभोग से समाधि तक वाक्य का अर्थ यों लेते है कि जी भर के संभोग sex करो तो
समाधि या ग्यान की प्राप्त होगा ये सिर्फ़ उन कुछ लोगों की बात
नहीं मेरी सत्संग चर्चा के दौरान कई लोगों ने यह बात कही कि
अधिक सेक्स करना सुख को प्राप्त होना है.
मैंने कई बार यह बात कही है कि आप जिस बात को लेकर भ्रमित
हो उसके शब्दों पर ध्यान दो काफ़ी रहस्य सुलझ जायेगा .जैसे संभोग को इस तरह कर लो समभोग से समाधि यानी इस का अर्थ ये हुआ कि भोगों में तुम सम हो जाओ अर्थात उनके होने या न होने का तुम पर असर न हो तो ये समाधि अवस्था की शुरुआत हो जायेगी..हाँ लेकिन रजनीश ने ये अवश्य कहा है कि यदि तुम्हारी कोई इच्छाये प्रवल हैं तो उनका दमन करने की बजाय उनकी पूर्ति कर लेना ही बेहतर हैं क्योंकि ग्यान मार्ग में दबी हुयी इच्छायें बहुत बङी बाधायें हैं पर लोग कुछ का कुछ समझ लेते हैं .
एक महात्मा ने कहा कि दूसरों को गढ्ढे से निकालना सबसे बङा पुण्य है दूसरे दिन एक आदमी ने आकर कहा महाराज पूरे दिन तलाश करता रहा पर गढ्ढे में गिरा कोई आदमी ही नहीं मिला . एक बार एक शिक्षक ने बच्चों से कहा कि अन्धे या वृद्ध आदमी को सङक पार कराना हमारा कर्तव्य है और हम सब को प्रतिदिन एक भला कार्य
करना चाहिये .दूसरे दिन उसने बच्चों से पूछा कि क्या किसी ने भला कार्य किया है .एक बच्चे ने कहा कि हाँ मैंने किया .मैंने एक बूढी औरत को सङक पार करायी .टीचर ने कहा फ़िर तो उसने तुम्हें खूब दुआयें दी होगी बच्चे ने कहा कि नहीं उसने मुझे गालियां दी क्यों कि वो सङक के पार जाना ही नहीं चाहती थी मैंने भला कार्य करने के लिये जबरन उसे सङक पार करायी . वो तो खैर बच्चा था पर हमारी अपनी भी समझ कहीं न कहीं ऐसी ही है इसीलिये हम सच के बेहद नजदीक होते हुये भी उससे दूर होते हैं .

अलल पक्षी और चन्डूल पक्षी दो ऐसे दुर्लभ पक्षी है

अलल पक्षी और चन्डूल पक्षी दो ऐसे दुर्लभ पक्षी है जो संभवत संसार में कुछ ही लोग देख पाते होंगे इनमें चन्डूल पक्षी तो खैर काफ़ी लोंगो ने देखा होगा फ़िर भी इसे देखने
वालों की संख्या अधिक नहीं होती . चन्डूल पक्षी की खासियत ये होती है कि ये किसी भी आवाज की नकल कर लेता है चाहे वह पुरुष महिला या किसी जानवर या अन्य पक्षी या अन्य कोई भी जो आवाज है जैसी आवाज है उसकी वखूबी नकल कर लेता है . इसकी इस मक्कारी की वजह से कई बार लोग जंगलों
में मुसीवत में पङ गये क्योंकि इसने उन्ही में से किसी की आवाज की नकल कर अथवा कोई अन्य इतर आवाज वनाकर लोगों को
भ्रमित किया इसी लिये चान्डाल स्वभाव का मानने के कारण इसका नाम चन्डूल रखा गया .
अलल पक्षी एक ऐसा पक्षी है जो पेग्विन के समान बनाबट वाला होता है पर उससे कुछ छोटा होता है इस पक्षी को किसी विशेष कृपा से या विशेष संयोग से अरवों खरवों में एक दो आदमी ही देख पाते है क्योंकि यह मनुष्य की पहुँच से काफ़ी ऊपर अनन्त आकाश में रहता है और भोजन के रूप में शुद्ध वायु का सेवन करता है . इसका प्रजनन या मादा से संयोग दृष्टि के माध्यम से होता है और बाद में मादा अंडा देते समय निराधार आकाश में ही अंडा देती है क्योंकि इनका स्थान वायुमंडल से काफ़ी ऊंचाई पर होता है अतः अंडा नीचे आने लगता है और रास्ते में ही स्वतः परिपक्व हो जाता है और फ़ूट भी जाता है इसके बच्चे की और नीचे आते आते आँखे खुल जाती है और उसके पंख उङान के लिये तैयार हो जाते है और हमारी प्रथ्वी से सौ दो सौ फ़ुट ऊपर ही इसको स्वत पता लग जाता है कि ये (प्रथ्वी) उसका ठिकाना नहीं है
तव ये वापस अंतरिक्ष की ऊँचाईयों की ओर उङ जाता है और नस्ल विशेष गुण से ये अपनी माँ को पहचान लेता है..आप सोचेंगे कि फ़िर इस दुर्लभ पक्षी के वारे में जानकारी कैसे प्राप्त हुयी .ये दरअसल सूक्ष्म शरीर या सशरीर अंतरिक्ष में जाने वाले संतो या सिद्धों या अन्य महात्माओं के द्वारा बखूबी देखा जाता है हाँ आम आदमी के लिये इसे देखना असंभव ही है
क्या आपको मालूम है कि जंगल का राजा कहा जाने वाले शेर शार्दूल नामके (सेही चूहे या छोटे खरगोश जितने आकार वाला एक जानवर ) जानवर से उतना ही डरता है जैसे चूहा बिल्ली से डरता है ये शार्दूल किसी पेङ की नीची
डाल पर या किसी थोङे से ऊँचे स्थान से जम्प लगाकर शेर की गर्दन में अपने दांत गङा देता है शेर किसी तरह इससे छुटकारा नही पा सकता और अन्तः में ढेरों खून बह जाने से शेर मर जाता है शार्दूल उसका खून पीता है या क्यों शेर को ही मारता है इस बारे में मेरी जानकारी नहीं है .
कछवी अपने अंडो को समुद्र तट या तालाव आदि के किनारे देने के बाद उन्हें रेत में दबाकर अपने भोजन आदि की तलाश में निकल जाती है और अपने अंडो का निरंतर ध्यान करती है ये कार्य अंडो को सेकर गर्मी देने जैसा है..यदि किसी दुर्घटनावश कछवी की मृत्यु हो जाती है तो अंडे सङ जाते है
आप सोच रहे होंगे कि मेरा अध्यात्म विषय आज पशु पक्षियों की तरफ़ कैसा मुङ गया दरअसल इन सारी घटनाओं का जुङाव अध्यात्म से ही है बस आपको थोङा सोचने की जरूरत है .क्योंकि कैसा अदभुत खेल बनाया , मोह माया में जीव फ़ंसाया ...माया महा ठगिनी हम जानी..तिरगुन फ़ांस लिये कर डोले बोले मधुरी वानी .
तिरगुन फ़ांस यानी सत रज तम...अब आप समझ लो कोई धुरंधर ग्यानी ..जो पूरी तरह सत आचरण में है वो भी माया के दायरे से बाहर नहीं है .

रविवार, अप्रैल 25, 2010

दीक्षा का सबसे बङा लाभ ये है

-- दीक्षा एक आदमी की हो सौ की हो हजार की अथवा
पाँच हजार की..दीक्षा के समय आपके सिर पर एक काला
कपङा या किसी भी गहरे रंग का कपङा होना चाहिये और
दीक्षा स्थान पर पर्याप्त अंधेरा होना चाहिये...दीक्षा के समय आपके दोनों हाथ की कोहनी किसी सहारा देने वाली चीज पर हों तथा एक एक उंगली कानों में तथा आंख और मुंह बन्द होना चाहिये..दीक्षा का समय एक घन्टा तक हो..दीक्षा वाले दिन किसी से मिलना जुलना नहीं चाहिये .
--मुक्ति या आत्मग्यान की दीक्षाएं अनेक नहीं है यह सिर्फ़
ढाई अक्षर के महामन्त्र से निर्वाणी ग्यान और हंस ग्यान
की दीक्षा है इसको देने का अधिकार सिर्फ़ सतगुरु को ही
है..खास बात ये है कि इसमें जो नाम देते हैं उसको राम या भगवते वासुदेवाय इस तरह वाणी से नहीं जपते हैं बल्कि एक विशेष जगह ध्यान केन्द्रित करना होता है ..यदि आपने पूरे कायदे से दीक्षा ली है तो उसी दिन आपका ग्यान नेत्र खुल जाता है जिसे तीसरा नेत्र भी कहते है .कुछ जड प्रकृति के साधकों को एक महीने के अभ्यास में अंतरजगत के द्रश्य दिखने लगते हैं .
इस दीक्षा का सबसे बङा लाभ ये है कि अब तक धर्म ग्रन्थों
में जो बाते आपको समझ में नहीं आती थी उनका बोध हो जाता है .
--दीक्षा का सबसे बङा लाभ ये है कि यदि आप किन्ही कारण वश साधना ठीक से नहीं कर पाये तो भी आप मनुश्य जन्म के अधिकारी हो जाते हैं और ये सिर्फ़ मुंहजबानी आपको भरमाया नहीं जाता आपको कुछ ऐसे अलोकिक अनुभव होते है जो आपकी समस्त शंकाओं का स्वयं समाधान करते है यदि आपको लगता है कि आपको अभी तक सतसंग से कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ और आप ध्यान की ऊँचाई को पाना चाहते है जैसे शरीर से बाहर निकलना सूक्ष्मलोकों का भ्रमण करना तो आप सम्पर्क कर सकते है यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि मैं नहीं आप को ये सब
अनुभव कराऊंगा मैं तो सिर्फ़ आपको महाराज जी से मिलवा दूँगा जिनसे मैंने ये सुर्ति साधना का दुर्लभ ग्यान
पाया है . जय गुरुदेव की

शनिवार, अप्रैल 17, 2010

कबीरा गरब न कीजिए, कबहू न हंसिये कोय ।

एक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय । एक से परचे भया, एक बाहे समाय कबीरा गरब न कीजिए, कबहू न हंसिये कोय । अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होय कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय । दुख बासे भागा फिरे, सुख में रहे समाय कबीरा संगति साधु की, नित प्रति कीजे जाय । दुरमति दूर वहावति, देगी सुमति बनाय ॥कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय । होमी चन्दन बासना, नीम न कहसी कोय ॥ को छूटो इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय । ज्यों ज्यों सुरझि भजो चहे त्यों त्यों उरझत जाय ॥कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान । जम जब घर ले जाएंगे, पड़ा रहेगा म्यान ॥ काह भरोसा देह का, बिनस जात छिन माहिं । सांस सांस सुमिरन करो, और जतन कछु नाहिं ॥ काल करे से आज कर, सबहि सात तुव साथ । काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ ॥ काया काठ काल घुन, जतन जतन सो खाय । काया बह्रा ईश बस, मर्म न काहू पाय ॥ कहा कियो हम आय कर, कहा करेंगे जाय । इनके भये न उतके, चाले मूल गवाय ॥कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे होत न हार । साधु वचन जल रूप है, बरसे अम्रत धार ॥कहता तो बहुता मिला, गहता मिला न कोय । सो कहता वह जान दे, जो नहीं गहता कोय ॥ कबीरा मन पंछी भया, भये ते बाहर जाय । जो जैसे संगति करे सो तैसा फल पाय ॥कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर । ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेरकहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह । देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देय करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय । बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय ॥ कस्तूरी कुन्डल बसे, म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिं । ऐसे घट घट राम है, दुनिया देखे नाहिं कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार । एक दिना है सोवना, लांबे पांव पसार कागा काको धन हरे, कोयल काको देय । मीठे शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेय कबिरा सोई पीर है, जो जानें पर पीर । जो पर पीर न जानइ, सो काफिर बेपीर कबिरा मनहि गयन्द है, आकुंश दे दे राखि । विष की बेली परि रहे अम्रत को फल चाखि कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा मीठ । काल्ह जो बैठा भण्डपे आज भसाने दीठ कबिरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय । आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव । कहत कबीरा या जगत, नाहीं और उपाय कबिरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा । के सेवा कर साधु की, के गोविंद गुन गा कलि खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय । चाहे कहू सत आइना, सो जग बैरी होय केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह । अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहिं बरसे मेह कबीर जात पुकारया, चढ़ चन्दन की डार । वाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार कबीरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय । जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय गांठि दाम न बांधहि, नहिं नारी सो नेह । कह कबीर वा साधु की, हम चरनन की खेह खेत न छोड़े सूरमा, जूझे को दल मांह । आशा जीवन मरण की, मन में राखे नांहचन्दन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार । वाके अंग लपटा रहे, मन मे नाहिं विकार घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल । दाना तो दुश्मन भला, मूरख का क्या मेल गारी ही सो ऊपजे, कलह कष्ट और भींच । हारि चले सो साधु हैं, लागि चले तो नीचचलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय । दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोयजा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी । राम नाम रसना बसे, लीजे जनम सुधारि जब लग भक्ति सकाम है, तब लग निष्फल सेव । कह कबीर वह क्यों मिले, निहकामी निज देव जो तोकूं कांटा बुवे ताहि बोय तू फूल । तोकू फूल के फूल है, बाकू है तिरशूल जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान । जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घट माहिं । मूर्ख लोग न जानिए, बाहर ढ़ूंढ़न जांहि जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप । पुछुप बास ते पामरा, ऐसा तत्व अनूप जहां आपा तहां आपदा, जहां संशय तहां रोग । कह कबीर यह क्यों मिटे चारों बाधक रोग जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान । मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान जल की जमी में है रोपा, अभी सींचें सौ बार । कबिरा खलक न तजे, जामे कौन वोचार जहां ग्राहक तंह मैं नहीं, जंह मैं गाहक नाय । बिको न यक भरमत फिरे, पकड़ी शब्द की छांय झूठे सुख को सुख कहे मानत है मन मोद । जगत चबेना काल का कुछ मुख में कुछ गोदजो तू चाहे मुक्ति को छोड़ दे सबकी आस । मुक्त जैसा हो रहे सब कुछ तेरे पास जो जाने जीव आपना करहीं जीव का सार । जीवा ऐसा पाहौना मिले न दूजी बार

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर ।

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर । तब लग जीव कर्मवश, जब लग ज्ञान न पूर ॥
आस पराई राखता, खाया घर का खेत । औरन को पथ बोधता, मुख में पङी रेत ॥
सोना सज्जन साधु जन टूट जुङ सौ बार । दुर्जन कुम्भ कुम्हार के एके धका दरार ॥ सब धरती कारज करूं लेखन सब बनराय । सात समुद्र की मसि करूं गुरु गुन लिखा न जाय ॥बलिहारी वा दूध की जामे निकसे घीव । घी साखी कबीर की चार वेद का जीव ॥आग जो लागी समुद्र में धुआं न प्रकट होय । सो जाने जो जरमुआ जाकी लाई होय ॥ साधु गांठि न बांधई, उदर समाता लेय । आगे पीछे हरि खड़े जब मांगे तब देय ॥घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार । बाल सने ही सांइया, आवा अन्त का यार ॥कबिरा खालिक जागिया और ना जागे कोय । जाके विषय विष भरा दास बन्दगी होय ॥ऊंचे कुल में जनमया, करनी ऊंच न होय । सुबरन कलश सुरा भरी, साधु निन्दा सोय ॥ सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार । होले होले सुरत में, कहें कबीर विचार ॥ सब आए इस एक में डाल पात फल फूल । कबिरा पीछा क्या रहा गह पकड़ी जब मूल ॥जो जन भीगे रामरस विगत कबहू ना रूख । अनुभव भाव न दरसते ना दुख ना सुख ॥ सिंह अकेला बन रहे, पलक पलक कर दौर । जैसा बन है आपना तैसा वन है और ॥ यह माया है चूहड़ी और चूहड़ा कीजो । बाप पूत उरझाय के संग ना काहो केहो ॥ जहर की जमीं में है रोपा, अभी खींचे सौ बार । कबिरा खलक न तजे, जामे कौन विचार ॥जग मे बैरी कोई नहीं जो मन शीतल होय । यह आपा तो डाल दे दया करे सब कोय ॥ जो जाने जीव न आपना करहीं जीव का सार । जीवा ऐसा पाहौना मिले ना दूजी बार ॥ कबीर जात पुकारया चढ़ चन्दन की डार । बाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार ॥लोग भरोसे कौन के बैठ रहे उरगाय । जीय रही लूटत जम फिरे मेंढ़ा लुटे कसाय ॥ एक कहूं तो है नहीं, दूजा कहूं तो गार । है जैसा तैसा ही रहे, कहे कबीर विचार ॥ जो तु चाहे मुक्त को, छोड़े दे सब आस । मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ॥ साई आगे सांच है साई सांच सुहाय । चाहे बोले केस रख चाहे घोंट मुन्डाय ॥अपने अपने साख की सबही लीनी मान । हरि की बातें दुरन्तरा पूरी ना कहूं जान ॥ खेत ना छोड़े सूरमा जूझे दो दल मोह । आशा जीवन मरण की मन में राखे नोह ॥लीक पुरानी को तजे कायर कुटिल कपूत । लीक पुरानी पर रहे शातिर सिंह सपूत ॥ सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह । लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह ॥भूखा भूखा क्या करे क्या सुनावे लोग । भांडा घड़ निज मुख दिया सोई पूर्ण जोग ॥ गर्भ योगेश्वर गुरु बिना लागा हर का सेव । कह कबीर बैकुण्ठ से फेर दिया शुकदेव ॥ प्रेमभाव एक चाहिए भेष अनेक बनाय । चाहे घर में वास कर चाहे बन को जाय ॥ कांचे भांडे से रहे ज्यों कुम्हार का नेह । भीतर से रक्षा करे बाहर चोई देह ॥ साई ते सब होत है बन्दे से कुछ नाहिं । राई से पर्वत करे पर्वत राई माहिं ॥
केतन दिन ऐसे गए अन रुचे का नेह । अवसर बोवे उपजे नहीं जो नहीं बरसे मेह ॥एक ते अनन्त अनन्त एक हो जाय । एक से परचे भया एक मांह समाय ॥ साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध । आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ॥ हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप । निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप ॥ आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत । जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ॥ आग जो लगी समुद्र में, धुआं ना प्रकट होय । सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥ अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट । चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पठन को फूट ॥अपने अपने साख की, सब ही लीनी भान । हरि की बात दुरन्तरा, पूरी ना कहू जान ॥ आस पराई राखता, खाया घर का खेत । औरन को पथ बोधता, मुख में डारे रेत ॥आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक । कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥आहार करे मनभावता, इंद्री केरे स्वाद । नाक तलक पूरन भरे, तो कहिए कौन प्रसाद ॥ आए हैं सो जांएगे, राजा रंक फकीर । एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बांधि जंजीर ॥ आया था किस काम को, तू सोया चादर तान । सूरत संभाल ए गाफिल, अपना आप पह्चान ॥उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय । एक हरि के नाम बिन, बांधा यमपुर जाय ॥ उतते कोई न आवई, तांसू पूछूं धाय । इतते ही सब जात है, भार लदाय लदाय ॥ अवगुन कहूं शराब का, आपा अहमक होय । मानुष से पशुआ भया, दाम गांठ से खोय ॥ एक कहूं तो है नहीं, दूजा कहूं तो गार । है जैसा तैसा रहे, रहे कबीर विचार ॥
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए । औरन को शीतल करे, आपो शीतल होय ॥ कबीरा संगति साधु की, जौ की भूसी खाय । खीर खांड़ भोजन मिले, साकत संग न जायएक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय । एक से परचे भया, एक बाहे समाय कबीरा गरब न कीजिए, कबहू न हंसिये कोय । अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होय कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय । दुख बासे भागा फिरे, सुख में रहे समाय कबीरा संगति साधु की, नित प्रति कीजे जाय । दुरमति दूर वहावति, देगी सुमति बनाय ॥

कलि खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय ।

वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल । बिना करम का मानव, फिरता डांवाडोल ॥कलि खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय । चाहे कह सत आइना, जो जग बैरी होय ॥कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय । भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय । सुरत डोर लागी रहे, तार टूट नहिं जाय ॥साधु ऐसा चहिए ,जैसा सूप सुभाय । सार सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ॥ लगी लगन छूटे नहिं, जीभ चोंच जरि जाय । मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय । कह कबीर कुछ भेद नहिं, कहां रंक कहां राय ॥घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार । बाल सनेही सांइया, आवा अन्त का यार ॥अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार । जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥मैं अपराधी जन्म का, नख सिख भरा विकार । तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय । राजा प्रजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय । लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग । कह कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ सुमरित सुरत जगाय कर, मुख से कछु न बोल । बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार । हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग । तेरा सांई तुझमें है, जाग सके तो जाग ॥ जा कारण जग ढ़ूँढ़िया, सो तो घट ही मांहि । परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं ॥ जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश । मानो चिनगी आग की, परी पुरानी घास ॥नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिम नहीं शीतल होय । कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥ आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद । नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद ॥ जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय । नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावे सोय ॥ जल ज्यों प्यारा माछरी लोभी प्यारा दाम । माता प्यारा बालका भगति प्यारा नाम ॥दिल का मरहम ना मिला जो मिला सो गर्जी । कह कबीर आसमान फटा क्योंकर सीवे दर्जी ॥बानी से पह्चानिये साह चोर की घात । अन्दर की करनी से सब निकले मुँह से बात ॥ जब लगि भगति सकाम है तब लग निष्फल सेव । कह कबीर वह क्यों मिले निष्कामी तज देव ॥ फूटी आंख विवेक की लखे ना सन्त असन्त । जाके संग दस बीस हैं ताको नाम महन्त ॥ दया भाव ह्र्दय नहीं ज्ञान थके बेहद । ते नर नरक ही जायेंगे सुनि सुनि साखी शब्द ॥ दया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय । सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ॥जब मैं था तब गुरु नहीं अब गुरु हैं मैं नाय । प्रेम गली अति सांकरी ता मे दो न समाय ॥छिन ही चढ़े छिन ही उतरे सो तो प्रेम न होय । अघट प्रेम पिंजरे बसे प्रेम कहावे सोय ॥ जहाँ काम तहाँ नाम नहिं जहाँ नाम नहिं वहाँ काम । दोनों कबहू नहिं मिले रवि रजनी इक धाम ॥ कबीरा धीरज के धरे हाथी मन भर खाय । टूक एक के कारने स्वान घर घर जाय ॥ ऊंचे पानी न टिके नीचे ही ठहराय । नीचा हो सो भरि पिए ऊंचा प्यासा जाय ॥ सबते लघुताई भली लघुता ते सब होय । जैसे दूज का चन्द्रमा शीश नवे सब कोय ॥संत ही में सत बांटई रोटी में ते टूक । कहे कबीर ता दास को कबहू न आवे चूक ॥ मार्ग चलते जो गिरा ताकों नाहि दोष । कह कबिरा बैठा रहे तो सिर करड़े कोस ॥ जब ही नाम ह्रदय धरयो भयो पाप का नाश । मानो चिनगी अग्नि की परि पुरानी घास ॥काया काठी काल घुन जतन-जतन सो खाय । काया वैध ईश बस मर्म न काहू पाय
सुख सागर का शील है कोई न पावे थाह । शब्द बिना साधु नही द्रव्य बिना नहीं शाह बाहर क्या दिखलाए अन्तर जपिए राम । कहा काज संसार से तुझे धनी से काम फल कारण सेवा करे करे न मन से काम । कहे कबीर सेवक नहीं चहे चौगुना दाम तेरा सांई तुझमें ज्यों पहुपन में बास । कस्तूरी का हिरन ज्यों फिर फिर ढ़ूँढ़त घास कथा कीर्तन कुल विशे भवसागर की नाव । कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव कबिरा यह तन जात है सके तो ठौर लगा । के सेवा कर साधु की के गोविंद गुन गा तन बोहत मन काग है लक्ष योजन उड़ जाय । कबहु के धर्म अगम दयी कबहुं गगन समाय जहं गाहक ता हूं नहीं जहां मैं गाहक नांय । मूरख यह भरमत फिरे पकड़ शब्द की छांय कहता तो बहुत मिला गहता मिला न कोय । सो कहता वह जान दे जो नहिं गहता होय

मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥

दुख में सुमरन सब करें सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमरिन करें दुख काहे को होय ॥ तिनका कबहु ना निंदिये जो पांव तले होय । कबहु उड़ आंखो पड़े पीर घनेरी होय ॥माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे मन का मनका फेर ॥गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पांय । बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ॥बलिहारी गुरु आपने घड़ी घड़ी सौ सौ बार । मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ कबीरा माला मनहि की और संसारी भीख । माला फेरे हरि मिले गले रहट के देख ॥सुख में सुमिरन ना किया दुख में किया याद । कह कबीर ता दास की कौन सुने फरियाद ॥ सांई इतना दीजिये जा में कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूं साधु ना भूखा जाय ॥ लूट सके तो लूट ले राम नाम की लूट । पाछे फिर पछताओगे प्राण जाहिं जब छूट ॥ जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान । मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान ॥ जहाँ दया तहाँ धर्म है जहाँ लोभ तहाँ पाप । जहाँ क्रोध तहाँ काल है जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा ॠतु आए फल होय ॥कबिरा ते नर अन्ध हैं गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रुठे नहीं ठौर ॥ पांच पहर धन्धे गया तीन पहर गया सोय । एक पहर हरि नाम बिन मुक्ति कैसे होय ॥ कबीरा सोया क्या करे उठि न भजे भगवान । जम जब घर ले जायेंगे पड़ी रहेगी म्यान ॥ शीलवन्त सबसे बड़ा सब रतनन की खान । तीन लोक की सम्पदा रही शील में आन ॥ माया मरी न मन मरा मर मर गए शरीर । आशा तृष्णा न मरी कह गए दास कबीर ॥ माटी कहे कुम्हार से तु क्या रोंदे मोय । एक दिन ऐसा आएगा मैं रौदूंगी तोय ॥ रात गंवाई सोय के दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था कोड़ी बदले जाय ॥ नींद निशानी मौत की उठ कबीरा जाग । और रसायन छांड़ि के नाम रसायन लाग ॥ जो तोकू कांटा बुवे ताहि बोय तू फूल । तोकू फूल के फूल है वाकू है त्रिशूल ॥ दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ती झड़े बहुरि न लागे डार ॥ आये हें सो जांएगे राजा रंक फकीर । एक सिंहासन चढ़ चले एक बंधे जंजीर ॥ काल करे सो आज कर आज करे सो अब । पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगा कब ॥ मांगन मरण समान है मति मांगो कोई भीख । मांगन से मरना भला यह सतगुरु की सीख ॥
जहाँ आपा तहाँ आपदा जहाँ संशय तहाँ रोग । कह कबीर यह क्यों मिटे चारों धीरज रोग ॥ माया छाया एक सी बिरला जाने कोय । भगता के पीछे लगे सम्मुख भागे सोय ॥ आया था किस काम को तु सोया चादर तान । सुरत सम्भाल ए गाफिल अपना आप पहचान ॥ क्या भरोसा देह का बिनस जात छिन मांह । सांस सांस सुमिरन करो और जतन कुछ नांह ॥ गारी ही सों ऊपजे कलह कष्ट और मींच । हारि चले सो साधु है लागि चले सो नींच ॥ दुर्बल को न सताइए जाकि मोटी हाय । बिना जीव की हाय से लोहा भस्म हो जाय ॥ दान दिए धन ना घटे नदी घटे न नीर । अपनी आँखों देख लो यों क्या कहे कबीर ॥ दस द्वारे का पिंजरा तामे पंछी का कौन । रहे को अचरज है गए अचम्भा कौन ॥ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय । औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय ॥ हीरा वहाँ न खोलिये जहाँ कुंजड़ों की हाट । बांधो चुप की पोटरी लागहु अपनी बाट ॥कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार । साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥जग में बैरी कोई नहीं जो मन शीतल होय । यह आपा तो ड़ाल दे दया करे सब कोय ॥ मैं रोऊं सब जगत को मोको रोवे न होय । मोको रोबे सोचना जो शब्द बोय की होय ॥ सोवा साधु जगाइए करे नाम का जाप । यह तीनों सोते भले साकत सिंह और सांप ॥ अवगुन कहूं शराब का आपा अहमक साथ । मानुष से पशुआ करे दाय गांठ से खात ॥बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ । नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट । चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय । ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥पतिवृता मैली भली, काली कुचल कुरूप । पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार । एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार हद चाले तो मानवा, बेहद चले सो साध । हद बेहद दोनों तजे, ताको मता अगाध ॥ राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस । रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥जाके जिभ्या बन्धन नहीं, ह्रदय में नहीं सांच । वाके संग न लागिये, खाले वटिया कांच ॥ तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन । प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय । मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥
हंसा मोती बीनिया, कंचन थार भराय । जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय । एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥

बेस्या केरा पूत ज्यूं, कहे कौन सू बाप ??

राम पियारा छाड़ि करि, करे आन का जाप । बेस्या केरा पूत ज्यूं, कहे कौन सू बाप कबीरा प्रेम न चषिया चषि न लिया साव । सूने घर का पांहुणा ज्यूं आया त्यूं जाव ॥ कबीरा राम रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाइ । फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन संधे संधि मिलाइ ॥लंबा मारग, दूर घर विकट पंथ बहुमार । कहो संतो क्यूं पाइये दुर्लभ हरि दीदार ॥बिरह भुवगम तन बसे मंत्र न लागे कोइ । राम बियोगी ना जिवे जिवे तो बौरा होइ ॥ यह तन जालो मसि करों लिखों राम का नाउं । लेखणि करूं करंक की लिख लिख राम पठाउं ॥ अंदेसड़ा न भाजिसी, सदेसो कहिया । के हरि आया भाजिसी, के हरि ही पास गया ॥इस तन का दीवा करो बाती मेल्यूं जीवउं । लोही सींचो तेल ज्यूं कब मुख देख पठिउं ॥ अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहार निहार । जीभड़ियां छाला पड़या राम पुकार पुकार ॥ सब रग तंत रबाब तन बिरह बजावे नित्त । और न कोई सुणि सके के साईं के चित्त ॥जो रोऊ तो बल घटे हंसो तो राम रिसाइ । मन ही माहिं बिसूरणा ज्यूं घुण काठहिं खाइ ॥कबीर हसणा दूरि करि करि रोवण सो चित्त । बिन रोया क्यूं पाइये प्रेम पियारा मित्व ॥ सुखिया सब संसार है खावे और सोवे । दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवे ॥परबत परबत मैं फिरया नैन गंवाए रोइ । सो बूटी पाऊं नहीं जाते जीवन होइ ॥ पूत पियारो पिता को गौहनि लागो धाइ । लोभ मिठाई हाथ दे आपण गयो भुलाइ हासी खेलो हरि मिले कोण सहे षरसान । काम क्रोध त्रिषना तजे तोहि मिले भगवान जा कारण में ढ़ूंढ़ती सनमुख मिलिया आइ । धन मैली पिव ऊजला लागि न सकों पाइ पहुंचेंगे तब कहेंगे उमङेंगे उस ठाई । अजहू बेरा समंद में बोलि बिगू पे काई दीठा है तो कस कहू कह्मा न को पतियाइ । हरि जैसा है तैसा रहो तू हरष हरष गुण गाइ
भारी कहों तो बहु डरों, हलका कहूं तो झूठ । मैं का जाणी राम कू नैन कबहू न दीठ
कबीर एक न जाण्या तो बहु जाण्या क्या होइ । एक ते सब होत है सब ते एक न होइ
कबीर रेख स्यंदूर की काजल दिया न जाइ । नैन रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाइकबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउं । गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाउं
कबीर कलिजुग आइ कर कीये बहुत जो मीत । जिन दिल बांध्या एक सूं ते सुख सोवे निचींत जब लग भगत सकामता, तब लग निष्फ़ल सेव । कह कबीर वे क्यूं मिले निह्कामी निज देव पतिबरता मैली भली गले कांच को पोत । सब सखियन में यों दिपे ज्यों रवि ससि को जोतकामी अमी न भावई विष ही को ले सोध । कुबुद्धि न जीव की भावे स्यंभ रहो प्रमोध भगति बिगाड़ी कामिया इन्द्री केरे स्वादि । हीरा खोया हाथ ते जनम गंवाया बाद परनारी का राचणो ज्यूं लहसण की खान । खूणें बेसिर खाइय परगट होइ दिवान परनारी राता फिरे चोरी बिढ़ ता खाहिं । दिवस चारि सरसा रहे अंत समूला जाहिं ग्यानी मूल गंवाइया आपण भये करना । ताते संसारी भला मन मैं रहे डरना कामी लज्जा ना करे मन माहें अहिलाद । नींद न मांगे सांथरा भूख न मांगे स्वाद कलि का स्वामी लोभिया पीतल धरी खटाइ । राज दुबारा यों फिरे ज्यूं हरयाई गाइस्वामी हूवा सीतका पैलाकार पचास । राम नाम काठें रह्मा करे सिषा की आस ॥इहि उदर के कारणे जग पाच्यो निस जाम । स्वामी पणो जो सिर चढ़यो सरे न एको काम ॥ ब्राह्मण गुरु जगत का साधू का गुरु नाहिं । उरझ पुरझ कर मर रहा चारउ बेदा मांहि ॥ कबीर कलि खोटी भई मुनियर मिले न कोइ । लालच लोभी मसकरा तिनकू आदर होइ ॥ कलि का स्वमी लोभिया मनसा घरी बधाई । देहि पईसा ब्याज़ को लेखा करता जाई ॥कबीर इस संसार को, समझाऊं के बार । पूंछ जो पकङे भेड़ की उतरया चाहे पार ॥तीरथ कर कर जग मुवा डूंधे पाणी न्हाइ । रामहि राम जपतंडा काल घसीटया जाइ ॥चतुराई सूवे पढ़ी सोइ पंजर मांहि । फिरि प्रमोधे आन को आपण समझे नाहिं ॥ कबीर मन फूल्या फिरे करता हूं मैं धरम । कोटि क्रम सिर ले चल्या, चेत न देखे भरम ॥

तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय ।

ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत । प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥ तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय । माया तजि भक्ति करे, सूर कहावे सोय ॥तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय । सहजे सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय ॥ तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर । तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर ॥दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन । रहे को अचरज भयो गये अचम्भा कौन ॥ धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सीचें सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय । मीन सदा जल में रहे धोये बास न जाय ॥पांच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय । एक पहर भी नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय । ढ़ाई आखर प्रेम का पढे सो पंड़ित होय ॥ पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात । देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात ॥ पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजो पहार । याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार ॥ पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय । अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय । चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय ॥बन्धे को बंधा मिले, छूटे कौन उपाय । कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ॥
बन्धे को बन्धा मिला , छूटे कौन उपाय . अन्धे को अन्धा मिला , मारग कौन बताय
बूंद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय । समुद्र समाना बूंद में, बूझे बिरला कोय ॥ बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम । कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥बानी से पहचानिए, साम चोर की घात । अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात ॥ बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर । पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥मूंड़ मुड़ाये हरि मिले सब कोई लेय मुड़ाय । बार बार के मुड़ते भेड़ न बैकुण्ठ जाय ॥माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश । जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश ॥ भज दीना कहूं और ही, तन साधुन के संग । कहे कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग ॥माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय । भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय ॥ मथुरा भावे द्वारिका भावे जो जगन्नाथ । साधु संग हरि भजन बिनु कछु न आवे हाथ ॥माली आवत देख के, कलियन करी पुकार । फूल फूल चुन लिए, काल हमारी बार ॥मैं रोऊं सब जगत को, मोको रोय न कोय । मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं । सीस उतारे भुई धरे, तब बैठें घर माहिं ॥ या दुनिया में आ कर, छाड़ि देय तू ऐंठ । लेना हो सो लेइले, उठी जात है पैंठ ॥राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास । नैन न आवे नीदरो अलग न आवे भास ॥ रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय । जो सुख साधु सगं में, सो बेकुंठ न होय ॥संगति सों सुख ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय । कह कबीर तहं जाइये, साधु संग जहं होय ॥ साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय । ज्यों मेहदी के पात में, लाली रखी न जाय ॥ सांझ पड़े दिन बीतबे चकवी दीन्ही रोय । चल चकवा वा देश को, जहां रैन नहिं होय ॥सत ही मे सत बांटे, रोटी में ते टूक । कहे कबीर ता दास को, कबहु न आवे चूक ॥ साई आगे सांच है, साई सांच सुहाय । चाहे बोले केस रख, चाहे घोंट मुण्डाय ॥लकड़ी कहे लुहार की, तू मत जारे मोहिं । एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारूंगी तोहि ॥ हरिया जाने रुखड़ा, जो पानी का गेह । सूखा काठ न जान ही, केतुउ बूड़ा मेह ॥ज्ञान रतन का जतनकर माटी का संसार । आय कबीर फिर गया, फीका है संसार ॥ॠद्धि सिद्धि मांगो नहीं, मांगो तुम पे येह । निसि दिन दरशन साधु को, प्रभु कबीर को देहु ॥ क्षमा बड़ेन को उचित है, छोटे को उत्पात । कहा विष्णु का घटि गया, जो भुगु मारीलात ॥ राम नाम के पटतरे, देबे को कुछ नाहिं । क्या ले गुर संतोषिए, होंस रही मन माहिं ॥बलिहारी गुर आपणो घोहाड़ी के बार । जिनि मानष ते देवता करत न लागी बार ॥ ना गुरु मिल्या न सिष भया लालच खेल्या डाव । दुन्यू बूड़े धार में चढ़ि पाथर की नाव ॥ सतगुर हम सू रीझ कर एक कह्मा प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया अब अंग ॥ कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख । स्वांग जती का पहरि करि, घर घर मांगे भीख ॥ यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूं । वारी फेरी बलि गई, जित देखों तित तू

बुधवार, अप्रैल 07, 2010

कोई तो बात होगी ही..??..

अगर हम साधारण नजरिये से बात करें तो फ़िर तो कोई
बात ही नहीं पर विशेष नजरिये से देखने पर यह बात अलग हो जाती है आप देखिये शास्त्रों में धर्मग्रन्थों में संतों को सबसे अधिक पूज्यनीय बताया है पर आज आप किसी से संत के बारे में बात करो तो वो नाक भों सिकोङ लेता है और अर्नगल भी बोल सकता है . और ये सच है कि बोलने वाले की संत के बारे में जो राय है एकदम सटीक हो सकती है ये बात अलग है कि आप सही संत को नहीं जानते . संत के लक्षणों को नहीं जानते तो फ़िर कुछ दोष तो आपका भी हुआ कि नहीं . कबीर साहेब ने संतों के बारे में कहा है कि गांठी दाम न बांधहिं
नहिं नारी से नेह . कह कबीर उन संत की हम लें चरनन की खेह तो ये मजाक बात नहीं है कि आप संतों के ऊपर कोई कमेंट कर सकें .हाँ जिन के ऊपर आप कमेंट करते हैं वे दरअसल संत हैं ही नहीं और आप संत कौन होते हैं ये न जानते हुये सबको एक ही तराजू में तौल देते हैं . मैं उन लोंगों से पूछता हूँ कि जब आप किसी संत के पास गये थे तब क्या आप जानते थे कि संतो के पास क्यों जाते है . संत होने की पहचान क्या है . संत अपने प्रवचन में क्या कह रहा है . आप को उसके पास जाने से क्या नुकसान या क्या फ़ायदा हुआ..जाहिर है इन बातों को अक्सर लोग कम देखते है .
एक बहुत शिक्षित आदमी का कमेंट मुझे लग रहा है कि आपको बताना चाहिये . उसने कहा कि बाबा( एक नामी संत जो टी.वी. पर भी आते हैं और लाखों की संख्या में उनके शिष्य हैं ) के पास लाखों लोग जाते हैं तो कोई तो बात होगी ही . मेरे पूछने पर उन्होने बताया कि अभी तक तो मुझे कोई लाभ नही हैं ..हाँ मैं लगभग पाँच साल से जुङा हूँ ..दरअसल मैं ध्यान के लिये समय ही नही दे पाता..? मैं संतों (वास्तविक ) की संगति में बीस साल से हूँ आप यकीन मानिये कि ये बाबा और ये आदमी दोनों ही अपनी अपनी जगह गलत है . न तो इस तरह शिष्य बनाये जातें हैं और न ही इस तरह गुरु का कोई मतलब होता है . लेकिन मैं शिष्य से अधिक गलती गुरु की मानता हूँ . मैं आपको बताऊँ गुरु उसी मन्त्र की दीक्षा देने का अधिकारी होता है जो कि उसने स्वयं जपा हो और उस मन्त्र उस ग्यान की दीक्षा देने का अधिकारी नियुक्त हुआ हो . लेकिन इस तरह के असली गुरु को थोक में दीक्षा बाँटने का कोई शौक नहीं होता और उसका दीक्षा देने का आज की तरह का फ़ेसनेबल तरीका नहीं होता और ये दीक्षा कुछ ही दिनों में असर दिखाने लगती है यानी आपको अलौकिक अनुभव होने लगते हैं . आप सच्चे संत से मिलना चाहते हैं मैं आपको इसका बेजोङ तरीका बताता हूँ . आप सब बातों से ध्यान हटाकर अधिक से अधिक समय अपने मन में ये लगन पैदा करें कि हे प्रभु आप मुझे किसी ऐसे संत से मिलाये जो आपके दर्शन कराने में समर्थ हो.. फ़िर देखिये आप विश्व के किसी भी कोने में हो किसी न किसी तरीके से आप को संत मिल जायेंगे . पर आपका भाव सच्चा और पवित्र , प्रेममय होना चाहिये .
राम कबीरा एक हैं , कहन सुनन को दोय दोय कर सो जाने , जे सतगुरु मिला न होय
पंचे सबद अनाहद बाजे संगे सारिगपानी कबीर दास तेरी आरति कीनी निरंकार निरवानी
साधो सबद साधना कीजे जेहि सबद से परगट भये सब ,सोइ सबद गहि लीजे
गुरु सोई जो शबद सनेही , शबद बिना दूसरि नहि सेई शबद कमावे सो गुरु पूरा , उन चरनन की हो जा धूरा
और पहचान करो मत कोई, लक्ष अलक्ष न देखो सोई शब्द भेद लेकर तुम उनसे ,शब्द कमाओ तुम तन मन से
कह नानक जिस सतगुरु पूरा, बाजे ताके अनहद तूरा सबद भेद तुम गुरु से पाओ, सबद माहिं फ़िर जाहि समाओ
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