सोमवार, मई 17, 2010

बिना दूल्हे की बारात...इच्छाधारी नाग ..?

त्रिया चरित न जाने कोय , खसम मार के सती होय . ये कहावत आपने प्रायः सुनी होगी और आज के समय में तो इसके कई ज्वलंत उदाहरण भी मौजूद हैं और प्रायः
हमारे आसपास अक्सर देखने को मिल जाते हैं ..मुझे हैरत तो तब होती है जब ये कहावत में स्वयं औरतों के मुख से सुनता हूँ जिसे वे दूसरी औरतों के लिये इस्तेमाल करती है..अब क्योंकि ये प्राचीनकाल से प्रसिद्ध कहावत है इसलिये इस कहावत की कोई न कोई ठोस वजह अवश्य रही होगी..ये कहावत कब और क्यों चलन में आयी इसकी जानकारी मुझे अभी तक नहीं हुयी है..पर इस बात पर मैं अक्सर एक बात सोचता
हूँ कि एक मामूली मजदूर वर्ग के आदमी से लेकर एक प्रधानमन्त्री या शीर्ष उधोगपति जैसे आदमी भी प्रायः अपनी ब्याहता से इस तरह के षङयंत्र करते देखे गये हैं लेकिन पुरुषों के लिये इस तरह की फ़ेमस कहावत मेरी नजर से अभी तक नहीं गुजरी है . इसकी क्या वजह हो सकती है मैं सोचने में नाकामयाब रहा हूँ . क्योंकि मेरी नजर में तो कमोवेश स्री पुरुष समान व्यहवार ही करते है अगर एक पुरुष अत्यंत ग्यानी पुरुष हो सकता है तो विदुषी स्त्रियों के उदाहरण भी अनगिनत हैं अगर एक स्त्री कुलटा या व्यभिचारिणी हो सकती है तो कामभ्रष्ट कामी पुरुषो के काले कारनामों से भी इतिहास भरा पङा है..दरअसल स्त्री पुरुष जैसी भेद द्रष्टि अग्यान का परिणाम है आत्मिक ग्यान की कसौटी पर तो वह सिर्फ़ आत्मा या चेतन ही है..एक बार महाभारत
श्रीमदभगवदगीता आदि धर्मग्रन्थों के रचियता व्यास जी जब वृद्ध हो चुके थे..उनके युवा पुत्र श्री शुकदेव जी को वैराग हो गया और वे जंगल की और तपस्या करने जाने लगे..तब वृद्ध व्यास जी पुत्रमोह में उनक पीछे पीछे उन्हें मनाने दौङे..श्री शुकदेव जी तेजी से चले जा रहे थे..आगे सरोवर पर कुछ निर्वस्त्र स्त्रियां स्नान कर रही थी उनके कमर से ऊपर स्तन आदि अंग पूर्णत अनावृत थे..युवा शुकदेव जी निकलते चले गये और स्त्रियां पूर्ववतनहाती रहीं लेकिन जब वृद्ध व्यास जी निकले तो स्त्रियों ने तत्परता से वस्त्रों से अपने बदन को ढँक लिया और व्यास जी को आदर से प्रणाम किया..व्यास जी ने ये पूरा द्रश्य देखा था तो उनके मन में एक संशय प्रश्न उठ खङा हुआ . उन्होने कहा ..देवियों अभी मेरा युवा पुत्र तुम्हारे सामने से निकला तो तुमने अपने तन को छिपाने की कोई कोशिश नहीं की और मुझ वृद्ध को देखते ही तुमने ऐसा किया..इस का क्या रहस्य है..स्त्रियों ने विनम्रता से उत्तर दिया ..हे महात्मन आपके पुत्र की द्रष्टि में स्त्री पुरुष का भेद नहीं है वो सर्वत्र कण कण में व्याप्त अविनाशी चेतन को ही सर्वत्र देखता है..जबकि आप शरीरों को भेद द्रष्टि से देखते हैं ..इसी तरह का उदाहरण श्रीकृष्ण भक्त विदुर पत्नी का है..जिस समय श्रीकृष्ण विदुर जी के घर पहुँचे विदुर घर पर नहीं थे और विदुर पत्नी निर्वस्त्र अवस्था में स्नान कर रही थी..श्रीकृष्ण की आवाज सुनते ही उसने बाबली के समान दरबाजा खोल दिया..और उसी नग्न अवस्था में श्रीकृष्ण
की आवभगत करने लगी ..इत्तफ़ाक से इसी समय विदुर जी घर लौट आये और ये देखकर दंग रह गये कि उनकी पत्नी नग्न अवस्था में श्रीकृष्ण को केले के छिलके खिला रही है और गिरियां फ़ेंकती जा रही है..तब विदुर ने जाना कि असली प्रेमभक्ति क्या होती है..आईये आपको एक दिलचस्प कहानी सुनाते हैं .
एक राजा के चार रानिंया थी लेकिन बहुत समय बीत जाने के बाद भी उस राजा के कोई संतान नहीं हुयी थी इससे राजा बहुत उदास और मानसिक रूप से हताश और अशान्त रहता था..तब उन चारों रानियों ने एक योजना बनायी और झूठी खबर फ़ैला दी कि छोटी रानी को गर्भ ठहर गया है पूरे राज्य में खुशी की लहर फ़ैल गयी कि आखिरकार राज्य का वारिस आ ही गया...राजा की खुशी का ठिकाना न रहा उसने राज्य में मिठाईयां बँटबायी और दिल खोलकर गरीबों को दान दिया ...इस तरह झूठे गर्भ का नाटक चलता रहा और आखिर नौ महीने गुजर गये..तब
रानियों ने एक विश्वस्त दाई को अपने नाटक में शामिल कर लिया और फ़िर से झूठी खवर फ़ैला दी कि रानी ने एक सुन्दर राजकुमार को जन्म दिया है लेकिन..छोटी रानी को स्वप्न में किसी देवात्मा ने चेतावनी दी है कि राजकुमार को रानियों के अतिरिक्त और किसी को न दिखाया जाय अन्यथा ऐसा करने पर राजकुमार की मृत्यु हो जायेगी...राजा जो अपने पुत्र का मुँह निहारने के लिये के लिये व्याकुल था ये बात ( या आदेश ) सुनकर मन मसोसकर रह गया..लेकिन उसके सामने चारा ही क्या था..चलो इतना ही काफ़ी है कि उसके एक पुत्र तो है..इसके बाद रानियों ने एक पत्रा बाँचने वाले पुरोहित को भी अपने षडयंत्र में शामिल कर लिया और उसके मुँह से घोषणा करवा दी कि राजकुमार बेहद विचित्र ग्रहयोग लेकर जन्मा है इस ग्रहयोग के अनुसार राजकुमार के विवाह से पूर्व आम जनता या कोई भी उसे ( रानियों को छोङकर ) देखेगा तो राजकुमार तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा..सब लोग इस विचित्र भविष्यवाणी को सुनकर ठंडी आह भरकर रह गये और अपने राजकुमार को निहारने की हसरत दिल में ही रह गयी...हाँ रानियों ने उसका सौन्दर्य वर्णन अवश्य जनता के बीच पहुँचा दिया कि राजकुमार बेहद सुन्दर हैं और उसके चेहरे पर अनोखा तेज है..रानियों ने दाई और पुरोहित को धमकी दी कि ये भेद अगर खुल गया
तो उनका जो अंजाम होगा सो होगा ही वे उन दोनों को फ़ाँसी पर अवश्य चङवा देंगी सो वे विचारे डरकर चुप ही रहे . इस तरह अजन्मा राजकुमार जिसका कहीं कोई अस्तित्व ही न था जन्मदिन आदि और अन्य सभी दस्तूर निभाता हुआ अठारह बरस का हो गया और उसके विवाह हेतु प्रस्ताव आने लगे..और आखिरकार एक जगह उसका विवाह भी तय हो गया लेकिन जब कन्या के पिता (दूसरे राजा) ने वर को देखने की इच्छा व्यक्त की तो रानियों ने पुरोहित के समर्थन से कह दिया कि कुन्डली में ऐसा योग बनता है कि राजकुमार को उसी समय देखा
जा सकता है जब वह बारात लेकर कन्या के दरबाजे पर पहुँच जाय...कुछ असमंजस के बाद कन्या का पिता मान गया..आखिर ये बात किसी एरे गैरे की नहीं थी बल्कि राजघराने की बात थी...उसने सोचा कुछ ही समय की बात है जामाता को विवाह पर देख लेंगे और इस तरह विवाह तय हो गया..विवाह के सारे कार्य निर्विघ्न होते रहे और बारात जाने के समय रानियों ने गुँधे हुये आटे का मानवीय पिंड ( शरीर ) बनाकर पालकी में रख दिया और गहरी ताकीद कर दी कि पालकी को कोई खोले नहीं ..इस तरह ये बारात चलती हुयी एक बगीचे में आकर विश्राम के लिये ठहर गयी..उधर रानियों को अपनी मृत्यु स्पष्ट नजर आ रही थी झूठे खेल ने बङते बङते क्या रूप धारण कर लिया था इसकी उन्होनें कोई कल्पना नहीं की थी उन्हें लग रहा था कि राजा और प्रजा उन्हें निश्चय ही फ़ाँसी से कम कोई सजा नहीं देगें ..
इधर जिस बगीचे में यह बारात ठहरी हुयी थी उसमें एक इच्छाधारी नाग- नागिन का जोङा निवास करता था..नाग ने हँसते हुये नागिन से कहा कि तूने कभी बिना दूल्हे की बारात देखी है...नागिन ने हैरानी से कहा बिना दूल्हे की बारात भी कहीं होती है क्या..? नाग ने कहा कि हमारे बगीचे में जो बारात ठहरी हुयी है वो ऐसी ही है...और उसने नागिन को पूरा किस्सा बताया...इस पर कोमल नारी स्वभाव बाली नागिन ने कहा कि..ओह जब ये बारात दरबाजे
पर पहुँचेगी तो वर प्रतीक्षारत कन्या और अन्य लोगों पर क्या गुजरेगी..उफ़ स्वामी ये तो बङा अनर्थ ही होगा...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी तरह से ये शादी भी निर्विघ्न हो जाय तो कम से कम कन्या पर एकदम तो बिजली गिरने से बच जायेगी ..फ़िर बाद में तो स्थिति संभल सकती है..क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है.. प्राणनाथ...?
नाग ने कहा कि एक उपाय है उसके लिये यदि तू राजी हो तो में वर के स्थान पर मनुष्य का शरीर धारण करके बैठ जाता हूँ और इसका विवाह सम्पन्न कराके वापस इसी स्थान पर इनको छोङ दूँगा फ़िर इनके भाग्य में जो होगा वो ये जाने...कोई ना काहू सुख दुख कर दाता , निज कर कर्म भोग सब भ्राता...नारी स्वभाव बाली भोली नागिन इसके लिये सहर्ष तैयार हो गयी..नाग ने इच्छा से मनुष्य शरीर बनाया और पालकी में वर के स्थान पर बैठ गया..उसकी सुन्दरता और तेज कामदेव के समान था . जब बारात दरबाजे पर पहुँची और वर पालकी से उतरकर पहली बार आम लोगों से रूबरू हुआ तो उसे निहारने बाले लोग बेहोश होते होते बचे..वाकई रानिंया ठीक कहती थी वर सुन्दरता में कामदेव की मूरत नजर आ रहा था..लोग बङे खुश हुये इस अनोखे बहुचर्चित वर की चर्चाएं पहले ही आसमान छू रही थी उसकी बेमिसाल सुन्दरता ने तो मानों आसमान भी फ़ाङ दिया..कन्या पक्ष बाले जो तरह तरह से सशंकित थे अपनी इस उपलब्धि पर फ़ूलकर कुप्पा हो गये..सशंकित वरनी भी वर वर्णन से पुलकित हो उठी उसका सीना धाङ धाङकर बजने लगा ..oh my god..oh my god...नमो देवी नमुस्तते नमुस्तते सुन सिय सत्य असीस हमारी , पूजहु मनोकामना तुम्हारी..कन्या का वर वाकई सपनों का राजकुमार था..खैर साहब विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया..और बारात वापस उसी बगीचे में आकर ठहर गयी..नाग राजकुमारी के स्पर्श से कामासक्त हो रहा था और उससे यौनभोग करने हेतु व्याकुल हो उठा था पर उसे नागिन की तरफ़ से डर था..यदि वह सीधे सीधे अपने मनोभाव व्यक्त कर देता तो नागिन खूंखार तो हो ही जाती वरनी को डसकर उसका काम
तमाम कर देती ..
सो उसने एक योजना बनाते हुये नागिन को समझाया..कि देख यदि में इसको भली प्रकार घर तक छोङ आऊँ ..और कुछ दिन रहकर चुपचाप चला आऊँ तो सारी स्थिति ठीक हो जायेगी..इस तरह बहुत भला होगा और तमाम बातें बिगङने से बच जायेंगी..हालांकि नागिन के मन में भी ये बात थी कि हो न हो नाग अब इससे सम्भोग करने का बेहद इच्छुक हो सकता है..पर नाग ने ये बात ऐसा सीरियस मुँह बनाकर और तमाम धर्मकर्म की बातें जोङकर
पेश की कि नागिन हिचकते हुये तैयार हो ही गयी..नाग ने वादा किया कि चार दिन के बाद वो अवश्य लौट आयेगा...बारात राजमहल में पहुँच गयी..राजा अपने पुत्र को देखकर बहुत आनन्दित हुआ हाँ झूठी रानियों के आश्चर्य का ठिकाना न था..पर प्रत्यक्ष प्रमाण को वो कैसे नकार सकती थीं
तब उन्होंने सोचा कि स्वयं भगवान ने ही उनकी मदद की है और जो हुआ सो अच्छा ही हुआ ..आदि .नाग सब कुछ भूलकर नवयौवना पत्नी की यौवन गहराईयों में डूब गया..चार दिन की जगह एक महीना..फ़िर दो महीना..फ़िर चार महीना गुजर गये..उसने नागिन की कोई सुधि न ली और निरंतर कामभोग में लगा रहा ..उल्टे उसने एक बहाना तैयार करते हुये किले के चारों तरफ़ एक बङी खाई खुदबाकर..उसमें पानी आदि भरवाकर..कुछ इस तरह की मजबूत व्यवस्था करवा दी कि कोई सर्प जाति किसी भी सूरत में किले में प्रवेश नहीं कर सकती थी..दरअसल वो खूंखार नागिन क्या कर सकती है... इसे वो नाग भली भांति जानता था .
चार महीने के लम्बे इंतजार के बाद आखिर नागिन का धैर्य खत्म हो ही गया और वो नाग की तलाश में उस किले तक आ ही गयी और किले के चारों तरफ़ सुरक्षा के इंतजाम देखते ही वो अपने धोखेबाज और बेबफ़ा नाग के मंसूबों को भली भाँति समझ गयी...हालांकि ये इंतजाम उसके लिये कोई अहमियत नहीं रखते थे वो कोई अन्य रूप धारण करके महल में घुस सकती थी और वापिस फ़िर नागिन बन सकती थी..ये बात इच्छाधारी नाग भी भली भाँति जानता था पर इसीलिये शायद किसी ने कहा है कि कामवासना अन्धी ही होती है...नागिन ने मन में सोचा कि मैं तुम दोनों को ही सबक सिखाऊँगी और नागिन बने रहकर ही महल में प्रवेश करूँगी..इसी विचार के
तहत वो महल में जाने वाले फ़ूलों की डलिया में छुपकर अन्दर चली गयी और छुपकर रात होने का इंतजार करने लगी..अगले चार दिनों तक इसी तरह छुपकर वो नाग और अपनी सौतन की प्रेमलीला देखती रही..कामवासना में खोये नाग का इस तरफ़ कोई ध्यान न गया...अगर वो जरा भी होश में होता तो उसकी इस तरह की स्थिति के लिये सचेतक इंद्रिया उसे अवश्य सूचित कर देती..बल्कि कर रही थी..पर वह एक कामी पुरुष की भाँति अन्धा हो चुका था . उनके प्रेमालाप को देखते हुये उन्हें डसने को तत्पर नागिन अक्सर इस सोच में पङ जाती ..ओह कितनी सुन्दर जोङी है ..मानों एक दूजे के लिये ही बने हों..दोनों एक दूसरे को कितना प्रेम करते हैं ..क्या इनका वियोग कराना उचित होगा..नाग मुझसे ऊवकर इसमें दिलचस्पी ले रहा है तो इसमें उसका क्या दोष ये तो पुरुष का स्वाभाविक गुण है..और सबसे बङा सबाल इस राजकुमारी का आखिर क्या दोष है जो मैं इसे मृत्यु के मुख में ढकेल दूँ...इस तरह कभी वो उन्हें डसने की सोचती..कभी यूँ ही वापस लौट जाने की सोचती..फ़िर सोचती वापिस जाकर करेगी क्या..नाग के धोखा देने के बाद जीवन का अर्थ ही क्या रह गया है..इस तरह नागिन ने कई बार उन्हें डसने का निश्चय किया और त्याग दिया...उसने सोचा कि यदि में नाग को डस लेती हूँ तो हम दो विधवा हो जायेंगी..और यदि अपने सौतन को डसती हूँ तो संभव है कि नाग इसके विरह वियोग में प्राण त्याग दे तब भी मैं विधवा की विधवा ही रहूँगी...ऐसे उसने हजारों तरह से घुमाफ़िरा कर सोचा और तब...?
अगले दिन नाग जब सुबह सोकर उठा तो उसने देखा कि उसके विस्तर के पैरों वाले स्थान पर एक घायल मुख वाली मृतक नागिन पङी है पास ही रखी पाषाण मूर्ति पर सर पटक पटक कर उसने अपने प्राण त्याग दिये थे..कुछ ही मिनटों में नाग पूरी कहानी समझ गया..उसने झपटकर अपनी प्रियतमा को उठाया..और जार जार रोने लगा..अरे तूने एक बार तो बताया होता..एक बार तो अपने मन की बात कही होती..पता नहीं अंतिम समय में तू मुझसे क्या बात करना चाहती थी..अरे ये सब एक बार बताया होता..तेरी मृत्यु का मैं पूरा पूरा गुनहगार हूँ..

मंगलवार, मई 11, 2010

वैश्या मधुमती का योगदान..दशरथ के पुत्रेष्टि यग्य में ??

राजा दशरथ के चारों पुत्र पुत्रेष्टि यग्य द्वारा प्राप्त फ़ल या खीर द्वारा हुये प्रायः यह वाकया सभी जानते हैं पर इस यग्य को सम्पन्न करवाने में एक वैश्या ने अपना जीवन दाव पर लगा दिया था और एक द्रष्टिकोण से यह वैश्या राम आदि भाईओं की बूआ बन गयी इस बात को शायद बहुत कम ही लोग जानते होंगे .
दरअसल इस सृष्टि का निर्माण क्योंकि माया के परदे पर है इसलिये सत्य देख पाना बेहद कठिन होता है.
ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति वेद कहे .
सुन रावन ब्रह्माण्ड निकाया पाय जासु बल विचरित माया .
जैसे कभी हम सिनेमा देख रहे होते हैं और हमें बखूबी मालूम होता है कि ये कल्पित है फ़िर भी हम कथावस्तु के अनुसार भावों में खो जाते हैं और कुछ देर को उसी कहानी को सत्य की तरह जीने लगते हैं .
इस संदर्भ में मुझे दो विस्मयकारी ( होनी चाहिये ) बातें याद आती हैं . सिकन्दर महान और बादशाह अकबर . इनके दो अदभुत (मेरे ख्याल में) उदाहरण ही महान सत्य को उदघाटित करने हेतु काफ़ी हैं . सिकन्दर जब विश्वविजय यात्रा पर था कबीर ने उसे भिखारी कहा और फ़िर कई घटनाक्रमों के बाद वह कबीर का शिष्य बना न सिर्फ़ शिष्य बना उसने सुरति शब्द साधना का परम उपदेश भी लिया .दूसरा उदाहरण अकबर का लें एक बार अकबर तानसेन की बङे दिल से तारीफ़ कर रहा था तब तानसेन ने सकुचाते हुये कहा कि सम्राट मैं अपने गुरु हरिदास जी के पैरों की धूल भी नहीं हूँ . अकबर यह सुनकर भोंचक्का रह गया आनन फ़ानन वह हरिदास जी के पास पहुँचा तब उसे बोध हुआ कि तानसेन सही कह रहा है उसने उस अलौकिक ग्यान की अनुभूति की और हरिदास जी से उपदेश भी लिया .वह इस ग्यान से इतना प्रभावित हुआ कि उसने मथुरा वृन्दावन जो उस समय मात्र जंगल थे पर सुन्दर मन्दिर जनमभूमि आदि का पहली बार निर्माण कराया .बाद में राजपूत आदि अन्य कई राजाओं द्वारा उस निर्माण को आगे बङाया गया लेकिन उस की शुरुआत करने वाला अकबर ही था .
सतसंग सभा में जब कोई बात बहस का रूप ले लेती है मैं हमेशा एक ही बात अधिक कहता हूँ आप अपने समग्र अध्ययन का स्वतः मूल्यांकन करे फ़िर किसी बङी हस्ती जिसमें विलक्षण बदलाव हुआ हो उसको बारीकी से देखे फ़िर अपने स्तर से उसकी तुलना करे सच्चाई एकदम सामने होगी .
उदाहरण सिकन्दर और अकबर की तुलना में ये तर्क (प्राय कुतर्क) देने वाले कहाँ ठहरते है . इसी तरह हिंसा के पक्षधरों से में कहता हूँ कि आप सम्राट अशोक या अन्गुलिमाल जैसे हिंसक हो सकते हैं ...नहीं..तो जब उन जैसे बदल गये तो फ़िर आप देखें कि आप की स्थिति क्या है..यही सत्य की खोज है .
एक्चुअली सच्चाई को दबा देने से भ्रान्ति पैदा होती है जो हम ग्यानी लोग अपने अहम की तुष्टि और निज निहित स्वार्थ हेतु करते हैं..आप ईसामसीह को लें यदि ईसा के जीवन वृत का ईमानदारी से अवलोकन करें तो ईसा कई बार भारत आकर लम्बे समय तक रहे यहाँ किसी संत से ग्यान लिया...क्रूस से उतारे जाने के बाद भारत आये.. रहे .. जख्मों का इलाज कराया..अगर ये सभी इतिहास उसी तरह मनुष्य के सामने होता जैसा घटित हुआ था तो बहुत सी असाध्य बीमारियों से हम मुक्त होते जो फ़ालतू की हैं .
जब दशरथ जी को किसी प्रकार संतान प्राप्ति की आशा न रही तो उन्होने इस सम्बन्ध में अलौकिक ग्यान के दिग्गजों की एक मीटिंग बुलायी..और इस हेतु हर संभव उपाय बताने का निवेदन किया . तब उस मीटिंग में विद्वानों ने एकमात्र उपाय बताया जो बहुत ही दुष्कर था .वह उपाय ये था कि कोई ब्रह्मचर्य युक्त तपस्वी जिसकी तपस्या को बारह बरस पूरे हो चुके हों. दशरथ के पुत्रेष्टि यग्य में आहुति दे तो जो यग्यफ़ल प्राप्त होगा उससे संतान हो सकती है लेकिन तपस्वी द्वारा आहुति देने पर बारह बरस का अर्जित तप समाप्त (खर्च) हो जायेगा.अब ऐसा
कोई क्यों करेगा...जो अपना तप स्वयं नष्ट कर दे ? फ़िर भी राजा ने खोया ऊँट घङे में तलाशने जैसा काम किया . दशरथ ने ग्यानियों से आग्रह किया कि वे दिव्य द्रष्टि से देखे कि ऐसा तपस्वी इस समय कौन है तथा किस स्थान पर है .रिषियों ने देखा और मुस्कराकर कहा कि राजन वो आपके घर का ही है पर उसको राजी करना लगभग असंभव जैसा ही है . दशरथ ने निज स्वार्थवश वशीभूत होकर पूछा वह कौन है ?
श्रंगी रिषी . रिषियों ने जबाब दिया .
श्रंगी रिषी ये दो शब्द शक्तिशाली बम की तरह फ़टे क्योंकि श्रंगी को उनकी गुफ़ा से बाहर निकालना इतना कठिन था कि आसमान से तारे तोङना उसकी तुलना में बेहद सरल था श्रंगी एक रिस्ते से दशरथ के बहनोई लगते थे यधपि वे पूर्ण ब्रह्मचारी थे और उस समय तक काम और कामिनी से एकदम दूर थे . विवाह करने का तो कोई प्रश्न ही नही था. वहाँ से काफ़ी दूर बनप्रांत की एक गुफ़ा में तपस्या में लीन थे और कभी किसी से मिलते नहीं थे यहाँ तक कि लोगों ने उन्हें कभी देखा (तप के समय से ) भी नहीं था . दशरथ निराश हो गये लेकिन उम्मीद के तौर पर उन्होनें शहर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई श्रंगी को उनकी गुफ़ा से निकालकर दशरथ के महल तक लायेगा उसे इनाम से मालामाल कर दिया जायेगा . इस मुनादी पर लोग हँसे और कहा कि दशरथ बुढापे में सठिया गये हैं..श्रंगी जैसे तपस्वी को तप में छेङना यानी उनके शाप को न्योता देना है जो किसी को भी समूल तबाह कर सकता है फ़िर वह इनाम किसके लिये होगा ? आखिर ये चैलेंज एक वैश्या ने कबूल किया .
(थोङा विषयान्तर करते हुये मैं एक बात पर ध्यान दिलाना चाहूँगा कि आप देखे वैश्या त्रेता युग में भी थी .आखिर इस वैश्या का उपभोग कौन क्यों और क्या करता होगा ? क्या कुछ लोग उस समय भी रडुये थे ? या पत्नी वाले भी इस तरह के शौक रखते थे ? सबसे महत्वपूर्ण ये कि ये वैश्या दशरथ के राज्य में थी .ये बात खास उन लोगों के लिये है जो आज के समय को नैतिकता मूल्यों में गिरा मानते हैं और कहते हैं कि पहले का जमाना ऐसा नहीं था ? आप को उस धोवी का किस्सा भी याद होगा जिसके कारण सीता को पुनः वनवास हुआ .ये किस्सा इस बात की पुष्टि करता है कि आदमी को उस समय भी शक था कि उसकी औरत मौका मिलते ही पर पुरुष के साथ सहवास कर सकती है . जाहिर है ऐसी घटनायें होती होगी अन्यथा अकारण ही किसी बात का जन्म नहीं होता.)
वैश्या ने राजा से पाँच साल का समय और उस अवधि का पूर्ण खर्चा एडवांस मांगा जिसे राजा ने सहर्ष दिया . तब ये चतुर वैश्या उस स्थान पर गयी जहाँ तपस्वी श्रंगी तप में लीन थे .लगभग दस दिन उस गुफ़ा से बाहर एकान्त में छिपकर उस वैश्या ने यही पता लगाया कि श्रंगी चौबीस घन्टे में सिर्फ़ एक बार रात के बारह बजे गुफ़ा के द्वार पर लगा पत्थर थोङा खिसकाकर निकलते हैं और गुफ़ा के निकट खङे एक पेढ की छाल को (जिसे उन्होने चीर कर खुरच दिया था जिससे पेढ का रस निकलकर जमा हो जाता था ) जीभ से चाटते थे . बस यही उनका आहार था और यही उनकी सम्पूर्ण दिनचर्या भी थी .
हाय राम इसको पटाना तो बहुत मुश्किल है . लगता है बात बनेगी नहीं वैश्या ने सोचा . पर वैश्या भी अपने हुनर में बेहद कुशल थी उसने एक उपाय आजमाया और गुङ की चाशनी बनाकर उस स्थान पर लगा आयी जिसको श्रंगी चाटते थे . उस रात जब श्रंगी ने आहार लिया तो छाल मीठी मीठी लगी..वे चौंक कर चारो तरफ़ देखने लगे और
उनके मुँह से निकला अरे यह क्या..ये क्या..पर उत्तर कौन देता..कहीं कोई नहीं था वैश्या छुपकर ये नजारा देख रही थी कि देखें क्या प्रतिक्रिया होती है..श्रंगी थोङा देर इधर उधर देखते रहे और फ़िर गुफ़ा में चले गये ..वैश्या मुस्करायी . उपाय काम कर गया .
यह क्रम बीस दिनों तक चला..श्रंगी को इसका रहस्य पता न चला अलवत्ता उन्होनें सोचा ये व्यवस्था प्रभु प्रदत्त है .उन्हें बिना किये कुछ अधिक और अच्छा आहार मिल रहा था . इक्कीसबें दिन वैश्या ने गुङ की चाशनी के स्थान पर रबङी का लेप कर दिया . श्रंगी फ़िर चौंके अरे ये क्या...ये क्या..फ़िर कोई उत्तर नहीं..श्रंगी फ़िर गुफ़ा में अन्दर
सोचा ..प्रभु की ही लीला है जो भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं .वरना इस बियावान में पेङ पर इस तरह के खाद्ध पदार्थ कहाँ से आ सकते हैं ?
अगले तीस दिन तक वैश्या रबङी की मात्रा बङाती गयी और रेसिपी के विभिन्न नुस्खों को आजमाती हुयी कभी रबङी में किशमिश कभी घिसा नारियल चूरा कभी चिरोंजी जैसे आयटम जोङती गयी..श्रंगी थोङी देर अचंभित होते फ़िर प्रभु की लीला मानकर खा लेते क्योंकि दूर दूर तक ऐसा करने वाला कोई नहीं था..? सार ये कि श्रंगी की भूख जाग्रत होने लगी जो कि योग से स्थिर हो गयी थी . इसके बाद वैश्या ने पेङ पर कुछ लेप करने के बजाय स्वादिष्ट मेवायुक्त खीर बनाकर विधिवत तरीके से ढककर पेङ के नीचे रख दी..श्रंगी ने नियत समय पर आकर पेङ चाटा तो वहाँ कुछ नहीं था वे बहुत परेशान हुये..आहार लेने से भूख सता रही थी...तभी उनकी द्रष्टि पेङ के नीचे रखी कटोरी पर गयी..चौंककर कुछ सकुचाते हुये उन्होनें खीर उठा ली और पात्र हाथ में लेकर शंकित द्रष्टि से इधर उधर देखा और ऊँची आवाज में कहा..अरे कोई यहाँ है क्या..कोई उत्तर नहीं ...कुछ देर के चिंतन के बाद प्रभु चमत्कार मानकर
उन्होनें खीर खा ली..वैश्या रहस्यमय ढंग से मुस्करायी . यह क्रम भी एक महीने चला फ़िर उसने खीर के स्थान पर सम्पूर्ण भोजन की सुन्दर थाली रखी फ़िर वही...अगले दो महीने तक श्रंगी ने आम इंसान की तरह दाल सब्जी
पूङी परांठे खीर पापङ सलाद अचार सब खाया और उस अद्रश्य और चमत्कारिक खाने के आदी हो गये..बल्कि साधना में भी उन्हें ये चिंतन हो आता कि देखें आज भोजन में क्या मिले ?
इस स्थित में दस माह गुजर गये तब एक दिन खाने की वह स्वादिष्ट थाली गायब हो गयी..श्रंगी बहुत परेशान..भूख प्रबल हो रही थी...चारों तरफ़ व्याकुल होकर देखते कहीं कोई नहीं..उन्होनें ऊँची आवाज में कहा कि मुझे रोज भोजन देने वाला आज कहाँ है सामने आये..मैं भूख से व्याकुल हो रहा हूँ ..
प्रत्युत्तर में एक नारी आवाज आयी कि पहले आप वचन दें कि मेरी गलतियों को क्षमा करेंगे..और मेरी सेवा का अनुचित विचार से सम्बन्ध न जोङेंगे . हैरान श्रंगी ने जल्दी में वचन दे दिया . तुरन्त एक अप्रतिम सोन्दर्य की मालकिन यौवन के भार से लदी हुयी.पर दिखने में एकदम शालीन..युवती अन्धेरे से निकलकर बाहर आयी..उसने श्रंगी को करबद्ध प्रणाम किया और कहा कि प्रभो गत दस माह से आपकी सेवा करने वाली वो तुच्छ दासी में ही हूँ .
सेवा का प्रयोजन क्या है ?
कुछ नहीं सन्तों की सेवा में शान्ति और आनन्द तो है ही अक्षय फ़ल की प्राप्ति भी है . श्रंगी उसके भाव जानकर अत्यंत प्रसन्न हुये उन्होनें सोचा कि मेरा विचार कितना गलत था कि नारी महज वासना की पुतली है और पुरुषों के साधन मोक्षमार्ग में बहुत बङी बाधा है ...ओ हो.. मैं सोचता था ..नारी नारी..नहीं नरक का द्वार है.. ओ हो.. कितना गलत था मैं ..धन्य हो देवी तुम धन्य हो .
मेरा नाम मधुमती है प्रभो .
इस तरह कुछ समय तक मधुमती उसी समय उन्हें भोजन कराती..श्रंगी तुरंत गुफ़ा में जाने के स्थान पर कुछ देर तक उसके पास बैठकर उपदेश आदि करते..मधुमती का आंचल अक्सर उसके उन्नत उरोजों से उङ जाता..यौवनरस से लबालब भरे नारी स्तन के आकर्षण से श्रंगी बच न पाये..लेकिन दोनों ही इस बारे में अनभिग्य बने रहे..या जानबूझकर बहाना करते रहे ..धीरे धीरे मधुमती को गुफ़ा में प्रवेश की आग्या मिल गयी..और फ़िर वह कभी कभी..फ़िर अक्सर ही..फ़िर ज्यादातर ही गुफ़ा में आने जाने लगी..फ़िर साधिकार रहने लगी..उसका असली उद्देश्य श्रंगी द्वारा स्व योनि में शिश्न प्रहार का था..नारी की निरंतर निकटता से श्रंगी में कामरस उमङने लगा और वे काम के वशीभूत होकर..मधुमती से सम्भोग करने लगे . मधुमती काम को धर्मशास्त्र का अंग बताकर योनिच्छेद में लिंग प्रहार हेतु उकसाती श्रंगी को ये अनुचित इसलिये नहीं लगा क्योंकि उनकी साधना पूर्ववत चल रही थी..और मधुमती उनकी साधना तथा अन्य देखभाल पूरे मनोयोग से करती थी .
अगले चार सालों में मधुमती ने श्रंगी के चार पुत्रों को जन्म दिया . तब खर्चा आदि बढने की बात कहकर.. किसी माध्यम से धन की व्यवस्था हो ऐसा कहकर मधुमती ने उन्हें नगर जाने हेतु राजी कर लिया..क्योंकि अब उनके
बच्चे भी थे .श्रंगी परिस्थितियों के आगे विवश हो गये और इस तरह नियत समय में ही मधुमती उन्हें दशरथ के महल में लाने में कामयाब हो गयी..अब रास्ता आसान था..सब लोगों ने उन्हें समझाया कि वे दसरथ के पुत्रेष्टि यग्य में आहुति डाले..
श्रंगी भली भांति जानते कि उनका तप नष्ट हो जायेगा..लेकिन ऐसा करने पर राजा उन्हें भारी धन देते जिसको लेकर मधुमती अपने बच्चों को स्वयं पालने पर तैयार थी और वे फ़िर नये सिरे से निर्विघ्न साधना कर सकते थे..और मधुमती से कामवासना का लगाव भी अब नही रहा था..इस तरह परिस्थितियों से मजबूर श्रंगी ने आहुति
दी .यग्य फ़ल प्रकट हुआ जिसको खाकर दशरथ की रानियां गर्भवती हुयीं..श्रंगी के आगे सब भेद खुल गया पर इसको ईश्वर की इच्छा मानकर वे पुनः साधना के लिये चले गये..क्योंकि तिनका तिनका करके वे स्वयं कामवासना से मोहित हुये थे.

शनिवार, मई 01, 2010

है सब आतम सोय प्रकास सांचो

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे। हरि सिमरत जन गए निसतरि तरेहरि के नाम कबीर उजागर। जनम जनम के काटे कागरनिमत नामदेउ दूध पीआइया। तउ जग जनम संकट नहीं आइआजनम रविदास राम रंग राता। इउ गुर परसाद नरक नहीं जाता
है सब आतम सोय प्रकास सांचो। निरंतरि निराहार कलपित ये पांचों।।आदि मध्य औसान एक रस तारतम नहीं भाई। थावर जंगम कीट पतंगा, पूर रहे हरिराई।।सरवेसुर श्रबपति सब गति, करता हरता सोई। सिव न असिव न साध अरु सेवक, उभय नहीं होई।।धरम अधरम मोक्ष नहीं बंधन, जरा मरण भव नासा। दृष्टि अदृष्टि गेय अरु ज्ञाता, येक मेक रैदासा।।

हरि हरि हरि न जपसि रसना

हरि जपत तेऊ जना पदम कवलापति तास समतुल नहीं आन कोऊ। एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूर सोऊ।।जा के भागवत लेखी ऐ अवरु नहीं पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा। बिआस महि लेखी ऐ सनक महि पेखी ऐ नाम की नामना सपत दीपा।।जा के ईद बकरीद कुल गऊ रे वधु करहि मानी अहि सेख सहीद पीरा। जा के बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा।।जा के कुटंब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरह अजहु बनारसी आस पासा। आचार सहित विप्र करहि डंडवत तिन तने रविदास दासानुदासा।।
हरि हरि हरि न जपसि रसना। अवर सब छाड़ि बचन रचनासुध सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जाके रे। चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि करतल ताके।।नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही। व्यास विचार कहिओ परमारथ राम नाम सरि नाहीसहज समाधि उपाधि रहत होइ उड़े भाग लिव लागी। कह रविदास उदास दास मतित जनम मरन भय भागी।।

सो कत जाने पीर पराई

सो कत जाने पीर पराई। जाके अंतर दरद न पाई।।सह की सार सुहागनी जाने। तज अभिमान सुख रलीआ माने। तन मन देइ न अंतर राखे। अवरा देखि न सुने अभाखे।।दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी। जिन नाह निरंतहि भगति न कीनी। पुरसलात का पंथु दुहेला। संग न साथी गवनु इकेला।।दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ। बहुत पिआस जबाब न पाइआ। कहि रविदास सरन प्रभु तेरी। जिय जानहु तिउ करु गति मेरी।।

हउ बलि बलि जाउ रमईया कारने। कारन कवन अबोल।।हम सरि दीनु दयाल न तुमसरि। अब पतीआरु किआ कीजे। बचनी तोर मोर मन माने। जन कउ पूरनु दीजे।।बहुत जनम बिछुरे थे माधउ, इहु जनमु तुम्हरे लेखे। कहि रविदास अस लगि जीवउ। चिर भइओ दरसन देखे।।
हरि को टांडो लादे जाइ रे। मैं बनजारो राम को।। राम नाम धन पायो, ताते सहज करों व्योपार रेऔघट घाट घनो घना रे, निरगुन बैल हमार। राम नाम हम लादियो, ताते विष लादयो संसार रे।।अंतहि धरती धन धरयो रे, अंतहि ढूँढ़न जाइ। अंत को धरयो न पाइये ताते चलो मूल गंवाइ रेरैन गंवाई सोइ कर, दिवस गंवायो खाइ। हीरा यह तन पाइ कर कौड़ी बदले जाइ रे।।साध संगति पूँजी भई रे, वस्तु लई निरमोल। सहजि बलदवा लादि करि, चहु दिस टांडो मेल रे।।जैसा रंग कसूंभ का रे, तैसा यहु संसार। रमइया रंग मजीठ का, ताते भने रैदास बिचार रे।।

जिन यहु पंथी पंथ चलावा

सु कछु बिचारयो ताते मेरो मन थिर के रहयो।
हरि रंग लागो ताते बरन पलट भयोजिन यहु पंथी पंथ चलावा, अगम गवन मैं गमि दिखलावा।।अबरन बरन कथे जिन कोई, घट घटत ब्याप रहयो हरि सोई।।जिह पद सुर नर प्रेम पियासा, सो पद रम रहयो जन रैदासा।।
सेई मन समझ समरथ सरनागता। जाकी आदि अंत मधि कोई न पावे।। कोटि कारज सरे देह गुन सब जरे नेक जो नाम पतिव्रत आवे।।आकार की वोट आकार नहीं उबरे सिव बिरंच अरु बिसन ताई। जास का सेवग तास को पाई है, ईस को छांड़ि आगे न जाही।।गुणमई मूरति सोई सब भेख मिलि, निरगुन निज ठौर विश्राम नांही। अनेक जुग बंदगी बिबिध प्रकार कर अंत गुन सेई गुन में समाही।।पांच तत तीनि गुन जूगति कर कर सांईया आस बिन होत नहीं करम काया। पाप पुन बीज अंकूर जामे मरे, उपजि बिनसे तिती सब माया।।किरतम करता कहें, परम पद क्यूं लहें भूल भरम मैं परयो लोक सारा। कहे रैदास जे राम रमता भजे कोई एक जन गये उतर पारा।।

साध का निंदक कैसे तरे

सगल भव के नाइका। इक छन दरस दिखाइ जी।।कूप भरओ जैसे दादिरा कछु देस बिदेस न बूझ। ऐसे मेरा मन बिखिआ बिमोहिआ, कछु आर पार न सूझ।।मलिन भई मति माधव, तेरी गति लखी न जाइ। करहु किरपा भरमु चूकई मैं सुमति देहु समझाइ।।जोगीसर पावहि नहीं तुअ गुन कथन अपार। प्रेम भगति के कारने कह रविदास चमार।।
सब कछु करत न कहु कछु कैसे। गुन बिधि बहुत रहत ससि जैसेदरपन गगन अनींल अलेप जस, गंध जलध प्रतिबिम्ब देख तस।।
सब आरंभ अकाम अनेहा, विधि नषेध कीयो अनकेहा।।इहि पद कहत सुनत नहीं आवे, कहे रैदास सुकृत को पावे।।

साध का निंदक कैसे तरे। सर पर जानहु नरक ही परेजो कोऊ अढसठ तीरथ न्हावे। जे कोऊ दुआदस सिला पुजावे। जे कोऊ कूप तटा देवावे। करे निंद सब बिरथा जावे।।जे ओहु ग्रहन करे कुलखेति। अरपे नारि सीगार समेति। सगली सिमरति स्रवनी सुने। करे निंद कवने नही गुने।।जो ओहु अनिक प्रसाद करावे। भूमि दान सोभा मंडपि पावे। अपना बिगारि बिराना साढे। करे निंद बहु जोनी हाढे।।निंदा कहा करहु संसारा। निंदक का प्ररगटि पाहारा। निंदकु सोधि साधि विचारिआ। कहु रविदास पापी नरक सिधारिआ।।

संतो अनन भगति यह नांही

रे मन माछला संसार समंदे, तू चित्र बिचित्र बिचारि रे। जिहि गाले गिलिया ही मरिये, सो संग दूरि निवारि रेजम छेड़ि गणि डोरि छे कंकन, पर त्रिया गालो जान रे। होइ रस लुबधि रमे यू मूरख, मन पछतावे न्याणि रेपाप गिलयो छे धरम निबोली, तू देख देख फल चाख रे। पर त्रिया संग भलो जे होवे, तो राणा रावन देखि रेकहे रैदास रतन फल कारन , गोबिंद का गुन गाइ रे। काचो कुंभ भरयो जल जैसे, दिन दिन घटतो जाइ रे

संत की संगति संत कथा रस। संत प्रेम माझे दीजे देवा देवसंत तुझी तनु संगति प्रान। सतगुर ग्यान जाने संत देवा देवसंत आचरन संत को मारग। संत क ओल्हग ओल्हगणी।।अउर इक मागउ भगति चिंतामणि। जणी लखावहु असंत पापी सणि।।रविदास भणै जो जाने सो जान । संत अनंतह अंतर नाही।।
संतो अनन भगति यह नांही। जब लग सत रज तम पांचू गुण ब्यापत हैं या मांहीसोइ आन अंतर करे हरि सू अपमारग कू आने। काम क्रोध मद लोभ मोह की पल पल पूजा ठाने।।सति सनेह इष्ट अंगि लावे अस्थल अस्थल खेले। जो कुछ मिले आंनि अखित ज्यूं सुत दारा सिरि मेले।।हरिजन हरि बिन और न जाने तजे आन तन त्यागी। कहे रैदास सोई जन निरमल निसदिन जो अनुरागी।।

रथ को चतुर चलावन हारो

रथ को चतुर चलावन हारो। खिन हाकें खिण ऊभौ राखे नहीं आन को सारो।।जब रथ रहे सारहीं थाके तब को रथहि चलावे। नाद बिनोद सबे ही थाके मन मंगल नहीं गावे।।पांच तत को यहु रथ साज्यो अरधे उरध निवासा। चरन कंवल लौ लाइ रहयो है गुण गावे रैदासा।।

राम राय का कहिये यह ऐसी। जन की जानत हो जैसी।।मीन पकर काटयो अरु फाटयो बांट कीयो बहु बानी। खंड खंड कर भोजन कीनो तऊ न बिसारयो पानी।।ते हम बांधे मोह पास में हम तूं प्रेम जेवरिया बांध्यो। अपने छूटन के जतन करत हो हम छूटे तू आराध्यो।।कह रैदास भगति इक बाढ़ी अब काको डर डरिये। जा डर को हम तुम को सेवे सु दुख अजहू सहिये।।

रामहि पूजा कहा चढाऊं। फल अरु फूल अनूप न पांऊ।।थनहर दूध जु बछ जुठारयो पहुप भवर जल मीन बिटारयो। मलयागिर बेधियो भवंगा विष अमृत दोऊ एके संगा।।मन ही पूजा मन ही धूप मन ही सेऊ सहज सरूप।।पूजा अरचा न जानू राम तेरी कहे रैदास कवन गति मेरी।।

रामा हो जगजीवन मोरा तू न बिसार राम मैं जन तोरा॥संकट सोच पोच दिनराती करम कठिन मोर जात कुजाती॥हरहु बिपत भावे करहु सो भाव चरण न छाङो जाव सो जाव॥कह रैदास कछु देहु अलंबन बेगि मिलो जनि करो बिलंबन॥
रे चित चेत चेत अचेत काहे बालमीको देख रे। जाति ते कोई पद न पहुचा राम भगति बिसेष रेषट क्रम सहित जु विप्र होते हरि भगति चित दृढ नांहि रे। हरि कथा सू हेत नांही सुपच तुले तांहि रेस्वान सत्रु अजाति सब ते अंतर लावे हेत रे। लोग वाकी कहा जाने तीन लोक पवित रेअजामिल गज गनिका तारी काटी कुंजर की पास रे। ऐसे दुरमती मुकती कीये क्यूं न तरे रैदास रे

यह अंदेस सोच जिय मेरे

मैं का जानूं देव मैं का जांनू। मन माया के हाथ बिकानू।।चंचल मनवा चहु दिस धावे जिभ्या इंद्री हाथ न आवे। तुम तो आहि जगत गुर स्वामी, हम कहियत कलिजुग के कामी।।लोक बेद मेरे सुकृत बढ़ाई लोक लीक मोपे तजी न जाई। इन मिल मेरो मन जु बिगारयो, दिन दिन हरि जी सू अंतर पारयो।।सनक सनंदन महा मुनि ग्यानी सुख नारद ब्यास इहे बखानी। गावत निगम उमापति स्वामी सेस सहस मुख कीरत गामी।।जहाँ जहाँ जांऊँ तहाँ दुख की रासी जो न पतियाइ साध है साखी। जमदूतन बहु बिधि कर मारयो, तऊ निलज अजहू नहीं हारयो।।हरि पद बिमुख आस नहीं छूटे, ताते त्रिसना दिन दिन लूटे। बहु बिधि करम लीये भटकावे तुमह दोस हरि कौन लगावे।।केवल राम नाम नहीं लीया संतुति विषे स्वाद चित दीया। कहे रैदास कहाँ लग कहिये बिन जग नाथ सदा दुख सहिये।।

मो सउ कोऊ न कहे समझाइ। जाते आवागवन बिलाइ।।सतजुग सत तेता जगी दुआपर पूजाचार। तीनो जुग तीनो दिड़े कलि केवल नाम अधार।।पार कैसे पाइबो रे।। बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसे सभ लोइ। कवन करम ते छूटी ऐ जिह साधे सभ सिधि होई।।करम अकरम बीचारी ए संका सुन बेद पुरान। संसा सद हिरदे बसे कउन हरे अभिमान ।।बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतर बिबिध बिकार। सुध कवन पर होइबो सुव कुंजर बिधि बिउहार।।रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार। पारस मानो ताबो छुए कनक होत नहीं बार।।परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट। उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट।।भगत जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार। सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार।।अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरे भ्रम फास। प्रेम भगति नहीं उपजे ता ते रविदास उदास।।
यह अंदेस सोच जिय मेरे ।निसिबासर गुन गांऊ तेरे तुम चिंतित मेरी चिंतहु जाई ।तुम चिंतामनि हो एक नाई ॥भगत हेत का का नहिं कीन्हा ।हमरी बेर भए बलहीना ॥कह रैदास दास अपराधी ।जेहि तुम द्रवो सो भगति न साधी ॥

साध संगति बिना भाव नहीं उपजे

माया मोहिला कान्ह। मैं जन सेवक तोरा।।संसार परपंच मैं ब्याकुल परमानंदा। त्राहि त्राहि अनाथ नाथ गोबिंदारैदास बिनवे कर जोरी। अबिगत नाथ कवन गति मोरी

मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते। साध संगति पाइ परम गतेमैले कपरे कहा लउ धोवउ, आवेगी नीद कहा लगु सोवउ।।जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटयो। झूठे बनज उठि ही गई हाटयोकहु रविदास भइयो जब लेखो। जोई जोई कीनो सोई सोई देखो
मेरी प्रीति गोपाल सू जिनि घटे हो। मैं मोलि महंगी लई तन सटे हो।।हिरदे सुमिरन करों नैन आलोकना, श्रवना हरि कथा पूरि राखू। मन मधुकर करो चरणा चित धरो राम रसाइन रसना चाखू।।साध संगति बिना भाव नहीं उपजे भाव बिन भगति क्यूं होइ तेरी। बंदत रैदास रघुनाथ सुन बीनती, गुर प्रसादि क्रिया करो मेरी।।

पंच ब्याधि असाधि इहि तन

माधौ अविद्या हित कीन्ह। ताते मैं तोर नांउ न लीन्ह।।मिरग मीन भ्रिग पतंग कुंजर, एक दोस बिनास। पंच ब्याधि असाधि इहि तन, कौन ताकी आसजल थल जीव जंत जहाँ जहाँ लों करम पासा जाइ। मोह पासि अबध बाधो करिये कोन उपायत्रिजुग जोनि अचेत सम भूमि, पाप पुन्य न सोच। मानिषा अवतार दुरलभ, तिहू संकुट पोचरैदास दास उदास बन भव, जप न तप गुरु ग्यान। भगत जन भौ हरन कहियत, ऐसे परम निधान

माधौ भरम कैसे न बिलाइ। ताते द्वती भाव दरसाइकनक कुंडल सूत्र पट जुदा, रजु भुजंग भ्रम जैसा। जल तरंग पाहन प्रितमा ज्यूं ब्रह्म जीव द्वती ऐसा।।बिमल ऐक रस उपजे न बिनसे उदे अस्त दोई नांही। बिगता बिगत गता गति नांही, बसत बसे सब मांही।।निहचल निराकार अजीत अनूपम, निरभे गति गोबिंदा। अगम अगोचर अखिर अतरक, निरगुण नित आनंदा।।सदा अतीत ग्यान ध्यान बिरिजित, निरबिकार अबिनासी। कहे रैदास सहज सुनि सत जीवन मुकति निधि कासी।।
माधौ संगति सरनि तुम्हारी जगजीवन कृष्ण मुरारीतुम्ह मखतूल गुलाल चत्रभुज, मैं बपुरो जस कीरा पीवत डाल फूल रस अमृत, सहज भई मति हीरातुम्ह चंदन मैं अरंड बापुरो, निकट तुम्हारी बासा। नीच बिरख थे ऊंच भये, तेरी बास सुबास निवासाजाति भी ओछी जनम भी ओछा ओछा करम हमारा। हम सरनागति राम राय की, कहे रैदास बिचारा

माटी को पुतरा कैसे नचत है

माटी को पुतरा कैसे नचत है देखे देखे सुने बोले दउरिओ फिरत हैजब कुछ पावे तब गरब करत है। माइआ गई तब रोवन लगत हैमन बच क्रम रस कसहि लुभाना। बिनसि गइआ जाइ कहूं समानाकहि रविदास बाजी जग भाई। बाजीगर सउ मोहि प्रीति बनि आई

माधवे का कहिये भ्रम ऐसा तुम कहियत होह न जैसानृपति एक सेज सुख सूता, सपने भया भिखारी। अछत राज बहुत दुख पायो, सो गति भई हमारीजब हम हते तवे तुम्ह नांही, अब तुम्ह हो मैं नांही। सरिता गवन कीयो लहरि महोदधि, जल केवल जल मांहीरजु भुजंग रजनी प्रकासा, अस कछु मरम जनावा। समझ परी मोहि कनक अल्यंक्रत ज्यूं, अब कछू कहत न आवाकरता एक भाव जगि भुगता, सब घट सब बिधि सोई। कहे रैदास भगति एक उपजी, सहजे होइ स होई
माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि। तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि।।जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा। जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोराजउ तुम दीवरा तउ हम बाती। जउ तुम तीरथ तउ हम जातीसाची प्रीति हम तुम सिउ जोरी। तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरीजह जह जाउ तहा तेरी सेवा। तुम सो ठाकुरु अउरु न देवातुमरे भजन कटहि जम फांसा। भगति हेत गावे रविदासा

काम क्रोध में जनम गंवायो

भेष लियो पे भेद न जान्यो। अमृत लेई विष सो मान्योकाम क्रोध में जनम गंवायो, साधु संगति मिलि नाम न गायोतिलक दियो पे तपनि न जाई, माला पहिरे घनेरी लाईकह रैदास परम जो पाऊँ, देव निरंजन सत कर ध्याऊँ

मन मेरे सोई सरूप बिचार। आदि अंत अनंत परम पद, संशे सकल निवारजस हरि कहियत तस तो नहीं, है अस जस कछू तैसा। जानत जानत जानि रहयो मन, ताको मरम कहो निज कैसाकहियत आन अनुभवत आन, रस मिला न बेगर होई। बाहरि भीतर गुप्त प्रगट, घट घट प्रति और न कोईआदि ही येक अंत सो एके मधि उपाधि सु कैसे। है सो येक पे भरम ते दूजा, कनक अल्यंकृत जैसेकहै रैदास प्रकास परम पद, का जप तप ब्रत पूजा। एक अनेक येक हरि, करो कवन बिधि दूजा
मरम कैसै पाइवो रे। पंडित कोई न कहे समझाइ, जाते मेरो आवागवन बिलाइबहु बिधि धरम निरूपिये, करता दीसे सब लोई। जाहि धरम भरम छूटिये, ताहि न चीन्हे कोईअक्रम क्रम बिचारिये, सु्न संक्या बेद पुरान। बा्के हृदे भै भरम, हरि बिन कोन हरे अभिमानसतजुग सत त्रेता तप, द्वापर पूजा आचार। तीन्यू जुग तीन्यू दिढी, कलि केवल नाव अधारबाहर अंग पखालिये, घट भीतरि बिबधि बिकारसुचि कवन परिहोइये, कुंजर गति ब्योहाररवि प्रकास रजनी जथा, गत दीसे संसार पारस मनि तांबो छिवे। कनक होत नहीं बार, धन जोबन प्रभु ना मिलेना मिले कुल करनी आचार। एके अनेक बिगाइया, ताको जाने सब संसारअनेक जतन करि टारिये, टारी टरे न भरम पास। प्रेम भगति नहीं उपजे ताते रैदास उदास

कहाँ ते तुम आयो रे भाई

भाई रे राम कहाँ है मोहे बतावो। सत राम ताके निकट न आवो
राम कहत जगत भुलाना, सो यह राम न होई।
करम अकरम करुणामय केसो करता नाउं सु कोई
जा रामहि सब जग जाने भरम भूले रे भाई।
आप आप ते कोई न जाने कहै कोन सू जाई
सति तन लोभ परसि जीय तन मन, गुण परस नहीं जाई।
अखिल नाउं जाको ठौर न कतहू क्यूं न कहे समझाई
भयो रैदास उदास ताही ते करता को है भाई।
केवल करता एक सही करि, सत राम तिहि ठाई
भाई रे सहज बन्दी लोई, बिन सहज सिद्धि न होई। लौ लीन मन जो जानिये, तब कीट भृंगी होईआपा पर चीन्हे नहीं रे, और को उपदेस। कहाँ ते तुम आयो रे भाई, जाहुगे किस देसकहिये तो कहिये काहि कहिये, कहाँ कौन पतियाइ। रैदास दास अजान है करि, रहयो सहज समाइब

कहा भयो नाचे अरु गाये

बरजि हो बरजि बीठल, माया जग खाया। महा प्रबल सब ही बसि कीये, सुर नर मुनि भरमायाबालक बिरध तरुन अति सुंदर नाना भेष बनावे। जोगी जती तपी संन्यासी, पंडित रहन न पावेबाजीगर की बाजी कारन सबको कौतिग आवे । जो देखे सो भूल रहे वाका चेला मरम जु पावेखंड ब्रह्मंड लोक सब जीते, ये ही बिधि तेज जनावे । स्वंभू को चित चोरि लीयो है, वा के पीछे लागा धावेइन बातन सुकचनि मरियत है, सबको कहे तुम्हारी। नैन अटकि किन राखो केसो मेटहु बिपत हमारीकहै रैदास उदास भयो मन, भाजि कहाँ अब जइये। इत उत तुम्ह गोबिंद गुसांई, तुम्ह ही मांहि समइये

भगति ऐसी सुनहु रे भाई। आई भगति तब गई बड़ाईकहा भयो नाचे अरु गाये कहा भयो तप कीन्हे। कहा भयो जे चरन पखाले जो परम तत नहीं चीन्हेकहा भयो जू मूंड मुंड़ायो बहु तीरथ ब्रत कीन्हे। स्वामी दास भगत अरु सेवग, जो परम तत नहीं चीन्हेकहै रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावे । तज अभिमान मेटि आपा पर, पिपलक होइ चुन खावे

भाई रे भरम भगति सुजान। जो लो नहीं साच सू पहिचानि।।
भरम नाचन भरम गाइन भरम जप तप दान। भरम सेवा भरम पूजा, भरम सू पहिचानि।।
भरम षट क्रम सकल सहिता, भरम गृह बन जानि। भरम करि करम कीये, भरम की यहु बानि।।
भरम इंद्री निग्रह कीया, भरम गुफा में बास। भरम तो लो जानिये सुनि की करे आस।।
भरम सुध सरीर जो लो भरम नांउ बिनांउ। भरम भणि रैदास तो लो जो लो चाहे ठांउ

राम काहू के बांटे न आयो

प्रीति सधारन आव। तेज सरूपी सकल सिरोमनि, अकल निरंजन रावपीव संगि प्रेम कबहूं नहीं पायो कारन कौन बिसारी। चक को ध्यान दधिसुत को होत है, त्यूं तुम्ह ते मैं न्यारीभोर भयो मोहिं इकटग जोवत, तलपत रजनी जाइ। पिय बिन सेज क्यूं सुख सोऊ बिरह बिथा तन माइदुहागनि सुहागनि कीजे अपने अंग लगाई। कहै रैदास प्रभु तुम्हरे बिछोहे येक पल जुग भरि जाइ

बंदे जान साहिब गनी । समझ बेद कतेब बोले ख्वाब में क्या मनींज्वानी दुनी जमाल सूरत देखिये थिर नांहि बे। दम छसे सहस्र इकवीस हरि दिन, खजाने ते जांहि बेमती मारे गरब गाफिल, बेमिहर बेपीर बे। दरी खाने पङे चोभा, होत नहीं तकसीर बेकुछ गांठि खरची मिहर तोसा, खैर खूबी हाथ बे। धनी का फरमान आया, तब कीया चाले साथ बेतज बद जबां बेनजरि कम दिल, करि खसकी कांणि बे। रैदास की अरदास सुन कछू हक हलाल पिछाणि बे
बपुरो सत रैदास कहे। ग्यान बिचार नांइ चित राखे हरि के सरन रहे रेपाती तोङे पूज रचावे तारन तरन कहे रे। मूरत मांह बसे परमेसुर, तो पानी मांहि तिरै रेत्रिबिधि संसार कवन बिधि तरिबो जे दिढ नांव न गहे रे। नाव छाड़ि जे डूंगे बैठे, तौ दूना दूख सहे रेगुरु को सबद अरु सुरत कुदाली, खोदत कोई लहे रे। राम काहू के बांटे न आयो सोने कूल बहे रेझूठी माया जग बहकाया, तो तनि ताप दहे रे। कहे रैदास नाम जप रसना माया काहू के संग न रहे रे

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरे दिन राती॥प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करे रैदासा॥

प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी।जग जीवन राम मुरारी॥गली गली को जल बह आयो सुरसरि जाय समायो।संगत के परताप महातम नाम गंगोदक पायो॥स्वाति बूंद बरसे फन ऊपर सोई विष होइ जाई।ओही बूंद के मोती निपजे संगति की अधिकाई॥तुम चंदन हम रेंड बापुरे निकट तुम्हारे आसा।संगति के परताप महातम, आवे बास सुबासा॥जाति भी ओछी करम भी ओछा ओछा कसब हमारा।नीचे से प्रभु ऊँच कियो है कह रैदास चमारा॥
प्रानी क्या मेरा क्या तेरा। जैसे तरवर पंखि बसेरा।।जल की भीत पवन का थंभा रकत बूंद का गारा। हाड़ मास नाड़ी को पिंजरू पंखी बसे बिचारा।।राखहु कंध उसारहु नीवा साढ़े तीनि हाथ तेरी सीवाबंके बाल पाग सिर डेरी यह तन होयगो भसम की ढेरीऊचे मंदर सुंदर नारी। राम नाम बिन बाजी हारी मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनम हमारा। तुम सरनागत राजा रामचंद कहि रविदास चमारा

पांडे कैसी पूज रची रे

पांडे कैसी पूज रची रे। सत बोले सोई सतबादी झूठी बात बची रेजो अबिनासी सबका करता, ब्याप रहयो सब ठौर रेपंच तत जिन कीया पसारा, सो यों ही किधों और रेतू ज कहत है यो ही करता, या को मनिख करे रे तारन सकति सहीजे यामें तो आपन क्यूं न तरे रेअही भरोसे सब जग बूझा, सुन पंडित की बात रेयाके दरस कौन गुन छूटा, सब जग आया जात रे याकी सेव सूल नहीं भाजे कटे न संसे पास रे। सोच बिचार देखया मूरत यों छाडो रैदास रे

पावन जस माधो तोरा तुम्ह दारन अध मोचन मोराकीरत तेरी पाप बिनासे लोक बेद यूं गावे। जो हम पाप करत नहीं भूधर, तो तू कहा नसावेजब लग अंग पंक नहीं परसे तो जल कहा पखाले। मन मलन बिषया रस लंपट तो हरि नांउ संभालेजो हम बिमल हिरदे चित अंतर दोस कवन पर धर हो। कह रैदास प्रभु तुम्ह दयाल हो अबंध मुकत कब करि हो
पार गया चाहे सब कोई। रहि उर वार पार नहीं होईपार कहें उर वार सू पारा बिन पद परचे भरमहि गवारापार परम पद मंझि मुरारी, तामें आप रमे बनवारीपूरन ब्रह्म बसे सब ठाइंर कहे रैदास मिले सुख सांइर

बालक बुधि गंवार न चेत्या

नहीं बिश्राम लहूँ धरनीधर। जाके सुर नर संत सरन अभिअंतरजहाँ जहाँ गयो तहाँ जनम काछे तृबिधि ताप तृ भुवनपति पाछेभये अति छीन खेद माया बस, जस तिन ताप पर नगरि हते तसद्वारे न दसा बिकट बिष कारन, भूल परयो मन या बिषया बनकह रैदास सुमरो बड़ राजा काट दिये जन साहिब लाजा

नाम तेरो आरती भजनु मुरारे। हरि के नाम बिनु झूठे सगल पसारेनाम तेरो आसनो नाम तेरो उरसा नाम तेरा केसरो ले छिड़का रे नाम तेरा अंमुला नाम तेरो चंदनो, घसि जपे नाम ले तुझहि का उचारेनाम तेरा दीवा नाम तेरो बाती नाम तेरो तेल ले माहि पसारे। नाम तेरे की जोति लगाई भइआ उजियारो भवन सगला रेनाम तेरो तागा नाम फूल माला, भार अठारह सगल जूठा रे। तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नाम तेरा तुही चवर ढोला रेदसअठा अठसठे चारे खानी इहे वरतनि है सगल संसारे। कह रविदास नाम तेरो आरती सतिनाम है हरि भोग तुहारे

परचे राम रमे जे कोइ पारस परसे दुबिध न होइ
जो दीसे सो सकल बिनास अण दीठे नांही बिसवास
बरन रहित कहे जे राम सो भगता केवल निहकाम
फल कारन फले बनराइ उपजे फल तब पुहप बिलाइ
ग्यानह कारन क्रम कराई, उपजो ग्यान तब क्रम नसाइ
बटक बीज जैसा आकार पसरयो तीन लोक बिस्तार ..जहां का उपजा तहां समाइ सहज सुन्य में रहो लुकाइ
जो मन ब्यदे सोई ब्यंद, अमावस मैं ज्यू दीसे चंद ..जल मैं जैसे तूबां तिरे परचे प्यंड जीवे नहीं मरे
जो मन कौन ज मन कू खाइ बिन द्वारे त्रीलोक समाइ ..मन की महिमा सब कोइ कहे पंडित सो जे अनभे रहे
कहे रैदास यह परम बैराग राम नाम किन जपऊ सभाग..घृत कारन दधि मथे सयान जीवन मुकति सदा निरवान
पहले पहरे रैणि दे बनजारया, तें जनम लीया संसार वेसेवा चुका राम की बनजारया, तेरी बालक बुधि गंवार वे बालक बुधि गंवार न चेत्या भूला माया जाल वेकहा होइ पीछे पछताये जल पहली न बंधी पाल वे बीस बरस का भया अयाना थंभ न सकया भार वेजन रैदास कहे बनजारा, तें जनम लया संसार वे

कैसै भगति करों राम तोरी

न बीचारिओ राजा राम को रस जिह रस अनरस बीसरि जाहीदूलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकेराजे इन्द्र समसरि ग्रिह आसन बिन हरि भगति कहहु किह लेखेजान अजान भए हम बावर सोच असोच दिवस जाहीइन्द्री सबल निबल बिबेक बुधि परमारथ परवेस नहींकहीअत आन अचरीअत आन कछु समझ न परे अपर माइआ कहि रविदास उदास दास मति परहरि कोपु करहु जीअ दइआ

नरहरि चंचल मति मोरी कैसै भगति करों राम तोरी तू कोहि देखे हूँ तोहि देखे प्रीती परस्पर होई तू मोहि देखे हों तोहि न देखों इहि मति सब बुधि खोई सब घट अंतर रमस निरंतर, मैं देखत ही नहीं जाना गुन सब तोर मोर सब औगुन कृत उपगार न मानामैं ते तोरि मोरी असमझ सों, कैसे करि निसतारा कहे रैदास कृश्न करुणामय जै जै जगत अधारा

नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटसि ना दीनानाथ दयाल नरहरिजन मैं तोही ते बिगरा न अहो, कछू बूझत हू रसयान परिवार बिमुख मोहि लाग, कछू समझ परत नहीं जागइक भंमदेस कलिकाल, अहो मैं आइ परयो जम जाल कबहूक तोर भरोस, जो मैं न कहूँ तो मोर दोसअस कहियत तेऊ न जान, अहो प्रभू तुम्ह श्रबंगि सयानसुत सेवक सदा असोच, ठाकुर पितहि सब सोचरैदास बिनवे कर जोर अहो स्वामी तोहि नाहि न खोरिसु तो अपूरबला अक्रम मोर, बलि बलि जाऊं करो जिन और

दरसन दीजे राम दरसन दीजे दरसन दीजे

दरसन दीजे राम दरसन दीजे दरसन दीजे हो बिलंब न कीजेदरसन तोरा जीवन मोरा बिन दरसन का जीवे हो चकोरामाधौ सतगुर सब जग चेला इब के बिछुरे मिलन दुहेलातन धन जोबन झूठी आसा सत सत भाखे जन रैदासा

देवा हम न पाप करंता अहो अनंता पतित पावन तेरा बिड़द क्यू होतातोही मोही मोही तोही अंतर ऐसा कनक कुटक जल तरंग जैसातुम ही मैं कोई नर अंतरजामी ठाकुर ते जन जाणिये जन ते स्वामीतुम सबन मैं सब तुम्ह मांही रैदास दास असझसि कहे कहाँ ही

देहु कलाली एक पियाला ऐसा अवधू है मतिवालाए रे कलाली तें क्या कीया, सिरके सा तें प्याला दीयाथे कलाली प्याला देऊँ, पीवनहारे का सिर लेऊँचंद सूर दोऊ सनमुख होई, पीवे पियाला मरे न कोईसहज सुनि मैं भाठी सरवे पीवे रैदास गुर मुखि दरवे

बोल बोल अपनी भगति क्यों खोले

तू कांइ गरबहि बावली। जैसे भादउ खूब राजु तू तिस ते खरी उतावलीतुझहि सुझता कछू नाहि। पहिरावा देखे ऊभि जाहि गरबवती का नाही ठाउ। तेरी गरदनि ऊपरि लवे काउजैसे कुरंक नहीं पाइओ भेदु। तन सुगंध ढूढे परदेसु अप तन का जो करे बीचारू। तिस नहीं जम कंकरू करे खुआरूपुत्र कलत्र का करहि अहंकारू। ठाकुर लेखा मगनहारू फेड़े का दुखु सहे जीउ। पाछे किसह पुकारहि पीउ पीउसाधू की जउ लेहि ओट। तेरे मिटह पाप सभ कोटि कोटि कह रविदास जो जपे नाम। तिस जातु न जनम न जोनि काम

तू जानत मैं किछु नहीं भव खंडन राम सगल जीअ सरनागति प्रभ पूरन काम दारिदु देखि सभ को हसे ऐसी दसा हमारी असटदसा सिधि कर तले सभ क्रिया तुमारीजो तेरी सरनागता तिन नाही भारू। ऊंच नीच तुमते तरे आलजु संसारूकहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करी जे जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजे

तेरा जन काहे को बोले।..बोल बोल अपनी भगति क्यों खोले
बोल बोलता बढे बियाध बोल अबोले जाई
बोले बोल अबोल को पकरे बोल बोले कू खाई
बोले बोल मांनि परि बोले बोले बेद बड़ाई।
उर में धरि धरि जब ही बोले तब हीं मूल गंवाई..बोल बोल औरह समझावे तब लग समझ नहीं रे भाई
बोल बोल समझ जब बूझी तब काल सहित सब खाई..बोले गुर अरु बोले चेला बोल्या बोल की परमिति जाई
कहे रैदास थकित भयो जब तब ही परमनिधि पाई

तब राम राम कह गावेगा

जो मोहि वेदन का सजि आखूँ। हरि बिन जीव न रहे कैसे कर राखूँजीव तरसे इक दंग बसेरा, करहु संभाल न सुर जन मोरा। बिरह तपे तन अधिक जरावे नींदड़ी न आवे भोजन नहीं भावेसखी सहेली ग्रब गहेली, पीव की बात न सुनहु सहेली। मैं रे दुहागनि अधिक रंजानी, गया सजोबन साध न मानीतू दाना सांइर साहिब मेरा, खिजमतिगार बंदा मैं तेरा। कहै रैदास अंदेसा एही, बिन दरसन क्यूँ जीवे हो सनेही

तब राम राम कह गावेगा। ररंकार रहित सबहिन ते अंतर मेल मिलावेगालोहा सम कर कंचन सम कर भेद अभेद समावेगा। जो सुख के पारस के परसें, तो सुख का कहि गावेगागुर प्रसाद भई अनभै मति, विष अमृत सम धावेगा। कहै रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावेगा
ताते पतित नहीं को अपावन। हरि तजि आनहि ध्यावे रे। हम अपूजि पूजि भये हरि ते नाउं अनूपम गावे रेअष्टादस ब्याकरन बखाने तीन काल षट जीता रे प्रेम भगति अंतरगति नाहीं, ताते धानुक नीका रेताते भलो स्वान को सत्रु, हरि चरना चित लावे रे मूवा मुकति बैकुंठा बासा, जीवत इहाँ जस पावे रे हम अपराधी नीच घर जनमे, कुटंब लोग करें हासी रे। कहै रैदास नाम जपि रसनी काटे जम की पासी रे

जो तुम तोरो राम मैं नहीं तोरो

जिह कुल साधु वेसनो होइ। बरन अबरन रंक नहीं ईसरू बिमल बासु जानी ऐ जग सोइब्रहमन बैस सूद अरु खत्री डोम चंडार मलेछ मन सोइ। होइ पुनीत भगवंत भजन ते आप तार तारे कुल दोइधन सु गाउ धन सो ठाउ धन पुनीत कुटंब सभ लोइ। जिन पीआ सार रस तजे आन रस होइ रस मगन डारे बिखु खोइ पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबर अउरु न कोइ। जैसे पुरैन पात रहे जल समीप भनि रविदास जनमें जग ओइ

जीवत मुकंदे मरत मुकंदे। ताके सेवक कउ सदा अनंदे।।मुकंद मुकंद जपहु संसार। बिन मुकंद तनु होइ अउहार। सोई मुकंदे मुकति का दाता। सोई मुकंदु हमरा पित मातामुकंद मुकंदे हमारे प्रान। जप मुकंद मसतक नीसान। सेव मुकंदे करे बैरागी। सोई मुकंद दुरबल धनु लाधीएक मुकंदु करे उपकारू। हमरा कहा करे संसारू। मेटी जाति हूए दरबारि। तुही मुकंद जोग जुगतारिउपजयो गियान हूआ परगास। करि किरपा लीने कर दास। कहु रविदास अब त्रिसना चूकी। जप मुकंद सेवा ताहू की

जो तुम तोरो राम मैं नहीं तोरो। तुम सो तोरि कवन सू जोरोतीरथ ब्रत का न करों अंदेसा, तुम्हारे चरन कंवल का भरोसाजहाँ जहाँ जांऊ तहाँ तुम्हारी पूजा, तुम्ह सा देव अवर नहीं दूजामैं हरि प्रीति सबन सू तोरी, सब स्यों तोरि तुम्हें स्यूं जोरीसब परहरि मैं तुम्हारी आसा मन क्रम वचन कहे रैदासा

झूठ रे यह तन झूठी माया

जय राम गोबिंद बीठल बासदेव। हरि बिश्न बैकुण्ठ मधुकीट भारी।। कृश्न केसो रिषीकेस कमलाकंत। अहो भगवंत त्रिबधि संतापहारीअहो देव संसार तो गहर गंभीर। भीतर भरमत दिस ब दिस दिस कछू न सूझे।। बिकल ब्याकुल खेद प्रणतंत परमहेत। ग्रसित मति मोहि मारग न सूझे।। देव इहि औसरि आन को जन संक्या समान। देव दीन उधरन चरन सरन तेरी।। नहीं आन गति बिपति को हरन और। श्रीपति सुनसि सीख संभाल प्रभु करहु मेरी।।अहो देव काम केसरि काल, भुजंग भामिनी भाल।
लोभ सूकर क्रोध बर बारनूँग्रब गैंडा महा मोह टटनीं, बिकट निकट अहंकार आरनू। जल मनोरथ ऊरमीं, तरल तृसना मकर इन्द्री जीव जंत्रक मांही। समक ब्याकुल नाथ, सत्य बिष्यादिक पंथ, देव देव विश्राम नांहीअहो देव सबे असंगति मेर, मधि फूटा भेर। नांव नव का बङे भाग पायो। बिन गुर करणधार डोले न लागे तीर। विषे प्रवाह गाह जाई। देव किह करों पुकार, कहाँ जांऊ। कासू कहूँ, का करूँ अनुग्रह दास की त्रासहारी। इति ब्रत मान और अवलंबन नहीं। तो बिन त्रिबधि नाइक मुरारी।।अहो देव जेते कये अचेत, तू सरबग मैं न जांनू। ग्यान ध्यान तेरो, सत्य सतिम्रिद परपन मन सा मल। मन क्रम बचन जमनिका, ग्यान बैराग दिढ़ भगति नाहीं। मलिन मति रैदास, निखल सेवा अभ्यास। प्रेम बिन प्रीति सकल संसे न जाहीं।।
जिन थोथरा पिछोरे कोई। जो र पिछोरे जिहि कण होईझूठ रे यह तन झूठी माया, झूठा हरि बिन जन्म गंवायाझूठा रे मंदिर भोग बिलासा, कह समझावे जन रैदासा

पढे गुने कछू समझ न परई

जग में बेद बैद मानी जे। इनमें और अंगद कछु औरे, कहो कवन परि कीजेभौ जल ब्याधि असाध प्रबल अति परम पंथ न गही जे। पढे गुने कछू समझ न परई, अनभे पद न लही जेचखि बिहूंन कतार चलत हैं, तिनहू अंस भुज दीजे। कहे रैदास बमेक तत बिन, सब मिल नरक परी जे

जन कू तारि तारि तारि तारि बाप रमइया। कठन फंद परयो पंच जमइयातुम बिन देव सकल मुनि ढूँढ़े, कहूँ न पायो जम पास छुड़इयाहमसे दीन, दयाल न तुमसे, चरन सरन रैदास चमइया
जब रामनाम कह गावेगा, तब भेद अभेद समावेगा जे सुख हवे या रसके परसे, सो सुख का कह गावेगागुरु परसाद भई अनुभौ मति, बिस अमरत सम धावेगा कह रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावेगा

गोबिंदे भव जल ब्याधि अपारा। तामें कछू सूझत वार न पारा

गोबिंदे भव जल ब्याधि अपारा। तामें कछू सूझत वार न पाराअगम ग्रेह दूर दूरंतर, बोलि भरोस न देहू। तेरी भगति परोहन, संत अरोहन, मोहि चढ़ाइ न लेहूलोह की नाव पखांनि बोझा, सुकृत भाव बिहूना। लोभ तरंग मोह भयो पाला, मीन भयो मन लीनादीनानाथ सुनहु बीनती, कोने हेतु बिलंबे। रैदास दास संत चरन, मोहि अब अवलंबन दीजे

चमरटा गांठि न जनई। लोग गठावे पनहीआर नहीं जिह तोपउ। नहीं रांबी ठाउ रोपउलोग गंठि गंठि खरा बिगूचा। हउ बिनु गांठे जाइ पहूचारविदासु जपे राम नाम, मोहि जम सिउ नाही काम
चल मन हरि चटसाल पढ़ाऊँगुरु की साटि ग्यान का अखिर, बिसरे तो सहज समाधि लगाऊँप्रेम की पाटी सुरति की लेखनी करिहूं, ररे ममे लिख आंक दिखाऊँइहि बिधि मुक्ति भये सनकादिक, रिदो बिदारि प्रकास दिखाऊँकागद केवल मति मसि कर निरमल, बिन रसना निसदिन गुण गाऊँक्हे रैदास राम जप भाई, संत साखि दे बहुरि न आऊँ

जब लग है या तन की आसा

गाइ गाइ अब का कह गांऊ। गावनहार को निकट बताऊँ
जब लग है या तन की आसा, तब लग करे पुकारा।
जब मन मिटयो आसा नहीं की, तब को गावनहारा।।
जब लग नदी न संमद समावे, तब लग बढे अहंकारा।
जब मन मिलयो राम सागर सू तब यह मिटी पुकारा।।
जब लग भगति मुकत की आसा, परम तत सुन गावे।
जहाँ जहाँ आस धरत है यह मन, तहाँ तहाँ कछू न पावे।।
छाड़े आस निरास परमपद, तब सुख सति करि होई।
कहे रैदास जासूं और कहत हैं, परम तत अब सोई।।

गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी। उर भुअंग भस्म अंग संतत बैरागीजाके तीन नैन अमृत बैन, सीसा जटाधारी, कोटि कलप ध्यान अलप, मदन अंतकारीजाके लील बरन अकल ब्रह्म, गले रुण्डमाला, प्रेम मगन फिरता नगन, संग सखा बालाअस महेश बिकट भेस, अजहू दरस आसा, कैसे राम मिलो तोहि, गावे रैदासा

झूठा जीवना सच करि जाना

क्या तू सोवे जण दिवाना। झूठा जीवना सच करि जानाजिन जीव दिया सो रिजक बड़ावे घट घट भीतर रहट चलावे। करि बंदगी छाड़ि मैं मेरा, हिरदे का राम संभाल सवेराजो दिन आवे सो दुख मैं जाई, कीजे कूच रहया सच नांही। संग चलया है हम भी चलना, दूर गवन सिर ऊपर मरनाजो कुछ बोया लुनियें सोई, ता मैं फेर फार कछू न होई। छाडे ओर कू भजे हरि चरना, ताका मिटे जनम अरु मरनाआगे पंथ खरा है झीना, खाडे धार जिसा है पैना। तिस ऊपर मारग है तेरा, पंथी पंथ संवार सवेराक्या तें खरचया क्या तें खाया, चल दरहाल दीवान बुलाया। साहिब तोपे लेखा लेसी, भीड़ पड़े तू भर भरदेसीजनम सिराना कीया पसारा, सांझ पड़ी चहु दिस अंधियारा। कहे रैदासा अग्यान दिवाना, अजहू न चेते दुनी फंध खाना
खालिक सकिसता मैं तेरा। दे दीदार उमेदगार बेकरार जीव मेराअवलि आख्यर इलल आदम, मौज फरेस्ता बंदा। जिसकी पनह पीर पेगम्बर, मैं गरीब क्या गंदातू हानिरा हजूर जोग एक, अवर नहीं दूजा। जिसके इसक आसिरा नांही, क्या निवाज क्या पूजानाली दोज हनोज बेबखत, कमि खिदमतगार तुम्हारा। दरमादा दरि ज्वाब न पावे कहे रैदास बिचारा

केसवे बिकट माया तोर

कान्हा हो जगजीवन मोरा। तू न बिसारीं राम मैं जन तोरा।।संकुट सोच पोच दिन राती, करम कठिन मेरी जाति कुभाती।।हरहु बिपत भावे करहु कुभाव, चरन न छाड़ूँ जाइ सु जाव। कह रैदास कछु देऊ अवलंबन, बेगि मिलो जनि करहु बिलंबन।।

किहि बिधि अणसरूं रे, अति दुलभ दीनदयाल। मैं महाबिषई अधिक आतुर, कामना की झाल।।कह द्यंभ बाहरि कीये हरि कनक कसौटी हार। बाहर भीतर साखि तू, मैं कीयो सुसा अंधियार।।कहा भयो बहु पाखंड कीये हरि हिरदे सपने न जान। ज्यू दारा बिभचारनी मुख पतिब्रता जीय आन।।मैं हिरदे हार बैठो हरी मो पे सरयो न एको काज। भाव भगति रैदास दे, प्रतिपाल करो मोहि आज।।

केसवे बिकट माया तोर। ताते बिकल गति मति मोर।।सु विष डसन कराल अहि मुख, ग्रसित सुठल सु भेख। निरखि माखी बके व्याकुल, लोभ काल न देख।।इन्द्रीयादिक दुख दारुन, असंख्यादिक पाप। तोहि भजत रघुनाथ अंतर ताहि त्रास न ताप।।प्रतंग्या प्रतिपाल चहु जुगि, भगति पुरवन काम। आस तोर भरोस है, रैदास जै जै राम।।

माया के भरम कहा भूलो

कहा सूते मुगध नर काल के मंझि मुख। तजि अब सति राम च्यंतत अनेक सुखअसहज धीरज लोप कृश्न उधरन कोप मदन भवंग नहीं मंत्र जंत्रा। विषम पावक झाल ताहि वार न पार लोभ की श्रपनी ग्यान हंताविषम संसार भौ लहर ब्याकुल तवे मोह गुण विषय सन बंध भूता। टेरि गुर गारड़ी मंत्र श्रवण दीयो जाग रे राम कह काइ सूतासकल सुमृत जिती, संत मत कहें तिती पाइ नहीं पनंग मति परम बेता। ब्रह्म रिषि नारदा स्यंभ सनिकादिका राम रमि रमत गये परितेताजजनि जाप निजाप रटणि तीर्थ दान, वोखदी रसिक गदमूल देता। नाग दवणि जरजरी राम सुमिरन बरी भणत रैदास चेतनि चेता
कहि मन राम नाम संभारि। माया के भरम कहा भूलो, जाहिगो कर झारदेख धूँ इहाँ कौन तेरो, सगा सुत नहीं नार। तोरि तंग सब दूर करि हें , दैहिगे तन जारप्रान गये कहु कौन तेरो, देख सोच बिचार। बहुरि इहि कल काल मांही, जीति भावे हारयहु माया सब थोथरी, भगति दिस प्रतिपार। कहि रैदास सत बचन गुर के सो जीय ते न बिसार

ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमार

ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमार। हिरदे राम गोबिंद गुन सार।। सुरसुरी जल लीया क्रित बारूणी रे, जैसे संत जन करता नहीं पान। सुरा अपवित्र नित गंग जल मानिये, सुरसुरी मिलत नहीं होत आन।।ततकरा अपवित्र करि मानिये, जैसे कागदगर करत बिचार। भगत भगवंत जब ऊपरे लेखिये, तब पूजिये करि नमसकार।।अनेक अधम जीव नाम गुण उधरे, पतित पावन भये परसि सार। भणत रैदास ररंकार गुण गावता, संत साधू भये सहजि पार।।

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करे ।गरीब निवाजु गुसाईआ मेरा माथे छत्रु धरे ॥ जाकी छोति जगत कउ लागे ता पर तुहीं ढरे ।नीचउ ऊच करे मेरा गोबिंदु काहू ते न डरे ॥नामदेव कबीरू तिलोचनु सदना सेनु तरे ।कहि रविदास सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभे सरे ॥
ऐसे जान जपो रे जीव। जप लेय राम न भरमो जीवगनिका थी किस करमा जोग पर पूरुष सो रमती भोगनिस बासर दुस्करम कमाई राम कहत बैकुंठ जाईनामदेव कहिए जाति के ओछ जाको जस गावे लोकभगति हेत भगता के चले अंकमाल ले बीठल मिलेकोटि जग्य जो कोई करे राम नाम सम तउ न निस्तरेनिरगुन का गुन देखो आई देही सहित कबीर सिधाईमोर कुचिल जाति कुचिल में बास भगति हेतु हरि चरन निवासचारिउ बेद किया खंडोति जन रैदास करे डंडोति

ऐसो कछु अनभे कहत न आवे। साहिब मेरो मिले तो को बिगरावे
सब में हरि हैं हरि में सब हैं, हरि आपन पौ जिन जाना।
अपनी आप साखि नहीं दूसर, जाननहार समाना..बाजीगर सूं रहन रही जे, बाजी का भरम इब जाना।
बाजी झूठ साच बाजीगर, जाना मन पतियाना..मन थिर होइ तो कोइ न सूझे, जाने जानन हारा।
कहे रैदास बिमल बसेक सुख, सहज सरूप संभारा

कवन भगित ते रहे प्यारो पाहुनो रे ।घर घर देखों मैं अजब अभावनो रे मैला मैला कपड़ा केता एक धोऊं ।आवे आवे नींदहि कहां लों सोऊँज्यों ज्यों जोड़े त्यों त्यों फाटे ।झूठे सबनि जरे उड़ि गये हाटे कह रैदास परो जब लेखयो ।जोई जोई कियो रे सोई सोई देखयो

ऐसा ध्यान धरूं बनवारी

ऐसा ध्यान धरूं बनवारी। मन पवन दिढ सुषमन नारीसो जप जपू जु बहुर न जपना सो तप तपूं जु बहुर न तपना। सो गुर करों जु बहुर न करना, ऐसे मरूं जैसे बहुर न मरना।।उलटी गंग जमुन मैं ल्याऊँ, बिन ही जल संजम के आंऊ। लोचन भर भर ब्यंव निहारूं जोति बिचार न और बिचारूं।।प्यंड परे जीव जिस घर जाता, सबद अतीत अनाहद राता। जा पर कृपा सोई भल जाने गूंगो सा कर कहा बखाने।।सुन्न मंडल में मेरा बासा ताते जीव मैं रहूं उदासा। कहे रैदास निरंजन ध्याऊँ, जिस घर जांऊ बहुर न आंऊ।।
ऐसी भगति न होइ रे भाई। राम नाम बिन जे कुछ करिये सो सब भरम कहाई।।भगति न रस दान भगति न कथा ग्यान भगत न बन में गुफा खुदाई। भगति न ऐसी हासि भगति न आसा पासि भगति न यहु सब कुल कानि गंवाई।।भगति न इंद्री बाधें भगति न जोग साधे भगति न अहार घटाये ए सब क्रम कहाई। भगति न निद्रा साधे, भगति न बैराग साधे, भगति नहीं यहु सब बेद बड़ाई।।भगति न मूंड़ मुड़ाये, भगति न माला दिखाये, भगत न चरन धुवाये, ए सब गुनी जन कहाई। भगति न तो लों जानी, जो लों आप कू आप बखानी, जोई जोई करे सोई क्रम चढ़ाई।।आपो गयो तब भगति पाई, ऐसी है भगति भाई, राम मिलयो आपो गुण खोयो, रिधि सिधि सबे जु गंवाई। कहे रैदास छूटी ले आसा पास, तब हरि ताही के पास, आतमा स्थिर तब सब निधि पाई।।

आयो हो आयो देव तुम्ह सरना

आयो हो आयो देव तुम्ह सरना। जानि क्रिया कीजे अपनो जना
त्रिबिधि जोनी बास जम की अगम त्रास तुम्हारे भजन बिन भरमत फिरयो।
ममता अहं विषय मद मातो इहि सुखि कबहू न दूभर तिरयो
तुम्हारे नांइ बेसास छाड़ी है आन की आस संसारी धरम मेरो मन न धीजे।
रैदास दास की सेवा मानि हो देवाधि देवा, पतित पावन नांउ प्रकट कीजे

इहि तनु ऐसा जैसे घास की टाटी। जलि गइओ घासु रलि गइओ माटीऊँचे मंदर साल रसोई। एक घरी फुनी रहनु न होईभाई बंध कुटंब सहेरा। ओइ भी लागे काढु सवेराघर की नारि उरहि तन लागी। उह तउ भूत करि भागीकहि रविदास सभे जग लूटआ। हम तउ एक राम कह छूटआ
इहे अंदेसा सोचि जिय मेरे। निस बासुरि गुन गाँऊ राम तेरेतुम्ह च्यतंत मेरी च्यंता हो न जाई, तुम्ह च्यंतामनि होऊ कि नांहीभगति हेत का का नहीं कीन्हा, हमारी बेर भये बल हीनाकहे रैदास दास अपराधी जिहि तुम्ह ढरवो सो मैं भगति न साधी

अबिगत नाथ निरंजन देवा

अबिगत नाथ निरंजन देवा। मैं का जांनू तुम्हारी सेवाबांधू न बंधन छांऊ न छाया तुमहीं सेऊ निरंजन रायाचरन पताल सीस असमाना सो ठाकुर कैसे संपटि समानासिव सनिकादिक अंत न पाया खोजत ब्रह्मा जनम गवायातोडूँ न पाती पूजों न देवा सहज समाधि करों हरि सेवानख प्रसेद जाके सुरसुरी धारा रोमावली अठारह भाराचार बेद जाके सुमृत सासा भगति हेत गावे रैदासा

अहो देव तेरी अमित महिमा, महादेवी माया। मनुज दनुज बन दहन, कलि विष कलि किरत सबे समय समंन।। निरबांन पद भुवन, नाम बिघनोघ पवन पातगरग उत्तम बामदेव, विस्वामित्र ब्यास जमदग्नि श्रिंगी ऋषि दुर्बासा। मारकंडेय बालमीक भृगु अंगिरा, कपिल बगदालिम सुकमातंम न्यासा।।अत्रिय अष्टावक्र गुर गजानन, अगस्त पुलस्त्य पारासर सिव विधाता। रिष जड़ भरत सऊ भरिष, चवन बसिष्टि जिह्वनि ज्यागबलिक तव ध्यानि राता।।ध्रुव अंबरीक प्रहलाद नारद, विदुर द्रोण अक्रूर पांडव सुदामा। भीषम उधव विभीषन चंद्रहास, बलि कलि भक्ति जुक्ति जयदेव नामा।।गरुड़ हनूमान मांन जनकात्मजा, जय बिजय द्रोपदी गिरि सुता श्री प्रचेता। रुकमांगद अंगद बसदेव देवकी, अवर अगिनत भक्त कहूं केता।।हे देव सेष सनकादि श्रुति भागवत, भारती स्तवत अनवरत गुणर्दुबगेवं। अकल अबिछन ब्यापक ब्रह्ममेक रस सुध चैतंनि पूरन मनेवं।।सगुण निरगुण निरामय निरबिकार, हरि अज निरंजन बिमल अप्रमेव। परमात्मा प्रकृति पर प्रमुचित, सचिदानंद गुर ग्यान मेव।।हे देव पवन पावक अवनि, जलधि जलधर तरनि। काल जाम मिति ग्रह ब्याध्य बाधा, गज भुजंग भुवपाल। ससि सक्र दिगपाल, आग्या अनुगत न मुचत मृजादा।।अभय बर ब्रिद प्रतग्या सत संकल्प, हरि दुष्ट तारन चरन सरन तेरे। दास रैदास यह काल ब्याकुल, त्राहि त्राहि अवर अवलंबन नहीं मेरे।।
आज दिवस लेऊँ बलिहारा ।मेरे घर आया राम का प्यारा आंगन बंगला भवन भयो पावन ।हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥करूं दंडवत चरन पखारूं ।तन मन धन उन उपर वारूं ॥कथा कहे अरु अरथ बिचारें ।आप तरें औरन को तारें ॥कह रैदास मिले निज दासा ।जनम जनम के काटे पासा ॥

अब मैं हारयो रे भाई

अब मैं हारयो रे भाई।
थकित भयो सब हाल चाल ते, लोग न बेद बड़ाई
थकित भयो गाइण अरु नाचण थाकी सेवा पूजा।
काम क्रोध ते देह थकित भई, कहूं कहाँ लूं दूजा
राम जन होउ न भगत कहाँऊ, चरन पखालूं न देवा।
जोई जोई करो उलट मोहि बाधें, ताते निकट न भेवा।।
पहली ग्यान का कीया चांदिणा पीछे दीया बुझाई।
सुन सहज मैं दोऊ त्यागे राम कहूं न खुदाई
दूरि बसे षट क्रम सकल अरु दूरिब कीन्हे सेऊ।
ग्यान ध्यान दोऊ दूर कीन्हे दूरिब छाड़े तेऊ
पंचू थकित भये जहाँ तहाँ जहाँ तहाँ थिति पाई।
जा कारन मैं दौरयो फिरतो सो अब घट में पाई ..पंचू मेरी सखी सहेली, तिन निधि दई दिखाई।
अब मन फूलि भयो जग महिया उलट आप मैं समाई..चलत चलत मेरो निज मन थाकयो अब मोपे चलयो न जाई।
साई सहज मिलयो सोई सनमुख कहे रैदास बताई

अब मोरी बूड़ी रे भाई। ता ते चढ़ी लोग बड़ाई..अति अहंकार उर मा सत रज ता में रहो उरझाई।
करम बलि बस परयो कछू न सूझे, स्वामी नांऊ भुलाई..हम मांनू गुनी जोग सुन जुगता, हम महा पुरष रे भाई।
हम मांनू सूर सकल बिधि त्यागी, ममता नहीं मिटाई..मानू अखिल सुन मन सोधयो सब चेतन सुध पाई।
ग्यान ध्यान सब हीं हम जान्यू, बूझे कौन सूं जाई...हम मानू प्रेम प्रेम रस जान्यू नौ बिधि भगति कराई।
स्वांग देखि सब ही जग लटकयो फिर आपन पौर बधाई..स्वांग पहरि हम साच न जांन्यू लोकन इहे भरमाई।
स्यंघ रूप देखी पहराई बोली तब सुध पाई...ऐसी भगति हमारी संतो, प्रभुता इहे बड़ाई।
आपन अनन और नहीं मानत, ताते मूल गंवाई...भणे रैदास उदास ताही ते, इब कछू मोपे करी न जाई।
आपो खोया भगति होत है, तब रहे अंतर उरझाई

अब हम खूब वतन घर पाया। उहॉ खैर सदा मेरे भाया।।बेगमपुर सहर का नांउ फिकर अंदेस नहीं तिह ठॉव।।नही तहॉ सीस खलात न मार है फन खता न तरस जवाल।।आवन जान रहम महसूर, जहॉ गनियाव बसे माबूंद।।जोई सेल करे सोई भावे, महरम महल में को अटकावे।।कहे रैदास खलास चमारा, सो उस सहर सो मीत हमारा।।

चंद सूर नहीं रात दिवस नहीं धरन अकास न भाई

अखि लख ले नहीं का कह पंडित कोई न कहे समझाई। अबरन बरन रूप नहीं जाके सु कहाँ ल्यो लाइ समाईचंद सूर नहीं रात दिवस नहीं धरन अकास न भाई। करम अकरम नहीं सुभ असुभ नहीं का कह देहु बड़ाईसीत बाइ उश्न नहीं सरवत काम कुटिल नहीं होई। जोग न भोग रोग नहीं जाके कहो नाम सत सोई निरंजन निराकार निरलेपहि निरबिकार निरासी। काम कुटिल ताही कह गावत हर हर आवे हासीगगन धूर धूसर नहीं जाके पवन पूर नहीं पानी। गुन बिगुन कहियत नहीं जाके कहो तुम्ह बात सयानीयाही सू तुम्ह जोग कहते हो, जब लग आस की पासी। छूटे तब हीं जब मिले एक ही भने रैदास उदासी

अब कुछ मरम बिचारा हो हरि। आदि अंत औसाण राम बिन कोई न करे निरवारा हो हरिजल में पंक पंक अमृत जल जलहि सुधा के जैसे। ऐसे करम धरम जीव बांधयो छूटे तुम्ह बिन कैसे हो हरिजप तप बिधि निषेद करुणामय पाप पुन दोऊ माया। अस मो हित मन गति विमुख धन, जनम जनम डहकाया हो हरिताड़ण, छेदण, त्रायण, खेदण बहु बिधि कर ले उपाई। लूण खड़ी संजोग बिना जैसे कनक कलंक न जाईभणे रैदास कठिन कलि केवल कहा उपाय अब कीजे। भौ बूड़त भेभीत भगत जन कर अवलंबन दीजे
अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी ।प्रभु जी तुम चंदन हम पानी जाकी अंग अंग बास समानी ।प्रभु जी तुम घन वन हम मोरा जैसे चितवत चंद चकोरा ।प्रभु जी तुम दीपक हम बाती जाकी जोति बरे दिन राती ।प्रभु जी तुम मोती हम धागा जैसे सोनहि मिलत सुहागा ।प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा ऐसी भक्ति करे रैदासा ।

राम कहो राम कहो राम कहो बावरे

ना वह रीझे जप तप कीन्हे ना आतम का जारे।ना वह रीझे धोती टांगे ना काया के पखारे॥दया करे धरम मन राखे घर में रहे उदासी।अपना सा दुख सबका जाने ताहि मिले अबिनासी॥सहे कुसब्द बाद हू त्यागे छाड़े गरब गुमाना।यही रीझ मेरे निरंकारकी कहत मलूक दिवाना॥

राम कहो राम कहो राम कहो बावरे।अवसर न चूक भोंदू पायो भला दाव रे॥जिन तोको तन दीन्हों ताको न भजन कीन्हों।जनम सिरानो जात लोहे कैसो ताव रे॥रामजी को गाय गाय रामजी को रिझाव रे।रामजी के चरन कमल चित्त माहिं लाव रे॥कहत मलूकदास छोड़ दे तें झूठी आसरे ।आनंद मगन होइ के हरि गुन गाव रे॥

सदा सोहागिन नारि सो जाके राम भतारा।मुख मांगे सुख देत है जगजीवन प्यारा॥कबहु न चढे रंडपुरा जाने सब कोई।अजर अमर अबिनासिया ताको नास न होईनर देही दिन दोय की सुन गुरुजन मेरी।क्या ऐसों का नेहरा मुए बिपति घनेरीना उपजे ना बीनसि संतन सुखदाई।कहें मलूक यह जानि के मैं प्रीति लगाई

हमसे जनि लागे तू माया।थोरे से फिर बहुत होयगी सुनि पैहे रघुराया॥अपने में है साहेब हमारा अजहू चेत दिवानी।काहु जनके बस परि जैहो भरत मरहुगी पानीतरह्वै चिते लाज करु जनकी डारु हाथ की फांसी।जन तें तेरो जोर न लहि है रच्छपाल अबिनासी॥कहे मलूका चुप करु ठगनी औगुन राउ दुराई।जो जन उबरे राम नाम कहि ताते कछु न बसाई॥

हरि समान दाता कोउ नांही सदा बिराजे संतन मांहीनाम बिसंभर बिस्व जिआवे सांझ बिहान रिजक पहुंचावेदेइ अनेकन मुख पर ऐने औगुन करे सोगुन करि माने॥काहू भांति अजार न देई जाही को अपना कर लेई॥घरी घरी देता दीदार जन अपने का खिजमतगार॥तीन लोक जाके औसाफ जनका गुनह करे सब माफ॥गरुवा ठाकुर है रघुराई कहे मूलक क्या करूं बड़ाई॥

आठ पहर यो झूमते ज्यों मात हाथी

दया धरम हिरदे बसे बोले अमरत बैन
तेई ऊंचे जानिये जिनके नीचे नैन॥आदर मान महत्व सत बालापन को नेह ।यह चारों तब ही गए जबहि कहा कछु देहु॥इस जीने का गर्व क्या कहा देह की प्रीत।बात कहत ढर जात है बालू की सी भीत॥अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।दास मलूका कह गए सबके दाता राम॥

दरद दिवाने बावरे अलमस्त फकीरा।एक अकीदा ले रहे ऐसे मन धीरा॥प्रेमी पियाला पीवते बिदरे सब साथी।आठ पहर यो झूमते ज्यों मात हाथी॥उनकी नजर न आवते कोइ राजा रंक।बंधन तोड़े मोह के फिरते निहसंक॥साहेब मिल साहेब भये कछु रही न तमाई।कहें मलूक किस घर गये जहं पवन न जाई॥

दीनदयाल सुनी जबते तब ते हिय में कुछ ऐसी बसी है।तेरो कहाय के जांऊ कहाँ मैं तेरे हित की पट खेंचि कसी है॥तेरो इ एक भरोसो मलूक को तेरे समान न दूजो जसी है।ए हो मुरारि पुकारि कहों अब मेरी हसी नहीं तेरी हसी है॥
नाम हमारा खाक है हम खाकी बन्देखाक ही ते पैदा किये अति गाफिल गन्देकबहु न करते बंदगी दुनिया में भूले।आसमान को ताकते घोड़े चढ़ि फूले॥जोरू लड़के खुस किये साहेब बिसराया।राह नेकी की छोड़ि के बुरा अमल कमायाहरदम तिस को यादकर जिन वजूद संवारा।सबे खाक दर खाक है कुछ समुझ गंवाराहाथी घोड़े खाक के खाक खानखानी।कहें मलूक रह जायगा औसाफ निसानी

गरब हिते रावन गया पाया दुख भारी

अब तेरी सरन आयो रामजबे सुनियो साध के मुख पतित पावन नाम॥यही जान पुकार कीन्ही अति सतायो काम॥बिषय सेती भयो आजिज कह मलूक गुलाम

कौन मिलावे जोगिया हो जोगिया बिन रहयो न जायमैं जो प्यासी पीव की रटत फिरों पिउ पीव।जो जोगिया नहिं मिलिहे हो तो तुरत निकासू जीवगुरुजी अहेरी मैं हिरनी गुरु मारे प्रेम का बान।जेहि लागे सोई जानई हो और दरद नहिं जानकहे मलूक सुनु जोगिनी रे तनहि में मनहिं समाय।तेरे प्रेम की कारने जोगी सहज मिला मोहि आय

गरब न कीजे बावरे हरि गरब प्रहारी।गरब हिते रावन गया पाया दुख भारीजरन खुदी रघुनाथ के मन नाहिं सुहाती।जाके जिय अभिमान है ताकि तोरत छातीएक दया और दीनता ले रहिये भाई।चरन गहो जाय साध के रीझे रघुराईयही बड़ा उपदेस है पर द्रोह न करिये।कह मलूक हरि सुमिरि के भौ सागर तरिये
तेरा मैं दीदार दीवाना।घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहू सुन साहेबा रहमाना॥हुआ अलमस्त खबर नहिं तन की पीया प्रेम पियाला।ठाढ़ होऊँ तो गिर गिर परता तेरे रंग मतवाला॥खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे ज्यों घर का बंदा जादा।नेकी की कुलाह सिर दिये गले पैरहन साजा॥तौजी और निमाज न जांनू ना जांनू धरि रोजा।बांग जिकर तब ही से बिसरी, जब से यह दिल खोज॥कह मलूक अब कजा न करिहो दिल ही सों दिल लाया।मक्का हज्ज हिये में देखा पूरा मुरसिद पाया॥
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