बुधवार, जून 30, 2010

यह आत्मा ब्रह्म है

अयमात्मा ब्रह्म । यह आत्मा ब्रह्म है । परन्तु यहाँ आत्मा शब्द जीवात्मा के लिये नहीं है । बल्कि यह तीनो शरीरों के योग द्वारा परित्याग पूर्वक आत्मतत्व का निर्देशक है । प्रथम पुरुष । मध्यम पुरुष । और उत्तम पुरुष । और आत्मा कृमशः एक दूसरे से अधिक समीपता के सूचक हैं । इसमें आठ प्रकृतियाँ । एक - मूल प्रकृति । दो - महतत्व । तीन - अहंकार । पाँच तन्मात्रा शब्द स्पर्श रूप रस गंध हैं । इसमें सोलह विकारों के रूप में पाँच स्थूल भूत । आकाश वायु अग्नि जल प्रथ्वी हैं । ग्यारह इन्द्रियाँ । पाँच ग्यानेन्द्रियाँ । कान त्वचा आँख जीभ नाक हैं । पाँच कर्मेंन्द्रिया । हाथ पैर लिंग गुदा वाणी हैं । और ग्यारहवाँ मन है । जिसके आगे कोई नया तत्व उत्पन्न हो उसे प्रकृति कहते है । जिसके आगे कोई नया तत्व उत्पन्न न हो उसे विकृति कहते हैं । ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँ च स्थूल भूत का शरीर प्रकट है । प्रत्यक्ष है । इसलिये ये विकृति है ।क्योंकि नया तत्व उत्पन्न नहीं होता । इनकी प्रकृति अनुमान गम्य है । जो इनमें अप्रकट है ।
ध्यान--स्थूल शरीर से अंतर्मुख होने पर ध्यान की प्रथम परिपक्व अवस्था में दिव्य निर्मल शब्द स्पर्श रूप रस गंध दिखता है । ये पाँच तन्मात्रा पाँच स्थूल भूतों की प्रकृति भी हैं । परन्तु प्रकट हो जाने पर ये विकृति हो गयीं । इसलिये इनकी प्रकृति भी अनुमान गम्य है । जो इनमें अप्रकट है । पाँच तन्मात्रा से अन्तर्मुख होने पर ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्रा की प्रकृति " अहंकार " का साक्षात्कार होता है । किन्तु प्रकट होने से ये भी विकृत हो गये । इसलिये इनकी भी प्रकृति भी अनुमान गम्य है । अहंकार से अन्तर्मुख होने पर अस्मितावृति और अस्मितावृति से " चेतन तत्व की और जाते हैं ।
चेतन तत्व के दो भेद हैं । जङतत्व + चेतनतत्व । ये शबल ऊपर और सगुण स्वरूप है ।
दूसरा शुद्ध है । जो परे है और निर्गुण स्वरूप है । अब इसमें मिश्रित के दो भेद हैं । व्यष्टि रूप से अनन्त शरीरों के सम्बन्ध से ह्रदयाकाश में जो बैठा है । समिष्टि रूप से सारे ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में जो ब्रह्माण्ड में व्यापक है । जो कामनाओं से रहित है । जो कामनाओं से बाहर निकल गया है । जिसकी कामनाएं पूरी हो गयीं हैं । या जिसको केवल आत्मा की ही कामना है । उसके प्राण नहीं निकलते । यानी वह जीव की तरह नहीं मरता । वह ब्रह्म ही हुआ ब्रह्म को पहुँचता है । ब्रह्म के शबल स्वरूप की उपासना और उसका साक्षात्कार कारण शरीर से होता है । शुद्ध चेतनतत्व में कारण शरीर और कारण जगत परे ही रह जाता है । यहाँ न द्वैत रह जाता है । और न अद्वैत । कोई द्वैत की और कोई अद्वैत की इच्छा करते है । ये दोनों शुद्ध परमातमतत्व को नहीं जानते । वह द्वैत अद्वैत दोनों से परे है । उसमें न द्वैत है और न अद्वैत है ।
तीन गुणों का स्वभाव इस तरह से है । सत का स्वभाव प्रकाश । रज का क्रिया । तम का स्थिति है । स्थूलभूतों की सूक्ष्मता के तारतम्य के लिये हुये पाँच तन्मात्राओं की एक सूक्ष्मावस्था होती है । जिसके अन्तर्गत सारे सूक्ष्म लोक लोकांतर हैं । प्रलय में केवल प्रथ्वी जल अग्नि का स्वरूप से लय और सृष्टि में उत्पन्न होना होता है ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

आईये खुद को जानें ।

1--आत्मा- जिसके पहचान के लिये इच्छा,द्वेष,सुख,दुख,ग्यान और प्रयत्न लिंग हैं यही भोगता है । यही निर्लेप भी है । इसी का सारा खेल है । ग्यान दृष्टि होने पर बंध मोक्ष मन का धर्म है ।
2--शरीर- जो चेष्टा,इंद्रियों और अर्थों का आश्रय है ।और भोग का स्थान है । बाह्य रूप में यह स्थूल है ।
3--इंद्रिय-आंख,नाक,कान,जीभ,त्वचा जिसके उपादान कारण प्रथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश हैं ।
ये भोग के साधन हैं । या ग्यानेन्द्रियां हैं ।
4--अर्थ या विषय-रस,रूप,गंध,स्पर्श,और शब्द हैं जो पांचो इंद्रियो के भोगने के विषय और पांच भूतों के यथायोग्य गुण भी हैं । मनुष्य में ये पाँचो होते हैं । अन्य जीवों में एक ही अधिक होता है ।
5--बुद्धि, ग्यान,उपलब्धि-ये तीनों पर्याय शब्द हैं.विषयों को भोगना या अनुभव करना बुद्धि है ।
6--मन-- जिसका लिंग एक से अधिक ग्यानेन्द्रियों से एक समय में ग्यान न होना है । जो सारी इन्द्रियों
का सहायक है । और सुख दुख आदि का अनुभव कराता है । पच्चीस प्रकृतियां । पाँच ग्यानेन्द्रियां । पाँच कर्मेंन्द्रियां । पाँच तत्वों के शरीर का राजा ये मन है ।
7--प्रवृति-- मन वाणी और शरीर से कार्य का आरम्भ होना प्रवृति है ।
8--दोष-- प्रवृत करना । जिनका लक्षण होता है । ये मोह राग द्वेश तीन दोष हैं ।
9--प्रेतभाव-- पुनर्जन्म अर्थात सूक्ष्म शरीर का एक शरीर को छोङकर दूसरे को धारण करना प्रेतभाव है । गीता में कृष्ण ने कहा था " हे अर्जुन सब भूतों में मैं ही स्थित हूँ । "
10--फ़ल--प्रवृत और दोष से जो अर्थ उत्पन्न हो । उसे फ़ल कहते हैं । फ़ल दो प्रकार का होता है ।
एक- मुख्य । दूसरा- गौण । मुख्य फ़ल में सुख दुख के अनुभव आते हैं । और गौण फ़ल में सुख दुख के साधन
शरीर इन्द्रियां विषय आदि का समावेश होता है ।
11-- दुख-- जिसका लक्षण पीङा होता है । सुख भी दुख के अंतर्गत है । क्योंकि सुख विना दुख के रह नहीं सकता । एक के बाद दूसरे का आना तय है । जैसे दिन के बाद रात और जीवन के मृत्यु निश्चित है ।
12--अपवर्ग-- दुख की निवृति हो जाना । ब्रह्म की प्राप्ति हो जाना । ग्यान की प्राप्ति । या सृष्टि से अलग ग्यान में प्रविष्ट को अपवर्ग कहते हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरुवार, जून 17, 2010

परिचय और तस्वीर

मेरे ब्लाग्स के बहुत से पाठकों ने यह इच्छा जतायी है कि मेरे गुरुदेव कौन है । और मैंने उनका कोई चित्र क्यों नहीं एड किया है । इसलिये मैं अपनी इस कमी को दूर कर रहा हूँ । श्री महाराज जी " अद्वैत ग्यान " के संत है । इनके सम्पर्क में मैं पिछले सात वर्षों से हूँ । इससे पूर्व मैंने अनेकों प्रकार की साधनाएं की । पर मेरी जिग्यासा और शंकाओं का समुचित समाधान नहीं हुआ । पर श्री महाराज जी के सम्पर्क में आते ही मेरा समस्त अग्यान नष्ट हो गया । मैं इस बात के लिये जोर नहीं देता कि आप मेरी बात को ही सत्य मान लें । पर आत्मा या आत्म ग्यान को लेकर
यदि आपके भी मन में कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको नहीं मिला है । या मेरी तरह आप भी जीवन के रहस्य और अनगिनत समस्यायों को लेकर परेशान हैं ( जैसे मैं कभी था )
तो " निज अनुभव तोहि कहूँ खगेशा । विनु हरि भजन न मिटे कलेशा । " वो कौन सा हरि का भजन है । जिससे जीवन के सभी कलेश मिट जाते है । " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू व्याधा । " वो कौन सी हरि की शरण है । या आप आत्मा परमात्मा की असली भक्ति या असली ग्यान के बारे में कोई भी प्रश्न रखते हैं । तो महाराज जी से बात कर सकते हैं । महाराज जी का सेलफ़ोन न . 0 9639892934 विशेष- महाराज का कहीं कोई आश्रम नहीं है । वे अक्सर भ्रमण पर रहते हैं । और किसी किसी समय एक गाँव के बाहर बम्बा के पास कुटिया में रहते हैं ।
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