शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

हमारी दुनिया एक सड़ी गली दुनियाँ है

हम सोचते हैं कि - परिभाषा को समझ लेने पर हम उस शब्द को समझ जायेंगे । जिसे परिभाषित किया गया है । लेकिन परिभाषा समझ नहीं होती । बल्कि इसके विपरीत । यह तो सोचने का सर्वाधिक विनाशक तरीका है । हम सुन्दर विश्व की परिभाषा इसलिए जानना चाहते हैं । ताकि हमें इस बारे में चिंतन मनन ना करना पड़े । दिमाग का इस्तेमाल ना करना पड़े । सब पका पकाया कोई हमें समझा दे । आप इस संबंध में किताबें उलट पलट कर या दार्शनिकों विचारकों के पास जाकर सुंदर विश्व का अर्थ जान लेना चाहते हैं । इससे आपको शब्दों के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा । हकीकत यह है कि उस प्रत्येक व्यक्ति को जिसे कि सुंदर विश्व की परिभाषा यथार्थ में जाननी समझनी है । उसे गहराई से इसका चिंतन मनन करना होगा । और उस शब्द के पीछे का सत्य भी जानना होगा ।
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आशा । विश्वास । भाव । और मानसिक स्थिति के अनुसार । सुन्दर विश्व का अलग अलग अर्थ हो सकता है । हो सकता है कि - दो अलग अलग व्यक्तियों की सुन्दर विश्व के बारे में अपनी अपनी परिभाषायें हों । जो सर्वथा विपरीत हों ।
अब जरा तथ्य देखिये । हमारी दुनिया एक सड़ी गली दुनियाँ है । यहाँ युद्ध हैं । धार्मिक । जातिवादी । आर्थिक । मानसिक सब तरह के विभाजन हैं । यह एक भृष्ट और विकृत संसार है ।
शब्दों में बह जाना ठीक नहीं । हमें बचपन से ही हमेशा यह सिखाया जाता है कि - क्या सोचें । यह हमें कभी नहीं सिखाया जाता कि - कैसे सोचें ?
सिमेटिक्स नामक विज्ञान में शब्दों के तात्पर्य का अध्ययन किया जाता है । जो भी शब्द आज वर्तमान में 


प्रचलित हैं । या नये शब्द अस्तित्व में आ रहे हैं । उनके विकास के मूल में एक संपूर्ण विज्ञान है । चूंकि शब्द हमें मानसिक और साथ ही भौतिक रूप से भी प्रभावित करते हैं । अतः यह महत्वपूर्ण है कि - हम उन्हें समझें । पर उनसे अप्रभावित रहें । जिस क्षण साम्यवाद शब्द का इस्तेमाल किया जाता है । यदि कोई पूंजीवादी सरोकार वाला व्यक्ति उसे सुन ले । तो उसे कंपकंपी छूटने लगती है । किसी गुरू के अनुयायी को आप यह समझायें कि - दूसरे के अनुयायी मत बनो । अनुयायी बनना नासमझी है । तो वह तुरन्त तनकर खड़ा हो जायेगा । और आपको भागने पर मजबूर कर देगा । शब्दों से होने वाला यह निरंतर भय समझ के अभाव के कारण होता है ।
आखिर शिक्षा का यही तो अर्थ है - शब्दों के माध्यम से दिये जाने वाले संप्रेषण को समझना । ना कि शब्दों में उलझ कर रह जाना ।
सुंदर विश्व जैसी कोई चीज नहीं होती । चीजें जैसी हैं । हमें उन्हें वैसा ही स्वीकारें । ना कि किसी आदर्श की तरह । विश्व कैसा होना चाहिए ? इस बारे में कोई आदर्श ना रखें । सभी आदर्श । आदर्श विद्यालय । आदर्श देश । आदर्श नायक । या अहिंसा आदि के सारे आदर्श बेतुके और हास्यास्पद होते हैं । भ्रामक होते हैं । तथ्यतः वास्तविक वही है । जो है । यदि सही मायने में हम विभिन्न चीजों को - गरीबी । भुखमरी । अलगाव । कटुता । आकांक्षा । लोभ । भृष्टाचार । भय आदि को जैसे वे हैं । वैसा का वैसा ही उन्हें यथा रूप समझ लें । तो हम सब इनसे निपट सकते हैं । इन्हें मिटा सकते हैं । किंतु यदि हम आदर्श बनाते हैं । हम कहते हैं कि - मुझे यह अथवा वह होना चाहिए । तो हम भ्रांतियों में भटकने लगते हैं । हमारे देश में सदियों से निरंतर जिन आदर्शों की घुट्टी पिलाई जाती रही है । वे सभी भृम हैं । अतः क्या यह उचित नहीं होगा कि -  अहिंसा की बातें करने की बजाय । हिंसा को समझा जाए ? यदि आप - जो हैं की समझ रखते हैं । तो ही किसी वास्तविक क्रांति की संभावना बनती है ।
मुझे नहीं मालूम । अगर आपने कभी इस बात पर गौर किया है । या नहीं कि किसी समस्या को जितना ज्यादा आप समझने की कोशिश करते हैं । जूझते हैं । बूझते हैं । समस्या को समझने में आपको उतनी ही मुश्किल आयेगी । लेकिन जिस पल आप संघर्ष करना बंद करते हैं । और उस समस्या को अपनी सारी कहानी सुनाने का मौका देते हैं । अपनी सारी हकीकत बयान करने देते हैं । तब बात समझ में आ जाती है । इससे हम यह स्पष्ट ही जान सकते हैं कि - किसी बात को समझने के लिए आपके मन का चुप होना बहुत जरूरी है । मन का बिना हाँ ना 


किये । निष्क्रिय रूप से जागरूक । सजग रहना जरूरी है । इस स्थिति में ही हममे जीवन की कई समस्याओं की समझ आती है । जे. कृष्णमूर्ति
- जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 11 मई 1895 को आन्ध्र प्रदेश के एक छोटे से कस्बे मदनापल्ली में एक धर्म परायण परिवार में हुआ था । उनका पूरा नाम जिड्डू या जिद्दू कृष्णमूर्ति है ।
विभिन्न धर्म ग्रंथो में वर्णित इस मान्यता के अनुसार कि मानवता के उद्धार के लिए समय समय पर परम चेतना मनुष्य रूप में अवतरित होती है । थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य पहले ही किसी विश्व गुरू के आगमन की भविष्यवाणी कर चुके थे । श्रीमती बेसेंट और थियोसोफ़िकल सोसायटी के प्रमुखों को जे.कृष्णमूर्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखे । जो कि एक विश्व गुरू में होते हैं । तो श्रीमती बेसेंट द्वारा किशोर वय में ही जे.कृष्णमूर्ति को गोद लेकर उनकी परवरिश पूर्णतया धर्म और आध्यात्म से ओत प्रोत परिवेश में की गई । उनकी संपूर्ण शिक्षा इंगलैण्ड में हुई ।
जे कृष्णमूर्ति ने किसी जाति राष्ट्रीयता अथवा धर्म में अपनी निष्ठा व्यक्त नहीं की । ना ही वे किसी परंपरा से आबद्ध रहे ।
सन 1922 में कृष्णमूर्ति किन्हीं गहरी आध्यात्मिक अनुभूतियों से होकर गुजरे । और उन्हें उस करूणा का स्पर्श हुआ । जिसके बारे में उन्होंने स्वयं कहा - वो करूणा सारे दुख कष्टों को हर लेती है ।
उन्होंने सत्य के मित्र और प्रेमी की भूमिका निभायी । लेकिन स्वयं को कभी भी गुरू के रूप में नहीं रखा ? उन्होंने जो भी कहा । वह उनकी अंतर दृष्टि का संप्रेषण था । उन्होंने दर्शन शास्त्र की किसी नई पद्धति या प्रणाली की व्याख्या नहीं की । बल्कि मनुष्य की रोज़मर्रा की जिन्दगी से ही भृष्ट और हिंसा पूर्ण समाज की चुनौतियों । मनुष्य की सुरक्षा । और सुख की खोज । भय । दुख । क्रोध जैसे विषयों पर कहा । बारीकी से मानव मन की गुत्थियों को सुलझा कर लोगों के सामने रखा । दैनिक जीवन में ध्यान के यथार्थ स्वरूप । धार्मिकता की महत्ता के बारे में बताया । उन्होंने विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में उस आमूल चूल परिवर्तन की बात कही । जिससे मानवता की वास्तविक प्रगति की ओर उन्मुख हुआ जा सके ।
उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि - मनुष्य की वैयक्तिक और सामाजिक चेतना दो भिन्न चीजें नहीं हैं ।

पिण्ड में ही बृह्माण्ड है । इसको समझाया । उन्होंने बताया कि - वास्तव में हमारी भीतर ही पूरी मानव जाति पूरा विश्व प्रतिबिम्बित है । प्रकृति और परिवेश से मनुष्य के गहरे रिश्ते और प्रकृति और परिवेश से अखण्डता की बात की । उनकी दृष्टि मानव निर्मित सारे बंटवारों । दीवारों । विश्वासों । दृष्टिकोणों से परे जाकर सनातन विचार के तल पर क्षण मात्र में जीने का बोध देती है ।
बुद्धत्व उपरांत 65 वर्षों तक वे अनथक सारी दुनियां में भृमण करते हुए । निज अंतर दृष्टि से उदभूत सार्वजनिक वार्ताओं । साक्षात्कार । निजी विवेचनाओं । संवाद । लेखन । और व्याख्यानों के माध्यम से सत्य के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराते रहे । उन्होंने बताया कि - किसी भी गुरू । संगठित धर्म । राजनीतिक । सामाजिक । आर्थिक उपाय से मनुष्य में भलाई । प्रेम और करूणा नहीं पैदा की जा सकती ।
उन्होंने कहा कि - मनुष्य को स्व बोध के जरिये । अपने आपसे परिचय करते हुए स्वयं को भय । पूर्व संस्कारों । सत्ता प्रामाण्य । और रूढ़ि बद्धता से मुक्त करना होगा । यही मनुष्य में व्यवस्था और आमूल चूल मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों का आधार हो सकता है ।
हर तरह की आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक दावेदारी को नकारना । और उन्हें भी कोई गुरू या अथॉरिटी ना बना डाले । इससे आगाह करना । उनके चेतावनी वाक्य थे ।
अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा - यहाँ किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है । यहाँ अनुयायी नहीं है । पंथ संप्रदाय नहीं है । व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए ? किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है ? और इसलिए हम एक ही तल पर । एक ही आधार पर । और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं । क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर मानव जीवन के अदभुत घटना कृम का अवलोकन कर सकते हैं ।
जे कृष्णमूर्ति ने स्वयं तथा उनकी शिक्षाओं को महिमा मंडित होने से बचाने और उनकी शिक्षाओं की व्याख्या की जाकर विकृत होने से बचाने के लिए लिए अमरीका । भारत । इंगलैण्ड । कनाडा । और स्पेन में फाउण्डेशन स्थापित किये ?
भारत इंगलैण्ड और अमरीका में विद्यालय भी स्थापित किये । जिनके बारे में उनका दृष्टि बोध था कि - शिक्षा में केवल शास्त्रीय बौद्धिक कौशल ही नहीं । वरन मन मस्तिष्क को समझने पर भी जोर दिया जाना चाहिये । जीवन यापन और तकनीकी कुशलता के अतिरिक्त जीने की कला कुशलता भी सिखाई जानी चाहिए ।
17 Fev 1986 को जे कृष्‍णमूर्ति‍  का देहावसान हुआ । जे कृष्णमूर्ति के मौलिक दर्शन ने पारंपरिक । गैर परंपरावादी विचारकों । दार्शनिकों । शीर्ष शासन संस्था प्रमुखों । भौतिक और मनोवैज्ञानियों और सभी धर्म । सत्य और यथार्थ परक जीवन में प्रवृत्त सुधिजनों को आकर्षित किया । और उनकी स्पष्ट दृष्टि से सभी आलोकित हुए हैं ।
उनके साहित्य में सार्वजनिक वार्तायें । प्रश्न उत्तर । परिचर्चाएं । साक्षात्कार । परस्पर संवाद । डायरी और उनका खुद का लेखन शामिल है । जो कि अब तक 75 से अधिक पुस्तकों और 700 से अधिक ऑडियो और 1200 से अधिक वीडियो कैसेटस सीडी के रूप में उपलब्ध है । उनका मूल साहित्य अंग्रेजी भाषा में है । जिसका कई मुख्य प्रचलित भाषाओं में अनुवाद किया गया है । वार्तायें । प्रश्न उत्तर । परिचर्चायें । साक्षात्कार । परस्पर संवाद । प्रवचनों के ऑडियो और वीडियो टेप भी उपलब्ध हैं ।

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