शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

मोक्ष का कारण कर्म है या ज्ञान ?

उस सत्चित आनन्द रूप आत्मा को नमस्कार है । जिससे सब भासते हैं । और जिसमें सब लीन और स्थिर होते हैं । एवं जिससे ज्ञाता । ज्ञान । ज्ञेय । दृष्टा । दर्शन । दृश्य । और कर्ता । करण । कर्म । सिद्ध होते हैं । जिस आनन्द के समुद्र के कण से सम्पूर्ण विश्व आनन्द वान है । और जिस आनन्द से सब जीव जीते हैं ।
अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण के मन में एक संशय उत्पन्न हुआ । तब वह उसके निवृत्त करने के अर्थ अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर विधि संयुक्त प्रणाम करके स्थित हुआ । और नमृता पूर्वक प्रश्न किया - हे भगवान ! आप सर्व तत्वज्ञ और सर्व शास्त्रों के ज्ञाता हो । एक संशय मुझको है । सो कृपा करके निवृत्त करो । मोक्ष का कारण कर्म है । या ज्ञान ? अथवा दोनों ?
अगस्त्य बोले - हे ब्रह्मण्य ! केवल कर्म मोक्ष का कारण नहीं । और केवल ज्ञान से भी । मोक्ष प्राप्त नहीं होता । मोक्ष की प्राप्ति । दोनों से ही होती है । कर्म करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है । मोक्ष नहीं होता । और अतःकरण की शुद्धि के बिना केवल ज्ञान से भी मुक्ति नहीं होती । इससे दोनों से मोक्ष की सिद्धि होती है । कर्म करने से अतःकरण शुद्ध होता है । फिर ज्ञान उपजता है । और तब मोक्ष होता है । जैसे दोनों पंखों से पक्षी आकाश मार्ग में सुख से उड़ता है । वैसे ही कर्म और ज्ञान दोनों से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
हे ब्रह्मण्य ! इसी आशय के अनुसार एक पुरातन इतिहास है । वह तुम सुनो ।
अग्निवेष का पुत्र कारण नाम ब्राह्मण गुरु के निकट जा षट अंगों सहित चारों वेद अध्ययन करके गृह में आया । और कर्म से रहित होकर तूष्णीं हो स्थित रहा । अर्थात संशय युक्त हो कर्मों से रहित हुआ ।
जब उसके पिता ने देखा कि - यह कर्मों से रहित हो गया है । तो उससे कहा कि - हे पुत्र ! तुम कर्म क्यों नहीं करते ? तुम कर्म के न करने से सिद्धता को कैसे प्राप्त होगे ? जिस कारण तुम कर्म से रहित हुए हो । वह कारण कहो ?
कारण बोला - हे पिता ! मुझको एक संशय उत्पन्न हुआ है । इसलिये कर्म से निवृत्त हुआ हूँ । वेद में एक ठौर तो

कहा है कि - जब तक जीता रहे । तब तक कर्म अर्थात अग्निहोत्र आदि करता रहे । और एक ठौर कहा है कि - न धन से मोक्ष होता है । न कर्म से मोक्ष होता है । न पुत्र आदि से मोक्ष होता है । और न केवल त्याग से ही मोक्ष होता है । इन दोनों में क्या कर्तव्य है ? मुझको यही संशय है । सो आप कृपा करके निवृत्त करो । और बतलाओ कि - क्या कर्तव्य है ?
अगस्त्य बोले - हे सुतीक्ष्ण ! जब कारण ने पिता से ऐसा कहा । तब अग्निवेष बोले - हे पुत्र ! एक कथा जो पहले हुई है । उसको सुन कर हृदय में धारण कर । फिर जो तेरी इच्छा हो । सो करना । एक काल में सुरुचि नामक अप्सरा । जो सम्पूर्ण अप्सराओं में उत्तम थी । हिमालय पर्वत के सुन्दर शिखर पर । जहाँ देवता और किन्नर गण जिनके हृदय कामना से तृप्त थे । अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करते थे । और जहाँ गंगा के पवित्र जल का प्रवाह लहर ले रहा था । बैठी थी । उसने इन्द्र का एक दूत अन्तरिक्ष से चला आता देखा । और जब निकट आया । तो उससे पूछा - अहो भाग्य । देवदूत ! तुम देवगणों में श्रेष्ठ हो । कहाँ से आये हो । और अब कहाँ जाओगे । सो कृपा करके कहो ?
देवदूत बोला - हे सुभद्रे ! अरिष्ट नेमि नामक एक धर्मात्मा राजर्षि ने अपने पुत्र को राज्य देकर वैराग्य लिया । और सम्पूर्ण विषयों की अभिलाषा त्याग करके । गन्धमादन पर्वत में जा तप करने लगा । उसी से मेरा एक कार्य था । और उस कार्य के लिये मैं उसके पास गया था । अब इन्द्र के पास जिसका मैं दूत हूँ । सम्पूर्ण वृतान्त निवेदन करने को जाता हूँ ।
अप्सरा ने पूछा - हे भगवान ! वह वृतान्त कौन सा है । मुझसे कहो ? मुझको तुम अति प्रिय हो । यह जानकर पूछती हूँ । महापुरुषों से जो कोई प्रश्न करता है । तो वे उद्वेग रहित होकर उत्तर देते हैं । देवदूत बोला - हे भद्रे ! वह वृतान्त मैं विस्तार पूर्वक तुमसे कहता हूँ । मन लगाकर सुनो ।
जब उस राजा ने गन्धमादन पर्वत पर बड़ा तप किया । तब देवताओं के राजा इन्द्र ने मुझको बुलाकर आज्ञा दी - हे दूत ! तुम गन्धमादन पर्वत पर जो नाना प्रकार की लताओं और वृक्षों से पूर्ण है । विमान । अप्सरा । और नाना प्रकार की सामग्री । एवं गन्धर्व । यक्ष । सिद्ध । किन्नर । ताल । मृदंग आदि वाध संग ले जाकर राजा को विमान पर बैठा के यहाँ ले आओ । तब मैं विमान और सामग्री सहित जहाँ राजा था आया । और राजा से कहा - हे राजन ! तुम्हारे कारण विमान ले आया हूँ । इस पर आरूढ़ होकर तुम स्वर्ग को चलो । और देवताओं के भोग भोगो ।
तब राजा बोला - हे दूत ! प्रथम तुम स्वर्ग का वृतान्त मुझे सुनाओ । तुम्हारे स्वर्ग में क्या क्या दोष और गुण हैं । तो उनको सुन कर मैं हृदय में विचारूँ । पीछे जो मेरी इच्छा होगी । तो चलूँगा । मैंने कहा - हे राजन ! स्वर्ग में बड़े 


बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्य वाले होते हैं । वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं । जो मध्यम पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं । और जो कनिष्ठ पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं । वे तो तुमसे कहे । अब स्वर्ग के जो दोष हैं । वे भी सुनो । हे राजन ! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं । और उत्तम सुख भोगते हैं । उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है । क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं । उनको देखकर क्रोध उपजता है कि - ये मेरे समान क्यों बैठे है । और जो आपसे नीचे बैठे हैं । उनको देखकर अभिमान उपजता है कि - मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि - जब पुण्य क्षीण होते हैं । तब जीव को उसी काल में मृत्यु लोक में गिरा देते हैं । एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं । हे भद्रे ! जब इस प्रकार मैंने राजा से कहा । तो राजा बोला - हे देवदूत ! उस स्वर्ग के योग्य हम नहीं हैं । और हमको उसकी इच्छा भी नहीं है । जैसे सर्प अपनी त्वचा को पुरातन जानकर त्याग देता है । वैसे ही हम उग्र तप करके यह देह त्याग देंगे । हे देवदूत ! तुम अपने विमान को जहाँ से लाये हो । वहीं ले जाओ । हमारा नमस्कार है ।
हे देवि ! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा । तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया । और सम्पूर्ण वृतान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ । और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला - हे दूत ! तुम फिर जहाँ राजा है । वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्म पद की इच्छा हुई है । इसलिये तुम

उसको अपने साथ वाल्मीकि के पास । जिसने आत्म तत्व को आत्माकार जाना है । ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि - हे महा ऋषे ! इस राजा को तत्व बोध का उपदेश करना । क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों भी इच्छा नहीं । इससे तुम इसको तत्व बोध का उपदेश करो । और यह तत्व बोध को पाकर संसार दुख से मुक्त हो ।
हे सुभद्रे ! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा । तब मैं वहाँ से चलकर राजा के निकट आया । और उससे कहा कि - हे राजन ! तुम संसार समुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकि जी के पास चलो । वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकि जी स्थान पर आया । और उस स्थान में राजा को बैठा । और प्रणाम कर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकि जी ने कहा - हे राजन ! कुशल तो है ? राजा बोले - हे भगवन ! आप परम तत्वज्ञ । और वेदान्त जानने वालों में श्रेष्ठ हैं । मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ । और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ । कृपा करके उत्तर दीजिए कि - संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो ?
इतना सुन वाल्मीकि बोले - हे राजन ! महा रामायण औषध तुमसे कहता हूँ । उसको सुन कर उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे । तब जीवन मुक्त होकर बिचरोगे । हे राजन ! वह वशिष्ठ और राम का संवाद है । और उसमें मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन कर जैसे राम अपने स्वभाव में स्थित हुए । और जीवन मुक्त होकर बिचरे हैं । वैसे ही तुम भी बिचरोगे ।

ज्ञान वान को भेद नहीं भासता

वशिष्ठ बोले - हे राम ! जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में कुछ भेद नहीं है । जैसे जल स्थिर हैं । तो भी जल है । और तरंग है । तो भी जल है । वैसे ही जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में कुछ भेद नहीं है । हे राम ! जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति का अनुभव तुमको प्रत्यक्ष नहीं भासता । क्योंकि स्व संवेद है । और उनमें जो भेद भासता है । सो सम्यक दर्शी को भासता है । ज्ञान वान को भेद नहीं भासता । हे मनन कर्ताओं में श्रेष्ठ राम ! जैसे वायु स्पन्द रूप होती है । तो भी वायु है । और निस्पन्द होती है । तो भी वायु है । निश्चय करके कुछ भेद नहीं । पर और जीव को स्पन्द होती है । तो भासती । और निस्स्पन्द होती है । तो नहीं भासती । वैसे ही ज्ञान वान पुरुष को जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में कुछ भेद नहीं । वह सदा अद्वैत निश्चय वाला और इच्छा से रहित है । जब जीव को उसका शरीर भासता है । तब जीवन मुक्ति कहते हैं । और जब शरीर अदृश्य होता है । तब विदेह मुक्ति कहते हैं । पर उसको दोनों तुल्य है ।
हे राम ! अब प्रकृत प्रसंग को । जो श्रवण का भूषण है । सुनिये । जो कुछ सिद्ध होता है । सो अपने पुरुषार्थ से सिद्ध होता है । पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं होता । लोग जो कहते हैं कि दैव करेगा । सो होगा । यह मूर्खता है । चन्द्रमा जो हृदय को शीतल और उल्लास कर्ता भासता है । इसमें यह शीतलता पुरुषार्थ से हुई है ।
हे राम ! जिस अर्थ की प्रार्थना और यत्न करे । और उससे फिरे नहीं । तो अवश्य पाता है । पुरुष प्रयत्न किसका नाम है । सो सुनिये । सन्त जन और सत्य शास्त्र के उपदेश रूप उपाय से । उसके अनुसार चित्त का विचरना पुरुषार्थ ( प्रयत्न ) है । और उससे इतर । जो चेष्टा है । उसका नाम उन्मत्त चेष्टा है । जिस निमित्त यत्न करता है । सोई पाता है । एक 


जीव पुरुषार्थ ( प्रयत्न ) करके इन्द्र की पदवी पाकर त्रिलोकी का पति हो सिंहासन पर आरूढ़ हुआ है । हे राम ! आत्म तत्व में जो चैतन्य संवित है । सो संवेदन रूप होकर फुरती है । और सोई अपने पुरुषार्थ से बृह्म पद को प्राप्त हुई है । इसलिए देखो । जिसको कुछ सिद्धता प्राप्त हुई है । सो अपने पुरुषार्थ से ही हुई है । केवल चैतन्य आत्म तत्व है । उसमें चित्त संवेदन स्पन्द रूप है । यह चित्त संवेदन ही अपने पुरुषार्थ से गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णु रूपी होता है । और पुरुषोत्तम कहाता है । और यही चित्त संवेदन अपने पुरुषार्थ से रुद्र रूप हो । अर्द्धांग में पार्वती । मस्तक में चन्द्रमा । और नीलकण्ठ परम शान्ति रूप को धारण करता है । इससे जो कुछ सिद्ध होता है । सो पुरुषार्थ से ही होता है ।
हे राम ! पुरुषार्थ से सुमेरु का चूर्ण किया चाहे । तो भी वह भी कर सकता है । यदि पूर्व दिन में दुष्कृत किया हो । और अगले दिन में सुकृत करे । तो दुष्कृत दूर हो जाता है । जो अपने हाथ से चरणामृत भी ले  नहीं सकता । वह यदि पुरुषार्थ करे । तो वह पृथ्वी को खण्ड खण्ड करने को समर्थ होता है ।

जीव को उसी समय मृत्युलोक 84 में गिरा देते हैं

हे राजन ! स्वर्ग में बड़े बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्य वाले होते हैं । वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं । जो मध्यम पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं । और जो कनिष्ठ पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं । वे तो तुमसे कहे । अब स्वर्ग के जो दोष हैं । वे भी सुनो ।
हे राजन ! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं । और उत्तम सुख भोगते हैं । उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है । क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं । उनको देखकर क्रोध उपजता है कि ये मेरे समान क्यों बैठे है । और जो आपसे नीचे बैठे हैं । उनको देखकर अभिमान उपजता है कि मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि जब पुण्य क्षीण होते हैं । तब जीव को उसी काल में मृत्यु लोक 84 में गिरा देते हैं । एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं ।

पंच 5 भूत का ये शरीर वासना रूप ही है

हे शिष्य ! संसार भृम मात्र सिद्ध है । इसको भृम मात्र जानकर विस्मरण करना । यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है । और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय । तब परम पद की प्राप्ति हो । वासना का एक पुतला है । उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ़ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है । और फिर सूर्य के ताप से पिघल कर जल होता है । तो केवल शुद्ध ही रहता है । वैसे ही आत्मा रूपी जल है । उसमें संसार की सत्यता रूपी जड़ता शीतलता है । और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञान रूपी सूर्य उदय होगा । तब संसार की सत्यता रूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत्त हुई । तब मन नष्ट हो जावेगा । और जब मन नष्ट हुआ । तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है । और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना दो प्रकार की है । एक शुद्ध । और दूसरी अशुद्ध । अशुद्ध वासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा को देह आदि हैं । उनमें अहंकार करता है । और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ । तब नाना प्रकार की वासना उपजती हैं । जिससे घटी यंत्र की तरह भृमता रहता है ।
हे साधो ! यह जो पंच 5 भूत का शरीर तुम देखते हो । सो सब वासना रूप है । और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं । और जब धागा टूट जाता है । तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं । और नहीं ठहरते । वैसे ही वासना के क्षय होने पर । पंच 5 भूत का शरीर नहीं रहता । इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है । शुद्ध वासना में जगत का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है । हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है । और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कच्चा बीज उगता है । और जो दग्ध हुआ है । सो फिर नहीं उगता । वैसे ही अज्ञानी की वासना रस सहित है । इससे जन्म का कारण है । और ज्ञानी की वासना रस रहित है । वह जन्म का कारण नहीं । ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक

होती है । वह किसी गुण से मिल कर अपने में चेष्टा नहीं देखता । वह खाता । पीता । लेता । देता । बोलता चलता । एवम और अन्य व्यवहार करता है । पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है । कदाचित द्वैत भावना उसको नहीं फुरती । वह अपने स्वभाव में स्थित है । इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कुम्हार के चक्र को जब तक घुमावे । तब तक फिरता है । और जब घुमाना छोड़ दे । तब स्थीयमान गति से उतरते उतरते स्थिर रह जाता है । वैसे ही जब तक अहंकार सहित वासना होती है । तब तक जन्म पाता है । और जब अहंकार से रहित हुआ । तब फिर जन्म नहीं पाता ।
हे साधो ! इस अज्ञान रूपी वासना के नाश करने को एक बृह्म विद्या ही श्रेष्ठ उपाय है । जो मोक्ष उपायक शास्त्र है । यदि इसको त्याग कर । और शास्त्र रूपी गर्त्त में गिरेगा । तो कल्प पर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा । जो बृह्म विद्या का आश्रय करेगा । वह सुख से आत्म पद को प्राप्त होगा । हे भारद्वाज ! यह मोक्ष उपाय राम और वशिष्ठ का संवाद है । यह विचारने योग्य है । और बोध का परम कारण है ।

भोग और जगत सब भृम मात्र हैं

हे मुनीश्वर ! जितने कुछ पदार्थ हैं । वह सब मन से उत्पन्न होते हैं । सो मन ही भृम मात्र है । अन होता मन दुखदायी हुआ है । मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है । और सुखदायक जानता है । सो मृग तृष्णा के जलवत है । जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं । और दौड़ते दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं । तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता । वैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं । और शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों के भोग सर्प वत है । जिनका मारा हुआ जन्म । मरण । और जन्म से जन्मान्तर पाता है । भोग और जगत । सब भृम मात्र हैं । उनमें जो आस्था करते हैं । वह महा मूर्ख हैं । मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि - सब आगमा पायी है । अर्थात आते भी हैं । और जाते भी हैं । इससे जिस पदार्थ का नाश न हो । वही पदार्थ पाने योग्य है । इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है ।
हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदा रूप पदार्थ भासते हैं । वह सब आपदा हैं । इनमें रंचक भी सुख नहीं । जब इनका वियोग होता है । तब कण्टक की तरह मन में चुभते हैं । जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं । तब जीव राग द्वेष से जलता है । और जब नहीं प्राप्त होते । तब तृष्णा से जलता है । इससे भोग दुख रूप ही है । जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता । वैसे ही भोग रूपी दुख की शिला में । सुख रूप छिद्र नहीं होता । हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ । जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो । तो धुँवा हो । थोड़ा थोड़ा जलता रहता है । वैसे ही भोग रूपी अग्नि से मन जलता रहता है । विषयों में कुछ भी सुख नहीं है । दुख बहुत हैं । इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है । जैसे खाईं के ऊपर तृण और पात होते हैं । और उससे खाईं आच्छादित हो जाती है । उसको देख हिरण कूदकर दुख पाता है । वैसे ही मूर्ख भोग को सुख रूप जानकर भोगने की इच्छा करता है । और जब भोगता है । तब जन्म से जन्मान्तर रूपी खाईं में जा पड़ता है । और दुख पाता है ।


हे मुनीश्वर ! भोग रूपी चोर । अज्ञान रूपी रात में । आत्मा रूपी धन लूट ले जाता है । पर उसके वियोग से महा दीन रहता है । जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है । वह दुख रूप है । उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती । और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है । वह शरीर क्षण भंगुर और असार है । जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है । वह मूर्ख और जड़ है । उसका बोलना । और चलना भी ऐसा है । जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है । और उसके वेग से शब्द होता है । जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता । वैसे ही दुख जानकर मैं भोग की इच्छा नहीं करता । लक्ष्मी भी परम अनर्थकारी है । जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती । तब तक उसके पाने का यत्न होता है । और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है । जब लक्ष्मी प्राप्त हुई । तब सब सदगुण अर्थात शीलता । सन्तोष । धर्म । उदारता । कोमलता । वैराग्य । विचार दया आदि का नाश कर देती है । जब ऐसे गुणों का नाश हुआ । तब सुख कहाँ से हो । तब तो परम आपदा ही प्राप्त होती है । इसको परम दुख का कारण जानकर । मैंने त्याग दिया है ।
हे मुनीश्वर ! इस जीव में गुण तब तक हैं । जब तक लक्ष्मी नहीं प्राप्त हुई । जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब सब गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे बसन्त ऋतु की मंजरी तब तक हरी रहती है । जब तक ज्येष्ठ आषाढ़ नहीं आता । और जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया । तब मंजरी जल जाती है । वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब शुभ गुण जल जाते हैं । मधुर वचन तभी तक बोलता है । जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं है । और जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब कोमलता का अभाव होकर कठोर हो जाता है । जैसे जल पतला तब तक 


रहता है । जब तक शीतलता का संयोग नहीं हुआ । और जब शीतलता का संयोग होता है । तब बरफ होकर कठोर दुखदायक हो जाता है । वैसे यह जीव लक्ष्मी से जड़ हो जाता है ।
हे मुनीश्वर ! जो कुछ संपदा है । वह आपदा का मूल है । क्योंकि जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । तब बड़े बड़े सुख भोगता है । और जब उसका अभाव होता है । तब तृष्णा से जलता है । और जन्म से जन्मान्तर पाता है  । लक्ष्मी की इच्छा करना ही मूर्खता है । यह तप क्षण भंगुर है । इससे भोग उपजते । और नष्ट होते हैं । जैसे जल से तरंग उपजते । और मिट जाते हैं । और जैसे बिजली स्थिर नहीं होती । वैसे ही भोग भी स्थिर नहीं रहते । पुरुष में शुभ गुण तब तक हैं । जब तक तृष्णा का स्पर्श नहीं । और जब तृष्णा हुई । तब गुणों का अभाव हो जाता है । जैसे दूध में मधुरता तब तक है । जब तक उसे सर्प ने स्पर्श नहीं किया । और सर्प ने स्पर्श किया । तब वही दूध विष रूप हो जाता है ।

जीवों का आश्रय संसार माया रूप है

हे राम !  यह संसार महा दीर्घ रूप है । और जैसे दृढ़ थम्भ के आश्रय गृह होता है । वैसे ही राजसी जीवों का आश्रय संसार माया रूप है । तुम सरीखे । जो सात्विक में स्थित हैं । वे शूरमा हैं । जो वैराग । विवेक । आदि गुणों से सम्पन्न हैं । वे लीला करके । यत्न बिना ही संसार माया को त्याग देते हैं । और जो बुद्धिमान सात्विक जागे हुए हैं । और जो राजस । और सात्विक हैं । वे भी उत्तम पुरुष हैं । वे पुरुष जगत के पूर्व अपूर्व को विचारते हैं । जो सन्त जन और सत शास्त्रों का संग करता है । उसके आचरण पूर्वक । वे बिचरते हैं । और उससे ईश्वर परमात्मा के देखने की उन्हें बुद्धि उपजती है । और दीपक वत ज्ञान प्रकाश उपजता है ।
हे राम ! जब तक मनुष्य । अपने विचार से । अपना स्वरूप नहीं पहचानता । तब तक उसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता । जो उत्तम कुल । निष्पाप । सात्विक । राजसी जीव हैं । उन्हीं को विचार उपजता है । और उस विचार से वे अपने आपसे आपको पाते हैं । वे दीर्घ दर्शी । संसार के । जो नाना प्रकार के आरम्भ हैं । उनको बिचारते हैं । और बिचार द्वारा आत्म पद पाते हैं । और परमानन्द सुख में प्राप्त होते हैं । इससे तुम इसी को विचारो कि - सत्य क्या है ? और असत्य क्या है ? ऐसे विचार से । असत्य का त्याग करो । और सत्य का आश्रय करो । जो पदार्थ आदि में न हो । और अन्त में भी न रहे । उसे मध्य में भी असत्य जानिये । जो आदि । अन्त । एक रस है । उसको सत्य जानिये । और जो आदि अन्त में नाश रूप है । उसमें जिसको प्रीति है । और उसके राग से जो रंचित है । वह मूढ़ पशु है । उसको विवेक का रंग नहीं लगता ।

संसार रूपी वृक्ष का मूल बीज मन है

हे राम ! जब अहं त्वं आदि रात विचार रूपी सूर्य से क्षीण हो जावेगी । तब परमात्मा का प्रकाश साक्षात होगा । भेद कल्पना नष्ट हो जावेगी । और अनन्त बृह्माण्ड में जो व्यापक आत्म तत्व है । वह प्रकाशित होगा । जैसे अपने विचार से जनक ने अहंकार रूपी वासना का त्याग किया है । वैसे ही तुम भी विचार करके अहंकार रूपी वासना का त्याग करो । अहंकार रूपी मेघ जब नष्ट होगा । और चित्त आकाश निर्मल होगा । तब आत्म रूपी सूर्य प्रकाशित होगा । जब तक अहंकार रूपी मेघ आवरण है । तब तक आत्म रूपी सूर्य नहीं भासता । विचार रूपी वायु से । जब अहंकार रूपी मेघ नाश हो । तब आत्म रूपी सूर्य प्रकट भासेगा ।
हे राम ! ऐसे समझो कि - मैं हूँ । न कोई । और है । न नास्ति है । न अस्ति है । जब ऐसी भावना दृढ़ होगी । तब मन शान्त हो जावेगा । और हेयो पादेय बुद्धि । जो इष्ट पदार्थों मे होती है । उसमें न डूबोगे । इष्ट अनिष्ट के गृहण त्याग में । जो भावना होती है । यही मन का रूप है । और यही बन्धन का कारण है । इससे भिन्न बन्धन कोई नहीं । इससे तुम इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट में हेयो पादेय बुद्धि मत करो । और दोनों के त्यागने से जो शेष रहे । उसमें स्थित हो । इष्ट अनिष्ट की भावना उसकी की जाती है । जिसको हेयो पादेय बुद्धि नहीं होती । और जब तक हेयो पादेय बुद्धि क्षीण नहीं होती । तब तक समता भाव नहीं उपजता । जैसे मेघ के नष्ट हुए बिना । चन्द्रमा की चाँदनी नहीं भासती । वैसे ही जब तक पदार्थों में इष्ट अनिष्ट बुद्धि है । और मन लोलुप होता है । तब तक समता उदय नहीं होती । जब तक युक्त । अयुक्त । लाभ । अलाभ । इच्छा नहीं मिटती । तब तक शुद्ध समता और निरसता नहीं उपजती । एक बृह्म तत्व । जो निरामय रूप । और नाना तत्व से रहित है । उसमें युक्त क्या ? और अयुक्त क्या ? जब तक इच्छा । अनिच्छा । और वांछित । अवांछित । यह दोनों बातें स्थित हैं । अर्थात फुरते और क्षोभ करते हैं । तब तक सौम्यता भाव नहीं होता । जो हेयो पादेय बुद्धि से रहित । ज्ञान वान है

। उस पुरुष को यह शक्ति आ प्राप्त होती है । जैसे राजा के अन्तःपुर में पटु ( चतुर ) रानी स्थित होती हैं । वह शक्ति यह है । भोगों में नीरसता । देह अभिमान से रहित । निर्भयता । नित्यता । समता । पूर्ण आत्मा दृष्टि । ज्ञान निष्ठा । निर इच्छता । निर अहंकारता । अपने आपको सदा अकर्ता जानना । इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में सम चित्तता । निर्विकल्पता । सदा आनन्द  स्वरूप रहना । धैर्य से सदा एक रस रहना । स्व रूप से भिन्न वृत्ति न फुरना । सब जीवों से मैत्री भाव । सत्य बुद्धि । निश्चयात्मक रूप से तुष्टता । मुदिता । और मृदु भाषणा । इतनी शक्ति हेयो पादेय से रहित पुरुष को आ प्राप्त होती है ।
हे राम ! संसार के पदार्थों की ओर । जो चित्त धावता है । उसको वैराग्य से उलटा कर खींचना । जैसे पुल से जल के वेग का निवारण होता है । वैसे ही । जगत से रोक कर मन को आत्म पद में लगाने से आत्म भाव प्रकाशता है । इससे हृदय से सब वासना का त्याग करो । और बाहर से सब क्रिया में रहो । वेग चलो । स्वांस लो । और सर्वदा । सब प्रकार चेष्टा करो । पर सर्वदा सब प्रकार की वासना त्याग करो । संसार रूपी समुद्र में वासना रूपी जल है । और चिन्ता रूपी सिवार है । उस जल में तृष्णा वान रूपी मच्छ फँसे हैं । यह विचार । जो तुमसे कहा है । उस विचार रूपी शिला से । बुद्धि को तीक्ष्ण करो । और इस जाल को छेदो । तब संसार से मुक्त होगे । संसार रूपी वृक्ष का । मूल बीज मन है । ये वचन जो कहे हैं । उनको हृदय में धरकर धैर्य वान हो । तब आधि व्याधि दुखों से मुक्त होगे । मन से मन को छेदो । जो बीती है । उसका स्मरण न करो । और भविष्य की चिन्ता न करो । क्योंकि वह असत्य रूप है । और वर्तमान को भी असत्य जान कर । उसमें बिचरो । जब मन से संसार का विस्मरण होता है । तब मन में फिर न फुरेगा । मन असत्य भाव जान कर चलो । बैठो । स्वांस लो । निस्वांस करो । उछलो । सोवो । सब 


चेष्टा करो । परन्तु भीतर सब असत्य रूप जानो । तब खेद न होगा । अहं । मम । रूपी मल का त्याग करो । प्राप्ति में बिचरो । अथवा राज आ प्राप्त हो । उसमें बिचरो । परन्तु भीतर से । इसमें आस्था न हो । जैसे आकाश का सब पदार्थों में अन्वय है । परन्तु किसी से स्पर्श नहीं करता । वैसे ही बाहर कार्य करो । परन्तु मन से किसी में बन्धाय मान न हो । तुम चेतन रूप । अजन्मा । महेश्वर पुरुष हो । तुमसे भिन्न कुछ नहीं । और सब में व्याप रहे हो । जिस पुरुष को सदा यही निश्चय रहता है । उसको संसार के पदार्थ चलाय मान नहीं कर सकते । और जिनको संसार में आसक्त भावना है । और स्वरूप भूले हैं । उनको संसार के पदार्थों से विकार उपजता है । और हर्ष । शोक । और भय खींचते हैं । उससे वे बँधे हुए हैं । जो ज्ञान वान पुरुष राग द्वेष से रहित हैं । उनको लोहा । बट्टा  ( ढेला ) पाषाण । और सुवर्ण सब एक समान है । संसार वासना के ही त्यागने का नाम मुक्ति है ।

उस सर्वात्मा को नमस्कार है

राजा बोले - हे भगवान ! राम कौन थे ? कैसे थे ? और कैसे होकर बिचरे । सो कृपा करके कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे राजन ! शाप के वश से विष्णु ने । जो अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं । अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया । इतना सुन राजा ने पूछा - हे भगवान !  चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ । और किसने दिया । सो कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे राजन ! एक काल में सनत कुमार । जो निष्काम हैं । बृह्मपुरी में बैठे थे । और त्रिलोक पति विष्णु भगवान भी वैकुण्ठ से उतरकर बृह्मपुरी में आये । तब बृह्मा सहित सब सभा उठकर खड़ी हुई । और उनका पूजन किया । पर सनत कुमार ने पूजन नहीं किया । इस बात को देखकर विष्णु  बोले - हे सनत कुमार ! तुमको निष्कामता का अभिमान है । इससे तुम काम से आतुर होगे । और स्वामि कार्तिक तुम्हारा नाम होगा । सनत कुमार बोले - हे विष्णु ! सर्वज्ञता का अभिमान तुमको भी है । इसलिये कुछ काल के लिए तुम्हारी सर्वज्ञता निवृत्त होकर अज्ञानता प्राप्त होगी ।
हे राजन ! एक तो यह शाप हुआ । दूसरा एक और भी शाप है सुनो । एक काल में भृगु की स्त्री जाती रही थी । उसके वियोग से वह ऋषि क्रोधित हुआ था । उसको देखकर विष्णु हँसे । तब भृगु ब्राह्मण ने शाप दिया - हे विष्णु ! मेरी तुमने हँसी की है । सो मेरी तरह तुम भी स्त्री के वियोग से आतुर होगे । और एक दिवस देव शर्मा ब्राह्मण ने नर सिंह भगवान को शाप दिया था । सो भी सुनिये । एक दिन नर सिंह भगवान गंगा के तीर पर गये । और वहाँ देव शर्मा ब्राह्मण की स्त्री को देखकर नर सिंह भयानक रूप दिखाकर हँसे । निदान उनको देखकर ऋषि की स्त्री ने भय पाय प्राण छोड़ दिया । तब देव शर्मा ने शाप दिया - तुमने मेरी स्त्री का वियोग किया । इससे तुम भी स्त्री का वियोग पावोगे ।
हे राजन ! सनत कुमार । भृगु । और देव शर्मा के । शाप से विष्णु ने मनुष्य का शरीर धारण किया । और दशरथ 


के घर में प्रकटे । हे राजन ! वह जो शरीर धारण किया । और आगे जो वृतान्त हुआ । सो सावधान होकर सुनो । अनुभवात्मक मेरा आत्मा जो त्रिलोकी अर्थात स्वर्ग । मृत्यु । और पाताल का प्रकाश कर्ता और भीतर बाहर आत्म तत्व से पूर्ण है । उस सर्वात्मा को नमस्कार है । हे राजन ! यह शास्त्र जो आरम्भ किया है । इसका विषय । प्रयोजन और सम्बन्ध क्या है ? और अधिकारी कौन है ? सो सुनो ।
यह शास्त्र सत । चित्त । आनन्द रूप । अचिन्त्य चिन्मात्र आत्मा को जताता है । यह तो विषय है । परमानन्द आत्मा की प्राप्ति । और अनात्म अभिमान । दुख की निवृत्ति प्रयोजन है । और बृह्म विद्या और मोक्ष उपाय से आत्म पद प्रतिपादन सम्बन्ध है । जिसको यह निश्चय है कि - मैं अद्वैत बृह्म अनात्म देह से बाँधा हुआ हूँ । सो किसी प्रकार छूटूँ । वह न अति ज्ञान वान है । न मूर्ख है । ऐसा विकृति आत्मा यहाँ अधिकारी है । यह शास्त्र मोक्ष ( परमानन्द की प्राप्ति ) करने वाला है । जो पुरुष इसको विचारेगा । वह ज्ञान वान होकर फिर जन्म मृत्यु रूप संसार में न आवेगा । हे राजन ! यह महा रामायण पावन है । श्रवण मात्र से ही सब पाप का नाश कर्त्ता है । जिसमें राम कथा है । यह मैंने प्रथम अपने शिष्य भारद्वाज को सुनाई थी ।
एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये । और मैंने उसको उपदेश किया था । वह उसको सुनकर । वचन रूपी समुद्र से । सार रूपी रत्न निकाल । और हृदय में धरकर । एक समय सुमेरु पर्वत पर गया । वहाँ बृह्मा बैठे थे । उसने उनको प्रणाम किया । और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई । तब बृह्मा ने प्रसन्न होकर उससे कहा - हे पुत्र ! कुछ वर माँग । मैं तुझ पर प्रसन्न हुआ हूँ । भारद्वाज ने । जिसका उदार आशय था । उनसे कहा - हे भूत भविष्य के ईश्वर ! जो तुम प्रसन्न हुए हो । तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार सुख से मुक्त हों । और परम पद पावें । और उसी का उपाय भी कहो ।

बृह्मा बोले -  हे पुत्र ! तुम अपने गुरु वाल्मीकि के पास जाओ । उसने आत्म बोध महा रामायण शास्त्र का जो परम पावन संसार समुद्र के तरने का पुल है । आरम्भ किया है । उसको सुनकर जीव महा मोह जनक संसार समुद्र से तरेंगे । निदान परमेष्ठी बृह्मा जिनकी सर्व भूतों के हित में प्रीति है । आप ही भारद्वाज को साथ लेकर मेरे आश्रम में आये । और मैंने भले प्रकार से उनका पूजन किया । उन्होंने मुझसे कहा - हे मुनियों में श्रेष्ठ वाल्मीकि ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का आरम्भ किया है । इस उद्यम का त्याग न करना । इसकी आदि से अन्त पर्यन्त समाप्त करना । क्योंकि यह मोक्ष उपाय संसार रूपी समुद्र के पार करने का जहाज । और इससे सब जीव कृतार्थ होंगे ।
इतना कहकर बृह्मा जैसे समुद्र से चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठ कर फिर लीन हो जावे । वैसे ही अंतर्ध्यान हो गये । तब मैंने भारद्वाज से कहा - हे पुत्र ! बृह्मा ने क्या कहा ? भारद्वाज बोले - हे भगवन ! बृह्मा ने तुमसे यह कहा कि - हे मुनियों में श्रेष्ठ ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का उद्यम किया है । उसका त्याग न करना । इसे अन्त पर्यन्त समाप्त करना । क्योंकि संसार समुद्र के पार करने को यह कथा जहाज है । और इससे अनेक जीव कृतार्थ होकर संसार संकट से मुक्त होंगे । इतना कह कर फिर वाल्मीकि बोले - हे राजन ! जब इस प्रकार बृह्मा ने मुझसे कहा । तब उनकी आज्ञा अनुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया । हे पुत्र ! वशिष्ठ के उपदेश को पाकर जिस प्रकार राम निशंक हो बिचरे हैं । वैसे ही तुम भी बिचरो । तब उसने प्रश्न किया - हे भगवान ! जिस प्रकार राम जीवन मुक्त होकर बिचरे । वह आदि से कृम करके मुझसे कहिये ? वाल्मीकि बोले - हे भारद्वाज ! राम । लक्ष्मण । भरत । शत्रुघन । सीता । कौशल्या । सुमित्रा । और दशरथ । ये 8 तो जीवन मुक्त हुए हैं । और 8 मन्त्री । अष्ट गण । वशिष्ठ और वामदेव से आदि अष्टा विंशति जीवन मुक्त हो बिचरे हैं । उनके नाम सुनो । राम से लेकर दशरथ पर्यन्त 8 तो ये कृतार्थ होकर परम बोध वान हुए हैं । और 1 कुन्तभासी । 2 शतवर्धन । 3 सुखधाम । 4 विभीषण । 5 इन्द्रजीत । 6 हनुमान । 7 वशिष्ठ । और 8 वामदेव । ये 8 मन्त्री निश्शंक हो चेष्टा करते भये । और सदा अद्वैत निष्ठ हुए हैं । इनको कदाचित स्वरूप से द्वैत भाव नहीं फुरा है । ये अनामय पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्ध परम पावनता को प्राप्त हुए हैं ।
इति श्री योग वशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे कथारम्भ वर्णनो नाम प्रथम सर्गः

लेकिन ज्ञानी की वासना रस रहित है

भारद्वाज बोले - हे भगवान ! जीवन मुक्त की स्थिति कैसी है ? और राम कैसे जीवन मुक्त हुए ? वह आदि से अन्त पर्यन्त सब कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे पुत्र ! यह जगत जो भासता है । सो वास्तविक कुछ नहीं उत्पन्न हुआ । अविचार करके भासता है । और विचार करने से निवृत्त हो जाता है । जैसे आकाश में नीलता भासती है । सो भृम से वैसे ही है । यदि विचार करके देखिए । तो नीलता की प्रतीति दूर हो जाती है । वैसे ही अविचार से जगत भासता है । और विचार से लीन हो जाता है । हे शिष्य ! जब तक सृष्टि का अत्यन्त अभाव नहीं होता । तब तक परम पद की प्राप्ति नहीं होती । जब दृश्य का अत्यन्त अभाव हो जावे । तब शुद्ध चिदाकाश आत्म सत्ता भासेगी । कोई इस दृश्य का महा प्रलय में अभाव कहते हैं । परन्तु मैं तुमको तीनों कालों का अभाव कहता हूँ । जब इस शास्त्र को । श्रद्धा संयुक्त । आदि से अन्त तक । सुनकर धारण करे । भ्रान्ति निवृत्ति हो जावे । और अव्याकृत पद की प्राप्ति हो । हे शिष्य ! संसार भृम मात्र सिद्ध है । इसको भृम मात्र जानकर विस्मरण करना यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है । और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय । तब परम पद की प्राप्ति हो । वासना का एक पुतला है । उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ़ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है । और फिर सूर्य के ताप से पिघल कर जल होता है । तो केवल शुद्ध ही रहता है । वैसे ही आत्मा रूपी जल है । उसमें संसार की सत्यता रूपी जड़ता शीतलता है । और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञान रूपी सूर्य उदय होगा । तब संसार की सत्यता रूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत हुई । तब मन नष्ट हो जावेगा । और जब मन नष्ट हुआ । तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है । और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना 2 प्रकार की है । एक शुद्ध । और दूसरी अशुद्ध । 


अशुद्ध वासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा को देह आदि हैं । उनमें अहंकार करता है । और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ । तब नाना प्रकार की वासना उपजती हैं । जिससे घटी यंत्र की तरह भृमता रहता है ।
हे साधो ! यह जो पंच 5 भूत का शरीर तुम देखते हो । सो सब वासना रूप है । और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं । और जब धागा टूट जाता है । तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं । और नहीं ठहरते । वैसे ही वासना के क्षय होने पर पंच 5 भूत का शरीर नहीं रहता । इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है । शुद्ध वासना में जगत का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है ।
हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है । और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कच्चा बीज उगता है । और जो दग्ध हुआ है । सो फिर नहीं उगता । वैसे ही अज्ञानी की वासना रस सहित है । इससे जन्म का कारण है । और ज्ञानी की वासना रस रहित है । वह जन्म का कारण नहीं । ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक होती है । वह किसी गुण से मिलकर अपने में चेष्टा नहीं देखता । वह खाता । पीता । लेता । देता । बोलता । चलता एवम और अन्य व्यवहार करता है । पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है । कदाचित द्वैत भावना उसको नहीं फुरती । वह अपने स्वभाव में स्थित है । इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कुम्हार के चक्र को । जब तक घुमावे । तब तक फिरता है । और जब घुमाना छोड़ दे । तब स्थीयमान गति से उतरते उतरते स्थिर रह जाता है । वैसे ही जब तक अहंकार सहित वासना होती है । तब तक जन्म पाता है । और जब अहंकार से रहित हुआ । तब फिर जन्म नहीं पाता ।
हे साधो ! इस अज्ञान रूपी वासना के नाश करने को एक बृह्म विद्या ही श्रेष्ठ उपाय है । जो मोक्ष उपायक शास्त्र है ।

यदि इसको त्याग कर । और शास्त्र रूपी गर्त्त में गिरेगा । तो कल्प पर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा । जो बृह्म विद्या का आश्रय करेगा । वह सुख से आत्मपद को प्राप्त होगा ।
हे भारद्वाज ! यह मोक्ष उपाय । राम और वशिष्ठ का संवाद है । यह विचारने योग्य है । और बोध का परम कारण है । इसे आदि से अन्त पर्यन्त सुनो । और जैसे राम जीवन मुक्त हो विचरे हैं । सो भी सुनो । एक दिन राम अध्ययन शाला से विद्या पढ़ कर अपने गृह में आये । और सम्पूर्ण दिन विचार सहित व्यतीत किया । फिर मन में तीर्थ ठाकुर द्वारे का संकल्प धरकर अपने पिता दशरथ के पास । जो अति प्रजा पालक थे आये । और जैसे हंस सुन्दर कमल को गृहण करे । वैसे ही उन्होंने उनका चरण पकड़ा । जैसे कमल के फूल के नीचे कोमल तरैयाँ होती हैं । और उन तरैयों सहित कमल को हंस पकड़ता है । वैसे ही दशरथ की अँगुलियों को उन्होंने गृहण किया । और बोले - हे पिता ! मेरा चित्त तीर्थ और ठाकुर द्वारों के दर्शनों को चाहता है । आप आज्ञा कीजिये । तो मैं दर्शन कर आऊँ । मैं तुम्हारा पुत्र हूँ । आगे मैंने कभी नहीं कहा । यह प्रार्थना अब ही की है । इससे यह वचन मेरा न फेरना । क्योंकि ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं है कि जिसका मनोरथ इस घर से सिद्ध न हुआ हो । इससे मुझको भी कृपा कर आज्ञा दीजिये ।
इतना कह कर वाल्मीकि बोले - हे भारद्वाज ! जिस समय इस प्रकार राम ने कहा । तब वशिष्ठ पास बैठे थे । उन्होंने दशरथ से कहा - हे राजन ! इनका चित्त उठा है । राम को आज्ञा दो । तीर्थ कर आवें । और इनके साथ सेना । धन । मंत्री और ब्राह्मण भी दीजिये कि विधि पूर्वक दर्शन करें । तब महाराज दशरथ ने शुभ मुहुर्त दिखाकर राम को आज्ञा दी । जब वे चलने लगे । तो पिता और माता के चरणों में पड़े । और 


सबको कण्ठ लगाकर रुदन करने लगे । इस प्रकार सबसे मिलकर लक्ष्मण आदि भाई । मन्त्री । और वशिष्ठ आदि ब्राह्मण । जो बिधि जानने वाले थे । बहुत सा धन और सेना साथ ली । और दान पुण्य करते हुए गृह के बाहर निकले । उस समय वहाँ के लोगों और स्त्रियों ने राम के ऊपर फूलों और कलियों की माला की । जैसे बरफ बरसती है । वैसी ही वर्षा की । ओर राम की मूर्ति हृदय में धर ली । इसी प्रकार राम वहाँ से ब्राह्मणों और निर्धनों को दान देते गंगा । यमुना । सरस्वती आदि तीर्थों में विधि पूर्वक स्नान कर पृथ्वी के चारों ओर पर्यटन करते रहे । उत्तर । दक्षिण । पूर्व । और पश्चिम में दान किया । और समुद्र के चारों ओर स्नान किया । सुमेरु और हिमालय पर्वत पर भी गये । और शालिग्राम । बद्री । केदार आदि में स्नान और दर्शन किये । ऐसे ही सब तीर्थ स्नान । दान । तप । ध्यान और विधि संयुक्त यात्रा करते करते एक वर्ष में अपने नगर में आये ।
इति श्री योग वशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे तीर्थ यात्रा वर्णनन्नाम द्वितीय सर्गः

इसी अवस्था को शांत बृह्म कहते हैं

श्री योग वशिष्ठ रामायण में कहा है - सर्व शक्ति मयो आत्मा । आत्मा ( परमात्मा ) सब शक्तियों से युक्त है । वह जिस शक्ति की भावना जहां करे । वहीं अपने संकल्प द्बारा । उसे प्रकट हुआ देखता है - सर्वशक्ति हि भगवानयैव तस्मै हि रोचते ।
भगवान ही सब प्रकार की शक्तियों वाला तथा सब जगह वर्तमान है । वह जहां चाहे अपनी शक्ति को प्रकट कर सकता है । वास्तव में नित्य । पूर्ण । और अक्षय बृह्म में ही समस्त शक्तियाँ मौजूद हैं । संसार में कोई वस्तु ऐसी है ही नहीं । जो सर्व रूप से प्रतिष्ठित बृह्म में मौजूद न हो । शांत आत्मा । बृह्म में ज्ञान शक्ति । क्रिया शक्ति आदि अनेकानेक शक्तियाँ वर्तमान हैं  । बृह्म की चेतना शक्ति शरीर धारी जीवों में दिखाई देती है । तो उसकी स्पंदन शक्ति । जिसे क्रिया शक्ति भी कहते हैं । हवा में दिखती है । उसी शक्ति रूप बृह्म की जड़ शक्ति पत्थर में है । तो दृव शक्ति ( बहने की शक्ति ) जल में दिखती है । चमकने की शक्ति का दर्शन हम आग में कर सकते हैं । शून्य 0 शक्ति आकाश में । सब कुछ होने की भव शक्ति संसार की स्थिति में । सबको धारण करने की शक्ति दशों दिशाओं में । नाश शक्ति नाशों में । शोक शक्ति शोक करने वालों में । आनन्द शक्ति प्रसन्न चित्त वालों में । वीर्य शक्ति योद्धाओं में । सृष्टि करने की शक्ति सृष्टि में देख सकते हैं । कल्प के अन्त में सारी शक्तियाँ स्वयं बृह्म में रहती हैं ।
परमेश्वर की स्वाभाविक स्पन्दन शक्ति प्रकृति कहलाती है । वही जगन्माया नाम से भी प्रसिद्ध है । यह स्पन्दन शक्ति रूपी भगवान की इच्छा इस दृश्य जगत की रचना करती है । जब शुद्ध संवित में जड़ शक्ति का उदय हुआ । तो संसार की विचित्रता उत्पन्न हुई । जैसे चेतन मकड़ी से जड़ जाले की उत्पत्ति हुई । वैसे ही चेतन बृह्म से प्रकृति उदभूत हुई । बृह्मानन्द स्वरूप आत्मा ही भाव की दृढ़ता से मिथ्या रूप में प्रकट हो रहा है ।
प्रकृति के 3 प्रकार हैं - सूक्ष्म । मध्यम । और स्थूल । तीनों अवस्थाओं में प्रकृति स्थित रहती है । इसी कारण

प्रकृति भी 3 प्रकार की कहलाई । इसके भी 3 भेद हुए - सत्व । रज । तम । त्रिगुणात्मक प्रकृति को अविद्या भी कहते हैं । इसी अविद्या से प्राणियों की उत्पत्ति हुई । सारा जगत अविद्या के आश्रय गत है । इससे परे पार बृह्म है । जैसे फूल और उसकी सुगन्ध । धातु और आभूषण । अग्नि और उसकी ऊष्णता 1 रूप है । वैसे ही चित्त और स्पन्दन शक्ति 1 ही है । मनोमयी स्पन्दन शक्ति उस बृह्म से भिन्न हो ही नहीं सकती । जब चित्त शक्ति क्रिया से निवृत्त होकर । अपने अधिष्टान की ओर । यानी बृह्म में लौट आती है । और वहीं शांत भाव से स्थित रहती है । तो उसी अवस्था को शांत बृह्म कहते हैं । जैसे सोना किसी आकार के बिना नहीं रहता । वैसे ही पार बृह्म भी चेतनता के बिना । जो कि उसकी स्व भान है । स्थित नहीं रहता । जैसे तिक्तता के बिना मिर्च । मधुरता के बिना गन्ने का । रस नहीं रहता । वैसे चित्त की चेतनता स्पन्दन के बिना नहीं रहती ।
प्रकृति से परे स्थित पुरूष सदा ही शरद ऋतु के आकाश की तरह स्वच्छ । शांत व शिव रूप है । भृम रूप वाली प्रकृति परमेश्वर की इच्छा रूपी स्पन्दनात्मक शक्ति है । वह तभी तक संसार में भृमण करती है कि जब तक वह नित्य तृप्त और निर्विकार शिव का दर्शन नही करती । जैसे नदी समुद्र में पड़ कर अपना रूप छोड़ कर समुद्र ही बन जाती है । वैसे ही प्रकृति पुरूष को प्राप्त करके पुरूष रूप हो जाती है । चित्त के शांत हो जाने पर परम पद को पाकर तद रूप हो जाती है ।
जिससे जगत के सब पदार्थों की उत्पत्ति होती है । जिसमें सब पदार्थ स्थित रहते हैं । और जिसमें सब लीन हो जाते हैं । जो सब जगह । सब कालों में । और सब वस्तुओं में मौजूद रहता है । उस परम तत्व को बृह्म कहते हैं ।

यत: सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च । यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नम: ।
ज्ञाता ज्ञानं तथाज्ञेयं दृष्टादर्शनदृश्यभू: । कर्ता हेतु: क्रिया यस्मात्तस्मै ज्ञत्यात्मने नम: ।
स्फुरन्तिसीकरा यस्मादानन्दरस्याम्बरेवनौ । सर्वेषां जीवनं तस्मै बृह्मानन्दात्मने नम: ।
श्री योग वशिष्ठ महा रामायण: ।
जिससे सब प्राणी प्रकट होते हैं । जिसमें सब स्थित हैं । और जिसमें सब लीन हो जाते हैं । उस सत्य रूप तत्व को नमस्कार हो । जिससे ज्ञाता । ज्ञान । ज्ञेय का दृष्टा । दर्शन । दृश्य का तथा कर्ता । हेतु और क्रिया का उदय होता है । उस ज्ञान स्वरूप तत्व को नमस्कार हो । जिससे पृथ्वी और स्वर्ग में आनंन्द की वर्षा होती है । और जिससे सबका जीवन है । उस बृह्मानंद स्वरूप तत्व को नमस्कार हो ।
बृह्म केवल उसको जानने वाले के अनुभव में ही आ सकता है । उसका वर्णन नहीं हो सकता । वह अवाच्य । अनभिव्यक्त । और इन्द्रियों से परे है । बृह्म का ज्ञान । केवल अपने अनुभव द्वारा ही होता है । वह परम पराकाष्ठा स्वरूप है । वह सब दृष्टियों की सर्वोत्तम दृष्टि है । वह सब महिमाओं की महिमा है । वह सब प्राणि रूपी मोतियों का तागा है । जो कि उनके हृदय रूपी छेदों में पिरोया हुआ है । वह सब प्राणि रूपी मिर्चों की तीक्ष्णता है । वह पदार्थ का पदार्थ तत्व है । वह सर्वोत्तम तत्व है । उस परमेश्वर तत्व को प्राप्त करना । उसी सर्वेश्वर में स्थिति करना । यही मानव जीवन की सार्थकता है ।

बुधवार, फ़रवरी 01, 2012

नानक नीच कहै विचार धाणक रूप रहा करतार

नानक साहब वाणी । महला 1 राग बिलावल । सृष्टि रचना ।
आपे सचु कीआ कर जोङि । अंडज फ़ोङि जोङि बिछोङ ।
धरती आकाश कीए बैसण कउ थाउ । रात दिनतु कीए भये भाउ ।
जिन कीए करि बेखणहारा ।
त्रतीआ बृह्मा विसनु महेसा । देवी देव उपाए बेसा ।
पउण पानी अगनी बिसराऊँ । ताही निरंजन सांचो नाउ ।
तिस महि मनुआ रहिया लिव लाई । प्रणवत नानक कालु न खाई ।
सुनहु बृह्मा विसनु महेस उपाए । सुने करते जुग सबाए ।
इसु पद विचारे सो जनु पूरा । तिसि मिलिए भरमु चुकाइदा ।
साम वेदु रुगु जुजरु अथरवणु । बृह्में मुख माइआ है त्रैगुण ।
ता की कीमत कहि न सकै । को तिउ बोले जिउ  बुलाइदा ।
ओअंकार बृह्मा उतपति । ओअंकार कीआ जिनि चित ।
ओअंकार सैल जुग भए । ओअंकार वेद निरमए ।
ओअंकार सबदि उधरे । ओअंकार गुरुमुखि तरे ।
ओनम अखर सुणहू बीचारू । ओनम अखरु त्रिभवण  सारू ।
उत्तम सतिगुरु पुरुष निराले । सबदि रते हरि रस मतवाले ।
रिधि बुधि सिधि  गिआन गुरु ते पाईए । पूरे भाग मिलाईदा ।
सतिगुरु ते पाए बीचारा । सुनि समाधि  सचे घरबारा ।
नानक निरमलु नादु सबद धुनि । सचु रामे नाम समाईदा ।
सिव नगरी महि आसणि बैसउ कलप  त्यागी वाद ।
सिंडी सबद सदा धुनि सोहै । अहिनिसि पूरै नाद ।
हरि कीरति रह रासि हमारी । गुरु मुख पंथ अतीत ।
सगली जोति हमारी समिआ । नाना वरण अनेक ।
कह नानक सुणि भरथरी जोगी । पारबृह्म लिव एक ।
जिनी नामु बिसारिआ । दूजै भरम भुलाई ।
मूलु छोङि डाली लगे किआ पावहि छाई ।
साहिबु मेरा एकु है । अवरु नाहि भाई ।
किरपा ते सुखु पाइआ । साचे परथाई ।
गुरु की  सेवा सो करे जिसु आप कराए ।
नानक सिरु दे छुटीए दरगह पति पाए ।
मैं मन चाहु घणा साचि बिगासी राम ।मोही प्रेम पिरे प्रभु अविनासी राम ।
अविगतो हरि नाथु । नाथह तिसै भावै सो थीए ।
किरपालु सदा दइआलु दाता जीआ अंदरि तूं जीए ।
मैं आधारू तेरा तू खसमु मेरा मैं ताणु तकीआ तेरओ ।
साचि सूचा सदा नानक गुरु सबदि झगरु निबेरओ ।
यक अर्ज गुफ़तम पेश तो दर कून करतार ।
हक्का कबीर करीम तू बेअब परवर दिगार ।
नानक बुगोयद जन तुरा तेरे चाकरां पा खाक ।
तेरा एक नाम तारे संसार । मैं ऐहा आस ऐहो आधार ।
नानक नीच कहै विचार । धाणक रूप रहा करतार ।
( श्री गुरु ग्रन्थ साहब )

जहँ ॐ ओंकार निरंजन नाहीं बृह्मा विष्णु वेद नहीं जाँहीं

अनन्त कोटि अवतार हैं माया के गोविन्द । कर्ता हो हो अवतरे बहुर पङे जग फ़ँद ।
बृह्मा विष्णु महेश्वर माया और धर्मराय कहिये । इन पाँचों मिल प्रपंच बनाया वाणी हमरी लहिये ।
इन पाँचों मिल जीव अटकाये । जुगन जुगन हम आन छुटाये ।
बन्दी छोङ हमारा नाम । अजर अमर स्थीर है ठाम ।
पीर पैगम्बर कुतुब औलिया । सुर नर मुनि जन ज्ञानी । ये ताको राह न पाया । जम के बँधे प्रानी ।
धर्मराय की धूमा धामी जम पर जंग चलाऊँ । जोरा को तो जान न दूँगा । बाँध अदल घर लाऊँ ।
काल अकाल दोऊ को मोसूँ । महाकाल सिर मूँङूँ । मैं तो तखत हजूरी हुकुमी । चोर खोज के ढूँङूँ ।
मूला माया मग में बैठी हँसा चुन चुन खाई । ज्योति स्वरूपी भया निरंजन मैं ही कर्ता भाई ।
सहस अठासी दीप मुनीश्वर बँधे मुला डोरी । एत्या में जम का तलबाना चलिये पुरुष की शोरी ।
मूला का तो माथा दागूँ सत की मोहर करूँगा । पुरुष दीप को हँस चलाऊँ दरा न रोकन दूँगा ।
हम तो बन्दी छोङ कहावा धर्मराय है चकवे । सतलोक की सकल सुनावा वाणी हमरी अखवे ।
नौ लख पट्टन ऊपर खेलूँ साहदरे कू रोकूँ । द्वादश कोटि कटक सब काटूँ हँस पठाऊँ मोखूँ ।
चौदह भुवन गमन है मेरा जल थल में सरबंगी । खालिक खलक खलक में खालिक अविगत अचल अभंगी ।
अगर अलील चक्र है मेरा जित से हम चल आये । पाँचों पर परवाना मेरा बाँध छुटावन्न धाये ।
जहँ ॐ ओंकार निरंजन नाहीं बृह्मा विष्णु वेद नहीं जाँहीं ।
जहाँ करता नहीं जान भगवाना । काया माया पिण्ड न प्राणा ।
पाँच तत्व तीनों गुण नाहीं । जोरा काल दीप नहिं जाही ।
अमर करूँ सतलोक पठाऊँ । ताते बन्दी छोङ कहाऊँ ।
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शिव बृह्मा का राज इन्द्र गिनती कहाँ । चार मुक्ति बैकुण्ठ समझ येता लहया ।
शंख जुगन की जूनी उमृ बङ धारिया । जा जननी कुर्बान सु कागज पारिया ।
येती उमृ बुलन्द मरेगा अन्त रे । सतगुरु लगे न कान भेंटे न सन्त रे ।

बृह्मा विष्णु महेश्वर चेला ॐ सोहं का है खेला

माया आदि निरंजन भाई । आपै जाये आपै खाई ।
बृह्मा विष्णु महेश्वर चेला । ॐ सोहं का है खेला ।
शिखर सुन्न में धर्म अन्यायी । जिन शक्ति डायन महल पठाई ।
लाख ग्रास नित उठ दूती । माया आदि तखत की कूती ।
सवा लाख घङिये नित भांडे । हँसा उतपति प्रलय डांडे ।
ये तीनों चेला बटपारी । सिरजे पुरुषा सिरजी नारी ।
खोखापुर में जीव भुलाये । स्वपना बहिस्त बैकुण्ठ बनाये ।
यो हरहट का कुआ लोई । या गल बँधया है सब कोई ।
कीङी कुंजर और अवतारा । हरहट डोरी बँधे कई बारा ।
अरब अलील इन्द्र हैं भाई । हरहट डोरी बँधे सब आई ।
शेष महेश गणेश्वर ताही । हरहट डोरी बँधे सब आहीं ।
शुक्रादिक बृह्मादिक देवा । हरहट डोरी बँधे सब खेवा ।
कोटिक कर्ता फ़िरता देखा । हरहट डोरी कहूँ सुन लेखा ।  हरहट - रहट
चतुर्भुजी भगवान कहावे । हरहट डोरी बँधे सब आवे ।
यो है खोखापुर को कुआ । या में पङा सो निश्चय मुआ ।
माया काली नागिनी अपने जाये खात । कुण्डली में छोङे नहीं सौ बातों की बात ।

बृह्मा विष्णु महेश्वर माया धर्मराय का राज पठाया

आदि रमैनी । गरीबदास ।
आदि रमैनी अदली सारा । जा दिन होते धुंधकारा ।
सतपुरुष कीन्हा प्रकाशा । हम होते तखत कबीर खवासा ।
मनमोहिनी सिरजी माया । सतपुरुष एक ख्याल बनाया ।
धर्मराय सिरजे दरबानी । चौसठ जुग तप सेवा ठानी ।
पुरुष प्रथ्वी जाकू दीनी । राज करो देवा आधीनी ।
इकीस बृह्माण्ड राज तुम दीन्हा । मन की इच्छा सब जुग लीन्हा ।
माया मूल रूप एक छाजा । मोहि लिये जिन हू धर्मराजा ।
धर्म का मन चंचल चित धारा । मन माया का रूप विचारा ।
चंचल चेरी चपल चिरागा । या के परसे सरबस जागा ।
धर्मराय किया मन का भागी । विषय वासना संग से जागी ।
आदि पुरुष अदली अनरागी । धर्मराय दिया दिल से त्यागी ।
पुरुष लोक से दिया ढहाही । अगम दीप चल आये  भाई ।
सहज दास जिस दीप रहंता । कारण कौन कौन कुल पंथा ।
धर्मराय बोले दरबानी । सुनो सहज दास बृह्म ज्ञानी ।
चौंसठ जुग हम सेवा कीन्ही । पुरुष प्रथ्वी हम कू दीन्ही ।
चंचल रूप भया मन बौरा । मनमोहिनी ठगिया भौंरा ।
सतपुरुष के ना मन भाये । पुरुष लोक से हम चलि आये ।
अगर दीप सुनत बङभागी । सहज दास मेटो मन पागी ।
बोले सहज दास दिल दानी । हम तो चाकर सत सहदानी ।
सतपुरुष से अरज गुजारूँ । जब तुम्हार बिवाण उतारूँ ।
सहज दास को कीया पयाना । सत्य लोक को लिया परवाना ।
सतपुरुष साहिब सरबंगी । अविगत अदली अचल अभंगी ।
धर्मराय तुम्हरा दरबानी । अगर दीप चलि गये प्रानी ।
कौन हुकुम करी अरज अवाजा । कहाँ पठावो उस धर्मराजा ।
भई अवाज अदली एक सांचा । विषय लोक जा तीन्यू बाचा ।
सहज विमान चले अधिकाई । छिन मा अगर दीप चलि आई ।
हम तो अरज करी अनरागी । तुम विषय लोक जावो बङभागी ।
धर्मराय के चले विमाना । मान सरोवर आये प्राना ।
मान सरोवर रहन न पाये । दरै कबीर थाना लाये ।
बंकनाल की विषमी बाटी । तहाँ कबीरा रोकी घाटी ।
इन पाँचों मिल जगत बँधाना । लख चौरासी जीव संताना ।
बृह्मा विष्णु महेश्वर माया । धर्मराय का राज पठाया ।
योह खोखा पुर झूठी बाजी । भिसति बैकुण्ठ दगा सी साजी ।
कृतिम जीव भुलाने भाई । निज घर की तो खबर न पाई ।
सवा लाख उपजें नित हँसा । एक लाख बिनसे नित अंशा ।
उत्पति खपति प्रलय फ़ेरी । हर्ष शोक जोरा जम जेरी ।
पाँचों तत्व है प्रलय माहीं । सतगुण रजगुण तमगुण झांई ।
आठों अंग मिली है माया । पिण्ड बृह्माण्ड सकल भरमाया ।
या में सुरत शब्द की डोरी । पिण्ड बृह्माण्ड लगी है खोरी ।
स्वांसा पारस गहि मन राखो । खोल कपाट अमीरस चाखो ।
सुनाऊँ हँस शब्द सुन दासा । अगम दीप है अंग है वासा ।
भवसागर जम दण्ड जमाना । धर्मराय का है तलबाना ।
पाँचों ऊपर पद की नगरी । बाट विहंगम बंकी डगरी ।
हमरा धर्मराय सों दावा । भवसागर में जीव भरमावा ।
हम तो कहें अगम की वानी । जहाँ अविगत अदली आप  बिनानी ।
बन्दी छोङ हमारा नाम । अजर अमर है स्थीर ठांम ।
जुगन जुगन हम कहते आये । जम जौरा से हँस छुटाये ।
जो कोई माने शब्द हमारा । भवसागर नहीं भरमे धारा ।
या में सुरत शब्द का लेखा । तन अन्दर मन कहो कीन्ही देखा ।
दास गरीब अगम की वानी । खोजा हँसा शब्द सहदानी ।

काल निरंजन जग भरमावे

सृष्टि रचना पर कबीर धर्मदास संवाद ।
धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने । पद निरवाना ।
यह कारन मैं । कथा पसारा । जग से कहियो । राम न्यारा ।
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवों का भरम नशाओ ।
अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रय देवन की उत्पत्ति भाई ।
कुछ संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरें मिट जाई ।
भरम गये जग वेद पुराना । आदि राम का भेद न जाना ।
राम राम सब जगत बखाने । आदि राम कोई बिरला जाने ।
ज्ञानी सुने सो ह्रदय लगाई । मूरख सुने सो गम्य ना पाई ।
माँ अष्टांगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ।
पहले कीन्ह निरंजन राई । पीछे से माया उपजाई ।
माया रूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ।
कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरत ही धर खाये ।
पेट से देवी करी पुकारा । साहब मेरा करो उबारा ।
टेर सुनी तब हम तहाँ आये ।  अष्टांगी को बन्द छुङाये ।
सतलोक में कीन्हा दुराचार । काल निरंजन दीन्हा निकार ।
माया समेत दिया भगाई । सोलह संख कोस दूरी पर आई ।
अष्टांगी और काल अब दोई । मन्द कर्म से गये  बिगोई ।
धर्मराइ को हिकमत कीन्हा । नख रेखा से भग कर लीन्हा ।
धर्मराय कीन्हा भोग  विलासा । माया को तब रही आसा ।
तीन पुत्र अष्टांगी जाये । बृह्मा विष्णु शिव नाम धराये ।
तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ।
पुरुष गम्य को कैसे पावे । काल निरंजन जग भरमावे ।
तीन लोक अपने सुत दीन्हा । सुन्न निरंजन वासा लीन्हा ।
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । बृह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ।
तीन देव सो उनको ध्यावे । निरंजन का पार ना पावे ।
अलख निरंजन बङा बटपारा । तीन लोक जीव कीन्ह अहारा ।
बृह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुनि धूरि उङाये ।
तिनके सुत हैं तीनों देवा । आँधर जीव करत हैं सेवा ।
अकाल पुरुष काहू नहि चीन्हा । काल पुरुष सबही गहि लीन्हा ।
बृह्म काल सकल जग जाने । आदि बृह्म को ना पहचाने ।
तीनों देव और औतारा । ताको भजे सकल संसारा ।
तीनों गुण का यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ।
गुण तीनों की भक्ति में । भूल परो संसार । कहि कबीर निज नाम बिन कैसे उतरे पार ।
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