रविवार, अगस्त 14, 2011

रावण जो पूजा पाठ करता था

जटाटवीगलज्जल.प्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव: शिवम  ।
सघन । जटा मंडल रूप । वन से । प्रवाहित होकर । गंगा की धारायें । जिन शिव के । पवित्र कण्ठ प्रदेश को । प्रक्षालित ( धोती ) करती हैं । और जिनके । गले में । लम्बे लम्बे । बड़े बड़े । सर्पों की । मालायें लटक रही हैं । तथा जो शिव । डमरू को । डम डम बजाकर । प्रचंड । तांडव नृत्य । करते हैं । वे शिव । हमारा कल्याण करें ।
जटाकटाहसम्भृमभृमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम ।
अति अम्भीर । कटाह रूप । जटाओं में । अति वेग से । विलास पूर्वक । भृमण करती हुई । देव नदी गंगा की । चंचल लहरें । जिन शिव के । शीश पर । लहरा रही हैं । तथा जिनके । मस्तक में । अग्नि की । प्रचंड ज्वालायें । धधक कर । प्रज्वलित हो रही हैं । ऐसे । बाल चंद्र से । विभूषित मस्तक वाले । शिव में । मेरा अनुराग ( प्रेम ) प्रतिक्षण । बढ़ता रहे ।
धराधरेन्द्रनन्दनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरदिगन्तसन्तति  प्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरिणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिदिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ।

पर्वतराज । सुता के । विलास मय । रमणीय कटाक्षों से । परम आनंदित चित्त वाले ( महेश्वर ) तथा जिनकी । कृपा दृष्टि से । भक्तों की । बड़ी से बड़ी । विपत्तियाँ । दूर हो जाती हैं । ऐसे ( दिशा ही हैं । वस्त्र जिसके ) दिगम्बर । शिव की । आराधना में । मेरा चित्त । कब आनंदित होगा ?
जटाभुजंगपिंगल  स्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ।
जटाओं में । लिपटे । सर्प के । फण के । मणियों के । प्रकाशमान । पीले प्रभा समूह रूप । केसर कांति से । दिशा बंधुओं के । मुखमंडल को । चमकाने वाले । मतवाले । गजासुर के । चर्म रूप । उपरने से विभूषित । प्राणियों की । रक्षा करने वाले । शिव में । मेरा मन विनोद को प्राप्त हो ।
सहस्त्रलोचनप्रभृत्य.शेषलेखशेखर प्रसून धूलिधोरिणी विधूसरांगघ्रिपीठभू: ।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटक: श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखर: ।

इंद्र आदि । समस्त देवताओं के । सिर से । सुसज्जित पुष्पों की । धूल राशि से । धूसरित पाद पृष्ठ वाले । सर्प राजों की । मालाओं से विभूषित । जटा वाले । प्रभु हमें । चिरकाल के लिये । सम्पदा दें ।
ललाटचत्वरज्वल.धनञ्जयस्फुलिंगभा  निपीतपञ्चसायकं नमन्नीलिम्पनायकं ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु न: ।
इंद्र आदि । देवताओं का । गर्व नाश करते हुये । जिन शिव ने । अपने विशाल मस्तक की । अग्नि ज्वाला से । कामदेव को । भस्म कर दिया । वे अमृत किरणों वाले । चंद्रमा की कांति । तथा गंगा से । सुशोभित । जटा वाले । तेज रूप । नर मुण्ड धारी । शिव । हमको अक्षय सम्पत्ति दें ।
करालभालपट्टिका धगधगधगज्ज्वल  धनञ्जयाहुती कृतप्रचंडपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दनी कुचाग्रचित्रपत्रक  प्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचने रतिर्मम ।
जलती हुई । अपने मस्तक की । भयंकर ज्वाला से । प्रचंड कामदेव को । भस्म करने वाले । तथा पर्वत राज सुता के । स्तन के । अग्रभाग पर । विविध भांति की । चित्रकारी करने में । अति चतुर । त्रिलोचन में । मेरी प्रीति अटल हो ।
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुर  त्कुहूनिशिथिनीतम:प्रबन्धबद्धकन्धर: ।
निलिम्पनिर्झरी धरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुर: कलानिधानबन्धुर: श्रियं जगदधुरन्धर: ।

नवीन मेघों की । घटाओं से । परिपूर्ण । अमावस्याओं की । रात्रि के । घने अंधकार की तरह । अति गूढ़ कण्ठ वाले ।  गंगा को धारण करने वाले । जग चर्म से सुशोभित । बाल चंद्र की । कलाओं के । बोझ से विनम । जगत के । बोझ को । धारण करने वाले । शिव हमको । सब प्रकार की सम्पत्ति दें ।
प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा वलम्बीकंठ कन्दली रूचिप्रबद्धकन्धरम ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ।
फूले हुये । नीलकमल की । फैली हुई । सुंदर श्याम प्रभा से । विभूषित । कंठ की शोभा से । उदभासित कंधे वाले । कामदेव । तथा त्रिपुरासुर के विनाशक । संसार के । दुखों के काटने वाले । दक्ष यज्ञ विध्वंसक । गजासुर हंता । अंधकारसुर नाशक । और मृत्यु को । नष्ट करने वाले । शिव का । मैं भजन करता हूँ ।
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमन्जरी । रस प्रवाह माधुरी विज्रुम्भणामधुव्रतम ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ।
कल्याणमय । नाश न होने वाली । समस्त कलाओं की । कलियों से । बहते हुये । रस की । मधुरता का । आस्वादन करने में । भृमररूप । कामदेव को । भस्म करने वाले । त्रिपुरासुर । विनाशक । संसार दुखहारी । दक्ष यज्ञ विध्वंसक । गजासुर तथा अंधकासुर । को मारने वाले । और यमराज के भी यमराज । शिव का । मैं भजन करता हूँ ।


जयत्वदभ्रविभृमभृम भुजंगमश्वस  द्विनिर्गमत्क्रम स्फुरत्करालभालहव्यवाट ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनि मृदंगतुंगमंगल ध्वनिकृमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डव: शिव: ।
अत्यंत शीघ्र । वेग पूर्वक । भृमण करते हुये । सर्पों के फुफकार छोड़ने से । कृमशः । ललाट में बढ़ी हुई । प्रचंड अग्नि वाले । मृदंग की धिम धिम । मंगलकारी उधा ध्वनि के । क्रमारोह से । चण्ड तांडव नृत्य में । लीन होने वाले । शिव सब भाँति से सुशोभित हो रहे हैं ।
दृषद्विचित्रतल्पयो भुजंगमौक्तिकस्त्रजो  र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयो: सुह्यद्विपक्षपक्षयो: ।
तृणारविन्दचक्षुषो: प्रजामहीमहेन्द्रयो: समप्रवृत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ।
कड़े पत्थर । और कोमल विचित्र शय्या में । सर्प और मोतियों की । मालाओं में । मिट्टी के टुकड़ों । और बहुमूल्य रत्नों में । शत्रु और मित्र में । तिनके और । कमल लोचननियों में । प्रजा और महाराजाधिक राजाओं में । समान दृष्टि रखते हुये । कब । मैं शिवजी का भजन करूँगा ।
कदा निलिम्पनिर्झरी निकुन्जकोटरे वसन विमुक्तदुर्मति: सदा शिर:स्थमजलिं वहन ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नक: शिवेतिमन्त्रमुच्चरन कदा सुखी भवाम्यहम ।
कब मैं । गंगा के । कछार कुंज में । निवास करता हुआ । निष्कपटी होकर । सिर पर अंजलि धारण किए हुये । चंचल नेत्रों वाली । ललनाओं में । परम सुंदरी । पार्वती के । मस्तक में । अंकित । शिव मंत्र । उच्चारण करते हुये । परम सुख को । प्राप्त करूँगा ।


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका निगुम्फनिर्भक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं  परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ।
देवांगनाओं के । सिर में । गूँथे पुष्पों की । मालाओं के । झड़ते हुये । सुगंधमय पराग से । मनोहर । परम शोभा के धाम । महादेव के । अंगों की । सुंदरतायें । परमानंद युक्त । हमारे मन की । प्रसन्नता को । सर्वदा बढ़ाती रहें ।
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी । महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम ।
प्रचण्ड । बड़वानल की भाँति । पापों को । भस्म करने में । स्त्री स्वरूपिणी । अणिमादिक । अष्ट महा सिद्धियों । तथा । चंचल नेत्रों वाली । देव कन्याओं से । शिव विवाह समय में । गान की गई । मंगल ध्वनि । सब मंत्रों में । श्रेष्ठ शिव मंत्र से । पूरित । सांसारिक दुखों को । नष्ट कर । विजय पायें ।
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्त मोत्तमं स्तवं पठन स्मरन ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम ।
इस परम । उत्तम । शिव तांडव । श्लोक को । नित्य प्रति । मुक्त कण्ठ से । पढ़ने से । या श्रवण करने से । संतति वगैरह से पूर्ण । हरि और । गुरु में । भक्ति । बनी रहती है । जिसकी । दूसरी गति नहीं होती । शिव की ही । शरण में रहता है ।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं य: शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भु: ।
शिव पूजा के । अंत में । इस रावण कृत । शिव तांडव स्तोत्र का । प्रदोष समय में । गान करने से । या पढ़ने से । लक्ष्मी स्थिर रहती है । रथ गज घोड़े से । सर्वदा युक्त रहता है ।

इति श्री रावण कृतं शिव ताण्डव स्तोत्रं सम्पूर्णम
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