शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

इससे आप अज्ञात को नहीं जान सकेंगे

अब यह कुछ ऐसी वास्तविकता है । जिसे मैं निश्चित होकर कह सकता हूँ कि - मैंने उपलब्ध किया है । मेरे लिये यह कोई सैद्धांतिक संकल्पना नहीं है । यह मेरे जीवन का अनुभव है । सुनिश्चित । वास्तविक । और ठोस । इसलिए मैं इसकी उपलब्धि के लिए क्या आवश्यक है । यह कह सकता हूँ । और मैं कहता हूँ कि - पहली चीज यह है कि हम जो है । उसे वैसा का वैसा ही पहचाने । यानि अपनी पूर्णता में कोई इच्छा क्या हो जायेगी । और तब प्रत्येक क्षण के अवलोकन में स्वयं को अनुशासित करें । जैसे कोई अपनी इच्छाओं को खुद ही देखे । और उन्हें उस अवैयक्तिक प्रेम की ओर निर्दिष्ट करे । जो कि उसकी स्वयं की निष्पत्ति हो । जब अप निरंतर जागरूकता का अनुशासन स्थापित कर लेते हैं । उन सब चीजों का जो आप सोचते हैं । महसूस करते हैं । और करते है ( अमल में लाते हैं ) का निरंतर अवलोकन हम में से अधिकतर के जीवन में उपस्थित दमन । ऊब । भृम से मुक्त कर  । अवसरों की श्रंखला ले आता है । जो हमें संपूर्णता की ओर प्रशस्त करती है । तो जीवन का लक्ष्य कुछ ऐसा नहीं । जो कि बहुत दूर हो ? जो कि दूर कहीं भविष्य में उपलब्ध करना है । अपितु पल पल की । प्रत्येक क्षण की वास्तविकता । हर पल का यथार्थ जानने में है । जो अभी अपनी अनन्तता सहित हमारे सामने साक्षात ही है ।

उन पलों में जब आप जिन्दगी को हिस्सों में बांट देते हैं । और यह सोचते हैं कि इसका लक्ष्य अंततः कुछ  दूर भविष्य में पाना है । तो आप यथार्थ के मधुर आशय को खो देते हैं । क्योंकि जिन्दगी का असली मजा यहीं इन्हीं पलों को जीने । इन्हीं पलों में जो हम कर रहे हैं । उसमें है । जिन्दगी जवानी और बुढ़ापे के बंटवारे को नहीं जानती ।
कोई कैसे नकार सकता है ? क्या कोई ज्ञात को नकार सकता है । किसी महान नाटकीय घटना में नहीं बल्कि छोटे छोटे वाकयों में ? क्या मैं शेव करते समय स्विटजरलैंड में बिताये हसीन वक्त की यादों को नकार सकता हूँ ? क्या कोई खुशनुमा वक्त की यादों को नकार सकता है ? क्या कोई किसी बात के प्रति जागरूक हो सकता है । और नकार सकता है ? यह नाटकीय नहीं है । यह चमत्कार पूर्ण या असाधारण नहीं है । लेकिन कोई भी इस बारे में नहीं जानता ।
फिर भी अनवरत इन छोटी छोटी चीजों को नकारना । छोटी छोटी सफाईयों से । छोटे छोटे दागों को घिसने । और पोंछने से क्या एक बहुत ही बड़ी सफाई नहीं हो जायेगी । यह बहुत ही आवश्यक है । अपरिहार्य है । यह बहुत ही जरूरी है कि - विचार को याद के रूप में नकारा जाये । वो चाहे खुशनुमा हो । या दर्दनाक । दिन भर प्रत्येक मिनट जब भी विचार याद की तरह आये । उसे नकारना । किसी भी व्यक्ति को ऐसा किसी उद्देश्य से नहीं करना है । ना ही अज्ञात की किसी असाधारण अपूर्व अवस्था में उतरने के अनुसरण स्वरूप । आप ऋषि वैली में रहते हैं । और मुम्बई और रोम के बारे में सोचते हैं । यह एक संघर्ष एवं वैमनस्य पदा करता है । और संघर्ष मस्तिष्क को कुंद 


बनाता है । खंडि‍त चीज बनाता है । क्या आप इस चीज को देखते हैं । और इसे पोंछकर हटा सकते हैं ? क्या आप यह सफाई जारी रखते हैं । क्योंकि आप अज्ञात में प्रवेश करना चाहते हैं ? इससे आप अज्ञात को नहीं जान सकेंगे । क्योंकि जिस क्षण आप इसे अज्ञात के रूप में पहचानते हैं । वह वापस ज्ञात की परिधि में आ जाता है । पहचानने या मान्यता देने की प्रक्रिया । ज्ञात में निरन्तर रहने कि प्रक्रिया है । जबकि हम नहीं जानते कि - अज्ञात क्या है ? हम यही एक चीज कर सकते हैं । हम विचारों कों पोंछते जायें । जैसे ही यह उगें । आप फूल देखें । उसे महसूस करें । सौन्दर्य देखें । उसका प्रभाव उसकी असाधारण दीप्ति देखें । फिर आप अपने उस कमरें में चले आये । जिसमें आप रहते हैं । जो कि उचित अनुपात में नहीं बना है । जो कि कुरूप है । आप कमरे में रहते हैं । लेकिन आपके पास कुछ सौन्दर्य बोध होता है । और आप फूल के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं । और विचार की पकड़ में आ जाते हैं । तो जैसे ही विचार उगे । आपको दिखे । उसे पोंछ दें । हटा दें । तो अब जिस गहराई से यह पोंछना । या सफाई कर्म । या हटाना करते हैं । आप जिस गहराई से फूल । अपनी पत्नी । अपने देवता । अपने आर्थिक जीवन को नकारते हैं । यह देखना है ? आपको अपनी पत्नी । बच्चों और कुरूप दानवीय समाज के साथ जीना ही है । आप जीवन से पलायन नहीं कर सकते । लेकिन जब अब पूर्णतः नकारना शुरू करते हैं । तो विचार । शोक । खुशी से आपके रिश्ते भी अलग होंगे । तो यहां पर अपरिहार्य अत्यावश्यक रूप से पूर्ण रूपेण नकारना होना चाहिये । आंशिक रूप से नकारना नहीं चलेगा । उन चीजों को बचाना भी नहीं चलेगा । जिन्हें आप चाहते हैं । ओर केवल उन चीजों को नकारने से भी नहीं चलेगा । जो आप नहीं चाहते ।
सच्चे शाब्दिक मायनों में सीखना । केवल जागरूकता अवधान पूर्ण अवस्था में ही संभव है । जिसमें आंतरिक या बाहृय विवशता न हो । उपयुक्त चिंतन मनन केवल तब हो सकता है । जब मन परंपरा और स्मृति की दासता में न हो । अवधान पूर्ण होना ही मन में शांति को आंमत्रित करता है । जो कि सृजन का द्वार है । यही वजह है कि

अवधान या जागरूकता सर्वोच्च रूप से महत्वपूर्ण हैं । मन की उर्वरता के लिए क्रियात्मक स्तर पर ज्ञान की आवश्यकता होती है । न कि ज्ञान पर ही रूक जाने की । हमारा सरोकार छात्र के मानव के रूप में सम्पूर्ण विकास पर होना चाहिए । ना कि गणित । या वैज्ञानिक । या संगीत । जैसे किसी एक क्षेत्र में उसकी क्षमता बढ़ाने से । हमारा सरोकार छात्र के सम्पूर्ण मानवीय विकास से होना चाहिए । अवधान की अवस्था किस प्रकार उपलब्ध की जा सकती है ? यह अनुनय । विनय । मनाने । तुलना करने । पुरस्कार । अथवा दंड जैसे दबाव के तरीकों से नहीं उपजायी जा सकती । भय का निर्मूलन अवधान पूर्ण होने की शुरूआत है । जब तक कुछ होने । कुछ हो जाने की जिद । या अपेक्षा । जो कि सफलता का पीछा करने जैसा है । जब तक हैं । अपनी सम्पूर्ण निराशा । अवसाद । और कुटिल विसंगतियों के साथ । भय बना रहता है । आप ध्यान केन्द्रित करना सिखा सकते हैं लेकिन अवधान पूर्ण होना नहीं सिखा सकते । वैसे ही जैसे कि भय से स्वाधीन रहना नहीं सिखा सकते । लेकिन हम शुरूआत कर सकते हैं । भय को पैदा करने वाले कारणों को खोज कर । उन कारणों को समझना । भय के निर्मूलन में सहायक हो सकता है । तो जब छात्र के आस पास अच्छाई का वातावरण बनता है । जब वह अपने आपको सुरक्षित और सहज महसूस करता है । तो जागरूकता या अवधान तुरन्त ही उदित हो जाता है । जागरूकता या अवधान सप्रेम निष्काम कर्म की तरह उसमें चले आते हैं । प्रेम तुलना नहीं है । इसलिए कुछ होने की ईर्ष्या और दमन भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं । जे. कृष्णमूर्ति
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