शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

भोग और जगत सब भृम मात्र हैं

हे मुनीश्वर ! जितने कुछ पदार्थ हैं । वह सब मन से उत्पन्न होते हैं । सो मन ही भृम मात्र है । अन होता मन दुखदायी हुआ है । मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है । और सुखदायक जानता है । सो मृग तृष्णा के जलवत है । जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं । और दौड़ते दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं । तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता । वैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं । और शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों के भोग सर्प वत है । जिनका मारा हुआ जन्म । मरण । और जन्म से जन्मान्तर पाता है । भोग और जगत । सब भृम मात्र हैं । उनमें जो आस्था करते हैं । वह महा मूर्ख हैं । मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि - सब आगमा पायी है । अर्थात आते भी हैं । और जाते भी हैं । इससे जिस पदार्थ का नाश न हो । वही पदार्थ पाने योग्य है । इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है ।
हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदा रूप पदार्थ भासते हैं । वह सब आपदा हैं । इनमें रंचक भी सुख नहीं । जब इनका वियोग होता है । तब कण्टक की तरह मन में चुभते हैं । जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं । तब जीव राग द्वेष से जलता है । और जब नहीं प्राप्त होते । तब तृष्णा से जलता है । इससे भोग दुख रूप ही है । जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता । वैसे ही भोग रूपी दुख की शिला में । सुख रूप छिद्र नहीं होता । हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ । जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो । तो धुँवा हो । थोड़ा थोड़ा जलता रहता है । वैसे ही भोग रूपी अग्नि से मन जलता रहता है । विषयों में कुछ भी सुख नहीं है । दुख बहुत हैं । इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है । जैसे खाईं के ऊपर तृण और पात होते हैं । और उससे खाईं आच्छादित हो जाती है । उसको देख हिरण कूदकर दुख पाता है । वैसे ही मूर्ख भोग को सुख रूप जानकर भोगने की इच्छा करता है । और जब भोगता है । तब जन्म से जन्मान्तर रूपी खाईं में जा पड़ता है । और दुख पाता है ।


हे मुनीश्वर ! भोग रूपी चोर । अज्ञान रूपी रात में । आत्मा रूपी धन लूट ले जाता है । पर उसके वियोग से महा दीन रहता है । जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है । वह दुख रूप है । उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती । और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है । वह शरीर क्षण भंगुर और असार है । जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है । वह मूर्ख और जड़ है । उसका बोलना । और चलना भी ऐसा है । जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है । और उसके वेग से शब्द होता है । जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता । वैसे ही दुख जानकर मैं भोग की इच्छा नहीं करता । लक्ष्मी भी परम अनर्थकारी है । जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती । तब तक उसके पाने का यत्न होता है । और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है । जब लक्ष्मी प्राप्त हुई । तब सब सदगुण अर्थात शीलता । सन्तोष । धर्म । उदारता । कोमलता । वैराग्य । विचार दया आदि का नाश कर देती है । जब ऐसे गुणों का नाश हुआ । तब सुख कहाँ से हो । तब तो परम आपदा ही प्राप्त होती है । इसको परम दुख का कारण जानकर । मैंने त्याग दिया है ।
हे मुनीश्वर ! इस जीव में गुण तब तक हैं । जब तक लक्ष्मी नहीं प्राप्त हुई । जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब सब गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे बसन्त ऋतु की मंजरी तब तक हरी रहती है । जब तक ज्येष्ठ आषाढ़ नहीं आता । और जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया । तब मंजरी जल जाती है । वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब शुभ गुण जल जाते हैं । मधुर वचन तभी तक बोलता है । जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं है । और जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब कोमलता का अभाव होकर कठोर हो जाता है । जैसे जल पतला तब तक 


रहता है । जब तक शीतलता का संयोग नहीं हुआ । और जब शीतलता का संयोग होता है । तब बरफ होकर कठोर दुखदायक हो जाता है । वैसे यह जीव लक्ष्मी से जड़ हो जाता है ।
हे मुनीश्वर ! जो कुछ संपदा है । वह आपदा का मूल है । क्योंकि जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । तब बड़े बड़े सुख भोगता है । और जब उसका अभाव होता है । तब तृष्णा से जलता है । और जन्म से जन्मान्तर पाता है  । लक्ष्मी की इच्छा करना ही मूर्खता है । यह तप क्षण भंगुर है । इससे भोग उपजते । और नष्ट होते हैं । जैसे जल से तरंग उपजते । और मिट जाते हैं । और जैसे बिजली स्थिर नहीं होती । वैसे ही भोग भी स्थिर नहीं रहते । पुरुष में शुभ गुण तब तक हैं । जब तक तृष्णा का स्पर्श नहीं । और जब तृष्णा हुई । तब गुणों का अभाव हो जाता है । जैसे दूध में मधुरता तब तक है । जब तक उसे सर्प ने स्पर्श नहीं किया । और सर्प ने स्पर्श किया । तब वही दूध विष रूप हो जाता है ।

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