शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

लेकिन ज्ञानी की वासना रस रहित है

भारद्वाज बोले - हे भगवान ! जीवन मुक्त की स्थिति कैसी है ? और राम कैसे जीवन मुक्त हुए ? वह आदि से अन्त पर्यन्त सब कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे पुत्र ! यह जगत जो भासता है । सो वास्तविक कुछ नहीं उत्पन्न हुआ । अविचार करके भासता है । और विचार करने से निवृत्त हो जाता है । जैसे आकाश में नीलता भासती है । सो भृम से वैसे ही है । यदि विचार करके देखिए । तो नीलता की प्रतीति दूर हो जाती है । वैसे ही अविचार से जगत भासता है । और विचार से लीन हो जाता है । हे शिष्य ! जब तक सृष्टि का अत्यन्त अभाव नहीं होता । तब तक परम पद की प्राप्ति नहीं होती । जब दृश्य का अत्यन्त अभाव हो जावे । तब शुद्ध चिदाकाश आत्म सत्ता भासेगी । कोई इस दृश्य का महा प्रलय में अभाव कहते हैं । परन्तु मैं तुमको तीनों कालों का अभाव कहता हूँ । जब इस शास्त्र को । श्रद्धा संयुक्त । आदि से अन्त तक । सुनकर धारण करे । भ्रान्ति निवृत्ति हो जावे । और अव्याकृत पद की प्राप्ति हो । हे शिष्य ! संसार भृम मात्र सिद्ध है । इसको भृम मात्र जानकर विस्मरण करना यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है । और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय । तब परम पद की प्राप्ति हो । वासना का एक पुतला है । उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ़ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है । और फिर सूर्य के ताप से पिघल कर जल होता है । तो केवल शुद्ध ही रहता है । वैसे ही आत्मा रूपी जल है । उसमें संसार की सत्यता रूपी जड़ता शीतलता है । और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञान रूपी सूर्य उदय होगा । तब संसार की सत्यता रूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत हुई । तब मन नष्ट हो जावेगा । और जब मन नष्ट हुआ । तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है । और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना 2 प्रकार की है । एक शुद्ध । और दूसरी अशुद्ध । 


अशुद्ध वासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा को देह आदि हैं । उनमें अहंकार करता है । और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ । तब नाना प्रकार की वासना उपजती हैं । जिससे घटी यंत्र की तरह भृमता रहता है ।
हे साधो ! यह जो पंच 5 भूत का शरीर तुम देखते हो । सो सब वासना रूप है । और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं । और जब धागा टूट जाता है । तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं । और नहीं ठहरते । वैसे ही वासना के क्षय होने पर पंच 5 भूत का शरीर नहीं रहता । इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है । शुद्ध वासना में जगत का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है ।
हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है । और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कच्चा बीज उगता है । और जो दग्ध हुआ है । सो फिर नहीं उगता । वैसे ही अज्ञानी की वासना रस सहित है । इससे जन्म का कारण है । और ज्ञानी की वासना रस रहित है । वह जन्म का कारण नहीं । ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक होती है । वह किसी गुण से मिलकर अपने में चेष्टा नहीं देखता । वह खाता । पीता । लेता । देता । बोलता । चलता एवम और अन्य व्यवहार करता है । पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है । कदाचित द्वैत भावना उसको नहीं फुरती । वह अपने स्वभाव में स्थित है । इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कुम्हार के चक्र को । जब तक घुमावे । तब तक फिरता है । और जब घुमाना छोड़ दे । तब स्थीयमान गति से उतरते उतरते स्थिर रह जाता है । वैसे ही जब तक अहंकार सहित वासना होती है । तब तक जन्म पाता है । और जब अहंकार से रहित हुआ । तब फिर जन्म नहीं पाता ।
हे साधो ! इस अज्ञान रूपी वासना के नाश करने को एक बृह्म विद्या ही श्रेष्ठ उपाय है । जो मोक्ष उपायक शास्त्र है ।

यदि इसको त्याग कर । और शास्त्र रूपी गर्त्त में गिरेगा । तो कल्प पर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा । जो बृह्म विद्या का आश्रय करेगा । वह सुख से आत्मपद को प्राप्त होगा ।
हे भारद्वाज ! यह मोक्ष उपाय । राम और वशिष्ठ का संवाद है । यह विचारने योग्य है । और बोध का परम कारण है । इसे आदि से अन्त पर्यन्त सुनो । और जैसे राम जीवन मुक्त हो विचरे हैं । सो भी सुनो । एक दिन राम अध्ययन शाला से विद्या पढ़ कर अपने गृह में आये । और सम्पूर्ण दिन विचार सहित व्यतीत किया । फिर मन में तीर्थ ठाकुर द्वारे का संकल्प धरकर अपने पिता दशरथ के पास । जो अति प्रजा पालक थे आये । और जैसे हंस सुन्दर कमल को गृहण करे । वैसे ही उन्होंने उनका चरण पकड़ा । जैसे कमल के फूल के नीचे कोमल तरैयाँ होती हैं । और उन तरैयों सहित कमल को हंस पकड़ता है । वैसे ही दशरथ की अँगुलियों को उन्होंने गृहण किया । और बोले - हे पिता ! मेरा चित्त तीर्थ और ठाकुर द्वारों के दर्शनों को चाहता है । आप आज्ञा कीजिये । तो मैं दर्शन कर आऊँ । मैं तुम्हारा पुत्र हूँ । आगे मैंने कभी नहीं कहा । यह प्रार्थना अब ही की है । इससे यह वचन मेरा न फेरना । क्योंकि ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं है कि जिसका मनोरथ इस घर से सिद्ध न हुआ हो । इससे मुझको भी कृपा कर आज्ञा दीजिये ।
इतना कह कर वाल्मीकि बोले - हे भारद्वाज ! जिस समय इस प्रकार राम ने कहा । तब वशिष्ठ पास बैठे थे । उन्होंने दशरथ से कहा - हे राजन ! इनका चित्त उठा है । राम को आज्ञा दो । तीर्थ कर आवें । और इनके साथ सेना । धन । मंत्री और ब्राह्मण भी दीजिये कि विधि पूर्वक दर्शन करें । तब महाराज दशरथ ने शुभ मुहुर्त दिखाकर राम को आज्ञा दी । जब वे चलने लगे । तो पिता और माता के चरणों में पड़े । और 


सबको कण्ठ लगाकर रुदन करने लगे । इस प्रकार सबसे मिलकर लक्ष्मण आदि भाई । मन्त्री । और वशिष्ठ आदि ब्राह्मण । जो बिधि जानने वाले थे । बहुत सा धन और सेना साथ ली । और दान पुण्य करते हुए गृह के बाहर निकले । उस समय वहाँ के लोगों और स्त्रियों ने राम के ऊपर फूलों और कलियों की माला की । जैसे बरफ बरसती है । वैसी ही वर्षा की । ओर राम की मूर्ति हृदय में धर ली । इसी प्रकार राम वहाँ से ब्राह्मणों और निर्धनों को दान देते गंगा । यमुना । सरस्वती आदि तीर्थों में विधि पूर्वक स्नान कर पृथ्वी के चारों ओर पर्यटन करते रहे । उत्तर । दक्षिण । पूर्व । और पश्चिम में दान किया । और समुद्र के चारों ओर स्नान किया । सुमेरु और हिमालय पर्वत पर भी गये । और शालिग्राम । बद्री । केदार आदि में स्नान और दर्शन किये । ऐसे ही सब तीर्थ स्नान । दान । तप । ध्यान और विधि संयुक्त यात्रा करते करते एक वर्ष में अपने नगर में आये ।
इति श्री योग वशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे तीर्थ यात्रा वर्णनन्नाम द्वितीय सर्गः

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