शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

संसार रूपी वृक्ष का मूल बीज मन है

हे राम ! जब अहं त्वं आदि रात विचार रूपी सूर्य से क्षीण हो जावेगी । तब परमात्मा का प्रकाश साक्षात होगा । भेद कल्पना नष्ट हो जावेगी । और अनन्त बृह्माण्ड में जो व्यापक आत्म तत्व है । वह प्रकाशित होगा । जैसे अपने विचार से जनक ने अहंकार रूपी वासना का त्याग किया है । वैसे ही तुम भी विचार करके अहंकार रूपी वासना का त्याग करो । अहंकार रूपी मेघ जब नष्ट होगा । और चित्त आकाश निर्मल होगा । तब आत्म रूपी सूर्य प्रकाशित होगा । जब तक अहंकार रूपी मेघ आवरण है । तब तक आत्म रूपी सूर्य नहीं भासता । विचार रूपी वायु से । जब अहंकार रूपी मेघ नाश हो । तब आत्म रूपी सूर्य प्रकट भासेगा ।
हे राम ! ऐसे समझो कि - मैं हूँ । न कोई । और है । न नास्ति है । न अस्ति है । जब ऐसी भावना दृढ़ होगी । तब मन शान्त हो जावेगा । और हेयो पादेय बुद्धि । जो इष्ट पदार्थों मे होती है । उसमें न डूबोगे । इष्ट अनिष्ट के गृहण त्याग में । जो भावना होती है । यही मन का रूप है । और यही बन्धन का कारण है । इससे भिन्न बन्धन कोई नहीं । इससे तुम इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट में हेयो पादेय बुद्धि मत करो । और दोनों के त्यागने से जो शेष रहे । उसमें स्थित हो । इष्ट अनिष्ट की भावना उसकी की जाती है । जिसको हेयो पादेय बुद्धि नहीं होती । और जब तक हेयो पादेय बुद्धि क्षीण नहीं होती । तब तक समता भाव नहीं उपजता । जैसे मेघ के नष्ट हुए बिना । चन्द्रमा की चाँदनी नहीं भासती । वैसे ही जब तक पदार्थों में इष्ट अनिष्ट बुद्धि है । और मन लोलुप होता है । तब तक समता उदय नहीं होती । जब तक युक्त । अयुक्त । लाभ । अलाभ । इच्छा नहीं मिटती । तब तक शुद्ध समता और निरसता नहीं उपजती । एक बृह्म तत्व । जो निरामय रूप । और नाना तत्व से रहित है । उसमें युक्त क्या ? और अयुक्त क्या ? जब तक इच्छा । अनिच्छा । और वांछित । अवांछित । यह दोनों बातें स्थित हैं । अर्थात फुरते और क्षोभ करते हैं । तब तक सौम्यता भाव नहीं होता । जो हेयो पादेय बुद्धि से रहित । ज्ञान वान है

। उस पुरुष को यह शक्ति आ प्राप्त होती है । जैसे राजा के अन्तःपुर में पटु ( चतुर ) रानी स्थित होती हैं । वह शक्ति यह है । भोगों में नीरसता । देह अभिमान से रहित । निर्भयता । नित्यता । समता । पूर्ण आत्मा दृष्टि । ज्ञान निष्ठा । निर इच्छता । निर अहंकारता । अपने आपको सदा अकर्ता जानना । इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में सम चित्तता । निर्विकल्पता । सदा आनन्द  स्वरूप रहना । धैर्य से सदा एक रस रहना । स्व रूप से भिन्न वृत्ति न फुरना । सब जीवों से मैत्री भाव । सत्य बुद्धि । निश्चयात्मक रूप से तुष्टता । मुदिता । और मृदु भाषणा । इतनी शक्ति हेयो पादेय से रहित पुरुष को आ प्राप्त होती है ।
हे राम ! संसार के पदार्थों की ओर । जो चित्त धावता है । उसको वैराग्य से उलटा कर खींचना । जैसे पुल से जल के वेग का निवारण होता है । वैसे ही । जगत से रोक कर मन को आत्म पद में लगाने से आत्म भाव प्रकाशता है । इससे हृदय से सब वासना का त्याग करो । और बाहर से सब क्रिया में रहो । वेग चलो । स्वांस लो । और सर्वदा । सब प्रकार चेष्टा करो । पर सर्वदा सब प्रकार की वासना त्याग करो । संसार रूपी समुद्र में वासना रूपी जल है । और चिन्ता रूपी सिवार है । उस जल में तृष्णा वान रूपी मच्छ फँसे हैं । यह विचार । जो तुमसे कहा है । उस विचार रूपी शिला से । बुद्धि को तीक्ष्ण करो । और इस जाल को छेदो । तब संसार से मुक्त होगे । संसार रूपी वृक्ष का । मूल बीज मन है । ये वचन जो कहे हैं । उनको हृदय में धरकर धैर्य वान हो । तब आधि व्याधि दुखों से मुक्त होगे । मन से मन को छेदो । जो बीती है । उसका स्मरण न करो । और भविष्य की चिन्ता न करो । क्योंकि वह असत्य रूप है । और वर्तमान को भी असत्य जान कर । उसमें बिचरो । जब मन से संसार का विस्मरण होता है । तब मन में फिर न फुरेगा । मन असत्य भाव जान कर चलो । बैठो । स्वांस लो । निस्वांस करो । उछलो । सोवो । सब 


चेष्टा करो । परन्तु भीतर सब असत्य रूप जानो । तब खेद न होगा । अहं । मम । रूपी मल का त्याग करो । प्राप्ति में बिचरो । अथवा राज आ प्राप्त हो । उसमें बिचरो । परन्तु भीतर से । इसमें आस्था न हो । जैसे आकाश का सब पदार्थों में अन्वय है । परन्तु किसी से स्पर्श नहीं करता । वैसे ही बाहर कार्य करो । परन्तु मन से किसी में बन्धाय मान न हो । तुम चेतन रूप । अजन्मा । महेश्वर पुरुष हो । तुमसे भिन्न कुछ नहीं । और सब में व्याप रहे हो । जिस पुरुष को सदा यही निश्चय रहता है । उसको संसार के पदार्थ चलाय मान नहीं कर सकते । और जिनको संसार में आसक्त भावना है । और स्वरूप भूले हैं । उनको संसार के पदार्थों से विकार उपजता है । और हर्ष । शोक । और भय खींचते हैं । उससे वे बँधे हुए हैं । जो ज्ञान वान पुरुष राग द्वेष से रहित हैं । उनको लोहा । बट्टा  ( ढेला ) पाषाण । और सुवर्ण सब एक समान है । संसार वासना के ही त्यागने का नाम मुक्ति है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...