शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

जीव को उसी समय मृत्युलोक 84 में गिरा देते हैं

हे राजन ! स्वर्ग में बड़े बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्य वाले होते हैं । वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं । जो मध्यम पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं । और जो कनिष्ठ पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं । वे तो तुमसे कहे । अब स्वर्ग के जो दोष हैं । वे भी सुनो ।
हे राजन ! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं । और उत्तम सुख भोगते हैं । उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है । क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं । उनको देखकर क्रोध उपजता है कि ये मेरे समान क्यों बैठे है । और जो आपसे नीचे बैठे हैं । उनको देखकर अभिमान उपजता है कि मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि जब पुण्य क्षीण होते हैं । तब जीव को उसी काल में मृत्यु लोक 84 में गिरा देते हैं । एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं ।

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