शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010

तो.. तूही तूही गाती है ..??

बैल बने । हल में जुते । ले गाडी में दीन । तेली के कोल्हू रहे । पुनि घेर कसाई लीन । मांस कटा । बोटी बिकी । चमडन मढी नक्कार । कछुक करम बाकी रहे । तिस पर पडती मार । .. सतगुरु कबीर साहेब ।
एक बार की बात है । कबीर साहब एक गांव में गये । वहां उन्हें एक आदमी मिला । कबीर साहब ने कहा । भाई कब तक जगत जंजाल में पडा रहेगा । प्रभु का नाम ( गुरु द्वारा दिया गया नाम ) जपा कर । अपना आगा सुधार । आदमी बोला । कबीर साहब अभी मेरे छोटे छोटे बच्चे हैं । जब इनकी शादियां हो जांय । तब नाम जपा करूंगा । काफ़ी समय बाद कबीर साहब फ़िर आय । बोले । अब तो नाम जपा कर । वह बोला । बच्चे तो बडे हो गये । इनकी शादियां भी हो गयीं । पर अभी इनके बच्चे छोटे छोटे हैं । ये बडे हो जांय । तब नाम जपूंगा । कबीर साहब चले गये । मगर अबकी बार जब आये । तो वह बूढा मर चुका था । उन्होंने पूछा । यहां एक बाबा रहते थे । वे कहां गये । घरवालों ने कहा । उन्हें तो मरे हुये बहुत समय हो गया । महाराज ।.. आत्मग्यानी कबीर साहब जानते थे कि उसका पुत्र । पोत्रों तथा और अन्य चीजों से बहुत मोह था । और ऐसा आदमी मरकर कहीं जाता नहीं । वरन माया मोहवश मरकर वहीं जनम लेता है । मनुष्य जन्म मिल सकता नहीं । अतः किसी पशु आदि योनि के रूप में वहीं होगा । उस बूढे को अपनी एक गाय से बेहद प्यार था । जब कबीर साहब ने अंतरध्यान होकर देखा । तो वह बूढा मरकर उसी गाय का बछडा बना था । ( मरने के बाद भी जीवात्मा का लिंग चेंज नहीं होता । स्त्री मादा रूप में । पुरुष नर रूप में ही जन्म लेगा । चाहे वे पशु । कीट । पतंगा कुछ भी क्यों न बनें । ) जब वह तीन साल का हुआ । तो अच्छा बैल बन गया । घरवालों ने उसे खेती कार्यों में खूब जोता । फ़िर उन्होंने उसे गाडीवान को बेच दिया । उसने भी उसे खूब जोता । जब वह गाडीवान के काम का भी ना रहा । तो उसने उसे एक कोल्हू चलाने वाले तेली को बेच दिया । बुडापा हो जाने के बाद भी तेली ने उसे खूब जोता । आखिर जब वह तेली के काम का भी ना रहा । तो उसने उसे एक कसाई को बेच दिया । कसाई ने पूरी निर्दयता से उसे जीवित ही काट डाला । और उसका मांस बोटी बोटी करके बेच दिया । बाकी बचा हुआ चमढा नगाढा मढने वाले ले गये । उन्होंने नगाडे पर मढकर उसे तब तक पीटा । जब तक वह फ़ट ना गया । इसी पर कबीर साहब ने कहा था । बैल बने । हल में जुते । ले गाडी में दीन । तेली के कोल्हू रहे । पुनि घेर कसाई लीन । मांस कटा । बोटी बिकी । चमडन मढी नक्कार । कछुक करम बाकी रहे । तिस पर पडती मार । .. सतगुरु कबीर साहेब । *** मेरी बात -- इसी प्रसंग पर मुझे एक बात याद आ गयी । जो सतसंग के दौरान किसी ने कही थी । बाबा । मैं.. । की पक्की तो बकरी होती है । जो मरते दम तक मैं नहीं छोडती ? मैंने कहा । हरेक को आखिर में । मैं.. छोडनी ही पडती है । बोला । बाबा कैसे ? बकरी जो मैं.. मैं करती है । आखिर तक मैं ना जाती है । गर्दन पर छुरी चलती है । पर मैं ही मैं चिल्लाती है ।..लेकिन..? उसी बकरी आंत की जब तांत बना ली जाती है । धुनिया जब उसको धुनता है । तो.. तूही तूही गाती है ।,,तांत क्या होती है ? ? ..पहले के समय में रजाई आदि में भरने के लिये जो रुई धुनी जाती थी । उसमें एक कमान में इसी तांत को रस्सी की जगह बांधकर धनुष की तरह बनाकर छ्त से लटका देते थे । फ़िर जब रुई के ढेर में उस यंत्र को हाथ से चलाते थे । तो उससे तूही तूही ..आवाज निकलती थी । मैंने इसको खूब देखा है । 40 या ऊपर के लोगों ने भी खूब देखा होगा ।

गुरुवार, दिसंबर 23, 2010

दोबारा..अनुराग सागर की संक्षित कहानी ।

लेखकीय - अनुराग सागर की संक्षित कहानी । मेरे ज्यादा पढे जाने वाले लेखों में से एक है । लेकिन पहले जब मैंने इसको प्रकाशित किया था । तब आनलाइन टाइप करने के कारण । स्लो इंटरनेट आदि की वजह से इसमें काफ़ी अशुद्धियां और मैटर कम और विधिवत नहीं था । पाठकों की सुविधा हेतु । मैंने इसे संशोधित करके इसमें कुछ और मैटर बढाकर पुनः प्रकाशित किया है । पर अपने जीवन का असली रहस्य जानने हेतु । और आप कैसे बन्दी हो ? इसको जानने हेतु आपको मूल पुस्तक । अनुराग सागर । मूल्य 100 रु० ही पढनी होगी । ये पुस्तक किसी की भी आंखे खोल देगी । यदि आपके मन में कोई प्रश्न हो । तो आप ब्लाग पर कमेंट के रूप में या मेरे ई मेल GOLU224 @YAHOO.COM पर मेल करके पूछ सकते हैं ।
अनुराग सागर ।.. कबीर साहिब और धरमदास जी के संवादों पर आधारित महान ग्रन्थ है । इसकी शुरुआत में बताया गया है कि सबसे पहले जब ये सृष्टि नहीं थी । प्रथ्वी । आसमान । सूरज । तारे आदि कुछ भी नहीं था । तब केवल परमात्मा ही था ।.. सिर्फ़ परमात्मा ही शाश्वत है । इसलिये संतमत में । और सच्चे जानकार संत । परमात्मा के लिये । है । शब्द का प्रयोग करते हैं । उसने ( परमात्मा ने ) कुछ सोचा ।.. ( सृष्टि की शुरूआत में । उसमें स्वतः एक विचार उत्पन्न हुआ । इससे स्फ़ुरणा ( संकुचन जैसा ) हुयी ) । तब एक शब्द ( हुं.. ) प्रकट हुआ । ( जैसे हम लोग आज भी विचारशील होने पर । हुं.. । करते हैं । तब उसने सोचा । मैं कौन हूं ?.. इसीलिये हर इंसान आज तक इसी प्रश्न का उत्तर खोज रहा है कि मैं कौन हूं ? उस समय ये पूर्ण था । ) तब उसने एक सुन्दर और आनंददायक दीप की रचना की । और उसमें विराजमान हो गया । फिर उसने एक एक करके । एक ही नाल से 16 अंश यानी सुत प्रकट किये । उनमें 5 वें अंश कालपुरुष को छोड़कर सभी सुत आनंद को देने वाले थे । और वे सतपुरुष द्वारा बनाये गए हंसदीपों मैं आनंदपूर्वक रहते थे । इनमें कालपुरुष सबसे भयंकर और विकराल था । वह अपने भाइयों की तरह हंसदीपों में न जाकर । मानसरोवर दीप के निकट चला आया । और सत्पुरुष के प्रति घोर तपस्या करने लगा । लगभग 64 युगों तक तपस्या हो जाने पर । उसने सतपुरुष के प्रसन्न होने पर तीन लोक । स्वर्ग । धरती और पाताल मांग लिए । और फिर से कई युगों तक तपस्या की । इस पर सतपुरुष ने अष्टांगी कन्या ( आदिशक्ति । भगवती आदि ) को स्रष्टि बीज के साथ कालपुरुष के पास भेजा । ( इससे पहले सतपुरुष ने कूरम नाम के सुत को भेजकर उसकी तपस्या करने की इच्छा की वजह पूछी । ) अष्टांगी कन्या बेहद सुन्दर और मनमोहक अंगो वाली थी । वह कालपुरुष को देखकर भयभीत हो गयी । कालपुरुष उस पर मोहित हो गया । और उससे रतिक्रिया का आग्रह किया । ( यही प्रथम स्त्री पुरुष का काम मिलन था । ) और दोनों रतिक्रिया मैं लीन हो गए । ये रतिक्रिया बहुत लम्बे समय तक चलती रही । इससे ब्रह्मा । विष्णु और शंकर का जन्म हुआ । अष्टांगी कन्या उनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगी । पर कालपुरुष की इच्छा कुछ और ही थी ? इनके जन्म के उपरांत कुछ समय बाद कालपुरुष अदृश्य हो गया । और भविष्य के लिए आदिशक्ति को निर्देश दे गया । तब आदिशक्ति ने अपने अंश से तीन कन्यायें उत्पन्न की । और उन्हें समुद्र में छिपा दिया । फ़िर उसने अपने पुत्रों को समुद्र मंथन की आग्या दी । और समुद्र से मंथन के द्वारा प्राप्त हुयी तीनों कन्यायें अपने तीन पुत्रों को दे दी । ये कन्यायें सावित्री । लक्ष्मी और पार्वती थी । तीनों पुत्रों ने मां के कहने पर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार लिया । तब आध्याशक्ति ने ( कालपुरुष के कहेनुसार..यह बात कालपुरुष दोबारा कहने आया था । क्योंकि पहले अष्टांगी ने जब पुत्रों को इससे पहले सृष्टि रचना के लिये कहा । तो उन्होंने अनसुना कर दिया । ) अपने तीनो पुत्रों के साथ सृष्टि की रचना की ।
आद्धाशक्ति ने खुद अंडज । यानी अंडे से पैदा होने वाले जीवों को रचा । ब्रह्मा ने पिंडज । यानी पिंड से शरीर से पैदा होने वाले जीवों की रचना की । विष्णु ने ऊश्मज । यानी पानी । गर्मी से पैदा होने वाले जीव कीट पतंगे जूं आदि की रचना की । शंकर जी ने स्थावर यानी पेड । पौधे । पहाड़ । पर्वत आदि जीवों की रचना की । और फिर इन सब जीवों को 4 खानों वाली 84 लाख योनियों में डाल दिया । इनमें मनुष्य शरीर की रचना सर्वोत्तम थी । इधर ब्रह्मा । विष्णु । शंकर ने अपने पिता कालपुरुष के वारे मैं जानने की बहुत कोशिश की । पर वे सफल न हो सके । क्योंकि वो अदृश्य था और उसने आध्याशक्ति से कह रखा था कि वो किसी को उसका पता न बताये । फिर वो सब जीवों के अन्दर ॥ मन ।। ??? के रूप मैं बैठ गया । और जीवों को तरह तरह की वासनाओं में फ़साने लगा । और समस्त जीव बेहद दुख भोगने लगे । क्योंकि सतपुरुष ने उसकी क्रूरता देखकर शाप दिया था कि वह एक लाख जीवों को नित्य खायेगा । और सवा लाख को उत्पन्न करेगा । समस्त जीव उसके क्रूर व्यवहार से हाहाकार करने लगे और अपने बनाने वाले को पुकारने लगे । सतपुरुष को ये जानकर बहुत गुस्सा आया कि काल समस्त जीवों पर बेहद अत्याचार कर रहा है । ( दरअसल काल जीवों को तप्तशिला पर रखकर पटकता और खाता था । ) तब सतपुरुष ने ग्यानी जी ( कबीर साहब ...जो सतपुरुष के 16 अंश में से एक है । ) को उसके पास भेजा । कालपुरुष और ग्यानी जी के बीच काफ़ी झडप हुयी । और कालपुरुष हार गया । तप्तशिला पर तडपते जीवों ने ग्यानी जी से प्रार्थना की । कि वो उसे इसके अत्याचार से बचायें । ग्यानी जी ने उन जीवों को सतपुरुष का नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र । ) ध्यान करने को कहा । इस नाम के ध्यान करते ही जीव मुक्त होकर ऊपर ( सतलोक ) जाने लगे । यह देखकर काल घबरा गया । तब उसने ग्यानी जी से एक समझौता किया । कि जो जीव इस परम नाम ( वाणी से परे ) को सतगुरु से प्राप्त कर लेगा । वह यहां से मुक्त हो जायेगा । ग्यानी जी ने कहा । मैं स्वयं आकर सभी जीवों को यह नाम दूंगा । नाम के प्रभाव से वे यहां से मुक्त होकर आनन्दधाम को चले जायेंगे । तब काल ने कहा । मैं और माया ( उसकी पत्नी ) जीवों को तरह तरह की भोगवासना में फ़ंसा देंगे । जिससे जीव भक्ति भूल जायेगा । और यहीं फ़ंसा रहेगा । तब ग्यानी जी ने कहा । लेकिन उस सतनाम के अंदर जाते ही जीव में ग्यान का प्रकाश हो जायेगा और जीव तुम्हारे सभी चाल समझ जायेगा । अब काल को चिंता हुयी ।..तब उसने बेहद चालाकी से कहा । ..मैं जीवों को मुक्ति और उद्धार के नाम पर तरह तरह के जाति धर्म पूजा पाठ तीर्थ वृत आदि में ऐसा उलझाऊंगा कि वह कभी अपनी असलियत नहीं जान पायेगा ।..साथ ही मैं तुम्हारे चलाये गये.. पंथ में भी..? अपना जाल फ़ैला दूंगा ? इस तरह अल्पबुद्धि जीव यही नहीं सोच पायेगा.. कि सच्चाई आखिर है क्या ? मैं तुम्हारे असली नाम में भी अपने नाम मिला दूंगा ?..आदि । अब क्योंकि समझौता हो गया था । ग्यानी जी वापस लौट गये । वास्तव में मन रूप मैं यह काल ही है । जो हमें तरह तरह के कर्मजाल मैं फंसाता है । और फिर नरक आदि भोगवाता है । लेकिन वास्तव मैं यह आत्मा सतपुरुष का अंश होने से बहुत शक्तिशाली है । पर भोग वासनाओं में पड़कर इसकी ये दुर्गति हो गई है । इससे छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय सतगुरु की शरण और महामंत्र का ध्यान करना ही है ।

मंगलवार, अगस्त 17, 2010

स्थायी ख़ुशी की प्रतीक्षा है ??


लेखकीय - यह सिर्फ़ विनय जी की ही बात नहीं है । प्रत्येक इंसान अपने जीवन में ऐसी स्थिति से कभी न कभी दो चार होता ही है । प्रभु की कृपा है । लगभग अठारह साल की निरन्तर तलाश और अथक मेहनत के बाद महाराज जी की कृपा से आज मेरे जीवन में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं है । मुझे श्री महाराज जी की छत्रछाया में सात साल हो चुके हैं । और जीवन की तमाम भटकन अब समाप्त हो चुकी है । इस लेख में मुझे एक गलती ने आकर्षित किया । जो प्रायः हम सभी करते हैं । क्या है । वो गलती ? विनय जी के लेख के बाद नीचे पढें । साभार । श्री विनय शर्मा । मेरे बलोग । जब भगवान से साक्षात्कार की ख़ुशी नहीं,मिलती तो इंसान क्षणिक ख़ुशी खोजता है । अभी अभी पंडित डी.के वत्स जी का लेख पड़ा । मन्त्र । कर्मकांड । उपासना से लाभ क्यों नहीं मिलता । में पंडित जी के लेख बहुत मनोयोग से पड़ता हूँ । पंडित जी ने लिखा है । हमें इस योग्य होना चाहिए कि हम इन चीजों का लाभ उठा सकें । मेरे मन में बहुत से अनसुलझे प्रश्न उठते हैं । ईश्वर के एक बार दर्शन करने के बाद यहाँ वहाँ भटकता रहा कि पुन: दर्शन हो जाएँ । किसी ने कहा कोई गुरु बनाओ । फिर गुरु की खोज में भटकता रहा । यह भी कहा जाता है । पानी पियो छान के । गुरु बनाओ जान के । एक गुरु भी बनाये । प्रारंभ में तो वो गुरु तो मुझे अच्छे लगे । और लगभग तीन साल के बाद मुझे लगा कि उनकी अपने सब शिष्यों पर सम दृष्टि नहीं है । लेकिन यह बात मैंने प्रकट नहीं करी । लेकिन एक दिन मैंने उन गुरु जी से जिज्ञासावश कोई प्रश्न पूछा तो उन्होंने मुझे बहुत बुरी तरह से दुत्कार दिया । और मेरे को चार दिन तक तो रात को नींद ही नहीं आई । और तो और उनके एक और शिष्य हैं । मुझे ज्ञात नहीं वो मेरे मनोभावों को कैसे पड़ लेते थे । मेरी उनके उन शिष्य से अच्छी मित्रता हो गयी थी । उनके पास मुझे कुछ मानसिक आराम मिलता था । परन्तु वो तथाकथित गुरु जी । अपने उन शिष्य और मेरे मित्र के पास सुबह शाम आया करते थे । मेरे पास भी वही समय होता था । इसलिए मैंने अपने उन मित्र के पास जाना छोड़ दिया । मेरी विडंबना यह रही । मैंने श्री परमहंस योगानंद जी को गुरु बनाने के लिए आवेदन किया था । योगानंद जी तो इस दुनिया में नहीं थे । परन्तु उनके अध्याय ही गुरु की तरह प्रेरणा देते थे । वो केवल एक माह में एक ही प्रति आती थी । और उन अध्यायों का मेरी बहुत मानसिक,शारीरिक और अध्यात्मक उन्नति कर रहे थे । आप विश्वास करें या न करें । में लोगों की चिकित्सा योग से करने लगा । और उक्त घटना के बाद मेरे मन में वो अध्याय पड़ने की रूचि बिलकुल समाप्त हो गयी थी । और एक और विद्या जो कि संभवत: चीन कि थी । प्राणिक हीलिंग । जिसमें दूरस्थ या समीप लोगों की चिकित्सा बिना छुये और बिना दवाइयों के में कर लेता था । और यही काम में योग द्वारा कर लेता था । परन्तु यह विद्याएँ मेरे में उस घटना के बाद समाप्त हो चुकीं हैं । पंडित जी का वो लेख भी पड़ा है । जिसमें उन्होंने अंत:करण को गुरु बताया है । यह बात तो यहीं पर छोड़ता हूँ । जब यह सब समाप्त हो गया । तो में तो क्षणिक ख़ुशी की खोज करता हूँ । मुझे मालूम हैं । यह क्षणिक खुशियाँ क्षणिक ही हैं । स्थायी नहीं हैं । और यह क्षणिक खुशियाँ नहीं मिल पातीं । तो मन बहुत खिन्न हो जाता है । फिर भी मन क्षणिक खुशियों की ओर भागता है । यह सब मेरे मन के उदगार हैं । पंडित जी का वो लेख पड़ कर में भावुक हो उठा । मैंने एक बार लिखा था कि में विवादित लेख नहीं लिखूंगा । पर क्या करुँ दिल है कि मानता नहीं । पुन: कहता हूँ । यह मेरे ह्रदय से निकले हुए उदगार हैं । कोई माने या नहीं माने । पंडित जी की इस सार्थक लिखी हुई पोस्ट से भावुक हो गया । इसी प्रतीक्षा में हूँ । क्षणिक ख़ुशी के स्थान पर वास्तविक और स्थायी ख़ुशी मिल जाये । स्थायी ख़ुशी की प्रतीक्षा है ?
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@ ..किसी ने कहा कोई गुरु बनाओ । एक गुरु भी बनाये । मैंने श्री परमहंस योगानंद जी को गुरु बनाने के लिए आवेदन किया था । ( विनय जी के लेख से )
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मेरी बात -- यह सिर्फ़ विनय जी की बात नहीं है । 99 % लोग अग्यानतावश यह गलती करते हैं । लोग अक्सर कहते हैं कि मैं ने उन्हें गुरु बनाया है । या हमने तो वो गुरु करे हैं । तुमने गुरु कर लिये । तुमने गुरु बना लिये । शायद आप लोग इसमें छिपा रहस्य समझ गयें होंगे ? जरा सोचिये । आपने गुरु बनाये ?इसका क्या अर्थ है ? गुरु को बनाने वाले आप हैं । आपने गुरु किये । कैसे किये ? इसको सही तरह से ऐसे कहते हैं । मेरे गुरु वो हैं । मैंने उनसे उपदेश लिया है । मैंने उनसे नामदान लिया है । मैंने उनको गुरु माना है । और इसका सबसे आखिर में जब आप गुरु के रहस्यों से परिचित हो जाते हैं । तब कहते हैं । मैंने उनको गुरु जाना है । हालांकि ये कहने वाले बहुत ही कम गिने चुने लोग होते हैं ।वास्तव में पहले गुरु के शब्दों या मौखिक आध्यात्मिक ग्यान के प्रभाव से उन्हें माना ही जाता है । और फ़िर गुरु के द्वारा बतायी साधना को करते हुये साधना की ऊंची स्थितियों में गुरु को जाना जाता है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

बुधवार, अगस्त 11, 2010

भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
जब तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुये फ़न्दे ।
भगवान के इंसाफ़ पर सब छोड दे बन्दे ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
खुद ही तेरी मुश्किल । को वो आसान करेगा । जो तू नही कर पाया । वो भगवान करेगा ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
कहने की जरूरत नहीं आना ही बहुत है ।
इस दर पर तेरा शीश झुकाना ही बहुत है ।
जो कुछ है तेरे दिल में वो उसको भी खबर है । बन्दे तेरे हर हाल पर मालिक की नजर है ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
बिन मांगे भी मिलती हैं यहां मन की मुरादें ।
दिल साफ़ है जिनका वो खुद ही पधारें ।
मिलता है जहां न्याय । वो दरवार यही है । संसार की सबसे बडी सरकार यही है ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है । भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है ।

मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । अजब है गुरुओं का दरबार । भरा जहां भक्ती का भंडार ।
शबद अनमोल सुनाते हैं । कि मन का भरम मिटाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । गुरूजी सत का देते ग्यान । जीव का हो ईश्वर से ध्यान ।
वो अमृत खूब पिलाते हैं । कि मन की प्यास बुझाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । गुरूजी नही लेते कुछ दान । फ़िर भी रखते दुखियों का ध्यान ।
वो अपना ग्यान लुटाते हैं । अनेकों कष्ट मिटाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । कर लो गुरु चरणों का ध्यान । तुझसे करे भक्त बखान ।
गुरूजी सारे दुख मिटाते हैं । कि भव से पार लगाते हैं । मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।

तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला ।
एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
आज अवध की शोभा लगती । स्वर्गपुरी से भी प्यारी ।
चौदह बरस बाद राम के । राजतिलक की तैयारी ।
हनुमत के दिल की मत पूछो । झूम रहा है मतवाला ।
एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
( जितने राजा आधीन अवध के । सभी सभा में आये थे । )
रत्न जडित हीरों का हार जब । लंकापति ने भेंट किया ।
राम ने सोचा आभूषण है । सीताजी की ओर किया ।
सीता ने हनुमत को दे दिया । इसे पहन मेरे लाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
हार हाथ में लेकर हनुमत । घुमा फ़िरा कर देख रहे । नहीं समझ में आया तो । तोड तोडकर फ़ेंक रहे ।
लंकापति मन में पछताया । पडा है बन्दर से पाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
लंकापति का धीरज टूटा । क्रोध की भडक उठी ज्वाला । भरी सभा में बोल उठा । पागल हो अंजनी लाला ।
हार कीमती तोड दिया । क्या पेड का फ़ल समझ डाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला । हाथ जोडकर हनुमत बोले । मुझे है क्या कीमत से काम ।
मेरे काम की चीज वही है । जिसमें बसे है मेरे राम । राम नजर न आया इसमें ।यूं बोले बजरंग वाला ।
एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला । तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला ।
इतनी बात सुनी हनुमत की । बोल उठा लंकावाला । तेरे में क्या राम बसा है । सभा बीच में कह डाला ।
चीर के सीना हनुमत ने । राम का दरस करा डाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला ।

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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।

गुरु पारब्रह्म परमेश्वर निखलेश्वरमय जग सारा ।
गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
गुरु दोष मेरे सब लेलो । मेरे अंतर के पट खोलो ।
बस जाओ मेरे ह्रदय में । मुझे अपनी शरण में लेलो ।
मेरा मन माया में भटके । तुम दे दो जरा सहारा ।
गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
मैं भटक न जाऊं पथ से । मेरी बांहे थामे रखना ।
तुम समरथ हो मेरे गुरुवर । केवल ये ध्यान में रखना ।
मेरा कुछ भी नहीं है जग में । जो है गुरुदेव तुम्हारा । गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
जब से गुरु शरण मिली है । देखा गुरु रूप तुम्हारा । भाता ही नहीं है मुझको । दुनिया का कोई नजारा ।
नहीं बोल फ़ूटते मुख से । बहती है केवल धारा । गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

जब सीना फ़ाड दिया श्री राम नजर आये ।

भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
जब सीना फ़ाड दिया श्री राम नजर आये ।
राणा ने मीरा को जहर जब खिलाया था ।
उस जहर के प्याले में घनश्याम नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
शबरी ने संकट में श्रीराम को पुकारा था ।
जब बेर खिलाये तो श्रीराम नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
द्रोपदी ने संकट में श्रीकृष्ण को पुकारा था ।
साडी के चीर में श्रीकृष्ण नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
कलियुग में भक्तों ने श्रीराम को पुकारा था ।
भक्तों के कीर्तन में श्रीराम नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
प्रहलाद ने संकट में श्रीकृष्ण को पुकारा था ।
महलों के खम्बों में नरसिंह नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

भारतवर्ष का वर्णन

जम्बूदीप के मध्यभाग में इलावृत नाम का वर्ष है । उसके पूर्व में भद्राश्ववर्ष । तथा उसके पूर्व दक्षिण मेंहिरण्वान नामक वर्ष है । मेरु के दक्षिण में किम्पुरुषवर्ष माना गया है । उसके दक्षिण भाग में भारतवर्ष है । मेरु के दक्षिण पश्चिम में हरिवर्ष । पश्चिम में केतुमालवर्ष । पश्चिम उत्तर में रम्यक । और उत्तर में कुरुवर्ष स्थित है । जो कल्पवृक्षों से भरा हुआ है । भारतवर्ष को छोडकर अन्य सभी वर्षों में सिद्धि स्वभाव से ही प्राप्त होती है । यानी निश्चित है । यहां इन्द्रदीप । कशेरुमान । ताम्रवर्ण । गभस्तिमान । नागदीप । कटाह । सिंहल । वारूण । नाम के आठ वर्ष है । नवां भारतवर्ष है । जो चारों ओर समुद्र से घिरा हुआ है । भारतवर्ष के पूर्व में किरात तथा पश्चिम में यवन देश स्थित हैं । इस्के दक्षिण में आन्ध्र । उत्तर में तुरुष्का आदि देश हैं ।
भारत में ब्राह्मण । वैश्य । क्षत्रिय । शूद्र रहते हैं । यहां महेन्द्र । मलय । सह्य । शुक्तिमान । ऋक्ष । विन्ध्य ।
पारयात्र । ये सात पर्वत हैं । भारतवर्ष में । वेद । स्मृति । नर्मदा । वरदा । सुरसा । शिवा । तापी । पयोष्णी
। सरयू । कावेरी । गोमती । गोदावरी । भीमरथी । कृष्णवेणी । केतुमाला । ताम्रपर्णी । चन्द्रभागा । सरस्वती । ऋषिकुल्या । कावेरी । मत्तगंगा । पयस्विनी । विदर्भा । शतद्रू । नाम की पवित्र नदियां हैं ।
पांच्चाल । कुरु । मत्स्य । यौधेय । पटच्चर । कुन्त । शूरसेन । ये मध्यदेश के निवासी हुये । पाद्म । सूत । मगध । चेदि । काशेय । विदेह । ये पूर्व के देश हैं । कोशल । कलिंग । वंग । पुण्ड्र । अंग । विदर्भ । मूलकजनों के देश हैं । विन्ध्यपर्वत के अतर्गत विधमान देश पूरब तथा दक्षिण के तटवर्ती भूभाग में बसे हैं । पुलिंद । अश्मक । जीमूत । नय । देश में निवास करने वाले । कर्णाटक । कम्बोज तथा घण । ये दक्षिण भाग के निवासी हैं । अम्बष्ठ । द्रविड । लाट । कम्भोज । स्त्रीमुख । शक । आनर्तवासी । दक्षिण पश्चिम के निवासी हैं । स्त्रीराज्य । सैन्धव । म्लेच्छ । नास्तिक । यवन । मथुरा । निषध । के रहने वाले लोगों का देश पश्चिमी भूभाग है । माण्डव्य । तुषार । मूलिका । अश्वमुख । खश । महाकेश । महानास । देश उत्तर पश्चिम में हैं । लम्बक । स्तननाग । माद्र । गान्धार । बाह्यिक । म्लेच्छ देश हिमाचल के उत्तरतटवर्ती भूभाग में है । त्रिगर्त । नील । कोलात । ब्रह्मपुत्र । सटड्क्ण । अभीषाह । कश्मीर । उत्तरपूर्व में हैं ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता
है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

श्री विनय शर्मा

श्री विनय शर्मा ( जी ) ब्लागर हैं । और एक व्यक्ति के तौर पर भले इंसानो की श्रेणी में आते हैं । धार्मिक प्रवृति के विनय जी अक्सर दूसरों की सहायता करने में विश्वास रखतें हैं । इनके दो ब्लाग " मेरे ब्लाग " vinay-mereblog.blogspot.com और " स्नेह परिवार " snehparivar.blogspot.com हैं । विनय जी क्योंकि प्राचीन ग्यान तन्त्र मन्त्र ज्योतिष आदि में भरपूर आस्था रखते हैं । और इस तरह के लोगों के सम्पर्क में काफ़ी समय से हैं । और इन्होंने इस तरह की कुछ साधनायें भी की हैं । इसलिये निसंकोच यह कहा जा सकता है कि ये संसारी होते हुये भी मन से बेहद धार्मिक हैं । और सांसारिक कार्यों से बचा समय साधु संत मन्दिर या
धार्मिक साहित्य के अध्ययन में लगाते हैं । मेरा पहले विनय जी से कोई परिचय नहीं था । पर क्योंकि मेरा लेखन विनय जी की रुचि के अनुकूल था । अतः विनय जी ने किन्ही क्षणों में मेरे ब्लाग का अवलोकन किया होगा और वे मेरे ब्लागों के नियमित reader और सदस्य बन गये । अक्सर वे मेरे लेखों पर
brief comments भी किया करते थे । पर समय का बेहद अभाव होने के कारण मैं ध्यान नहीं दे पाया । लेकिन प्रेत जगत की मेरी एक रचना " काली चिङिया का रहस्य@ नगर कालका " पर विनय जी ने एक comment किया । " डौली की भलाई के लिये आपने ठीक ही किया ।लेकिन मैंने मां काली और भैंरो के दरबार में बहुतो को ठीक होते हुये देखा है । " मैं एक लम्बे समय से इस ग्यान के सम्पर्क में रहने के कारण इस comment का मतलब समझ गया । मैंने सोचा देखें ये सज्जन कौन हैं ? जो इस तरह की रुचि वाले हैं । मैं इनके ब्लाग पर गया और इनकी सभी रचनाओं का अवलोकन किया । जिसमें एक लेख ने मुझे आकर्षित किया । उस लेख में इनके द्वारा english में chatting करने की बात कही गयी थी । मेरे मन में तुरन्त ख्याल आया कि एक अध्यात्म रुचि वाला इंसान अपने ग्यान को अगर जीवों को चेताने में प्रयुक्त करें । तो स्वयं उसका भी । सामने वाले का भी । और समाज का बेहद लाभ होता है । संतो की यही भावना होती है । हमें यही कर्तव्य सर्वोपरि सिखाया जाता है । और फ़िर सच्चे
अध्यात्म मार्ग पर चलने से इंसान सुकून तो महसूस करता ही है । उसे अनमोल सम्पदा की भी प्राप्ति होती है । तब तक विनय जी मेरी काफ़ी रचनाये अध्ययन कर चुके थे ।यही सोचकर मैंने उनके ब्लाग पर comment दिया कि आप यदि अपने english ग्यान का उपयोग अध्यात्म हेतु करें तो चहुं ओर भला होगा । खैर । इसके बाद हम लोग अक्सर सम्पर्क में रहने लगे । और आज विनय जी अपने व्यस्त समय में से समय निकालकर spiritualismfromindia.blogspot.com ब्लाग लिख रहें हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरुपूर्णिमा उत्सव पर आप सभी सादर आमन्त्रित हैं ।


गुर्रुब्रह्मा गुर्रुविष्णु गुर्रुदेव महेश्वरा । गुरुः साक्षात पारब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।श्री श्री 1008 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज " परमहँस " अनन्तकोटि नायक पारब्रह्म परमात्मा की अनुपम अमृत कृपा से ग्राम - उवाली । पो - उरथान ।
बुझिया के पुल के पास । करहल । मैंनपुरी । में सदगुरुपूर्णिमा उत्सव बङी धूमधाम से सम्पन्न होने जा रहा है । गुरुपूर्णिमा उत्सव का मुख्य उद्देश्य इस असार संसार में व्याकुल पीङित एवं अविधा से ग्रसित श्रद्धालु भक्तों को ग्यान अमृत का पान कराया जायेगा । यह जीवात्मा सनातन काल से जनम मरण की चक्की में पिसता हुआ धक्के खा रहा है व जघन्य यातनाओं से त्रस्त एवं बैचेन है ।
जिसे उद्धार करने एवं अमृत पिलाकर सदगुरुदेव यातनाओं से अपनी कृपा से मुक्ति करा देते हैं । अतः ऐसे सुअवसर को न भूलें एवं अपनी आत्मा का उद्धार करें । सदगुरुदेव का कहना है । कि मनुष्य यदि पूरी तरह से ग्यान भक्ति के प्रति समर्पण हो । तो आत्मा को परमात्मा को जानने में सदगुरु की कृपा से पन्द्रह मिनट का समय लगता है । इसलिये ऐसे पुनीत अवसर का लाभ उठाकर आत्मा की अमरता प्राप्त करें ।
नोट-- यह आयोजन 25-07-2010 को उवाली ( करहल ) में होगा । जिसमें दो दिन पूर्व से ही दूर दूर से पधारने वाले संत आत्म ग्यान पर सतसंग करेंगे । विनीत -
राजीव कुलश्रेष्ठ । आगरा । पंकज अग्रवाल । मैंनपुरी । पंकज कुलश्रेष्ठ । आगरा । अजब सिंह परमार ।
जगनेर ( आगरा ) । राधारमण गौतम । आगरा । फ़ौरन सिंह । आगरा । रामप्रकाश राठौर । कुसुमाखेङा । भूरे बाबा उर्फ़ पागलानन्द बाबा । करहल । चेतनदास । न . जंगी मैंनपुरी । विजयदास । मैंनपुरी ।
बालकृष्ण श्रीवास्तव । आगरा । संजय कुलश्रेष्ठ । आगरा । रामसेवक कुलश्रेष्ठ । आगरा । चरन सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । उदयवीर सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । मुकेश यादव । उवाली । मैंनपुरी । रामवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । सत्यवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । कायम सिंह । रमेश चन्द्र । नेत्रपाल सिंह । अशोक कुमार । सरवीर सिंह ।

शनिवार, जुलाई 10, 2010

जय हो मायावती..?

आपने माया माया बहुत सुना होगा । संत महात्मा अक्सर कहते रहते हैं कि माया से दूर रहो । माया महा ठगिनी हम जानी । तिरगुन फ़ांस लिये कर डोले । बोले मधुरी वाणी । तुलसीदास ने कहा है ।
मात पिता भगिनी सुत दारा । ये सब माया कृत परिवारा । बताओ । तुलसीदास ने पूरा खानदान ही " माया " बता दिया । माता पिता बहन पुत्र पत्नी । सब माया । अपनी पत्नी ने झिङक दिया । तो दूसरों के घर बुरे लगने लगे । पहले इतने व्याकुल थे । कि पत्नी से मिलने के लिये सर्प पर चङकर ससुराल के घर में कूद गये । तब पत्नी माया नहीं थी ? तब काम आतुरता में सर्प रस्सी का भेद भी नहीं समझ में आया । पहले में नासमझ था । तुलसीदास जैसों की बात में आ के गेरुआ पहन लिये । पर बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया । कि सब माया कैसे हैं । इधर तुलसी ये भी कहते हैं । प्रातकाल उठकर रघुनाथा । मात पिता गुरु नावहि माथा । अन्य जगहों पर भी सबके प्रति आपस में आदर प्रेम भाव सम्मान आदि की बात कही है । और एक तरफ़ सबको माया भी बता दिया । कबीर साहब ने भी कहा है । गांठी दाम न बांधहि । नहिं नारी से नेह । कह कबीर उन संत की । हम लें चरनन की खेह । अब कबीर साहब ये बताओ । आदमी गांठ ( जेब ) में पैसा नहीं रखेगा । तो उसका काम चल जायेगा । और नारी से नेह नहीं करेगा । तो शाम की रोटी भी मुश्किल से पल्ले पङेगी । आप करघा पर कपङा क्यूँ बुनते थे ? आप की भी लोई नाम की स्त्री थी । तो क्या लोई से हर वक्त लङते झगङते रहते थे ? इक्का दुक्का संतो को छोङकर प्रत्येक संत की स्त्री थी । या नहीं । तो ये तो वही बात हो गयी । कि शादी वो लड्डू जो खाये सो पछताये
और जो ना खाये सो भी पछताये । तो कबीर साहब ये तो वही बात हो गयी । कि आप भी लड्डू खाकर ही पछताये ?
मेरे नियमित पाठक अक्सर एक बात कहते हैं । कि उन्हें मेरी बात का अर्थ पल्ले ही नहीं पङता है । कि आखिर मैं कहना क्या चाह रहा हूँ ? आपने एक कहावत सुनी है । " संत की बातें अटपटी । चटपट लखी न जाय ।" बहुत लोग ये नहीं समझ पाते कि मैं किसी बात के पक्ष में बोल रहा हूँ । अथवा विपक्ष में ? वास्तविकता ये है । कि मेरा सिद्धांत है । धर्म को बोझिल तरीके से । भय पैदा हो ऐसे तरीके से । सिर्फ़ श्रद्धा जागे ऐसे तरीके से । पेश करना एक बङी भूल है । और इसी भूल के कारण धर्म या तो श्रद्धा की वस्तु बनकर रह गया । या एक ऐसा डरावना " हौवा " बन गया । जिसकी बात उल्टी या सीधी कैसी भी लग रही हो । बस सिर झुकाकर स्वीकार कर लो । और इस तरह धार्मिक ग्यान की अनमोल सम्पदा से बहुत से लोग वंचित रह गये । अब ऊपर का कबीर या तुलसी का जिक्र ले लो । मैंने ये एक तरीके से मजाक किया है । क्योंकि मैं संतो की बिरादरी का हूँ । मैं भगवान से मजाक कर लेता हूँ । भगवान कोई हौवा नहीं है ? भगवान कोई तोप नहीं है ? और अगर ये लोग तोप हैं । तो मैं भी किसी से कम
नहीं हूँ । " तू अजर अनामी वीर । भय किसकी खाता । तेरे ऊपर । कोई न दाता । "
इसलिये यदि मेरे ख्याल से धर्म को धर्म के ठेकेदारों ने हौवा न बनाया होता । तो आज बच्चा बच्चा धार्मिक
होता । चन्दन विष व्यापत नहीं । लपटे रहत भुजंग । शीतलता सुख शांति देने वाला धर्म उल्टे भुजंग के समान डरावना लगने लगा ( मगर वास्तव में है नहीं । )
तो अब माया को जानिये । माया के दो प्रकार है । जिसे खानी माया यानी मोटी माया । और वाणी माया यानी झीनी माया कहा जाता है । खानी माया में । स्त्री । पुत्र । परिवार । घर । धन आदि आते हैं । इसी को मोटी माया भी कहते हैं । वाणी माया में । मान । बङाई । ईर्ष्या । कल्पित । स्वर्गलोक । उपाधि आदि आते हैं । इसी को झीनी माया कहते हैं । " मोटी माया सब तजे । झीनी तजी न जाय । मान बङाई ईर्ष्या । लख चौरासी लाय । " वास्तविक संतो की महफ़िल में इस बात की बेहद चर्चा होती है । घर । परिवार । स्त्री आदि मोटी माया सब कोई छोङ देता है । पर मान बङाई ईर्ष्या आदि झीनी माया उच्च स्थिति के संत साधक भी मुश्किल से छोङ पाते हैं ? और अक्सर काफ़ी ऊँचाई पर पहुँचकर उनका पतन हो जाता है । अगर वास्तविक रूप में " माया " की परिभाषा समझने की कोशिश करें । तो जिस चीज में आपका मन अटक जाय । बस वही माया है । और यह सकल सृष्टि ही माया के परदे में बनी है । देखें रामायण क्या कहती है । ब्रह्माण्ड निकाया । निर्मित माया । रोम रोम । प्रति वेद कहे । मम उर । सो वासी । यह उपहासी । सुनत धीर । मति थिर न रहे । मन्दोदरी भी कह रही है । सुन रावन । ब्रह्माण्ड निकाया ।
पाय जासु बल विरचित माया । तो है सब माया । कि नहीं । और संसार व्यर्थ में " फ़ांय फ़ांय " कर रहा है । चलिये लेख खत्म करके मैं भी किसी " माया । माया देवी । मायावती । माया कुमारी । की तलाश में निकलता हूँ । क्योंकि । तुलसी भरोसे राम के । निर्भय हो के सोय । अनहोनी होनी नही । होनी हो सो होय । तो बनी रहेगी । माया या मायाबती । फ़िलहाल तो मौज करो ?
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

बुधवार, जून 30, 2010

यह आत्मा ब्रह्म है

अयमात्मा ब्रह्म । यह आत्मा ब्रह्म है । परन्तु यहाँ आत्मा शब्द जीवात्मा के लिये नहीं है । बल्कि यह तीनो शरीरों के योग द्वारा परित्याग पूर्वक आत्मतत्व का निर्देशक है । प्रथम पुरुष । मध्यम पुरुष । और उत्तम पुरुष । और आत्मा कृमशः एक दूसरे से अधिक समीपता के सूचक हैं । इसमें आठ प्रकृतियाँ । एक - मूल प्रकृति । दो - महतत्व । तीन - अहंकार । पाँच तन्मात्रा शब्द स्पर्श रूप रस गंध हैं । इसमें सोलह विकारों के रूप में पाँच स्थूल भूत । आकाश वायु अग्नि जल प्रथ्वी हैं । ग्यारह इन्द्रियाँ । पाँच ग्यानेन्द्रियाँ । कान त्वचा आँख जीभ नाक हैं । पाँच कर्मेंन्द्रिया । हाथ पैर लिंग गुदा वाणी हैं । और ग्यारहवाँ मन है । जिसके आगे कोई नया तत्व उत्पन्न हो उसे प्रकृति कहते है । जिसके आगे कोई नया तत्व उत्पन्न न हो उसे विकृति कहते हैं । ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँ च स्थूल भूत का शरीर प्रकट है । प्रत्यक्ष है । इसलिये ये विकृति है ।क्योंकि नया तत्व उत्पन्न नहीं होता । इनकी प्रकृति अनुमान गम्य है । जो इनमें अप्रकट है ।
ध्यान--स्थूल शरीर से अंतर्मुख होने पर ध्यान की प्रथम परिपक्व अवस्था में दिव्य निर्मल शब्द स्पर्श रूप रस गंध दिखता है । ये पाँच तन्मात्रा पाँच स्थूल भूतों की प्रकृति भी हैं । परन्तु प्रकट हो जाने पर ये विकृति हो गयीं । इसलिये इनकी प्रकृति भी अनुमान गम्य है । जो इनमें अप्रकट है । पाँच तन्मात्रा से अन्तर्मुख होने पर ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्रा की प्रकृति " अहंकार " का साक्षात्कार होता है । किन्तु प्रकट होने से ये भी विकृत हो गये । इसलिये इनकी भी प्रकृति भी अनुमान गम्य है । अहंकार से अन्तर्मुख होने पर अस्मितावृति और अस्मितावृति से " चेतन तत्व की और जाते हैं ।
चेतन तत्व के दो भेद हैं । जङतत्व + चेतनतत्व । ये शबल ऊपर और सगुण स्वरूप है ।
दूसरा शुद्ध है । जो परे है और निर्गुण स्वरूप है । अब इसमें मिश्रित के दो भेद हैं । व्यष्टि रूप से अनन्त शरीरों के सम्बन्ध से ह्रदयाकाश में जो बैठा है । समिष्टि रूप से सारे ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में जो ब्रह्माण्ड में व्यापक है । जो कामनाओं से रहित है । जो कामनाओं से बाहर निकल गया है । जिसकी कामनाएं पूरी हो गयीं हैं । या जिसको केवल आत्मा की ही कामना है । उसके प्राण नहीं निकलते । यानी वह जीव की तरह नहीं मरता । वह ब्रह्म ही हुआ ब्रह्म को पहुँचता है । ब्रह्म के शबल स्वरूप की उपासना और उसका साक्षात्कार कारण शरीर से होता है । शुद्ध चेतनतत्व में कारण शरीर और कारण जगत परे ही रह जाता है । यहाँ न द्वैत रह जाता है । और न अद्वैत । कोई द्वैत की और कोई अद्वैत की इच्छा करते है । ये दोनों शुद्ध परमातमतत्व को नहीं जानते । वह द्वैत अद्वैत दोनों से परे है । उसमें न द्वैत है और न अद्वैत है ।
तीन गुणों का स्वभाव इस तरह से है । सत का स्वभाव प्रकाश । रज का क्रिया । तम का स्थिति है । स्थूलभूतों की सूक्ष्मता के तारतम्य के लिये हुये पाँच तन्मात्राओं की एक सूक्ष्मावस्था होती है । जिसके अन्तर्गत सारे सूक्ष्म लोक लोकांतर हैं । प्रलय में केवल प्रथ्वी जल अग्नि का स्वरूप से लय और सृष्टि में उत्पन्न होना होता है ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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आईये खुद को जानें ।

1--आत्मा- जिसके पहचान के लिये इच्छा,द्वेष,सुख,दुख,ग्यान और प्रयत्न लिंग हैं यही भोगता है । यही निर्लेप भी है । इसी का सारा खेल है । ग्यान दृष्टि होने पर बंध मोक्ष मन का धर्म है ।
2--शरीर- जो चेष्टा,इंद्रियों और अर्थों का आश्रय है ।और भोग का स्थान है । बाह्य रूप में यह स्थूल है ।
3--इंद्रिय-आंख,नाक,कान,जीभ,त्वचा जिसके उपादान कारण प्रथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश हैं ।
ये भोग के साधन हैं । या ग्यानेन्द्रियां हैं ।
4--अर्थ या विषय-रस,रूप,गंध,स्पर्श,और शब्द हैं जो पांचो इंद्रियो के भोगने के विषय और पांच भूतों के यथायोग्य गुण भी हैं । मनुष्य में ये पाँचो होते हैं । अन्य जीवों में एक ही अधिक होता है ।
5--बुद्धि, ग्यान,उपलब्धि-ये तीनों पर्याय शब्द हैं.विषयों को भोगना या अनुभव करना बुद्धि है ।
6--मन-- जिसका लिंग एक से अधिक ग्यानेन्द्रियों से एक समय में ग्यान न होना है । जो सारी इन्द्रियों
का सहायक है । और सुख दुख आदि का अनुभव कराता है । पच्चीस प्रकृतियां । पाँच ग्यानेन्द्रियां । पाँच कर्मेंन्द्रियां । पाँच तत्वों के शरीर का राजा ये मन है ।
7--प्रवृति-- मन वाणी और शरीर से कार्य का आरम्भ होना प्रवृति है ।
8--दोष-- प्रवृत करना । जिनका लक्षण होता है । ये मोह राग द्वेश तीन दोष हैं ।
9--प्रेतभाव-- पुनर्जन्म अर्थात सूक्ष्म शरीर का एक शरीर को छोङकर दूसरे को धारण करना प्रेतभाव है । गीता में कृष्ण ने कहा था " हे अर्जुन सब भूतों में मैं ही स्थित हूँ । "
10--फ़ल--प्रवृत और दोष से जो अर्थ उत्पन्न हो । उसे फ़ल कहते हैं । फ़ल दो प्रकार का होता है ।
एक- मुख्य । दूसरा- गौण । मुख्य फ़ल में सुख दुख के अनुभव आते हैं । और गौण फ़ल में सुख दुख के साधन
शरीर इन्द्रियां विषय आदि का समावेश होता है ।
11-- दुख-- जिसका लक्षण पीङा होता है । सुख भी दुख के अंतर्गत है । क्योंकि सुख विना दुख के रह नहीं सकता । एक के बाद दूसरे का आना तय है । जैसे दिन के बाद रात और जीवन के मृत्यु निश्चित है ।
12--अपवर्ग-- दुख की निवृति हो जाना । ब्रह्म की प्राप्ति हो जाना । ग्यान की प्राप्ति । या सृष्टि से अलग ग्यान में प्रविष्ट को अपवर्ग कहते हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरुवार, जून 17, 2010

परिचय और तस्वीर

मेरे ब्लाग्स के बहुत से पाठकों ने यह इच्छा जतायी है कि मेरे गुरुदेव कौन है । और मैंने उनका कोई चित्र क्यों नहीं एड किया है । इसलिये मैं अपनी इस कमी को दूर कर रहा हूँ । श्री महाराज जी " अद्वैत ग्यान " के संत है । इनके सम्पर्क में मैं पिछले सात वर्षों से हूँ । इससे पूर्व मैंने अनेकों प्रकार की साधनाएं की । पर मेरी जिग्यासा और शंकाओं का समुचित समाधान नहीं हुआ । पर श्री महाराज जी के सम्पर्क में आते ही मेरा समस्त अग्यान नष्ट हो गया । मैं इस बात के लिये जोर नहीं देता कि आप मेरी बात को ही सत्य मान लें । पर आत्मा या आत्म ग्यान को लेकर
यदि आपके भी मन में कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको नहीं मिला है । या मेरी तरह आप भी जीवन के रहस्य और अनगिनत समस्यायों को लेकर परेशान हैं ( जैसे मैं कभी था )
तो " निज अनुभव तोहि कहूँ खगेशा । विनु हरि भजन न मिटे कलेशा । " वो कौन सा हरि का भजन है । जिससे जीवन के सभी कलेश मिट जाते है । " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू व्याधा । " वो कौन सी हरि की शरण है । या आप आत्मा परमात्मा की असली भक्ति या असली ग्यान के बारे में कोई भी प्रश्न रखते हैं । तो महाराज जी से बात कर सकते हैं । महाराज जी का सेलफ़ोन न . 0 9639892934 विशेष- महाराज का कहीं कोई आश्रम नहीं है । वे अक्सर भ्रमण पर रहते हैं । और किसी किसी समय एक गाँव के बाहर बम्बा के पास कुटिया में रहते हैं ।

सोमवार, मई 17, 2010

बिना दूल्हे की बारात...इच्छाधारी नाग ..?

त्रिया चरित न जाने कोय , खसम मार के सती होय . ये कहावत आपने प्रायः सुनी होगी और आज के समय में तो इसके कई ज्वलंत उदाहरण भी मौजूद हैं और प्रायः
हमारे आसपास अक्सर देखने को मिल जाते हैं ..मुझे हैरत तो तब होती है जब ये कहावत में स्वयं औरतों के मुख से सुनता हूँ जिसे वे दूसरी औरतों के लिये इस्तेमाल करती है..अब क्योंकि ये प्राचीनकाल से प्रसिद्ध कहावत है इसलिये इस कहावत की कोई न कोई ठोस वजह अवश्य रही होगी..ये कहावत कब और क्यों चलन में आयी इसकी जानकारी मुझे अभी तक नहीं हुयी है..पर इस बात पर मैं अक्सर एक बात सोचता
हूँ कि एक मामूली मजदूर वर्ग के आदमी से लेकर एक प्रधानमन्त्री या शीर्ष उधोगपति जैसे आदमी भी प्रायः अपनी ब्याहता से इस तरह के षङयंत्र करते देखे गये हैं लेकिन पुरुषों के लिये इस तरह की फ़ेमस कहावत मेरी नजर से अभी तक नहीं गुजरी है . इसकी क्या वजह हो सकती है मैं सोचने में नाकामयाब रहा हूँ . क्योंकि मेरी नजर में तो कमोवेश स्री पुरुष समान व्यहवार ही करते है अगर एक पुरुष अत्यंत ग्यानी पुरुष हो सकता है तो विदुषी स्त्रियों के उदाहरण भी अनगिनत हैं अगर एक स्त्री कुलटा या व्यभिचारिणी हो सकती है तो कामभ्रष्ट कामी पुरुषो के काले कारनामों से भी इतिहास भरा पङा है..दरअसल स्त्री पुरुष जैसी भेद द्रष्टि अग्यान का परिणाम है आत्मिक ग्यान की कसौटी पर तो वह सिर्फ़ आत्मा या चेतन ही है..एक बार महाभारत
श्रीमदभगवदगीता आदि धर्मग्रन्थों के रचियता व्यास जी जब वृद्ध हो चुके थे..उनके युवा पुत्र श्री शुकदेव जी को वैराग हो गया और वे जंगल की और तपस्या करने जाने लगे..तब वृद्ध व्यास जी पुत्रमोह में उनक पीछे पीछे उन्हें मनाने दौङे..श्री शुकदेव जी तेजी से चले जा रहे थे..आगे सरोवर पर कुछ निर्वस्त्र स्त्रियां स्नान कर रही थी उनके कमर से ऊपर स्तन आदि अंग पूर्णत अनावृत थे..युवा शुकदेव जी निकलते चले गये और स्त्रियां पूर्ववतनहाती रहीं लेकिन जब वृद्ध व्यास जी निकले तो स्त्रियों ने तत्परता से वस्त्रों से अपने बदन को ढँक लिया और व्यास जी को आदर से प्रणाम किया..व्यास जी ने ये पूरा द्रश्य देखा था तो उनके मन में एक संशय प्रश्न उठ खङा हुआ . उन्होने कहा ..देवियों अभी मेरा युवा पुत्र तुम्हारे सामने से निकला तो तुमने अपने तन को छिपाने की कोई कोशिश नहीं की और मुझ वृद्ध को देखते ही तुमने ऐसा किया..इस का क्या रहस्य है..स्त्रियों ने विनम्रता से उत्तर दिया ..हे महात्मन आपके पुत्र की द्रष्टि में स्त्री पुरुष का भेद नहीं है वो सर्वत्र कण कण में व्याप्त अविनाशी चेतन को ही सर्वत्र देखता है..जबकि आप शरीरों को भेद द्रष्टि से देखते हैं ..इसी तरह का उदाहरण श्रीकृष्ण भक्त विदुर पत्नी का है..जिस समय श्रीकृष्ण विदुर जी के घर पहुँचे विदुर घर पर नहीं थे और विदुर पत्नी निर्वस्त्र अवस्था में स्नान कर रही थी..श्रीकृष्ण की आवाज सुनते ही उसने बाबली के समान दरबाजा खोल दिया..और उसी नग्न अवस्था में श्रीकृष्ण
की आवभगत करने लगी ..इत्तफ़ाक से इसी समय विदुर जी घर लौट आये और ये देखकर दंग रह गये कि उनकी पत्नी नग्न अवस्था में श्रीकृष्ण को केले के छिलके खिला रही है और गिरियां फ़ेंकती जा रही है..तब विदुर ने जाना कि असली प्रेमभक्ति क्या होती है..आईये आपको एक दिलचस्प कहानी सुनाते हैं .
एक राजा के चार रानिंया थी लेकिन बहुत समय बीत जाने के बाद भी उस राजा के कोई संतान नहीं हुयी थी इससे राजा बहुत उदास और मानसिक रूप से हताश और अशान्त रहता था..तब उन चारों रानियों ने एक योजना बनायी और झूठी खबर फ़ैला दी कि छोटी रानी को गर्भ ठहर गया है पूरे राज्य में खुशी की लहर फ़ैल गयी कि आखिरकार राज्य का वारिस आ ही गया...राजा की खुशी का ठिकाना न रहा उसने राज्य में मिठाईयां बँटबायी और दिल खोलकर गरीबों को दान दिया ...इस तरह झूठे गर्भ का नाटक चलता रहा और आखिर नौ महीने गुजर गये..तब
रानियों ने एक विश्वस्त दाई को अपने नाटक में शामिल कर लिया और फ़िर से झूठी खवर फ़ैला दी कि रानी ने एक सुन्दर राजकुमार को जन्म दिया है लेकिन..छोटी रानी को स्वप्न में किसी देवात्मा ने चेतावनी दी है कि राजकुमार को रानियों के अतिरिक्त और किसी को न दिखाया जाय अन्यथा ऐसा करने पर राजकुमार की मृत्यु हो जायेगी...राजा जो अपने पुत्र का मुँह निहारने के लिये के लिये व्याकुल था ये बात ( या आदेश ) सुनकर मन मसोसकर रह गया..लेकिन उसके सामने चारा ही क्या था..चलो इतना ही काफ़ी है कि उसके एक पुत्र तो है..इसके बाद रानियों ने एक पत्रा बाँचने वाले पुरोहित को भी अपने षडयंत्र में शामिल कर लिया और उसके मुँह से घोषणा करवा दी कि राजकुमार बेहद विचित्र ग्रहयोग लेकर जन्मा है इस ग्रहयोग के अनुसार राजकुमार के विवाह से पूर्व आम जनता या कोई भी उसे ( रानियों को छोङकर ) देखेगा तो राजकुमार तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा..सब लोग इस विचित्र भविष्यवाणी को सुनकर ठंडी आह भरकर रह गये और अपने राजकुमार को निहारने की हसरत दिल में ही रह गयी...हाँ रानियों ने उसका सौन्दर्य वर्णन अवश्य जनता के बीच पहुँचा दिया कि राजकुमार बेहद सुन्दर हैं और उसके चेहरे पर अनोखा तेज है..रानियों ने दाई और पुरोहित को धमकी दी कि ये भेद अगर खुल गया
तो उनका जो अंजाम होगा सो होगा ही वे उन दोनों को फ़ाँसी पर अवश्य चङवा देंगी सो वे विचारे डरकर चुप ही रहे . इस तरह अजन्मा राजकुमार जिसका कहीं कोई अस्तित्व ही न था जन्मदिन आदि और अन्य सभी दस्तूर निभाता हुआ अठारह बरस का हो गया और उसके विवाह हेतु प्रस्ताव आने लगे..और आखिरकार एक जगह उसका विवाह भी तय हो गया लेकिन जब कन्या के पिता (दूसरे राजा) ने वर को देखने की इच्छा व्यक्त की तो रानियों ने पुरोहित के समर्थन से कह दिया कि कुन्डली में ऐसा योग बनता है कि राजकुमार को उसी समय देखा
जा सकता है जब वह बारात लेकर कन्या के दरबाजे पर पहुँच जाय...कुछ असमंजस के बाद कन्या का पिता मान गया..आखिर ये बात किसी एरे गैरे की नहीं थी बल्कि राजघराने की बात थी...उसने सोचा कुछ ही समय की बात है जामाता को विवाह पर देख लेंगे और इस तरह विवाह तय हो गया..विवाह के सारे कार्य निर्विघ्न होते रहे और बारात जाने के समय रानियों ने गुँधे हुये आटे का मानवीय पिंड ( शरीर ) बनाकर पालकी में रख दिया और गहरी ताकीद कर दी कि पालकी को कोई खोले नहीं ..इस तरह ये बारात चलती हुयी एक बगीचे में आकर विश्राम के लिये ठहर गयी..उधर रानियों को अपनी मृत्यु स्पष्ट नजर आ रही थी झूठे खेल ने बङते बङते क्या रूप धारण कर लिया था इसकी उन्होनें कोई कल्पना नहीं की थी उन्हें लग रहा था कि राजा और प्रजा उन्हें निश्चय ही फ़ाँसी से कम कोई सजा नहीं देगें ..
इधर जिस बगीचे में यह बारात ठहरी हुयी थी उसमें एक इच्छाधारी नाग- नागिन का जोङा निवास करता था..नाग ने हँसते हुये नागिन से कहा कि तूने कभी बिना दूल्हे की बारात देखी है...नागिन ने हैरानी से कहा बिना दूल्हे की बारात भी कहीं होती है क्या..? नाग ने कहा कि हमारे बगीचे में जो बारात ठहरी हुयी है वो ऐसी ही है...और उसने नागिन को पूरा किस्सा बताया...इस पर कोमल नारी स्वभाव बाली नागिन ने कहा कि..ओह जब ये बारात दरबाजे
पर पहुँचेगी तो वर प्रतीक्षारत कन्या और अन्य लोगों पर क्या गुजरेगी..उफ़ स्वामी ये तो बङा अनर्थ ही होगा...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी तरह से ये शादी भी निर्विघ्न हो जाय तो कम से कम कन्या पर एकदम तो बिजली गिरने से बच जायेगी ..फ़िर बाद में तो स्थिति संभल सकती है..क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है.. प्राणनाथ...?
नाग ने कहा कि एक उपाय है उसके लिये यदि तू राजी हो तो में वर के स्थान पर मनुष्य का शरीर धारण करके बैठ जाता हूँ और इसका विवाह सम्पन्न कराके वापस इसी स्थान पर इनको छोङ दूँगा फ़िर इनके भाग्य में जो होगा वो ये जाने...कोई ना काहू सुख दुख कर दाता , निज कर कर्म भोग सब भ्राता...नारी स्वभाव बाली भोली नागिन इसके लिये सहर्ष तैयार हो गयी..नाग ने इच्छा से मनुष्य शरीर बनाया और पालकी में वर के स्थान पर बैठ गया..उसकी सुन्दरता और तेज कामदेव के समान था . जब बारात दरबाजे पर पहुँची और वर पालकी से उतरकर पहली बार आम लोगों से रूबरू हुआ तो उसे निहारने बाले लोग बेहोश होते होते बचे..वाकई रानिंया ठीक कहती थी वर सुन्दरता में कामदेव की मूरत नजर आ रहा था..लोग बङे खुश हुये इस अनोखे बहुचर्चित वर की चर्चाएं पहले ही आसमान छू रही थी उसकी बेमिसाल सुन्दरता ने तो मानों आसमान भी फ़ाङ दिया..कन्या पक्ष बाले जो तरह तरह से सशंकित थे अपनी इस उपलब्धि पर फ़ूलकर कुप्पा हो गये..सशंकित वरनी भी वर वर्णन से पुलकित हो उठी उसका सीना धाङ धाङकर बजने लगा ..oh my god..oh my god...नमो देवी नमुस्तते नमुस्तते सुन सिय सत्य असीस हमारी , पूजहु मनोकामना तुम्हारी..कन्या का वर वाकई सपनों का राजकुमार था..खैर साहब विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया..और बारात वापस उसी बगीचे में आकर ठहर गयी..नाग राजकुमारी के स्पर्श से कामासक्त हो रहा था और उससे यौनभोग करने हेतु व्याकुल हो उठा था पर उसे नागिन की तरफ़ से डर था..यदि वह सीधे सीधे अपने मनोभाव व्यक्त कर देता तो नागिन खूंखार तो हो ही जाती वरनी को डसकर उसका काम
तमाम कर देती ..
सो उसने एक योजना बनाते हुये नागिन को समझाया..कि देख यदि में इसको भली प्रकार घर तक छोङ आऊँ ..और कुछ दिन रहकर चुपचाप चला आऊँ तो सारी स्थिति ठीक हो जायेगी..इस तरह बहुत भला होगा और तमाम बातें बिगङने से बच जायेंगी..हालांकि नागिन के मन में भी ये बात थी कि हो न हो नाग अब इससे सम्भोग करने का बेहद इच्छुक हो सकता है..पर नाग ने ये बात ऐसा सीरियस मुँह बनाकर और तमाम धर्मकर्म की बातें जोङकर
पेश की कि नागिन हिचकते हुये तैयार हो ही गयी..नाग ने वादा किया कि चार दिन के बाद वो अवश्य लौट आयेगा...बारात राजमहल में पहुँच गयी..राजा अपने पुत्र को देखकर बहुत आनन्दित हुआ हाँ झूठी रानियों के आश्चर्य का ठिकाना न था..पर प्रत्यक्ष प्रमाण को वो कैसे नकार सकती थीं
तब उन्होंने सोचा कि स्वयं भगवान ने ही उनकी मदद की है और जो हुआ सो अच्छा ही हुआ ..आदि .नाग सब कुछ भूलकर नवयौवना पत्नी की यौवन गहराईयों में डूब गया..चार दिन की जगह एक महीना..फ़िर दो महीना..फ़िर चार महीना गुजर गये..उसने नागिन की कोई सुधि न ली और निरंतर कामभोग में लगा रहा ..उल्टे उसने एक बहाना तैयार करते हुये किले के चारों तरफ़ एक बङी खाई खुदबाकर..उसमें पानी आदि भरवाकर..कुछ इस तरह की मजबूत व्यवस्था करवा दी कि कोई सर्प जाति किसी भी सूरत में किले में प्रवेश नहीं कर सकती थी..दरअसल वो खूंखार नागिन क्या कर सकती है... इसे वो नाग भली भांति जानता था .
चार महीने के लम्बे इंतजार के बाद आखिर नागिन का धैर्य खत्म हो ही गया और वो नाग की तलाश में उस किले तक आ ही गयी और किले के चारों तरफ़ सुरक्षा के इंतजाम देखते ही वो अपने धोखेबाज और बेबफ़ा नाग के मंसूबों को भली भाँति समझ गयी...हालांकि ये इंतजाम उसके लिये कोई अहमियत नहीं रखते थे वो कोई अन्य रूप धारण करके महल में घुस सकती थी और वापिस फ़िर नागिन बन सकती थी..ये बात इच्छाधारी नाग भी भली भाँति जानता था पर इसीलिये शायद किसी ने कहा है कि कामवासना अन्धी ही होती है...नागिन ने मन में सोचा कि मैं तुम दोनों को ही सबक सिखाऊँगी और नागिन बने रहकर ही महल में प्रवेश करूँगी..इसी विचार के
तहत वो महल में जाने वाले फ़ूलों की डलिया में छुपकर अन्दर चली गयी और छुपकर रात होने का इंतजार करने लगी..अगले चार दिनों तक इसी तरह छुपकर वो नाग और अपनी सौतन की प्रेमलीला देखती रही..कामवासना में खोये नाग का इस तरफ़ कोई ध्यान न गया...अगर वो जरा भी होश में होता तो उसकी इस तरह की स्थिति के लिये सचेतक इंद्रिया उसे अवश्य सूचित कर देती..बल्कि कर रही थी..पर वह एक कामी पुरुष की भाँति अन्धा हो चुका था . उनके प्रेमालाप को देखते हुये उन्हें डसने को तत्पर नागिन अक्सर इस सोच में पङ जाती ..ओह कितनी सुन्दर जोङी है ..मानों एक दूजे के लिये ही बने हों..दोनों एक दूसरे को कितना प्रेम करते हैं ..क्या इनका वियोग कराना उचित होगा..नाग मुझसे ऊवकर इसमें दिलचस्पी ले रहा है तो इसमें उसका क्या दोष ये तो पुरुष का स्वाभाविक गुण है..और सबसे बङा सबाल इस राजकुमारी का आखिर क्या दोष है जो मैं इसे मृत्यु के मुख में ढकेल दूँ...इस तरह कभी वो उन्हें डसने की सोचती..कभी यूँ ही वापस लौट जाने की सोचती..फ़िर सोचती वापिस जाकर करेगी क्या..नाग के धोखा देने के बाद जीवन का अर्थ ही क्या रह गया है..इस तरह नागिन ने कई बार उन्हें डसने का निश्चय किया और त्याग दिया...उसने सोचा कि यदि में नाग को डस लेती हूँ तो हम दो विधवा हो जायेंगी..और यदि अपने सौतन को डसती हूँ तो संभव है कि नाग इसके विरह वियोग में प्राण त्याग दे तब भी मैं विधवा की विधवा ही रहूँगी...ऐसे उसने हजारों तरह से घुमाफ़िरा कर सोचा और तब...?
अगले दिन नाग जब सुबह सोकर उठा तो उसने देखा कि उसके विस्तर के पैरों वाले स्थान पर एक घायल मुख वाली मृतक नागिन पङी है पास ही रखी पाषाण मूर्ति पर सर पटक पटक कर उसने अपने प्राण त्याग दिये थे..कुछ ही मिनटों में नाग पूरी कहानी समझ गया..उसने झपटकर अपनी प्रियतमा को उठाया..और जार जार रोने लगा..अरे तूने एक बार तो बताया होता..एक बार तो अपने मन की बात कही होती..पता नहीं अंतिम समय में तू मुझसे क्या बात करना चाहती थी..अरे ये सब एक बार बताया होता..तेरी मृत्यु का मैं पूरा पूरा गुनहगार हूँ..

मंगलवार, मई 11, 2010

वैश्या मधुमती का योगदान..दशरथ के पुत्रेष्टि यग्य में ??

राजा दशरथ के चारों पुत्र पुत्रेष्टि यग्य द्वारा प्राप्त फ़ल या खीर द्वारा हुये प्रायः यह वाकया सभी जानते हैं पर इस यग्य को सम्पन्न करवाने में एक वैश्या ने अपना जीवन दाव पर लगा दिया था और एक द्रष्टिकोण से यह वैश्या राम आदि भाईओं की बूआ बन गयी इस बात को शायद बहुत कम ही लोग जानते होंगे .
दरअसल इस सृष्टि का निर्माण क्योंकि माया के परदे पर है इसलिये सत्य देख पाना बेहद कठिन होता है.
ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति वेद कहे .
सुन रावन ब्रह्माण्ड निकाया पाय जासु बल विचरित माया .
जैसे कभी हम सिनेमा देख रहे होते हैं और हमें बखूबी मालूम होता है कि ये कल्पित है फ़िर भी हम कथावस्तु के अनुसार भावों में खो जाते हैं और कुछ देर को उसी कहानी को सत्य की तरह जीने लगते हैं .
इस संदर्भ में मुझे दो विस्मयकारी ( होनी चाहिये ) बातें याद आती हैं . सिकन्दर महान और बादशाह अकबर . इनके दो अदभुत (मेरे ख्याल में) उदाहरण ही महान सत्य को उदघाटित करने हेतु काफ़ी हैं . सिकन्दर जब विश्वविजय यात्रा पर था कबीर ने उसे भिखारी कहा और फ़िर कई घटनाक्रमों के बाद वह कबीर का शिष्य बना न सिर्फ़ शिष्य बना उसने सुरति शब्द साधना का परम उपदेश भी लिया .दूसरा उदाहरण अकबर का लें एक बार अकबर तानसेन की बङे दिल से तारीफ़ कर रहा था तब तानसेन ने सकुचाते हुये कहा कि सम्राट मैं अपने गुरु हरिदास जी के पैरों की धूल भी नहीं हूँ . अकबर यह सुनकर भोंचक्का रह गया आनन फ़ानन वह हरिदास जी के पास पहुँचा तब उसे बोध हुआ कि तानसेन सही कह रहा है उसने उस अलौकिक ग्यान की अनुभूति की और हरिदास जी से उपदेश भी लिया .वह इस ग्यान से इतना प्रभावित हुआ कि उसने मथुरा वृन्दावन जो उस समय मात्र जंगल थे पर सुन्दर मन्दिर जनमभूमि आदि का पहली बार निर्माण कराया .बाद में राजपूत आदि अन्य कई राजाओं द्वारा उस निर्माण को आगे बङाया गया लेकिन उस की शुरुआत करने वाला अकबर ही था .
सतसंग सभा में जब कोई बात बहस का रूप ले लेती है मैं हमेशा एक ही बात अधिक कहता हूँ आप अपने समग्र अध्ययन का स्वतः मूल्यांकन करे फ़िर किसी बङी हस्ती जिसमें विलक्षण बदलाव हुआ हो उसको बारीकी से देखे फ़िर अपने स्तर से उसकी तुलना करे सच्चाई एकदम सामने होगी .
उदाहरण सिकन्दर और अकबर की तुलना में ये तर्क (प्राय कुतर्क) देने वाले कहाँ ठहरते है . इसी तरह हिंसा के पक्षधरों से में कहता हूँ कि आप सम्राट अशोक या अन्गुलिमाल जैसे हिंसक हो सकते हैं ...नहीं..तो जब उन जैसे बदल गये तो फ़िर आप देखें कि आप की स्थिति क्या है..यही सत्य की खोज है .
एक्चुअली सच्चाई को दबा देने से भ्रान्ति पैदा होती है जो हम ग्यानी लोग अपने अहम की तुष्टि और निज निहित स्वार्थ हेतु करते हैं..आप ईसामसीह को लें यदि ईसा के जीवन वृत का ईमानदारी से अवलोकन करें तो ईसा कई बार भारत आकर लम्बे समय तक रहे यहाँ किसी संत से ग्यान लिया...क्रूस से उतारे जाने के बाद भारत आये.. रहे .. जख्मों का इलाज कराया..अगर ये सभी इतिहास उसी तरह मनुष्य के सामने होता जैसा घटित हुआ था तो बहुत सी असाध्य बीमारियों से हम मुक्त होते जो फ़ालतू की हैं .
जब दशरथ जी को किसी प्रकार संतान प्राप्ति की आशा न रही तो उन्होने इस सम्बन्ध में अलौकिक ग्यान के दिग्गजों की एक मीटिंग बुलायी..और इस हेतु हर संभव उपाय बताने का निवेदन किया . तब उस मीटिंग में विद्वानों ने एकमात्र उपाय बताया जो बहुत ही दुष्कर था .वह उपाय ये था कि कोई ब्रह्मचर्य युक्त तपस्वी जिसकी तपस्या को बारह बरस पूरे हो चुके हों. दशरथ के पुत्रेष्टि यग्य में आहुति दे तो जो यग्यफ़ल प्राप्त होगा उससे संतान हो सकती है लेकिन तपस्वी द्वारा आहुति देने पर बारह बरस का अर्जित तप समाप्त (खर्च) हो जायेगा.अब ऐसा
कोई क्यों करेगा...जो अपना तप स्वयं नष्ट कर दे ? फ़िर भी राजा ने खोया ऊँट घङे में तलाशने जैसा काम किया . दशरथ ने ग्यानियों से आग्रह किया कि वे दिव्य द्रष्टि से देखे कि ऐसा तपस्वी इस समय कौन है तथा किस स्थान पर है .रिषियों ने देखा और मुस्कराकर कहा कि राजन वो आपके घर का ही है पर उसको राजी करना लगभग असंभव जैसा ही है . दशरथ ने निज स्वार्थवश वशीभूत होकर पूछा वह कौन है ?
श्रंगी रिषी . रिषियों ने जबाब दिया .
श्रंगी रिषी ये दो शब्द शक्तिशाली बम की तरह फ़टे क्योंकि श्रंगी को उनकी गुफ़ा से बाहर निकालना इतना कठिन था कि आसमान से तारे तोङना उसकी तुलना में बेहद सरल था श्रंगी एक रिस्ते से दशरथ के बहनोई लगते थे यधपि वे पूर्ण ब्रह्मचारी थे और उस समय तक काम और कामिनी से एकदम दूर थे . विवाह करने का तो कोई प्रश्न ही नही था. वहाँ से काफ़ी दूर बनप्रांत की एक गुफ़ा में तपस्या में लीन थे और कभी किसी से मिलते नहीं थे यहाँ तक कि लोगों ने उन्हें कभी देखा (तप के समय से ) भी नहीं था . दशरथ निराश हो गये लेकिन उम्मीद के तौर पर उन्होनें शहर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई श्रंगी को उनकी गुफ़ा से निकालकर दशरथ के महल तक लायेगा उसे इनाम से मालामाल कर दिया जायेगा . इस मुनादी पर लोग हँसे और कहा कि दशरथ बुढापे में सठिया गये हैं..श्रंगी जैसे तपस्वी को तप में छेङना यानी उनके शाप को न्योता देना है जो किसी को भी समूल तबाह कर सकता है फ़िर वह इनाम किसके लिये होगा ? आखिर ये चैलेंज एक वैश्या ने कबूल किया .
(थोङा विषयान्तर करते हुये मैं एक बात पर ध्यान दिलाना चाहूँगा कि आप देखे वैश्या त्रेता युग में भी थी .आखिर इस वैश्या का उपभोग कौन क्यों और क्या करता होगा ? क्या कुछ लोग उस समय भी रडुये थे ? या पत्नी वाले भी इस तरह के शौक रखते थे ? सबसे महत्वपूर्ण ये कि ये वैश्या दशरथ के राज्य में थी .ये बात खास उन लोगों के लिये है जो आज के समय को नैतिकता मूल्यों में गिरा मानते हैं और कहते हैं कि पहले का जमाना ऐसा नहीं था ? आप को उस धोवी का किस्सा भी याद होगा जिसके कारण सीता को पुनः वनवास हुआ .ये किस्सा इस बात की पुष्टि करता है कि आदमी को उस समय भी शक था कि उसकी औरत मौका मिलते ही पर पुरुष के साथ सहवास कर सकती है . जाहिर है ऐसी घटनायें होती होगी अन्यथा अकारण ही किसी बात का जन्म नहीं होता.)
वैश्या ने राजा से पाँच साल का समय और उस अवधि का पूर्ण खर्चा एडवांस मांगा जिसे राजा ने सहर्ष दिया . तब ये चतुर वैश्या उस स्थान पर गयी जहाँ तपस्वी श्रंगी तप में लीन थे .लगभग दस दिन उस गुफ़ा से बाहर एकान्त में छिपकर उस वैश्या ने यही पता लगाया कि श्रंगी चौबीस घन्टे में सिर्फ़ एक बार रात के बारह बजे गुफ़ा के द्वार पर लगा पत्थर थोङा खिसकाकर निकलते हैं और गुफ़ा के निकट खङे एक पेढ की छाल को (जिसे उन्होने चीर कर खुरच दिया था जिससे पेढ का रस निकलकर जमा हो जाता था ) जीभ से चाटते थे . बस यही उनका आहार था और यही उनकी सम्पूर्ण दिनचर्या भी थी .
हाय राम इसको पटाना तो बहुत मुश्किल है . लगता है बात बनेगी नहीं वैश्या ने सोचा . पर वैश्या भी अपने हुनर में बेहद कुशल थी उसने एक उपाय आजमाया और गुङ की चाशनी बनाकर उस स्थान पर लगा आयी जिसको श्रंगी चाटते थे . उस रात जब श्रंगी ने आहार लिया तो छाल मीठी मीठी लगी..वे चौंक कर चारो तरफ़ देखने लगे और
उनके मुँह से निकला अरे यह क्या..ये क्या..पर उत्तर कौन देता..कहीं कोई नहीं था वैश्या छुपकर ये नजारा देख रही थी कि देखें क्या प्रतिक्रिया होती है..श्रंगी थोङा देर इधर उधर देखते रहे और फ़िर गुफ़ा में चले गये ..वैश्या मुस्करायी . उपाय काम कर गया .
यह क्रम बीस दिनों तक चला..श्रंगी को इसका रहस्य पता न चला अलवत्ता उन्होनें सोचा ये व्यवस्था प्रभु प्रदत्त है .उन्हें बिना किये कुछ अधिक और अच्छा आहार मिल रहा था . इक्कीसबें दिन वैश्या ने गुङ की चाशनी के स्थान पर रबङी का लेप कर दिया . श्रंगी फ़िर चौंके अरे ये क्या...ये क्या..फ़िर कोई उत्तर नहीं..श्रंगी फ़िर गुफ़ा में अन्दर
सोचा ..प्रभु की ही लीला है जो भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं .वरना इस बियावान में पेङ पर इस तरह के खाद्ध पदार्थ कहाँ से आ सकते हैं ?
अगले तीस दिन तक वैश्या रबङी की मात्रा बङाती गयी और रेसिपी के विभिन्न नुस्खों को आजमाती हुयी कभी रबङी में किशमिश कभी घिसा नारियल चूरा कभी चिरोंजी जैसे आयटम जोङती गयी..श्रंगी थोङी देर अचंभित होते फ़िर प्रभु की लीला मानकर खा लेते क्योंकि दूर दूर तक ऐसा करने वाला कोई नहीं था..? सार ये कि श्रंगी की भूख जाग्रत होने लगी जो कि योग से स्थिर हो गयी थी . इसके बाद वैश्या ने पेङ पर कुछ लेप करने के बजाय स्वादिष्ट मेवायुक्त खीर बनाकर विधिवत तरीके से ढककर पेङ के नीचे रख दी..श्रंगी ने नियत समय पर आकर पेङ चाटा तो वहाँ कुछ नहीं था वे बहुत परेशान हुये..आहार लेने से भूख सता रही थी...तभी उनकी द्रष्टि पेङ के नीचे रखी कटोरी पर गयी..चौंककर कुछ सकुचाते हुये उन्होनें खीर उठा ली और पात्र हाथ में लेकर शंकित द्रष्टि से इधर उधर देखा और ऊँची आवाज में कहा..अरे कोई यहाँ है क्या..कोई उत्तर नहीं ...कुछ देर के चिंतन के बाद प्रभु चमत्कार मानकर
उन्होनें खीर खा ली..वैश्या रहस्यमय ढंग से मुस्करायी . यह क्रम भी एक महीने चला फ़िर उसने खीर के स्थान पर सम्पूर्ण भोजन की सुन्दर थाली रखी फ़िर वही...अगले दो महीने तक श्रंगी ने आम इंसान की तरह दाल सब्जी
पूङी परांठे खीर पापङ सलाद अचार सब खाया और उस अद्रश्य और चमत्कारिक खाने के आदी हो गये..बल्कि साधना में भी उन्हें ये चिंतन हो आता कि देखें आज भोजन में क्या मिले ?
इस स्थित में दस माह गुजर गये तब एक दिन खाने की वह स्वादिष्ट थाली गायब हो गयी..श्रंगी बहुत परेशान..भूख प्रबल हो रही थी...चारों तरफ़ व्याकुल होकर देखते कहीं कोई नहीं..उन्होनें ऊँची आवाज में कहा कि मुझे रोज भोजन देने वाला आज कहाँ है सामने आये..मैं भूख से व्याकुल हो रहा हूँ ..
प्रत्युत्तर में एक नारी आवाज आयी कि पहले आप वचन दें कि मेरी गलतियों को क्षमा करेंगे..और मेरी सेवा का अनुचित विचार से सम्बन्ध न जोङेंगे . हैरान श्रंगी ने जल्दी में वचन दे दिया . तुरन्त एक अप्रतिम सोन्दर्य की मालकिन यौवन के भार से लदी हुयी.पर दिखने में एकदम शालीन..युवती अन्धेरे से निकलकर बाहर आयी..उसने श्रंगी को करबद्ध प्रणाम किया और कहा कि प्रभो गत दस माह से आपकी सेवा करने वाली वो तुच्छ दासी में ही हूँ .
सेवा का प्रयोजन क्या है ?
कुछ नहीं सन्तों की सेवा में शान्ति और आनन्द तो है ही अक्षय फ़ल की प्राप्ति भी है . श्रंगी उसके भाव जानकर अत्यंत प्रसन्न हुये उन्होनें सोचा कि मेरा विचार कितना गलत था कि नारी महज वासना की पुतली है और पुरुषों के साधन मोक्षमार्ग में बहुत बङी बाधा है ...ओ हो.. मैं सोचता था ..नारी नारी..नहीं नरक का द्वार है.. ओ हो.. कितना गलत था मैं ..धन्य हो देवी तुम धन्य हो .
मेरा नाम मधुमती है प्रभो .
इस तरह कुछ समय तक मधुमती उसी समय उन्हें भोजन कराती..श्रंगी तुरंत गुफ़ा में जाने के स्थान पर कुछ देर तक उसके पास बैठकर उपदेश आदि करते..मधुमती का आंचल अक्सर उसके उन्नत उरोजों से उङ जाता..यौवनरस से लबालब भरे नारी स्तन के आकर्षण से श्रंगी बच न पाये..लेकिन दोनों ही इस बारे में अनभिग्य बने रहे..या जानबूझकर बहाना करते रहे ..धीरे धीरे मधुमती को गुफ़ा में प्रवेश की आग्या मिल गयी..और फ़िर वह कभी कभी..फ़िर अक्सर ही..फ़िर ज्यादातर ही गुफ़ा में आने जाने लगी..फ़िर साधिकार रहने लगी..उसका असली उद्देश्य श्रंगी द्वारा स्व योनि में शिश्न प्रहार का था..नारी की निरंतर निकटता से श्रंगी में कामरस उमङने लगा और वे काम के वशीभूत होकर..मधुमती से सम्भोग करने लगे . मधुमती काम को धर्मशास्त्र का अंग बताकर योनिच्छेद में लिंग प्रहार हेतु उकसाती श्रंगी को ये अनुचित इसलिये नहीं लगा क्योंकि उनकी साधना पूर्ववत चल रही थी..और मधुमती उनकी साधना तथा अन्य देखभाल पूरे मनोयोग से करती थी .
अगले चार सालों में मधुमती ने श्रंगी के चार पुत्रों को जन्म दिया . तब खर्चा आदि बढने की बात कहकर.. किसी माध्यम से धन की व्यवस्था हो ऐसा कहकर मधुमती ने उन्हें नगर जाने हेतु राजी कर लिया..क्योंकि अब उनके
बच्चे भी थे .श्रंगी परिस्थितियों के आगे विवश हो गये और इस तरह नियत समय में ही मधुमती उन्हें दशरथ के महल में लाने में कामयाब हो गयी..अब रास्ता आसान था..सब लोगों ने उन्हें समझाया कि वे दसरथ के पुत्रेष्टि यग्य में आहुति डाले..
श्रंगी भली भांति जानते कि उनका तप नष्ट हो जायेगा..लेकिन ऐसा करने पर राजा उन्हें भारी धन देते जिसको लेकर मधुमती अपने बच्चों को स्वयं पालने पर तैयार थी और वे फ़िर नये सिरे से निर्विघ्न साधना कर सकते थे..और मधुमती से कामवासना का लगाव भी अब नही रहा था..इस तरह परिस्थितियों से मजबूर श्रंगी ने आहुति
दी .यग्य फ़ल प्रकट हुआ जिसको खाकर दशरथ की रानियां गर्भवती हुयीं..श्रंगी के आगे सब भेद खुल गया पर इसको ईश्वर की इच्छा मानकर वे पुनः साधना के लिये चले गये..क्योंकि तिनका तिनका करके वे स्वयं कामवासना से मोहित हुये थे.

शनिवार, मई 01, 2010

है सब आतम सोय प्रकास सांचो

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे। हरि सिमरत जन गए निसतरि तरेहरि के नाम कबीर उजागर। जनम जनम के काटे कागरनिमत नामदेउ दूध पीआइया। तउ जग जनम संकट नहीं आइआजनम रविदास राम रंग राता। इउ गुर परसाद नरक नहीं जाता
है सब आतम सोय प्रकास सांचो। निरंतरि निराहार कलपित ये पांचों।।आदि मध्य औसान एक रस तारतम नहीं भाई। थावर जंगम कीट पतंगा, पूर रहे हरिराई।।सरवेसुर श्रबपति सब गति, करता हरता सोई। सिव न असिव न साध अरु सेवक, उभय नहीं होई।।धरम अधरम मोक्ष नहीं बंधन, जरा मरण भव नासा। दृष्टि अदृष्टि गेय अरु ज्ञाता, येक मेक रैदासा।।

हरि हरि हरि न जपसि रसना

हरि जपत तेऊ जना पदम कवलापति तास समतुल नहीं आन कोऊ। एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूर सोऊ।।जा के भागवत लेखी ऐ अवरु नहीं पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा। बिआस महि लेखी ऐ सनक महि पेखी ऐ नाम की नामना सपत दीपा।।जा के ईद बकरीद कुल गऊ रे वधु करहि मानी अहि सेख सहीद पीरा। जा के बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा।।जा के कुटंब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरह अजहु बनारसी आस पासा। आचार सहित विप्र करहि डंडवत तिन तने रविदास दासानुदासा।।
हरि हरि हरि न जपसि रसना। अवर सब छाड़ि बचन रचनासुध सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जाके रे। चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि करतल ताके।।नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही। व्यास विचार कहिओ परमारथ राम नाम सरि नाहीसहज समाधि उपाधि रहत होइ उड़े भाग लिव लागी। कह रविदास उदास दास मतित जनम मरन भय भागी।।

सो कत जाने पीर पराई

सो कत जाने पीर पराई। जाके अंतर दरद न पाई।।सह की सार सुहागनी जाने। तज अभिमान सुख रलीआ माने। तन मन देइ न अंतर राखे। अवरा देखि न सुने अभाखे।।दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी। जिन नाह निरंतहि भगति न कीनी। पुरसलात का पंथु दुहेला। संग न साथी गवनु इकेला।।दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ। बहुत पिआस जबाब न पाइआ। कहि रविदास सरन प्रभु तेरी। जिय जानहु तिउ करु गति मेरी।।

हउ बलि बलि जाउ रमईया कारने। कारन कवन अबोल।।हम सरि दीनु दयाल न तुमसरि। अब पतीआरु किआ कीजे। बचनी तोर मोर मन माने। जन कउ पूरनु दीजे।।बहुत जनम बिछुरे थे माधउ, इहु जनमु तुम्हरे लेखे। कहि रविदास अस लगि जीवउ। चिर भइओ दरसन देखे।।
हरि को टांडो लादे जाइ रे। मैं बनजारो राम को।। राम नाम धन पायो, ताते सहज करों व्योपार रेऔघट घाट घनो घना रे, निरगुन बैल हमार। राम नाम हम लादियो, ताते विष लादयो संसार रे।।अंतहि धरती धन धरयो रे, अंतहि ढूँढ़न जाइ। अंत को धरयो न पाइये ताते चलो मूल गंवाइ रेरैन गंवाई सोइ कर, दिवस गंवायो खाइ। हीरा यह तन पाइ कर कौड़ी बदले जाइ रे।।साध संगति पूँजी भई रे, वस्तु लई निरमोल। सहजि बलदवा लादि करि, चहु दिस टांडो मेल रे।।जैसा रंग कसूंभ का रे, तैसा यहु संसार। रमइया रंग मजीठ का, ताते भने रैदास बिचार रे।।

जिन यहु पंथी पंथ चलावा

सु कछु बिचारयो ताते मेरो मन थिर के रहयो।
हरि रंग लागो ताते बरन पलट भयोजिन यहु पंथी पंथ चलावा, अगम गवन मैं गमि दिखलावा।।अबरन बरन कथे जिन कोई, घट घटत ब्याप रहयो हरि सोई।।जिह पद सुर नर प्रेम पियासा, सो पद रम रहयो जन रैदासा।।
सेई मन समझ समरथ सरनागता। जाकी आदि अंत मधि कोई न पावे।। कोटि कारज सरे देह गुन सब जरे नेक जो नाम पतिव्रत आवे।।आकार की वोट आकार नहीं उबरे सिव बिरंच अरु बिसन ताई। जास का सेवग तास को पाई है, ईस को छांड़ि आगे न जाही।।गुणमई मूरति सोई सब भेख मिलि, निरगुन निज ठौर विश्राम नांही। अनेक जुग बंदगी बिबिध प्रकार कर अंत गुन सेई गुन में समाही।।पांच तत तीनि गुन जूगति कर कर सांईया आस बिन होत नहीं करम काया। पाप पुन बीज अंकूर जामे मरे, उपजि बिनसे तिती सब माया।।किरतम करता कहें, परम पद क्यूं लहें भूल भरम मैं परयो लोक सारा। कहे रैदास जे राम रमता भजे कोई एक जन गये उतर पारा।।

साध का निंदक कैसे तरे

सगल भव के नाइका। इक छन दरस दिखाइ जी।।कूप भरओ जैसे दादिरा कछु देस बिदेस न बूझ। ऐसे मेरा मन बिखिआ बिमोहिआ, कछु आर पार न सूझ।।मलिन भई मति माधव, तेरी गति लखी न जाइ। करहु किरपा भरमु चूकई मैं सुमति देहु समझाइ।।जोगीसर पावहि नहीं तुअ गुन कथन अपार। प्रेम भगति के कारने कह रविदास चमार।।
सब कछु करत न कहु कछु कैसे। गुन बिधि बहुत रहत ससि जैसेदरपन गगन अनींल अलेप जस, गंध जलध प्रतिबिम्ब देख तस।।
सब आरंभ अकाम अनेहा, विधि नषेध कीयो अनकेहा।।इहि पद कहत सुनत नहीं आवे, कहे रैदास सुकृत को पावे।।

साध का निंदक कैसे तरे। सर पर जानहु नरक ही परेजो कोऊ अढसठ तीरथ न्हावे। जे कोऊ दुआदस सिला पुजावे। जे कोऊ कूप तटा देवावे। करे निंद सब बिरथा जावे।।जे ओहु ग्रहन करे कुलखेति। अरपे नारि सीगार समेति। सगली सिमरति स्रवनी सुने। करे निंद कवने नही गुने।।जो ओहु अनिक प्रसाद करावे। भूमि दान सोभा मंडपि पावे। अपना बिगारि बिराना साढे। करे निंद बहु जोनी हाढे।।निंदा कहा करहु संसारा। निंदक का प्ररगटि पाहारा। निंदकु सोधि साधि विचारिआ। कहु रविदास पापी नरक सिधारिआ।।

संतो अनन भगति यह नांही

रे मन माछला संसार समंदे, तू चित्र बिचित्र बिचारि रे। जिहि गाले गिलिया ही मरिये, सो संग दूरि निवारि रेजम छेड़ि गणि डोरि छे कंकन, पर त्रिया गालो जान रे। होइ रस लुबधि रमे यू मूरख, मन पछतावे न्याणि रेपाप गिलयो छे धरम निबोली, तू देख देख फल चाख रे। पर त्रिया संग भलो जे होवे, तो राणा रावन देखि रेकहे रैदास रतन फल कारन , गोबिंद का गुन गाइ रे। काचो कुंभ भरयो जल जैसे, दिन दिन घटतो जाइ रे

संत की संगति संत कथा रस। संत प्रेम माझे दीजे देवा देवसंत तुझी तनु संगति प्रान। सतगुर ग्यान जाने संत देवा देवसंत आचरन संत को मारग। संत क ओल्हग ओल्हगणी।।अउर इक मागउ भगति चिंतामणि। जणी लखावहु असंत पापी सणि।।रविदास भणै जो जाने सो जान । संत अनंतह अंतर नाही।।
संतो अनन भगति यह नांही। जब लग सत रज तम पांचू गुण ब्यापत हैं या मांहीसोइ आन अंतर करे हरि सू अपमारग कू आने। काम क्रोध मद लोभ मोह की पल पल पूजा ठाने।।सति सनेह इष्ट अंगि लावे अस्थल अस्थल खेले। जो कुछ मिले आंनि अखित ज्यूं सुत दारा सिरि मेले।।हरिजन हरि बिन और न जाने तजे आन तन त्यागी। कहे रैदास सोई जन निरमल निसदिन जो अनुरागी।।

रथ को चतुर चलावन हारो

रथ को चतुर चलावन हारो। खिन हाकें खिण ऊभौ राखे नहीं आन को सारो।।जब रथ रहे सारहीं थाके तब को रथहि चलावे। नाद बिनोद सबे ही थाके मन मंगल नहीं गावे।।पांच तत को यहु रथ साज्यो अरधे उरध निवासा। चरन कंवल लौ लाइ रहयो है गुण गावे रैदासा।।

राम राय का कहिये यह ऐसी। जन की जानत हो जैसी।।मीन पकर काटयो अरु फाटयो बांट कीयो बहु बानी। खंड खंड कर भोजन कीनो तऊ न बिसारयो पानी।।ते हम बांधे मोह पास में हम तूं प्रेम जेवरिया बांध्यो। अपने छूटन के जतन करत हो हम छूटे तू आराध्यो।।कह रैदास भगति इक बाढ़ी अब काको डर डरिये। जा डर को हम तुम को सेवे सु दुख अजहू सहिये।।

रामहि पूजा कहा चढाऊं। फल अरु फूल अनूप न पांऊ।।थनहर दूध जु बछ जुठारयो पहुप भवर जल मीन बिटारयो। मलयागिर बेधियो भवंगा विष अमृत दोऊ एके संगा।।मन ही पूजा मन ही धूप मन ही सेऊ सहज सरूप।।पूजा अरचा न जानू राम तेरी कहे रैदास कवन गति मेरी।।

रामा हो जगजीवन मोरा तू न बिसार राम मैं जन तोरा॥संकट सोच पोच दिनराती करम कठिन मोर जात कुजाती॥हरहु बिपत भावे करहु सो भाव चरण न छाङो जाव सो जाव॥कह रैदास कछु देहु अलंबन बेगि मिलो जनि करो बिलंबन॥
रे चित चेत चेत अचेत काहे बालमीको देख रे। जाति ते कोई पद न पहुचा राम भगति बिसेष रेषट क्रम सहित जु विप्र होते हरि भगति चित दृढ नांहि रे। हरि कथा सू हेत नांही सुपच तुले तांहि रेस्वान सत्रु अजाति सब ते अंतर लावे हेत रे। लोग वाकी कहा जाने तीन लोक पवित रेअजामिल गज गनिका तारी काटी कुंजर की पास रे। ऐसे दुरमती मुकती कीये क्यूं न तरे रैदास रे

यह अंदेस सोच जिय मेरे

मैं का जानूं देव मैं का जांनू। मन माया के हाथ बिकानू।।चंचल मनवा चहु दिस धावे जिभ्या इंद्री हाथ न आवे। तुम तो आहि जगत गुर स्वामी, हम कहियत कलिजुग के कामी।।लोक बेद मेरे सुकृत बढ़ाई लोक लीक मोपे तजी न जाई। इन मिल मेरो मन जु बिगारयो, दिन दिन हरि जी सू अंतर पारयो।।सनक सनंदन महा मुनि ग्यानी सुख नारद ब्यास इहे बखानी। गावत निगम उमापति स्वामी सेस सहस मुख कीरत गामी।।जहाँ जहाँ जांऊँ तहाँ दुख की रासी जो न पतियाइ साध है साखी। जमदूतन बहु बिधि कर मारयो, तऊ निलज अजहू नहीं हारयो।।हरि पद बिमुख आस नहीं छूटे, ताते त्रिसना दिन दिन लूटे। बहु बिधि करम लीये भटकावे तुमह दोस हरि कौन लगावे।।केवल राम नाम नहीं लीया संतुति विषे स्वाद चित दीया। कहे रैदास कहाँ लग कहिये बिन जग नाथ सदा दुख सहिये।।

मो सउ कोऊ न कहे समझाइ। जाते आवागवन बिलाइ।।सतजुग सत तेता जगी दुआपर पूजाचार। तीनो जुग तीनो दिड़े कलि केवल नाम अधार।।पार कैसे पाइबो रे।। बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसे सभ लोइ। कवन करम ते छूटी ऐ जिह साधे सभ सिधि होई।।करम अकरम बीचारी ए संका सुन बेद पुरान। संसा सद हिरदे बसे कउन हरे अभिमान ।।बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतर बिबिध बिकार। सुध कवन पर होइबो सुव कुंजर बिधि बिउहार।।रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार। पारस मानो ताबो छुए कनक होत नहीं बार।।परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट। उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट।।भगत जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार। सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार।।अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरे भ्रम फास। प्रेम भगति नहीं उपजे ता ते रविदास उदास।।
यह अंदेस सोच जिय मेरे ।निसिबासर गुन गांऊ तेरे तुम चिंतित मेरी चिंतहु जाई ।तुम चिंतामनि हो एक नाई ॥भगत हेत का का नहिं कीन्हा ।हमरी बेर भए बलहीना ॥कह रैदास दास अपराधी ।जेहि तुम द्रवो सो भगति न साधी ॥

साध संगति बिना भाव नहीं उपजे

माया मोहिला कान्ह। मैं जन सेवक तोरा।।संसार परपंच मैं ब्याकुल परमानंदा। त्राहि त्राहि अनाथ नाथ गोबिंदारैदास बिनवे कर जोरी। अबिगत नाथ कवन गति मोरी

मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते। साध संगति पाइ परम गतेमैले कपरे कहा लउ धोवउ, आवेगी नीद कहा लगु सोवउ।।जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटयो। झूठे बनज उठि ही गई हाटयोकहु रविदास भइयो जब लेखो। जोई जोई कीनो सोई सोई देखो
मेरी प्रीति गोपाल सू जिनि घटे हो। मैं मोलि महंगी लई तन सटे हो।।हिरदे सुमिरन करों नैन आलोकना, श्रवना हरि कथा पूरि राखू। मन मधुकर करो चरणा चित धरो राम रसाइन रसना चाखू।।साध संगति बिना भाव नहीं उपजे भाव बिन भगति क्यूं होइ तेरी। बंदत रैदास रघुनाथ सुन बीनती, गुर प्रसादि क्रिया करो मेरी।।

पंच ब्याधि असाधि इहि तन

माधौ अविद्या हित कीन्ह। ताते मैं तोर नांउ न लीन्ह।।मिरग मीन भ्रिग पतंग कुंजर, एक दोस बिनास। पंच ब्याधि असाधि इहि तन, कौन ताकी आसजल थल जीव जंत जहाँ जहाँ लों करम पासा जाइ। मोह पासि अबध बाधो करिये कोन उपायत्रिजुग जोनि अचेत सम भूमि, पाप पुन्य न सोच। मानिषा अवतार दुरलभ, तिहू संकुट पोचरैदास दास उदास बन भव, जप न तप गुरु ग्यान। भगत जन भौ हरन कहियत, ऐसे परम निधान

माधौ भरम कैसे न बिलाइ। ताते द्वती भाव दरसाइकनक कुंडल सूत्र पट जुदा, रजु भुजंग भ्रम जैसा। जल तरंग पाहन प्रितमा ज्यूं ब्रह्म जीव द्वती ऐसा।।बिमल ऐक रस उपजे न बिनसे उदे अस्त दोई नांही। बिगता बिगत गता गति नांही, बसत बसे सब मांही।।निहचल निराकार अजीत अनूपम, निरभे गति गोबिंदा। अगम अगोचर अखिर अतरक, निरगुण नित आनंदा।।सदा अतीत ग्यान ध्यान बिरिजित, निरबिकार अबिनासी। कहे रैदास सहज सुनि सत जीवन मुकति निधि कासी।।
माधौ संगति सरनि तुम्हारी जगजीवन कृष्ण मुरारीतुम्ह मखतूल गुलाल चत्रभुज, मैं बपुरो जस कीरा पीवत डाल फूल रस अमृत, सहज भई मति हीरातुम्ह चंदन मैं अरंड बापुरो, निकट तुम्हारी बासा। नीच बिरख थे ऊंच भये, तेरी बास सुबास निवासाजाति भी ओछी जनम भी ओछा ओछा करम हमारा। हम सरनागति राम राय की, कहे रैदास बिचारा

माटी को पुतरा कैसे नचत है

माटी को पुतरा कैसे नचत है देखे देखे सुने बोले दउरिओ फिरत हैजब कुछ पावे तब गरब करत है। माइआ गई तब रोवन लगत हैमन बच क्रम रस कसहि लुभाना। बिनसि गइआ जाइ कहूं समानाकहि रविदास बाजी जग भाई। बाजीगर सउ मोहि प्रीति बनि आई

माधवे का कहिये भ्रम ऐसा तुम कहियत होह न जैसानृपति एक सेज सुख सूता, सपने भया भिखारी। अछत राज बहुत दुख पायो, सो गति भई हमारीजब हम हते तवे तुम्ह नांही, अब तुम्ह हो मैं नांही। सरिता गवन कीयो लहरि महोदधि, जल केवल जल मांहीरजु भुजंग रजनी प्रकासा, अस कछु मरम जनावा। समझ परी मोहि कनक अल्यंक्रत ज्यूं, अब कछू कहत न आवाकरता एक भाव जगि भुगता, सब घट सब बिधि सोई। कहे रैदास भगति एक उपजी, सहजे होइ स होई
माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि। तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि।।जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा। जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोराजउ तुम दीवरा तउ हम बाती। जउ तुम तीरथ तउ हम जातीसाची प्रीति हम तुम सिउ जोरी। तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरीजह जह जाउ तहा तेरी सेवा। तुम सो ठाकुरु अउरु न देवातुमरे भजन कटहि जम फांसा। भगति हेत गावे रविदासा

काम क्रोध में जनम गंवायो

भेष लियो पे भेद न जान्यो। अमृत लेई विष सो मान्योकाम क्रोध में जनम गंवायो, साधु संगति मिलि नाम न गायोतिलक दियो पे तपनि न जाई, माला पहिरे घनेरी लाईकह रैदास परम जो पाऊँ, देव निरंजन सत कर ध्याऊँ

मन मेरे सोई सरूप बिचार। आदि अंत अनंत परम पद, संशे सकल निवारजस हरि कहियत तस तो नहीं, है अस जस कछू तैसा। जानत जानत जानि रहयो मन, ताको मरम कहो निज कैसाकहियत आन अनुभवत आन, रस मिला न बेगर होई। बाहरि भीतर गुप्त प्रगट, घट घट प्रति और न कोईआदि ही येक अंत सो एके मधि उपाधि सु कैसे। है सो येक पे भरम ते दूजा, कनक अल्यंकृत जैसेकहै रैदास प्रकास परम पद, का जप तप ब्रत पूजा। एक अनेक येक हरि, करो कवन बिधि दूजा
मरम कैसै पाइवो रे। पंडित कोई न कहे समझाइ, जाते मेरो आवागवन बिलाइबहु बिधि धरम निरूपिये, करता दीसे सब लोई। जाहि धरम भरम छूटिये, ताहि न चीन्हे कोईअक्रम क्रम बिचारिये, सु्न संक्या बेद पुरान। बा्के हृदे भै भरम, हरि बिन कोन हरे अभिमानसतजुग सत त्रेता तप, द्वापर पूजा आचार। तीन्यू जुग तीन्यू दिढी, कलि केवल नाव अधारबाहर अंग पखालिये, घट भीतरि बिबधि बिकारसुचि कवन परिहोइये, कुंजर गति ब्योहाररवि प्रकास रजनी जथा, गत दीसे संसार पारस मनि तांबो छिवे। कनक होत नहीं बार, धन जोबन प्रभु ना मिलेना मिले कुल करनी आचार। एके अनेक बिगाइया, ताको जाने सब संसारअनेक जतन करि टारिये, टारी टरे न भरम पास। प्रेम भगति नहीं उपजे ताते रैदास उदास

कहाँ ते तुम आयो रे भाई

भाई रे राम कहाँ है मोहे बतावो। सत राम ताके निकट न आवो
राम कहत जगत भुलाना, सो यह राम न होई।
करम अकरम करुणामय केसो करता नाउं सु कोई
जा रामहि सब जग जाने भरम भूले रे भाई।
आप आप ते कोई न जाने कहै कोन सू जाई
सति तन लोभ परसि जीय तन मन, गुण परस नहीं जाई।
अखिल नाउं जाको ठौर न कतहू क्यूं न कहे समझाई
भयो रैदास उदास ताही ते करता को है भाई।
केवल करता एक सही करि, सत राम तिहि ठाई
भाई रे सहज बन्दी लोई, बिन सहज सिद्धि न होई। लौ लीन मन जो जानिये, तब कीट भृंगी होईआपा पर चीन्हे नहीं रे, और को उपदेस। कहाँ ते तुम आयो रे भाई, जाहुगे किस देसकहिये तो कहिये काहि कहिये, कहाँ कौन पतियाइ। रैदास दास अजान है करि, रहयो सहज समाइब

कहा भयो नाचे अरु गाये

बरजि हो बरजि बीठल, माया जग खाया। महा प्रबल सब ही बसि कीये, सुर नर मुनि भरमायाबालक बिरध तरुन अति सुंदर नाना भेष बनावे। जोगी जती तपी संन्यासी, पंडित रहन न पावेबाजीगर की बाजी कारन सबको कौतिग आवे । जो देखे सो भूल रहे वाका चेला मरम जु पावेखंड ब्रह्मंड लोक सब जीते, ये ही बिधि तेज जनावे । स्वंभू को चित चोरि लीयो है, वा के पीछे लागा धावेइन बातन सुकचनि मरियत है, सबको कहे तुम्हारी। नैन अटकि किन राखो केसो मेटहु बिपत हमारीकहै रैदास उदास भयो मन, भाजि कहाँ अब जइये। इत उत तुम्ह गोबिंद गुसांई, तुम्ह ही मांहि समइये

भगति ऐसी सुनहु रे भाई। आई भगति तब गई बड़ाईकहा भयो नाचे अरु गाये कहा भयो तप कीन्हे। कहा भयो जे चरन पखाले जो परम तत नहीं चीन्हेकहा भयो जू मूंड मुंड़ायो बहु तीरथ ब्रत कीन्हे। स्वामी दास भगत अरु सेवग, जो परम तत नहीं चीन्हेकहै रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावे । तज अभिमान मेटि आपा पर, पिपलक होइ चुन खावे

भाई रे भरम भगति सुजान। जो लो नहीं साच सू पहिचानि।।
भरम नाचन भरम गाइन भरम जप तप दान। भरम सेवा भरम पूजा, भरम सू पहिचानि।।
भरम षट क्रम सकल सहिता, भरम गृह बन जानि। भरम करि करम कीये, भरम की यहु बानि।।
भरम इंद्री निग्रह कीया, भरम गुफा में बास। भरम तो लो जानिये सुनि की करे आस।।
भरम सुध सरीर जो लो भरम नांउ बिनांउ। भरम भणि रैदास तो लो जो लो चाहे ठांउ

राम काहू के बांटे न आयो

प्रीति सधारन आव। तेज सरूपी सकल सिरोमनि, अकल निरंजन रावपीव संगि प्रेम कबहूं नहीं पायो कारन कौन बिसारी। चक को ध्यान दधिसुत को होत है, त्यूं तुम्ह ते मैं न्यारीभोर भयो मोहिं इकटग जोवत, तलपत रजनी जाइ। पिय बिन सेज क्यूं सुख सोऊ बिरह बिथा तन माइदुहागनि सुहागनि कीजे अपने अंग लगाई। कहै रैदास प्रभु तुम्हरे बिछोहे येक पल जुग भरि जाइ

बंदे जान साहिब गनी । समझ बेद कतेब बोले ख्वाब में क्या मनींज्वानी दुनी जमाल सूरत देखिये थिर नांहि बे। दम छसे सहस्र इकवीस हरि दिन, खजाने ते जांहि बेमती मारे गरब गाफिल, बेमिहर बेपीर बे। दरी खाने पङे चोभा, होत नहीं तकसीर बेकुछ गांठि खरची मिहर तोसा, खैर खूबी हाथ बे। धनी का फरमान आया, तब कीया चाले साथ बेतज बद जबां बेनजरि कम दिल, करि खसकी कांणि बे। रैदास की अरदास सुन कछू हक हलाल पिछाणि बे
बपुरो सत रैदास कहे। ग्यान बिचार नांइ चित राखे हरि के सरन रहे रेपाती तोङे पूज रचावे तारन तरन कहे रे। मूरत मांह बसे परमेसुर, तो पानी मांहि तिरै रेत्रिबिधि संसार कवन बिधि तरिबो जे दिढ नांव न गहे रे। नाव छाड़ि जे डूंगे बैठे, तौ दूना दूख सहे रेगुरु को सबद अरु सुरत कुदाली, खोदत कोई लहे रे। राम काहू के बांटे न आयो सोने कूल बहे रेझूठी माया जग बहकाया, तो तनि ताप दहे रे। कहे रैदास नाम जप रसना माया काहू के संग न रहे रे

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरे दिन राती॥प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करे रैदासा॥

प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी।जग जीवन राम मुरारी॥गली गली को जल बह आयो सुरसरि जाय समायो।संगत के परताप महातम नाम गंगोदक पायो॥स्वाति बूंद बरसे फन ऊपर सोई विष होइ जाई।ओही बूंद के मोती निपजे संगति की अधिकाई॥तुम चंदन हम रेंड बापुरे निकट तुम्हारे आसा।संगति के परताप महातम, आवे बास सुबासा॥जाति भी ओछी करम भी ओछा ओछा कसब हमारा।नीचे से प्रभु ऊँच कियो है कह रैदास चमारा॥
प्रानी क्या मेरा क्या तेरा। जैसे तरवर पंखि बसेरा।।जल की भीत पवन का थंभा रकत बूंद का गारा। हाड़ मास नाड़ी को पिंजरू पंखी बसे बिचारा।।राखहु कंध उसारहु नीवा साढ़े तीनि हाथ तेरी सीवाबंके बाल पाग सिर डेरी यह तन होयगो भसम की ढेरीऊचे मंदर सुंदर नारी। राम नाम बिन बाजी हारी मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनम हमारा। तुम सरनागत राजा रामचंद कहि रविदास चमारा

पांडे कैसी पूज रची रे

पांडे कैसी पूज रची रे। सत बोले सोई सतबादी झूठी बात बची रेजो अबिनासी सबका करता, ब्याप रहयो सब ठौर रेपंच तत जिन कीया पसारा, सो यों ही किधों और रेतू ज कहत है यो ही करता, या को मनिख करे रे तारन सकति सहीजे यामें तो आपन क्यूं न तरे रेअही भरोसे सब जग बूझा, सुन पंडित की बात रेयाके दरस कौन गुन छूटा, सब जग आया जात रे याकी सेव सूल नहीं भाजे कटे न संसे पास रे। सोच बिचार देखया मूरत यों छाडो रैदास रे

पावन जस माधो तोरा तुम्ह दारन अध मोचन मोराकीरत तेरी पाप बिनासे लोक बेद यूं गावे। जो हम पाप करत नहीं भूधर, तो तू कहा नसावेजब लग अंग पंक नहीं परसे तो जल कहा पखाले। मन मलन बिषया रस लंपट तो हरि नांउ संभालेजो हम बिमल हिरदे चित अंतर दोस कवन पर धर हो। कह रैदास प्रभु तुम्ह दयाल हो अबंध मुकत कब करि हो
पार गया चाहे सब कोई। रहि उर वार पार नहीं होईपार कहें उर वार सू पारा बिन पद परचे भरमहि गवारापार परम पद मंझि मुरारी, तामें आप रमे बनवारीपूरन ब्रह्म बसे सब ठाइंर कहे रैदास मिले सुख सांइर

बालक बुधि गंवार न चेत्या

नहीं बिश्राम लहूँ धरनीधर। जाके सुर नर संत सरन अभिअंतरजहाँ जहाँ गयो तहाँ जनम काछे तृबिधि ताप तृ भुवनपति पाछेभये अति छीन खेद माया बस, जस तिन ताप पर नगरि हते तसद्वारे न दसा बिकट बिष कारन, भूल परयो मन या बिषया बनकह रैदास सुमरो बड़ राजा काट दिये जन साहिब लाजा

नाम तेरो आरती भजनु मुरारे। हरि के नाम बिनु झूठे सगल पसारेनाम तेरो आसनो नाम तेरो उरसा नाम तेरा केसरो ले छिड़का रे नाम तेरा अंमुला नाम तेरो चंदनो, घसि जपे नाम ले तुझहि का उचारेनाम तेरा दीवा नाम तेरो बाती नाम तेरो तेल ले माहि पसारे। नाम तेरे की जोति लगाई भइआ उजियारो भवन सगला रेनाम तेरो तागा नाम फूल माला, भार अठारह सगल जूठा रे। तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नाम तेरा तुही चवर ढोला रेदसअठा अठसठे चारे खानी इहे वरतनि है सगल संसारे। कह रविदास नाम तेरो आरती सतिनाम है हरि भोग तुहारे

परचे राम रमे जे कोइ पारस परसे दुबिध न होइ
जो दीसे सो सकल बिनास अण दीठे नांही बिसवास
बरन रहित कहे जे राम सो भगता केवल निहकाम
फल कारन फले बनराइ उपजे फल तब पुहप बिलाइ
ग्यानह कारन क्रम कराई, उपजो ग्यान तब क्रम नसाइ
बटक बीज जैसा आकार पसरयो तीन लोक बिस्तार ..जहां का उपजा तहां समाइ सहज सुन्य में रहो लुकाइ
जो मन ब्यदे सोई ब्यंद, अमावस मैं ज्यू दीसे चंद ..जल मैं जैसे तूबां तिरे परचे प्यंड जीवे नहीं मरे
जो मन कौन ज मन कू खाइ बिन द्वारे त्रीलोक समाइ ..मन की महिमा सब कोइ कहे पंडित सो जे अनभे रहे
कहे रैदास यह परम बैराग राम नाम किन जपऊ सभाग..घृत कारन दधि मथे सयान जीवन मुकति सदा निरवान
पहले पहरे रैणि दे बनजारया, तें जनम लीया संसार वेसेवा चुका राम की बनजारया, तेरी बालक बुधि गंवार वे बालक बुधि गंवार न चेत्या भूला माया जाल वेकहा होइ पीछे पछताये जल पहली न बंधी पाल वे बीस बरस का भया अयाना थंभ न सकया भार वेजन रैदास कहे बनजारा, तें जनम लया संसार वे

कैसै भगति करों राम तोरी

न बीचारिओ राजा राम को रस जिह रस अनरस बीसरि जाहीदूलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकेराजे इन्द्र समसरि ग्रिह आसन बिन हरि भगति कहहु किह लेखेजान अजान भए हम बावर सोच असोच दिवस जाहीइन्द्री सबल निबल बिबेक बुधि परमारथ परवेस नहींकहीअत आन अचरीअत आन कछु समझ न परे अपर माइआ कहि रविदास उदास दास मति परहरि कोपु करहु जीअ दइआ

नरहरि चंचल मति मोरी कैसै भगति करों राम तोरी तू कोहि देखे हूँ तोहि देखे प्रीती परस्पर होई तू मोहि देखे हों तोहि न देखों इहि मति सब बुधि खोई सब घट अंतर रमस निरंतर, मैं देखत ही नहीं जाना गुन सब तोर मोर सब औगुन कृत उपगार न मानामैं ते तोरि मोरी असमझ सों, कैसे करि निसतारा कहे रैदास कृश्न करुणामय जै जै जगत अधारा

नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटसि ना दीनानाथ दयाल नरहरिजन मैं तोही ते बिगरा न अहो, कछू बूझत हू रसयान परिवार बिमुख मोहि लाग, कछू समझ परत नहीं जागइक भंमदेस कलिकाल, अहो मैं आइ परयो जम जाल कबहूक तोर भरोस, जो मैं न कहूँ तो मोर दोसअस कहियत तेऊ न जान, अहो प्रभू तुम्ह श्रबंगि सयानसुत सेवक सदा असोच, ठाकुर पितहि सब सोचरैदास बिनवे कर जोर अहो स्वामी तोहि नाहि न खोरिसु तो अपूरबला अक्रम मोर, बलि बलि जाऊं करो जिन और

दरसन दीजे राम दरसन दीजे दरसन दीजे

दरसन दीजे राम दरसन दीजे दरसन दीजे हो बिलंब न कीजेदरसन तोरा जीवन मोरा बिन दरसन का जीवे हो चकोरामाधौ सतगुर सब जग चेला इब के बिछुरे मिलन दुहेलातन धन जोबन झूठी आसा सत सत भाखे जन रैदासा

देवा हम न पाप करंता अहो अनंता पतित पावन तेरा बिड़द क्यू होतातोही मोही मोही तोही अंतर ऐसा कनक कुटक जल तरंग जैसातुम ही मैं कोई नर अंतरजामी ठाकुर ते जन जाणिये जन ते स्वामीतुम सबन मैं सब तुम्ह मांही रैदास दास असझसि कहे कहाँ ही

देहु कलाली एक पियाला ऐसा अवधू है मतिवालाए रे कलाली तें क्या कीया, सिरके सा तें प्याला दीयाथे कलाली प्याला देऊँ, पीवनहारे का सिर लेऊँचंद सूर दोऊ सनमुख होई, पीवे पियाला मरे न कोईसहज सुनि मैं भाठी सरवे पीवे रैदास गुर मुखि दरवे

बोल बोल अपनी भगति क्यों खोले

तू कांइ गरबहि बावली। जैसे भादउ खूब राजु तू तिस ते खरी उतावलीतुझहि सुझता कछू नाहि। पहिरावा देखे ऊभि जाहि गरबवती का नाही ठाउ। तेरी गरदनि ऊपरि लवे काउजैसे कुरंक नहीं पाइओ भेदु। तन सुगंध ढूढे परदेसु अप तन का जो करे बीचारू। तिस नहीं जम कंकरू करे खुआरूपुत्र कलत्र का करहि अहंकारू। ठाकुर लेखा मगनहारू फेड़े का दुखु सहे जीउ। पाछे किसह पुकारहि पीउ पीउसाधू की जउ लेहि ओट। तेरे मिटह पाप सभ कोटि कोटि कह रविदास जो जपे नाम। तिस जातु न जनम न जोनि काम

तू जानत मैं किछु नहीं भव खंडन राम सगल जीअ सरनागति प्रभ पूरन काम दारिदु देखि सभ को हसे ऐसी दसा हमारी असटदसा सिधि कर तले सभ क्रिया तुमारीजो तेरी सरनागता तिन नाही भारू। ऊंच नीच तुमते तरे आलजु संसारूकहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करी जे जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजे

तेरा जन काहे को बोले।..बोल बोल अपनी भगति क्यों खोले
बोल बोलता बढे बियाध बोल अबोले जाई
बोले बोल अबोल को पकरे बोल बोले कू खाई
बोले बोल मांनि परि बोले बोले बेद बड़ाई।
उर में धरि धरि जब ही बोले तब हीं मूल गंवाई..बोल बोल औरह समझावे तब लग समझ नहीं रे भाई
बोल बोल समझ जब बूझी तब काल सहित सब खाई..बोले गुर अरु बोले चेला बोल्या बोल की परमिति जाई
कहे रैदास थकित भयो जब तब ही परमनिधि पाई

तब राम राम कह गावेगा

जो मोहि वेदन का सजि आखूँ। हरि बिन जीव न रहे कैसे कर राखूँजीव तरसे इक दंग बसेरा, करहु संभाल न सुर जन मोरा। बिरह तपे तन अधिक जरावे नींदड़ी न आवे भोजन नहीं भावेसखी सहेली ग्रब गहेली, पीव की बात न सुनहु सहेली। मैं रे दुहागनि अधिक रंजानी, गया सजोबन साध न मानीतू दाना सांइर साहिब मेरा, खिजमतिगार बंदा मैं तेरा। कहै रैदास अंदेसा एही, बिन दरसन क्यूँ जीवे हो सनेही

तब राम राम कह गावेगा। ररंकार रहित सबहिन ते अंतर मेल मिलावेगालोहा सम कर कंचन सम कर भेद अभेद समावेगा। जो सुख के पारस के परसें, तो सुख का कहि गावेगागुर प्रसाद भई अनभै मति, विष अमृत सम धावेगा। कहै रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावेगा
ताते पतित नहीं को अपावन। हरि तजि आनहि ध्यावे रे। हम अपूजि पूजि भये हरि ते नाउं अनूपम गावे रेअष्टादस ब्याकरन बखाने तीन काल षट जीता रे प्रेम भगति अंतरगति नाहीं, ताते धानुक नीका रेताते भलो स्वान को सत्रु, हरि चरना चित लावे रे मूवा मुकति बैकुंठा बासा, जीवत इहाँ जस पावे रे हम अपराधी नीच घर जनमे, कुटंब लोग करें हासी रे। कहै रैदास नाम जपि रसनी काटे जम की पासी रे
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