गुरुवार, दिसंबर 23, 2010

अक्षर खण्ड रमैनी 6



सदा अस्ति भासे निज भास, सोई कहिये परम प्रकाश ।
परम प्रकाश ले झांईं होय, महद अकाश होय बरते सोय ।
बरते बर्त मान परचंड, भासक तुरीयातीत अखंड ।
काल संधि होये उश्वास, आगे पीछे अनवनि भास ।
विविध भावना कल्पित रूप, परकाशी सो साक्षि अनूप ।
शून्य अज्ञान सुषुप्ति होय, अकुलाहट ते नादै सोय ।
(शून्य ज्ञान सुषुप्ति होय, अकुलाहट ते नादी सोय)
नाद वेद अकर्षण जान, तेज नीर प्रगटे तेहि आन ।
पानी पवन गांठि परि जाय, देही देह धरे जग आय ।
सो कौआर शब्द परचंड, बहु व्यवहार खंड ब्रह्मंड ।

जतन भये निज अर्थ को, जेहि छूटे दुख भूरि ।
धूरि परी जब आँख में, सूझे किमि निज मूर । 23

पांजी परख जबै फ़रि आवै, तुरतहि सबै विकार नसावै ।
शब्द सुधार के रहे अकरम, स्वाति भक्ति के खोटे भरम ।
काल जाल जो लखि नहि आवै, तौलौ निज पद नहीं पावै ।
झाईं सन्धि काल पहिचान, सार शब्द बिन गुरु नहि जान ।
परखे रूप अवस्था जाए, आन विचार न ताहि समाए ।
झांईं सन्धि शब्द ले परखे जोय, संशय वाके रहि न कोय ।

धन्य धन्य तरण तरण, जिन परखा संसार ।
बन्दीछोर कबीर सों, परगट गुरु विचार । 24

शब्द सन्धि ले ज्ञानी मूढ़, देह करम जगत आरूढ़ ।
नाद संधि लै सपना होय, झांई शून्य सुषोपित सोय ।
ज्ञान प्रकाशक साक्षी संधि, तुरीयातीत अभास अवंधि ।
झांई ले वरते वर्तमान, सो जो तहाँ परे पहिचान ।
काल अस्थिति के भास नसाए, परख प्रकाश लक्ष बिलगाए ।
बिलगै लक्ष अपन पौ जान, आपु अपन पौ भेद न आन ।

आप अपुन पौ भेद बिनु, उलटि पलटि अरुझाय ।
गुरु बिन मिटे न दुगदुगी, अनवनि यतन नसाय । 25

निज प्रकाश झांई जो जान, महा संधि माकाश बखान ।
सोई पांजी ल बुद्धि विशेष, प्रकाशक तुरीयातीत अरु शेष ।
विविध भावना बुद्धि अनुरूप, विद्या माया सोई स्वरूप ।
सो संकल्प बसे जिव आप, फ़ुरी अविद्या बहु संताप ।
त्रीगुण पाँच तत्व विस्तार, तीन लोक तेहि के मंझार ।
अदबुद कला बरनि नहि जाई, उपजे खपे तेहि माहि समाई ।
निज झांई जो जानी जाए, सोच मोह सन्देह नसाए ।
अनजाने को ऐही रीत, नाना भांति करे परतीत ।
सकल जगत जाल अरुझान, बिरला और कियो अनुमान ।
कर्ता ब्रह्म भजे दुख जाये, कोई आपै आप कहाये ।
पूरण सम्भव दूसर नाहि, बंधन मोक्ष न एको आहि ।
फ़ल आश्रित स्वर्गहि के भोग, कर्म सुकर्म लहै संयोग ।
करम हीन वाना भगवान, सूत कुसूत लियो पहिचान ।
भांतिन भांतिन पहिरे चीर, युग युग नाचे दास कबीर । 26

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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