शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

इससे आप अज्ञात को नहीं जान सकेंगे

अब यह कुछ ऐसी वास्तविकता है । जिसे मैं निश्चित होकर कह सकता हूँ कि - मैंने उपलब्ध किया है । मेरे लिये यह कोई सैद्धांतिक संकल्पना नहीं है । यह मेरे जीवन का अनुभव है । सुनिश्चित । वास्तविक । और ठोस । इसलिए मैं इसकी उपलब्धि के लिए क्या आवश्यक है । यह कह सकता हूँ । और मैं कहता हूँ कि - पहली चीज यह है कि हम जो है । उसे वैसा का वैसा ही पहचाने । यानि अपनी पूर्णता में कोई इच्छा क्या हो जायेगी । और तब प्रत्येक क्षण के अवलोकन में स्वयं को अनुशासित करें । जैसे कोई अपनी इच्छाओं को खुद ही देखे । और उन्हें उस अवैयक्तिक प्रेम की ओर निर्दिष्ट करे । जो कि उसकी स्वयं की निष्पत्ति हो । जब अप निरंतर जागरूकता का अनुशासन स्थापित कर लेते हैं । उन सब चीजों का जो आप सोचते हैं । महसूस करते हैं । और करते है ( अमल में लाते हैं ) का निरंतर अवलोकन हम में से अधिकतर के जीवन में उपस्थित दमन । ऊब । भृम से मुक्त कर  । अवसरों की श्रंखला ले आता है । जो हमें संपूर्णता की ओर प्रशस्त करती है । तो जीवन का लक्ष्य कुछ ऐसा नहीं । जो कि बहुत दूर हो ? जो कि दूर कहीं भविष्य में उपलब्ध करना है । अपितु पल पल की । प्रत्येक क्षण की वास्तविकता । हर पल का यथार्थ जानने में है । जो अभी अपनी अनन्तता सहित हमारे सामने साक्षात ही है ।

उन पलों में जब आप जिन्दगी को हिस्सों में बांट देते हैं । और यह सोचते हैं कि इसका लक्ष्य अंततः कुछ  दूर भविष्य में पाना है । तो आप यथार्थ के मधुर आशय को खो देते हैं । क्योंकि जिन्दगी का असली मजा यहीं इन्हीं पलों को जीने । इन्हीं पलों में जो हम कर रहे हैं । उसमें है । जिन्दगी जवानी और बुढ़ापे के बंटवारे को नहीं जानती ।
कोई कैसे नकार सकता है ? क्या कोई ज्ञात को नकार सकता है । किसी महान नाटकीय घटना में नहीं बल्कि छोटे छोटे वाकयों में ? क्या मैं शेव करते समय स्विटजरलैंड में बिताये हसीन वक्त की यादों को नकार सकता हूँ ? क्या कोई खुशनुमा वक्त की यादों को नकार सकता है ? क्या कोई किसी बात के प्रति जागरूक हो सकता है । और नकार सकता है ? यह नाटकीय नहीं है । यह चमत्कार पूर्ण या असाधारण नहीं है । लेकिन कोई भी इस बारे में नहीं जानता ।
फिर भी अनवरत इन छोटी छोटी चीजों को नकारना । छोटी छोटी सफाईयों से । छोटे छोटे दागों को घिसने । और पोंछने से क्या एक बहुत ही बड़ी सफाई नहीं हो जायेगी । यह बहुत ही आवश्यक है । अपरिहार्य है । यह बहुत ही जरूरी है कि - विचार को याद के रूप में नकारा जाये । वो चाहे खुशनुमा हो । या दर्दनाक । दिन भर प्रत्येक मिनट जब भी विचार याद की तरह आये । उसे नकारना । किसी भी व्यक्ति को ऐसा किसी उद्देश्य से नहीं करना है । ना ही अज्ञात की किसी असाधारण अपूर्व अवस्था में उतरने के अनुसरण स्वरूप । आप ऋषि वैली में रहते हैं । और मुम्बई और रोम के बारे में सोचते हैं । यह एक संघर्ष एवं वैमनस्य पदा करता है । और संघर्ष मस्तिष्क को कुंद 


बनाता है । खंडि‍त चीज बनाता है । क्या आप इस चीज को देखते हैं । और इसे पोंछकर हटा सकते हैं ? क्या आप यह सफाई जारी रखते हैं । क्योंकि आप अज्ञात में प्रवेश करना चाहते हैं ? इससे आप अज्ञात को नहीं जान सकेंगे । क्योंकि जिस क्षण आप इसे अज्ञात के रूप में पहचानते हैं । वह वापस ज्ञात की परिधि में आ जाता है । पहचानने या मान्यता देने की प्रक्रिया । ज्ञात में निरन्तर रहने कि प्रक्रिया है । जबकि हम नहीं जानते कि - अज्ञात क्या है ? हम यही एक चीज कर सकते हैं । हम विचारों कों पोंछते जायें । जैसे ही यह उगें । आप फूल देखें । उसे महसूस करें । सौन्दर्य देखें । उसका प्रभाव उसकी असाधारण दीप्ति देखें । फिर आप अपने उस कमरें में चले आये । जिसमें आप रहते हैं । जो कि उचित अनुपात में नहीं बना है । जो कि कुरूप है । आप कमरे में रहते हैं । लेकिन आपके पास कुछ सौन्दर्य बोध होता है । और आप फूल के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं । और विचार की पकड़ में आ जाते हैं । तो जैसे ही विचार उगे । आपको दिखे । उसे पोंछ दें । हटा दें । तो अब जिस गहराई से यह पोंछना । या सफाई कर्म । या हटाना करते हैं । आप जिस गहराई से फूल । अपनी पत्नी । अपने देवता । अपने आर्थिक जीवन को नकारते हैं । यह देखना है ? आपको अपनी पत्नी । बच्चों और कुरूप दानवीय समाज के साथ जीना ही है । आप जीवन से पलायन नहीं कर सकते । लेकिन जब अब पूर्णतः नकारना शुरू करते हैं । तो विचार । शोक । खुशी से आपके रिश्ते भी अलग होंगे । तो यहां पर अपरिहार्य अत्यावश्यक रूप से पूर्ण रूपेण नकारना होना चाहिये । आंशिक रूप से नकारना नहीं चलेगा । उन चीजों को बचाना भी नहीं चलेगा । जिन्हें आप चाहते हैं । ओर केवल उन चीजों को नकारने से भी नहीं चलेगा । जो आप नहीं चाहते ।
सच्चे शाब्दिक मायनों में सीखना । केवल जागरूकता अवधान पूर्ण अवस्था में ही संभव है । जिसमें आंतरिक या बाहृय विवशता न हो । उपयुक्त चिंतन मनन केवल तब हो सकता है । जब मन परंपरा और स्मृति की दासता में न हो । अवधान पूर्ण होना ही मन में शांति को आंमत्रित करता है । जो कि सृजन का द्वार है । यही वजह है कि

अवधान या जागरूकता सर्वोच्च रूप से महत्वपूर्ण हैं । मन की उर्वरता के लिए क्रियात्मक स्तर पर ज्ञान की आवश्यकता होती है । न कि ज्ञान पर ही रूक जाने की । हमारा सरोकार छात्र के मानव के रूप में सम्पूर्ण विकास पर होना चाहिए । ना कि गणित । या वैज्ञानिक । या संगीत । जैसे किसी एक क्षेत्र में उसकी क्षमता बढ़ाने से । हमारा सरोकार छात्र के सम्पूर्ण मानवीय विकास से होना चाहिए । अवधान की अवस्था किस प्रकार उपलब्ध की जा सकती है ? यह अनुनय । विनय । मनाने । तुलना करने । पुरस्कार । अथवा दंड जैसे दबाव के तरीकों से नहीं उपजायी जा सकती । भय का निर्मूलन अवधान पूर्ण होने की शुरूआत है । जब तक कुछ होने । कुछ हो जाने की जिद । या अपेक्षा । जो कि सफलता का पीछा करने जैसा है । जब तक हैं । अपनी सम्पूर्ण निराशा । अवसाद । और कुटिल विसंगतियों के साथ । भय बना रहता है । आप ध्यान केन्द्रित करना सिखा सकते हैं लेकिन अवधान पूर्ण होना नहीं सिखा सकते । वैसे ही जैसे कि भय से स्वाधीन रहना नहीं सिखा सकते । लेकिन हम शुरूआत कर सकते हैं । भय को पैदा करने वाले कारणों को खोज कर । उन कारणों को समझना । भय के निर्मूलन में सहायक हो सकता है । तो जब छात्र के आस पास अच्छाई का वातावरण बनता है । जब वह अपने आपको सुरक्षित और सहज महसूस करता है । तो जागरूकता या अवधान तुरन्त ही उदित हो जाता है । जागरूकता या अवधान सप्रेम निष्काम कर्म की तरह उसमें चले आते हैं । प्रेम तुलना नहीं है । इसलिए कुछ होने की ईर्ष्या और दमन भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं । जे. कृष्णमूर्ति

उस तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं ?

ध्यान निस्तब्ध और सुनसान मार्ग पर इस तरह उतरता है । जैसे पहाड़ियों पर सौम्य वर्षा । यह इसी तरह सहज और प्राकृतिक रूप से आता है - जैसे रात । वहाँ किसी तरह का प्रयास या केन्द्रीकरण या विक्षेप विकर्षण पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होता । वहां पर कोई भी आज्ञा या नकल नहीं होती । ना किसी तरह का नकार होता है । ना स्वीकार । ना ही ध्यान में स्मृति की निरंतरता होती है । मस्तिष्क अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहता है । पर बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत रहता है । बिना किसी दखलंदाजी के । वह जागता तो है । पर प्रतिक्रिया हीन होता है ।
वहाँ नितांत शांति स्तब्धता होती है । पर शब्द विचारों के साथ धुँधले पड़ जाते हैं । वहां अनूठी और निराली ऊर्जा होती है । उसे कोई भी नाम दें । वह जो भी हो । उसका महत्व नहीं है । वह गहनता पूर्वक सक्रिय होती है । बिना किसी लक्ष्य और उद्देश्य के । वह सृजित होता है । बिना कैनवास और संगमरमर के । बिना कुछ तराशे । या तोड़े । वह मानव मस्तिष्क की चीज नहीं होती । ना अभिव्यक्ति की कि - अभिव्यक्त हो । और उसका क्षरण हो जाये । उस तक नहीं पहुंचा जा सकता । उसका वर्गीकरण या विश्लेषण नहीं किया जा सकता । विचार और भाव या अहसास उसको जानने समझने के साधन नहीं हो सकते । वह किसी भी चीज से पूर्णतया 


असम्बद्ध है । और अपने ही असीम विस्तार और अनन्तता में अकेली ही रहती है । उस अंधेरे मार्ग पर चलना । वहां पर असंभवता का आनंद होता है । ना कि उपलब्धि का । वहां पहुंच । सफलता और ऐसी ही अन्यान्य बचकानी मांगों और प्रतिक्रियाओं का अभाव होता है । होता है तो बस असंभव असंभवता असंभाव्य का अकेलापन । जो भी संभव है । वह यांत्रिक है । और असंभव की परिकल्पना की जा सके । तो कोशिश करने पर उसे उपलब्ध किये जा सकने के कारण वह भी यांत्रिक हो जायेगा । उस आनन्द का कोई कारण या कारक नहीं होता । वह बस सहजतः होती है । किसी अनुभव की तरह नहीं । बस अपितु किसी तथ्य की तरह । किसी के स्वीकारने या नकारने के लिए नहीं । उस पर वार्तालाप या वाद विवाद या चीर फाड़ विश्लेषण किये जायें । इसके लिए भी नहीं । वह कोई चीज नहीं कि - उसे खोजा जाये । उस तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं ? सब कुछ उस एक के लिए मरता है । वहां मृत्यु और संहार प्रेम है । क्या आपने भी कभी देखा है । कहीं बाहर । गंदे मैले कुचैले कपड़े पहने एक मजदूर किसान को जो सांझ ढले अपनी मरियल हड्डियों का ढांचा रह गई गाय के साथ घर लौटता है ।
मन और मस्तिष्क की गुणवत्ता ध्यान में महत्वपूर्ण है । यह महत्वपूर्ण नहीं है कि - आपने क्या उपलब्ध किया ? या उपलब्धि के बारे में आप क्या कह रहे हैं । बल्कि मन का वह गुण है । जो निर्दोष और अति संवेदनशील है । नकार के द्वारा सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है । हम समूह में रहें । या अपने में । अनुभव के द्वारा । ध्यान की शुद्धता को नकारते हैं । किसी अन्त पर पहुंचना । ध्यान का ध्येय नहीं है । यह ध्येय भी है । और साथ ही उसकी समाप्ति भी । अनुभव के द्वारा मन को कदापि निर्दोष या शुद्ध नहीं बनाया जा सकता । अनुभव को नकारने पर ही निर्दोषता की सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है । जो कि विचार द्वारा नहीं गढ़ी जा सकती । विचार

कभी भी निर्दोष नहीं होता । ध्यान विचार की समाप्ति है । पर ध्यान करने वाले के द्वारा नहीं । ध्यान करने वाले के लिए ध्यान है । यदि ध्यान नहीं है । तो प्रकाश और रंगों के अति सुन्दर विश्व में जैसे आप एक अंधे आदमी की तरह हैं । आप कभी सागर किनारे भटकें । तो ध्यान के ये गुण आपके पास आते हैं । यदि कभी ऐसा होता है । तो उनका पीछा ना करें । यदि आप उनका अनुसरण करते हैं । तो यह आपकी स्मृति का सक्रिय होना है । जो अतीत होता है । और जो है । उसकी मृत्यु अतीत है । या जब आप जंगलों पहाड़ों में विचरण कर रहे हों । तो अपने आस पास के सम्पूर्ण वातावरण को । सब कुछ को । जीवन के सौन्दर्य । और पीड़ाओं को । आपसे कहने दें । ताकि आप भी अपने दुख के प्रति जागरूक हो सकें । और ये दुख खत्म हो सकें ।
ध्यान जड़ है । ध्यान पौधा है । ध्यान फूल है । और ध्यान फल है । यह शब्द ही हैं । जो फल । फूल । पौधे । और जड़ को अलग अलग कर देते । या बांट देते हैं । इस बंटवारे में कोई भी कर्म भलेपन तक नहीं पहुंचता । और सद्गुण या भलाई सम्पूर्ण दृष्टि से ही जन्मते हैं ।
क्या आप कोई ऐसी क्रांति चाहते हैं ? जो आपकी सारी संकल्पनाओं । विश्वासों । मूल्यों । आपकी नैतिकता । आपकी सम्मानीयता । आपके ज्ञान को तहस नहस कर दे । इस प्रकार तहस नहस कर दे कि आप अत्यंतिक सम्पूर्ण रूप से ना कुछ हो जायें । यहां तक कि आपका कोई चरित्र ही न बचे । वो व्यक्ति ही न बचे । जो खोजी है । जो आदमी फैसले करता है । जो क्रोधी और अक्रोधी है । आप पूर्णतः कुछ भी होने से खाली हो जायें । जो भी आप हैं ?

यह खालीपन अपने चरम तप सहित परम सौन्दर्य होता है । जिसमें कठोरता या आक्रामकता का दावा करती कोई चिंगारी नहीं होती । यही उस भेद का अर्थ है । जो बाद में वहाँ होता है । वहाँ आश्चर्यजनक समझ बोध होता ही है । ना कि सूचना । और सीखना । यही विवेक या समझ बोध सर्वदा रहता है । आप चाहे सो रहे हों । या जाग रहे हों । इसलिए हम कहते हैं कि - वहाँ केवल अन्दर और बाहर का अवलोकन होना चाहिए । जो कि बुद्धि मस्तिष्क को तीक्ष्ण करता है । मस्तिष्क की यह तीक्ष्णता उसे शांत बनाती है । मस्तिष्क की इस संवेदन शीलता और समझ बोध परकता ही विचार को संचालित करती है । जब उसकी आवश्यकता हो । अन्य समय मस्तिष्क सोया नहीं रहता । पर दृष्टा हो शांत हो रहता है । इसलिए मस्तिष्क या दिमाग अपनी प्रतिक्रियाओं से संघर्ष नहीं पैदा करता । यह बिना किसी जूझने के । इसलिए बिना किसी विक्षिप्तता या विक्षेप के काम करता है । तब करना । और होना । या किया जाना । और अमल में होना । तुरत एक साथ होता है । वैसे ही जैसे कभी आप खतरे में पड़ें । और जो बन पड़े । तुरन्त सम्पन्न कर दें । इसलिए वहां पर हमेशा संकल्पनात्मक चीजों से मुक्ति रहती है । यह संकल्पनात्मक चीजें ही हैं । जो अवलोकन कर्ता । मैं । अहं हो जाती हैं । जो बांटती हैं । प्रतिरोध करती हैं । और अवरोध बनाती हैं । जब मैं नहीं होता । तो सफलता । फल या परिणाम का कोई भेद नहीं रहता । तब सम्पूर्ण जीवन । सौन्दर्य को जीना होता है । तब सम्बंधों में भी सौन्दर्य होता है । बिना किसी एक छवि को दूसरी छवि से प्रति स्थापित किये । तभी अनन्त महानता का अवतरण संभव होता है ।
कुछ भी जानने समझने के लिए । आपको उसके साथ जीना होगा । उसका अवलोकन करना ही होगा । आपको उसके सभी पहलू । उसकी सारी अंर्तवस्तु । उसकी प्रकृति । उसकी संरचना । उसकी गतिविधियां जाननी होंगी । क्या आपने कभी अपने ही साथ जीने की कोशिश की है ? यदि की है । तो आपने यह देखना भी शुरू किया होगा कि - आप एक स्थिर अवस्था में ही नहीं रहते । मानव जीवन एक ताजा और जिन्दा चीज है । और जिन्दा चीज के साथ रहने के लिए आपका मन भी उसी तरह ही ताजा और जिन्दा होना चाहिये । मन कभी भी जिन्दा नहीं रह सकता । जब तक कि विचारों । फैसलों और मूल्यों में जकड़ा हुआ हो । अपने मन । दिल दिमाग की गतिविधियों । अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के अवलोकन की दिशा में अनिवार्य रूप से । आपके पास एक मुक्त मन होना चाहिये । वो मन नहीं । जो सहमत या असहमत होता हो । कोई पक्ष ले लेता हो । और उन पर टीका टिप्पणियां या वाद विवाद करता हो । मात्र शब्दों के विवाद में ही उलझा रहता हो । बल्कि एक ऐसा मन हो । जिसका ध्येय समझ बूझ का अनुसरण करना हो । क्योंकि हम में से अधिकतर लोग यह जानते ही नहीं कि - हम अपने ही अस्तित्व की ओर कैसे देखें ? कैसे उसे सुनें ? तो हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि - हम किसी बहती नदी के सौन्दर्य को देख पायेंगे । या पेड़ों के बीच से गुजरती हवा को सुन पायेंगे ।
जब हम आलोचना करते हैं । या किसी चीज के बारे में किसी तरह के फैसले करने लगते हैं । तो हम उसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते ?? ना ही उस समय जब हमारा दिल दिमाग बिना रूके बक बक में ही लगा रहता है । तब हम जो है । उसका वास्तविक अवलोकन नहीं कर पाते । हम अपने बारे में अपने पूर्वाभास । पूर्वानुमान ही देख पाते हैं । जो अपने बारे में स्वयं हमने ही बनाये हैं । हममें से प्रत्येक ने अपने बारे में एक छवि बना रखी है कि - हम क्या सोचते हैं ? या हमें क्या होना है ? और यह छवि या चित्र ही हमें । हम जो यथार्थ में हैं । हमारी वास्तविकता के दर्शनों से परे रखता है । बचाता है । किसी चीज को सहज रूप से जैसी वो है । वैसी ही देखना । यह संसार में सर्वाधिक कठिन चीजों में से एक है । क्योंकि हमारे दिल दिमाग बहुत ही जटिल हैं । हमने सहजता का गुण खो दिया है । यहां मेरा आशय कपड़ों और भोजन । केवल एक लंगोट पहनकर काम चलाने । या उपवास वृतों का रिकार्ड तोड़ने वाले । अपरिपक्व कार्यों और मूर्खताओं से नहीं है । जिन्हें तथाकथित संतो ने सम्पन्न किया है । मेरा आशय है । उस सहजता से । जो किसी चीज को सीधे सीधे वैसा ही देख पाती है । बिना किसी भय के । वो सरलता । जो हमारी ओर उस तरह देख सके । जैसे कि वास्तव में हम हैं । बिना किसी विक्षेप के । जब हम झूठे बोलें । तो झूठ कहें । उसे ढंके छुपाये नहीं । ना ही उससे दूर भाग जाये । अपने को समझने के अनुक्रम में हमें अत्यंत विनमृता की आवश्यकता भी है । जब आप यह कहते हुए शुरूआत करते हैं कि - मैं खुद को जानता हूँ ? आप अपने बारे में सीखने समझने को तुरन्त ही बन्द कर चुके होते हैं । या यदि आप कहते हैं कि - मेरे अपने बारे में जानने समझने लायक कुछ नहीं है । क्योंकि मैं केवल स्मृतियों । संकल्पनाओं । अनुभवों और परम्पराओं का एक गट्ठर मात्र हूँ । तो भी आप अपने को सीखने समझने की प्रक्रिया को ठप कर चुके होते हैं ।
उस क्षण जब आप कुछ उपलब्ध करते हैं । तो आप अपनी सहजता । सरलता । और विनमृता के गुणों पर विराम लगा देते हैं । उस क्षण जब आप किसी निर्णय पर पहुंचते हैं । या ज्ञान से जॉंच परख की शुरूआत करते हैं । तो आप खत्म हो चुके होते हैं । उसके बाद आप हर जिन्दा चीज का पुरानी चीजों के सन्दर्भ अनुवाद करना शुरू कर देते हैं ।
जबकि यदि आप पैरों पर खड़े न हों । आपकी जमीन पर पकड़ ना हो । यदि कोई निश्चितता ना हो । कोई उपलब्धि ना हो । तो देखने और उपलब्ध करने की आजादी होती है । और जब आप आजाद होकर देखना शुरू करते हैं । तो जो भी होता है । हमेशा नया होता है । आश्वस्त या आत्मविश्वास से भरा हुआ आदमी, एक मृत मनुष्य होता है । जे. कृष्णमूर्ति

हमारी दुनिया एक सड़ी गली दुनियाँ है

हम सोचते हैं कि - परिभाषा को समझ लेने पर हम उस शब्द को समझ जायेंगे । जिसे परिभाषित किया गया है । लेकिन परिभाषा समझ नहीं होती । बल्कि इसके विपरीत । यह तो सोचने का सर्वाधिक विनाशक तरीका है । हम सुन्दर विश्व की परिभाषा इसलिए जानना चाहते हैं । ताकि हमें इस बारे में चिंतन मनन ना करना पड़े । दिमाग का इस्तेमाल ना करना पड़े । सब पका पकाया कोई हमें समझा दे । आप इस संबंध में किताबें उलट पलट कर या दार्शनिकों विचारकों के पास जाकर सुंदर विश्व का अर्थ जान लेना चाहते हैं । इससे आपको शब्दों के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा । हकीकत यह है कि उस प्रत्येक व्यक्ति को जिसे कि सुंदर विश्व की परिभाषा यथार्थ में जाननी समझनी है । उसे गहराई से इसका चिंतन मनन करना होगा । और उस शब्द के पीछे का सत्य भी जानना होगा ।
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आशा । विश्वास । भाव । और मानसिक स्थिति के अनुसार । सुन्दर विश्व का अलग अलग अर्थ हो सकता है । हो सकता है कि - दो अलग अलग व्यक्तियों की सुन्दर विश्व के बारे में अपनी अपनी परिभाषायें हों । जो सर्वथा विपरीत हों ।
अब जरा तथ्य देखिये । हमारी दुनिया एक सड़ी गली दुनियाँ है । यहाँ युद्ध हैं । धार्मिक । जातिवादी । आर्थिक । मानसिक सब तरह के विभाजन हैं । यह एक भृष्ट और विकृत संसार है ।
शब्दों में बह जाना ठीक नहीं । हमें बचपन से ही हमेशा यह सिखाया जाता है कि - क्या सोचें । यह हमें कभी नहीं सिखाया जाता कि - कैसे सोचें ?
सिमेटिक्स नामक विज्ञान में शब्दों के तात्पर्य का अध्ययन किया जाता है । जो भी शब्द आज वर्तमान में 


प्रचलित हैं । या नये शब्द अस्तित्व में आ रहे हैं । उनके विकास के मूल में एक संपूर्ण विज्ञान है । चूंकि शब्द हमें मानसिक और साथ ही भौतिक रूप से भी प्रभावित करते हैं । अतः यह महत्वपूर्ण है कि - हम उन्हें समझें । पर उनसे अप्रभावित रहें । जिस क्षण साम्यवाद शब्द का इस्तेमाल किया जाता है । यदि कोई पूंजीवादी सरोकार वाला व्यक्ति उसे सुन ले । तो उसे कंपकंपी छूटने लगती है । किसी गुरू के अनुयायी को आप यह समझायें कि - दूसरे के अनुयायी मत बनो । अनुयायी बनना नासमझी है । तो वह तुरन्त तनकर खड़ा हो जायेगा । और आपको भागने पर मजबूर कर देगा । शब्दों से होने वाला यह निरंतर भय समझ के अभाव के कारण होता है ।
आखिर शिक्षा का यही तो अर्थ है - शब्दों के माध्यम से दिये जाने वाले संप्रेषण को समझना । ना कि शब्दों में उलझ कर रह जाना ।
सुंदर विश्व जैसी कोई चीज नहीं होती । चीजें जैसी हैं । हमें उन्हें वैसा ही स्वीकारें । ना कि किसी आदर्श की तरह । विश्व कैसा होना चाहिए ? इस बारे में कोई आदर्श ना रखें । सभी आदर्श । आदर्श विद्यालय । आदर्श देश । आदर्श नायक । या अहिंसा आदि के सारे आदर्श बेतुके और हास्यास्पद होते हैं । भ्रामक होते हैं । तथ्यतः वास्तविक वही है । जो है । यदि सही मायने में हम विभिन्न चीजों को - गरीबी । भुखमरी । अलगाव । कटुता । आकांक्षा । लोभ । भृष्टाचार । भय आदि को जैसे वे हैं । वैसा का वैसा ही उन्हें यथा रूप समझ लें । तो हम सब इनसे निपट सकते हैं । इन्हें मिटा सकते हैं । किंतु यदि हम आदर्श बनाते हैं । हम कहते हैं कि - मुझे यह अथवा वह होना चाहिए । तो हम भ्रांतियों में भटकने लगते हैं । हमारे देश में सदियों से निरंतर जिन आदर्शों की घुट्टी पिलाई जाती रही है । वे सभी भृम हैं । अतः क्या यह उचित नहीं होगा कि -  अहिंसा की बातें करने की बजाय । हिंसा को समझा जाए ? यदि आप - जो हैं की समझ रखते हैं । तो ही किसी वास्तविक क्रांति की संभावना बनती है ।
मुझे नहीं मालूम । अगर आपने कभी इस बात पर गौर किया है । या नहीं कि किसी समस्या को जितना ज्यादा आप समझने की कोशिश करते हैं । जूझते हैं । बूझते हैं । समस्या को समझने में आपको उतनी ही मुश्किल आयेगी । लेकिन जिस पल आप संघर्ष करना बंद करते हैं । और उस समस्या को अपनी सारी कहानी सुनाने का मौका देते हैं । अपनी सारी हकीकत बयान करने देते हैं । तब बात समझ में आ जाती है । इससे हम यह स्पष्ट ही जान सकते हैं कि - किसी बात को समझने के लिए आपके मन का चुप होना बहुत जरूरी है । मन का बिना हाँ ना 


किये । निष्क्रिय रूप से जागरूक । सजग रहना जरूरी है । इस स्थिति में ही हममे जीवन की कई समस्याओं की समझ आती है । जे. कृष्णमूर्ति
- जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 11 मई 1895 को आन्ध्र प्रदेश के एक छोटे से कस्बे मदनापल्ली में एक धर्म परायण परिवार में हुआ था । उनका पूरा नाम जिड्डू या जिद्दू कृष्णमूर्ति है ।
विभिन्न धर्म ग्रंथो में वर्णित इस मान्यता के अनुसार कि मानवता के उद्धार के लिए समय समय पर परम चेतना मनुष्य रूप में अवतरित होती है । थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य पहले ही किसी विश्व गुरू के आगमन की भविष्यवाणी कर चुके थे । श्रीमती बेसेंट और थियोसोफ़िकल सोसायटी के प्रमुखों को जे.कृष्णमूर्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखे । जो कि एक विश्व गुरू में होते हैं । तो श्रीमती बेसेंट द्वारा किशोर वय में ही जे.कृष्णमूर्ति को गोद लेकर उनकी परवरिश पूर्णतया धर्म और आध्यात्म से ओत प्रोत परिवेश में की गई । उनकी संपूर्ण शिक्षा इंगलैण्ड में हुई ।
जे कृष्णमूर्ति ने किसी जाति राष्ट्रीयता अथवा धर्म में अपनी निष्ठा व्यक्त नहीं की । ना ही वे किसी परंपरा से आबद्ध रहे ।
सन 1922 में कृष्णमूर्ति किन्हीं गहरी आध्यात्मिक अनुभूतियों से होकर गुजरे । और उन्हें उस करूणा का स्पर्श हुआ । जिसके बारे में उन्होंने स्वयं कहा - वो करूणा सारे दुख कष्टों को हर लेती है ।
उन्होंने सत्य के मित्र और प्रेमी की भूमिका निभायी । लेकिन स्वयं को कभी भी गुरू के रूप में नहीं रखा ? उन्होंने जो भी कहा । वह उनकी अंतर दृष्टि का संप्रेषण था । उन्होंने दर्शन शास्त्र की किसी नई पद्धति या प्रणाली की व्याख्या नहीं की । बल्कि मनुष्य की रोज़मर्रा की जिन्दगी से ही भृष्ट और हिंसा पूर्ण समाज की चुनौतियों । मनुष्य की सुरक्षा । और सुख की खोज । भय । दुख । क्रोध जैसे विषयों पर कहा । बारीकी से मानव मन की गुत्थियों को सुलझा कर लोगों के सामने रखा । दैनिक जीवन में ध्यान के यथार्थ स्वरूप । धार्मिकता की महत्ता के बारे में बताया । उन्होंने विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में उस आमूल चूल परिवर्तन की बात कही । जिससे मानवता की वास्तविक प्रगति की ओर उन्मुख हुआ जा सके ।
उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि - मनुष्य की वैयक्तिक और सामाजिक चेतना दो भिन्न चीजें नहीं हैं ।

पिण्ड में ही बृह्माण्ड है । इसको समझाया । उन्होंने बताया कि - वास्तव में हमारी भीतर ही पूरी मानव जाति पूरा विश्व प्रतिबिम्बित है । प्रकृति और परिवेश से मनुष्य के गहरे रिश्ते और प्रकृति और परिवेश से अखण्डता की बात की । उनकी दृष्टि मानव निर्मित सारे बंटवारों । दीवारों । विश्वासों । दृष्टिकोणों से परे जाकर सनातन विचार के तल पर क्षण मात्र में जीने का बोध देती है ।
बुद्धत्व उपरांत 65 वर्षों तक वे अनथक सारी दुनियां में भृमण करते हुए । निज अंतर दृष्टि से उदभूत सार्वजनिक वार्ताओं । साक्षात्कार । निजी विवेचनाओं । संवाद । लेखन । और व्याख्यानों के माध्यम से सत्य के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराते रहे । उन्होंने बताया कि - किसी भी गुरू । संगठित धर्म । राजनीतिक । सामाजिक । आर्थिक उपाय से मनुष्य में भलाई । प्रेम और करूणा नहीं पैदा की जा सकती ।
उन्होंने कहा कि - मनुष्य को स्व बोध के जरिये । अपने आपसे परिचय करते हुए स्वयं को भय । पूर्व संस्कारों । सत्ता प्रामाण्य । और रूढ़ि बद्धता से मुक्त करना होगा । यही मनुष्य में व्यवस्था और आमूल चूल मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों का आधार हो सकता है ।
हर तरह की आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक दावेदारी को नकारना । और उन्हें भी कोई गुरू या अथॉरिटी ना बना डाले । इससे आगाह करना । उनके चेतावनी वाक्य थे ।
अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा - यहाँ किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है । यहाँ अनुयायी नहीं है । पंथ संप्रदाय नहीं है । व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए ? किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है ? और इसलिए हम एक ही तल पर । एक ही आधार पर । और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं । क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर मानव जीवन के अदभुत घटना कृम का अवलोकन कर सकते हैं ।
जे कृष्णमूर्ति ने स्वयं तथा उनकी शिक्षाओं को महिमा मंडित होने से बचाने और उनकी शिक्षाओं की व्याख्या की जाकर विकृत होने से बचाने के लिए लिए अमरीका । भारत । इंगलैण्ड । कनाडा । और स्पेन में फाउण्डेशन स्थापित किये ?
भारत इंगलैण्ड और अमरीका में विद्यालय भी स्थापित किये । जिनके बारे में उनका दृष्टि बोध था कि - शिक्षा में केवल शास्त्रीय बौद्धिक कौशल ही नहीं । वरन मन मस्तिष्क को समझने पर भी जोर दिया जाना चाहिये । जीवन यापन और तकनीकी कुशलता के अतिरिक्त जीने की कला कुशलता भी सिखाई जानी चाहिए ।
17 Fev 1986 को जे कृष्‍णमूर्ति‍  का देहावसान हुआ । जे कृष्णमूर्ति के मौलिक दर्शन ने पारंपरिक । गैर परंपरावादी विचारकों । दार्शनिकों । शीर्ष शासन संस्था प्रमुखों । भौतिक और मनोवैज्ञानियों और सभी धर्म । सत्य और यथार्थ परक जीवन में प्रवृत्त सुधिजनों को आकर्षित किया । और उनकी स्पष्ट दृष्टि से सभी आलोकित हुए हैं ।
उनके साहित्य में सार्वजनिक वार्तायें । प्रश्न उत्तर । परिचर्चाएं । साक्षात्कार । परस्पर संवाद । डायरी और उनका खुद का लेखन शामिल है । जो कि अब तक 75 से अधिक पुस्तकों और 700 से अधिक ऑडियो और 1200 से अधिक वीडियो कैसेटस सीडी के रूप में उपलब्ध है । उनका मूल साहित्य अंग्रेजी भाषा में है । जिसका कई मुख्य प्रचलित भाषाओं में अनुवाद किया गया है । वार्तायें । प्रश्न उत्तर । परिचर्चायें । साक्षात्कार । परस्पर संवाद । प्रवचनों के ऑडियो और वीडियो टेप भी उपलब्ध हैं ।

ईश्वरों का और मन्दिरों का निर्माण कैसे करें ?

काम करने के दिन । यहाँ पर इतने लोगों को देखना । कुछ अदभुत सा लगता है । नहीं ? पहली बार जब आप यहाँ मिले थे । शनिवार था । हमने चर्चा की थी कि - प्रेम क्या है । यदि आप यहाँ थे । तो शायद आपको याद होगा । हम सब लोग मिलकर । मेरा अभिप्राय है साथ साथ । इस पूरे मसले के संबंध में खोज बीन कर रहे हैं । यह अत्यंत जटिल है । यदि आप बुरा न मानें । तो आपको विचार करना है । केवल सहमत नहीं हो जाना है । इसे विचारने में आपको अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल पूरी ताकत से करना होगा । तो हम लोग एक साथ इस प्रश्न की छानबीन करने जा रहे हैं कि - प्रेम क्या है ? साथ साथ आप और हम एक ही मार्ग पर साथ चल रहे हैं । आप वक्ता का केवल अनुमोदन नहीं कर रहे हैं । और यह नहीं कह रहे हैं - हाँ ! सुनने में अच्छा लग रहा है । उपनिषद का । गीता का भी यही कहना है इत्यादि । यह सब बकवास है ।
सर्वप्रथम अपने अनुभवों । निष्कर्षों । विचारों के सम्बंध में । किसी बात को स्वीकार न करें । मेरी भी नहीं । मैं तो एक पथिक हँ । मेरा महत्व नहीं है । हम । आप । और मैं । मिलकर पता लगाने जा रहे हैं कि - क्या स्पष्ट है । क्या स्पष्ट नहीं है । हम लोग मिलकर जाँच कर रहे हैं । सन्देह कर रहे हैं । वक्ता का क्या कहना है  । उसे हम कतई भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं । यह मार्गदर्शन । निर्देश । या सहायता के लिए कोई भाषण नहीं है । यह तो अत्यधिक नादानी की बात होगी । उस तरह की सहायता तो हमें पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती रही है । और इसके बावजूद हम जहाँ थे । वहीं हैं । हम जैसे अभी हैं । वहीं से आरंभ करना है । अतीत में हम कहां थे ? अथवा भविष्य में हम क्या होंगे ? उससे नहीं । अभी हम जैसे हैं । भविष्य में भी वैसे ही होंगे । हमारा लोभ । हमारा द्वेष । हमारी ईर्ष्या । हमारा प्रबल अंधविश्वास । किसी को पूजने की हमारी कामना ।  अभी तो हम यही हैं ।
इस प्रकार हम मिलकर एक बहुत लंबे पथ पर चल रहे हैं । इसके लिए ऊर्जा चाहिये । और हम इस मसले पर गौर करने जा रहे हैं कि - प्रेम क्या है ? बहुत गहरी और सूक्ष्म छानबीन हम इस बारे में भी करें कि - ऊर्जा क्या है ? आपकी प्रत्येक चेष्टा ऊर्जा पर आधारित है । अभी जब आप वक्ता को सुन रहे हैं । आप अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं । घर के निर्माण में । वृक्ष लगाने में । कोई भी मुद्रा बनाने में । बात करने में । इन सबको लिए ऊर्जा की आवश्यकता है 


। कौवे की काँव काँव । सूर्योदय । और सूर्यास्त । यह सब कुछ ऊर्जा है । जन्म लेते ही बच्चे का रोना । ऊर्जा का ही अंग है । वायलिन बजाना । बोलना । विवाह करना । यौन क्रिया । धरती की हर बात में ऊर्जा आवश्यक है ।
अतः हम पूछते हैं । ऊर्जा क्या है ? यह है । वैज्ञानिक प्रश्नों में से एक । वैज्ञानिक कहते हैं । ऊर्जा पदार्थ है । हो सकता है कि - वह पदार्थ हो । पर उसके पहले मूलभूत ऊर्जा क्या है ? उसका उदगम स्रोत क्या है ? किसने इस ऊर्जा का सृजन किया ? सावधान । यह नहीं कह दें कि ईश्वर ने । और ऐसा कह कर चल दीजिए । ईश्वर को मैं नहीं मानता । वक्ता का कोई ईश्वर नहीं है । इतना स्पष्ट है न ?
तो ऊर्जा क्या है ? हम पता लगा रहे हैं । वैज्ञानिकों के कथन को । हम स्वीकार नहीं कर रहे हैं । और यदि आप कर सकें । तो जो कुछ भी प्राचीन लोगों ने कहा है । हम उस सबको त्याग दें । छोड़ दें उन्हें । राह के किनारे छोड़कर हम साथ साथ आगे बढ़ें ।
आपका मस्तिष्क । जो एक पदार्थ है ? दस लाख वर्षों के ? एकत्रित अनुभवों का भण्डार है । और उस तमाम विकास का अर्थ है - ऊर्जा । और मैं स्वयं से पूछ रहा हूं । आप स्वयं से पूछ रहे हैं । क्या कोई ऊर्जा है ? जो ज्ञान के क्षेत्र में अर्थात विचार के क्षेत्र में चालित और आबद्ध नहीं है ? क्या कोई ऐसी ऊर्जा है ? जो विचार की गतिविधि से परे है ?
विचार आपको प्रबल ऊर्जा देता है । प्रत्येक सुबह नौ बजे आफिस जाने के लिए । पैसा अर्जित करने के लिए । ताकि आप बेहतर घर बना लें । अतीत के संबंध में विचार । भविष्य का विचार । वर्तमान की योजना बनाना । इस तरह विचार प्रचण्ड ऊर्जा  देता है । धनी बन जाने के लिए आप प्रबल अग्नि शिखा के वेग की भांति कार्य करते हैं । विचार ऊर्जा उत्पन्न करता है । अतः अब हमें विचार के स्वरूप का ही गहराई से पता लगाना है ।
विचार ने इस समाज को योजना बद्ध किया है । इसने इस संसार को विभाजित कर दिया है । साम्यवादी । समाजवादी । जनतंत्र वादी । गणतंत्र वादी । थल सेना । जल सेना । वायु सेना । ना केवल देश से निकाल बाहर करना । वरन वध करना भी शासकों सैनिकों का कार्य है । इस प्रकार हमारे जीवन में विचार बड़ा ही महत्वपूर्ण है । क्योंकि विचार के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते । हर चीज विचार की प्रक्रिया में निहित है । तो विचारणा क्या है ? आप पता लगाईए । मेरी बात ही नहीं सुनिए । वक्ता ने तो इस पर बहुत चर्चा की है । इसलिए उसकी किताबें नहीं देखिए । यह नहीं कहिए । यह सब मैं पहले सुन चुका हूँ । यहां आप समस्त किताबों को । अब तक आपने जितनी सारी चीजें पढ़ी हैं । सबको भुला दीजिए । यह इसलिए कि इस पर प्रत्येक बार बिलकुल नये ढंग से हम गौर करें ।
विचारणा या विचारना ज्ञान पर आधारित है । और हमने असीम ज्ञान एकत्र कर लिया है । कैसे हम एक दूसरे को

बेच डालें । एक दूसरे का शोषण किस प्रकार करें । ईश्वरों का और मन्दिरों का निर्माण कैसे करें ? आदि हम जानते हैं ।
बिना अनुभव के ज्ञान नहीं हो सकता है । अनुभव स्मृति के रूप में मस्तिष्क में संग्रहित ज्ञान ? यही विचार का प्रारंभ है । अनुभव सदैव सीमित है । क्योंकि आप इसमें और और जोड़ रहे हैं । इस प्रकार अनुभव सीमित है । ज्ञान सीमित है । स्मृति सीमित है । अतः विचार सीमित है । ईश्वर जिन्हें विचारों ने निर्मित किया है । आपके ईश्वर ? आपकी विचारणा सदैव सीमित रहेंगें । सीमितता से हम उदगम की । ऊर्जा की खोज का प्रयास करते हैं । आप समझ रहे हैं न ? हम उदगम सृष्टि का प्रारंभ खोजने की कोशिश करते हैं ।
विचार ने भय का निर्माण किया । ठीक ? आगे चलकर क्या होगा । क्या आप इससे भयभीत नहीं हैं ? नौकरी कहीं खो न दें ? परीक्षा में असफल ना हो जाएं । सफलता की सीढ़ी पर शायद ऊपर न चढ़ पाएं ? और आप भयभीत हैं कि - आप अपनी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर पाए । अकेले खड़े रह पाने में असमर्थ हैं । आप स्वयं में एक ताकत नहीं बन पाए । आप हमेशा किसी न किसी पर निर्भर रहते हैं । और यह बात प्रचण्ड भय उत्पन्न करती है ।
हमारे नित्य जीवन का यही तथ्य है कि - हम भयभीत लोग हैं । और इसी से सुरक्षा चाहते हैं । इसी से भय उत्पन्न होता है । भय प्रेम को विनष्ट कर देता है । जहां भय है । वहां प्रेम का अस्तित्व हो ही नहीं सकता । भय स्वयं में ही एक प्रबल उर्जा है । प्रेम का भय से कोई संबंध ही नहीं है । वे एक दूसरे से पूर्णतया अलग हैं । तो भय का उदगम क्या है ? इस सब पर प्रश्न करना ही जीवन्तता है । विचारणा ने भय उत्पन्न किया है । भविष्य । अतीत के संबंध में विचार । वातावरण से शीघ्रता पूर्वक समायोजित नहीं हो पाना । शायद कहीं कुछ हो न जाये । मेरी पत्नी कहीं मेरा परि त्याग न कर दे । अथवा कहीं उसकी मृत्यु ना हो जाए । तब मैं बिल्कुल अकेला रह जाऊंगा । मैं तब क्या करूंगा ? मेरे अनेक बच्चे हैं । इसलिए किसी से पुनर्विवाह कर लेना बेहतर होगा । कम से कम वह मेरे बच्चों की देखभाल तो करेगी । ऐसे ही और विचार । यह है अतीत पर आधारित भविष्य के संबंध में विचारणा । इस प्रकार विचार और समय इसमें निहित है । भविष्य के सबंध में विचार । भविष्य अर्थात आने वाला कल । वह विचारणा ही भय का कारण है । इस प्रकार समय और विचार भय के केन्द्रीय तत्व हैं ।
तो जीवन के प्रधान तत्व हैं - समय और विचार । समय आन्तरिक और बाहरी दोनों है । भीतरी मैं यह हूँ । मैं वह बनूंगा । और बाहरी । और समय है - विचार । ये दोनों ही गतियां हैं ।
मृत्यु । पीड़ा । चिन्ता । दुख । एकाकीपन । हताशा । इन तमाम भयावह स्थितियों से मैं गुजरता हूँ । क्या स्थान है । इनका मेरे जीवन में ? तमाम तीवृ पीड़ाओं से अपने जीवन में आदमी गुजरता है । बस यही है । हमारी जिन्दगी ? मैं पूछ रहा हूँ । क्या आपकी जिन्दगी बस इतनी ही है ?
यही है आपका जीवन । आपकी चेतना जिन अन्तर्वस्तुओं से निर्मित है । वे हैं आपकी सोच । आपकी परम्परा । आपकी शिक्षा । आपकी जानकारी । आपका भय । आपका अकेलापन । आप सावधानी से गौर करके देख लीजिए । यही हैं आप । आपकी व्यथा । आपका दर्द । आपकी चिन्ता । आपका अकेलापन । आपका ज्ञान । यह सब प्रत्येक मनुष्य की साझा अवस्था है । यह एक तथ्य है । पृथ्वी का हर आदमी । पीड़ा । कष्ट । चिन्ता । झगड़े । प्रलोभन । इसकी कामना । इसकी उपेक्षा । आदि से गुजरता है । अतः आप एक व्यक्ति नहीं हैं । आप एक पृथक 


प्राण । एक प्रथक आत्मा नहीं हैं । आपकी चेतना वही है । शारीरिक रूप में ही नहीं । वरन मनोवैज्ञानिक रूप में । जो संपूर्ण मानव जाति की चेतना है ।
हम पता लगाने की । छानबीन करने की । कोशिश कर रहे हैं कि - जीवन क्या है ? हम कह रहे हैं कि जब तक किसी भी प्रकार का भय है । कोई भी दूसरी चीज अस्तित्व में नहीं आयेगी । अगर किसी भी प्रकार की आसक्ति है । दूसरा अस्तित्व में आयेगा ही नहीं । और वह दूसरा है - प्रेम । यानि किसी भी प्रकार की आसक्ति हो । तो प्रेम असंभव है ।
अतः हम गौर करने जा रहे हैं कि - संसार क्या है । और मृत्यु क्या है ? हम इनका पता लगा रहे हैं । हम सभी मृत्यु से इस कदर भयभीत क्यों हैं ? आप जानते हैं । मरने का क्या अर्थ है ? क्या आपने दर्जनों लोगों को मरते । घायल होते नहीं देखा है ? क्या कभी आपने गहराई से पता लगाया है कि - मृत्यु क्या है ? यह प्रश्न बड़ा ही महत्वपूर्ण है । उतना ही महत्वपूर्ण जितना कि यह प्रश्न कि - जीवन क्या है ? हम लोगों ने कहा कि जीवन है । यही सब व्यर्थ की बातें । जानकारी । प्रतिदिन नौ बजे आफिस जाना आदि । विवाद । संघर्ष । इसको नहीं चाहना । उसकी कामना रखना । जीवन क्या है ? शायद हम जानते हैं । हमने गंभीरता पूर्वक कभी भी यह पता नहीं लगाया कि - मरण क्या है ?
क्या है मरण ? निश्चित ही मृत्यु एक असाधारण चीज होनी चाहिए । प्रत्येक चीज आपसे ले ली जाती है । आपकी आसक्ति । आपका पैसा । आपकी पत्नी । आपके बच्चे । आपका देश । आपके अन्धविश्वास । आपके तमाम गुरू । आपके समस्त भगवान । आपकी यह कामना हो सकती है कि - आप इन सभी को दूसरी दुनिया में लेते जाएं । पर आप ऐसा कर ही नहीं सकते । अतः मृत्यु कहती है । पूर्णतया अनासक्त हो जाएं । मृत्यु जब आती है । तो ठीक यही होता । किसी भी व्यक्ति पर आप निर्भर नहीं रहते । कुछ भी नहीं रह जाता । फिर भी आप शरीर धारण करेंगे । ऐसा आप विश्वास करते हैं । यह कल्पना बहुत ही आराम पहुंचाने वाली है । पर यह यथार्थ नहीं है ।
हम लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं । जीवित रहते हुए मरने का क्या अर्थ है ? आत्म हत्या कर लेना नहीं । उस तरह की मूर्खता के संबंध में मैं बात नहीं कर रहा । मृत्यु का क्या अर्थ है ? मैं खुद ही पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ ? जिसका आशय है । क्या खुद अपने समेत आदमी ने जो कुछ भी निर्मित किया है । उस सबसे आदमी पूरी तरह मुक्त हो सकता है ?
मरने का अर्थ क्या है ? प्रत्येक चीज का परि त्याग । मृत्यु अत्यधिक तेज छुरे से काटकर । आपको तमाम आसक्तियों से । आपके ईश्वर से । देवताओं से । अन्धविश्वासों से । आराम की कामना से । अगले जीवन आदि से बिलकुल अलग कर देती है । मैं पता लगाने जा रहा हूँ कि - मरण का अर्थ क्या है ? क्योंकि यह उतना ही महत्वपूर्ण है । जितना कि जीवन । तो हम किस प्रकार पता लगाएंगे ? सचमुच में सैद्धांतिक रूप में नहीं । क्या अर्थ है मरण का ? मैं सचमुच पता लगाना चाहता हूँ ? वैसे ही जैसे आप पता लगाना चाहते हैं कि - मैं आपके लिए बोल रहा हूँ । अतः सो मत जाइए । मरण का क्या अर्थ है ? यह प्रश्न कीजिए । अपने आपसे । हम युवा हैं । या अधिक वृद्ध । यह प्रश्न सदैव कायम है । इसका अर्थ है । पूरी तरह से मुक्त हो जाना । आदमी ने जो भी गढ़ा है । उन सबों से पूरी तरह अनासक्त हो जाना । कोई आसक्ति नहीं । कोई भविष्य नहीं । कोई अतीत नहीं । जीवित रहते हुए मृत हो जाना । इसके सौन्दर्य को । इसकी श्रेष्ठता को । इसकी असाधारण शक्ति को । आप नहीं देख रहे हैं । इसका अर्थ क्या है । आप समझ रहे हैं ? आप जीवित हैं । लेकिन प्रत्येक क्षण आपका मरण हो रहा है । और इस प्रकार पूरे जीवन में आप किसी भी चीज से आसक्त नहीं ।  यही है अर्थ मरण का ।
इस प्रकार का मरण है - जीवन । आप समझ रहे हैं ? जीवित होने का अर्थ है । प्रत्येक दिन अपनी आसक्ति की प्रत्येक चीज का परि त्याग करते जा रहे हैं । क्या आप यह कर सकते हैं ? बड़ा ही स्पष्ट सरल यथार्थ है । पर विस्मयकारी हैं । इसके गूढ़ार्थ । इस प्रकार प्रत्येक दिन नया दिन है । प्रत्येक दिन आपकी मृत्यु हो रही है । और आप पुर्नजीवित हो रहे हैं । इसमें विस्मयकारी ओजस्विता है । उर्जा है । क्योंकि आप अब किसी भी चीज से भयभीत नहीं हैं । ऐसी कोई भी चीज नहीं । जो आपको आहत कर सके । आहत होने का अस्तित्व ही नहीं ।
आदमी ने जो कुछ भी गढ़ा है । उन सबों का पूर्णतया परि त्याग करना होगा । यही है - मरण का अर्थ । क्या आप ऐसा कर सकते हैं ? क्या आप ऐसा प्रयास करेंगे ? क्या आप इसक प्रयोग करेंगे ? महज एक दिन नहीं । वरन प्रत्येक दिन । नहीं श्रीमान ! आप ऐसा नहीं कर पाएंगे । इसके लिए आपका मस्तिष्क प्रशिक्षित नहीं है । क्योंकि आपकी शिक्षा । आपकी परम्पराओं । आपकी पुस्तकों । और आपके प्रोफेसरों द्वारा । आपका मस्तिष्क गहराई से प्रशिक्षित है । गंभीर रूप से संस्कारित है । इसके लिए यह पता लगाना आवश्यक है कि - प्रेम क्या है ? प्रेम और मरण बिलकुल साथ साथ कार्यशील हैं । मृत्यु कहती है - मुक्त हो जाओ । मुक्त हो जाओ आसक्ति से । आप अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते । और प्रेम कहता है - प्रेम कहता है - इसके लिए कोई शब्द नहीं है । प्रेम का अस्तित्व मुक्त अवस्था में ही है । आपको पत्नी से । नयी लड़की से । अथवा नये पति से । मुक्ति नहीं । वरन विपुल शक्ति । ओजस्विता । पूर्ण मुक्ति की उर्जा की अनुभूति । जे कृष्णमूर्ति  पुस्तक - अन्तिम वार्ताएं । अध्याय: मद्रास वार्ता 1 जनवरी, 1986 पृष्ठ 129 से 135
जिन्दगी का मतलब जीने में है । जब हम डरे हुए रहते हैं । या किसी के कहे मुताबिक चलते हैं । या हम किसी की नकल करते हुए जिन्दगी जीते हैं । तो क्या इसे जीना कहेंगे ? क्या तब जिन्दगी लीने लायक होती है ? किसी प्रमाणित व्यक्ति के रूप में स्थापित व्यक्ति का पिछलग्गू बनना । क्या जिन्दगी जीना है ? जब हम किसी के पिछलग्गू बने होते हैं । चाहे वे महान संत । राजनेता या विद्वान हो । तब क्या हम जी रहे होते हैं ?
यदि आप ध्यान पूर्वक अपने तौर तरीकों को देखें । तो आप पाएंगे कि - आप किसी ना किसी के पदचिह्नों पर चलने के अलावा कुछ अन्य नहीं कर रहे हैं ? दूसरों के कदमों पर कदम रखते हुए चलने के सिलसिले को हम जीना कह देते हैं । और इसके अंत में हम यह सवाल भी करते हैं कि - जिन्दगी की अर्थवत्ता क्या है ? लेकिन यह सब करते हुए जिन्दगी का कोई मतलब नहीं रह जाता है । जिन्दगी में अर्थवत्ता तब ही हो सकती है । जब हम कई तरह की मान्यताओं और प्रमाणिकताओं को एक ओर रख दें । जो कि सरल नहीं है ।
आप जानते हैं कि - कैसे एक ग्रामीण व्यक्ति या किसान उस प्रतिमा को ईश्वर मान लेता है । जिस पर वह कुछ फल फूल आदि चढ़ाता है । आदिम मानव बादलों के गरजने को ईश्वर का इशारा समझता था । कुछ अन्य मनुष्य पेड़ पौधों प्रकृति को भगवान मानते हैं । जैसे हमारे देश में पीपल । बरगद का पूजन किया जाता है । वैसे ही यूरोप में सेब और जैतून के वृक्षों की पूजा की जाती रही है । ये सब आज भी चला आ रहा है ।
बहुत पुराने शहरों से लेकर अभी अभी बने शहरों तक सभी जगह मन्दिर होते हैं । मन्दिरों में मूर्तियां होती हैं । जिन पर तेल । फूलों के हार । आभूषण चढ़ाकर पूजा जाता हैं । इसी तरह आप भी कोई नई कल्पना रच सकते हैं । जो कि आपके वंश की परम्परा आपकी पारिवारिक पृष्ठ भूमि से उपजी हो । और उसे आप ईश्वर कह सकते हैं । शायद आपको मालूम ना हो । जिस व्यक्ति ने संसार में पहले पहल परमाणु बम गिराये थे । उसने भी सोचा था कि - ईश्वर उसके साथ है । हिटलर से लेकर किचनर तक सभी युद्धोन्मादी सेना में छोटे बड़े ओहदों पर आसीन सभी नायक ईश्वर के नाम पर युद्ध करने में जरा नहीं हिचकते । तो क्या यह सब प्रतिमा । विचार और कर्मकाण्ड ईश्वर हो सकता है ? या क्या ईश्वर कोई ऐसी चीज है ? जिसका आकलन हम अपने मन से नहीं कर सकते । जो हमारी कल्पना से परे की चीज है ।
ईश्वर की गूढ़ता की थाह ले पाना हमारे लिए असंभव है । ईश्वर के सत्य का अनुभव कभी कभी तब होता है  । जब हम पूर्णतः मौन में होते हैं । जब हमारा मन प्रक्षेपण में रत नहीं होता । जब हम अन्दर ही अन्दर खुद से ही युद्ध और संघर्ष की स्थिति में नहीं होते । जब मन निश्चल होता है । शायद तब हम जान पाते हैं कि ईश्वर क्या है ?
इसलिये यह बहुत महत्वपूर्ण है कि - कम उमृ से ही हम ईश्वर शब्द में अटकें नहीं । ईश्वर के बारे में हमें दूसरों द्वारा जो कुछ भी बताया समझाया जाता है । उसे स्वीकारें नहीं । लाखों लोग हैं । जो ईश्वर के सम्बंध में आपको सिखाने । बताने । समझाने के लिए उत्सुक हैं । परन्तु हमें यह करना है कि - जो कुछ भी वो कहें । हम उस सबकी जांच करें । इसी तरह कुछ ऐसे भी लोग हैं । जो कहते हैं । ईश्वर वगैरह कुछ नहीं होता । तो हम इन लोगों की भी ना सुनें । पर बारीकी और सावधानी से हर बात की जांच पड़ताल करें । ना विश्वास करने वालों पर अंधविश्वास करें । ना ईश्वर को नकारने वाले को ही मानें । जब हमारा मन विश्वास और अविश्वास दोनों से ही आजाद होता है । तब मन निश्चल होता है । केवल तभी संभावना बनती है कि - ईश्वर संबंधित सत्य का बोध हो सके ।
इन सब पहलुओं के बारे में खुले मन से सोचने समझने की जरूरत है । इन सबके बारे में किसी व्यक्ति को कहां से शुरूआत करनी है । यह सब कोई नहीं बताता ।
जब आप किसी महान गुरू नुमा व्यक्ति के पास जाते हैं । तो वह आपको सिद्ध करके बताने की कोशिश करेगा कि - ईश्वर है ? वह कई विधियां बतायेगा कि किस किस तरह से क्या क्या करने पर । यह मंत्र जपो । तो ये होगा । इस प्रकार पूजा करो । तो ये होगा । इस वृत उपवास अनुशासन का पालन करने पर यह परिणाम होगा आदि । यह सब करने के बाद भी आप पायेंगे कि - जो प्राप्त होगा । वह ईश्वर नहीं । आपको वही प्राप्त होगा । जिस चीज को आपका मन प्रक्षेपित कर रहा है । जिस चीज की रचना मन कर रहा है । यह सब आपकी मानसिक इच्छाओं की ही एक छवि होगी । पर ईश्वर कदापि नहीं ।
तो ईश्वर उसके बारे में जानना समझना इतना भी सरल नहीं है । ईश्वर सम्बंधित बातों को जानने समझने के लिए बहुत अधिक चिंतन मनन खोजबीन की जरूरत है । पहले तो अपने आपको सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होगा । अपने आपको इस योग्य बनाना होगा कि - आप स्वयं इसका पता लगा सकें । स्वयं ही इन सब बातों के पीछे के रहस्यों को जान सकें । इस कार्य में कोई दूसरा आपका आधार नहीं बन सकता । आपको अपनी सहायता स्वयं करनी होगी । स्वयं ही ईश्वर को तलाशना होगा । जे. कृष्णमूर्ति

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

मोक्ष का कारण कर्म है या ज्ञान ?

उस सत्चित आनन्द रूप आत्मा को नमस्कार है । जिससे सब भासते हैं । और जिसमें सब लीन और स्थिर होते हैं । एवं जिससे ज्ञाता । ज्ञान । ज्ञेय । दृष्टा । दर्शन । दृश्य । और कर्ता । करण । कर्म । सिद्ध होते हैं । जिस आनन्द के समुद्र के कण से सम्पूर्ण विश्व आनन्द वान है । और जिस आनन्द से सब जीव जीते हैं ।
अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण के मन में एक संशय उत्पन्न हुआ । तब वह उसके निवृत्त करने के अर्थ अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर विधि संयुक्त प्रणाम करके स्थित हुआ । और नमृता पूर्वक प्रश्न किया - हे भगवान ! आप सर्व तत्वज्ञ और सर्व शास्त्रों के ज्ञाता हो । एक संशय मुझको है । सो कृपा करके निवृत्त करो । मोक्ष का कारण कर्म है । या ज्ञान ? अथवा दोनों ?
अगस्त्य बोले - हे ब्रह्मण्य ! केवल कर्म मोक्ष का कारण नहीं । और केवल ज्ञान से भी । मोक्ष प्राप्त नहीं होता । मोक्ष की प्राप्ति । दोनों से ही होती है । कर्म करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है । मोक्ष नहीं होता । और अतःकरण की शुद्धि के बिना केवल ज्ञान से भी मुक्ति नहीं होती । इससे दोनों से मोक्ष की सिद्धि होती है । कर्म करने से अतःकरण शुद्ध होता है । फिर ज्ञान उपजता है । और तब मोक्ष होता है । जैसे दोनों पंखों से पक्षी आकाश मार्ग में सुख से उड़ता है । वैसे ही कर्म और ज्ञान दोनों से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
हे ब्रह्मण्य ! इसी आशय के अनुसार एक पुरातन इतिहास है । वह तुम सुनो ।
अग्निवेष का पुत्र कारण नाम ब्राह्मण गुरु के निकट जा षट अंगों सहित चारों वेद अध्ययन करके गृह में आया । और कर्म से रहित होकर तूष्णीं हो स्थित रहा । अर्थात संशय युक्त हो कर्मों से रहित हुआ ।
जब उसके पिता ने देखा कि - यह कर्मों से रहित हो गया है । तो उससे कहा कि - हे पुत्र ! तुम कर्म क्यों नहीं करते ? तुम कर्म के न करने से सिद्धता को कैसे प्राप्त होगे ? जिस कारण तुम कर्म से रहित हुए हो । वह कारण कहो ?
कारण बोला - हे पिता ! मुझको एक संशय उत्पन्न हुआ है । इसलिये कर्म से निवृत्त हुआ हूँ । वेद में एक ठौर तो

कहा है कि - जब तक जीता रहे । तब तक कर्म अर्थात अग्निहोत्र आदि करता रहे । और एक ठौर कहा है कि - न धन से मोक्ष होता है । न कर्म से मोक्ष होता है । न पुत्र आदि से मोक्ष होता है । और न केवल त्याग से ही मोक्ष होता है । इन दोनों में क्या कर्तव्य है ? मुझको यही संशय है । सो आप कृपा करके निवृत्त करो । और बतलाओ कि - क्या कर्तव्य है ?
अगस्त्य बोले - हे सुतीक्ष्ण ! जब कारण ने पिता से ऐसा कहा । तब अग्निवेष बोले - हे पुत्र ! एक कथा जो पहले हुई है । उसको सुन कर हृदय में धारण कर । फिर जो तेरी इच्छा हो । सो करना । एक काल में सुरुचि नामक अप्सरा । जो सम्पूर्ण अप्सराओं में उत्तम थी । हिमालय पर्वत के सुन्दर शिखर पर । जहाँ देवता और किन्नर गण जिनके हृदय कामना से तृप्त थे । अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करते थे । और जहाँ गंगा के पवित्र जल का प्रवाह लहर ले रहा था । बैठी थी । उसने इन्द्र का एक दूत अन्तरिक्ष से चला आता देखा । और जब निकट आया । तो उससे पूछा - अहो भाग्य । देवदूत ! तुम देवगणों में श्रेष्ठ हो । कहाँ से आये हो । और अब कहाँ जाओगे । सो कृपा करके कहो ?
देवदूत बोला - हे सुभद्रे ! अरिष्ट नेमि नामक एक धर्मात्मा राजर्षि ने अपने पुत्र को राज्य देकर वैराग्य लिया । और सम्पूर्ण विषयों की अभिलाषा त्याग करके । गन्धमादन पर्वत में जा तप करने लगा । उसी से मेरा एक कार्य था । और उस कार्य के लिये मैं उसके पास गया था । अब इन्द्र के पास जिसका मैं दूत हूँ । सम्पूर्ण वृतान्त निवेदन करने को जाता हूँ ।
अप्सरा ने पूछा - हे भगवान ! वह वृतान्त कौन सा है । मुझसे कहो ? मुझको तुम अति प्रिय हो । यह जानकर पूछती हूँ । महापुरुषों से जो कोई प्रश्न करता है । तो वे उद्वेग रहित होकर उत्तर देते हैं । देवदूत बोला - हे भद्रे ! वह वृतान्त मैं विस्तार पूर्वक तुमसे कहता हूँ । मन लगाकर सुनो ।
जब उस राजा ने गन्धमादन पर्वत पर बड़ा तप किया । तब देवताओं के राजा इन्द्र ने मुझको बुलाकर आज्ञा दी - हे दूत ! तुम गन्धमादन पर्वत पर जो नाना प्रकार की लताओं और वृक्षों से पूर्ण है । विमान । अप्सरा । और नाना प्रकार की सामग्री । एवं गन्धर्व । यक्ष । सिद्ध । किन्नर । ताल । मृदंग आदि वाध संग ले जाकर राजा को विमान पर बैठा के यहाँ ले आओ । तब मैं विमान और सामग्री सहित जहाँ राजा था आया । और राजा से कहा - हे राजन ! तुम्हारे कारण विमान ले आया हूँ । इस पर आरूढ़ होकर तुम स्वर्ग को चलो । और देवताओं के भोग भोगो ।
तब राजा बोला - हे दूत ! प्रथम तुम स्वर्ग का वृतान्त मुझे सुनाओ । तुम्हारे स्वर्ग में क्या क्या दोष और गुण हैं । तो उनको सुन कर मैं हृदय में विचारूँ । पीछे जो मेरी इच्छा होगी । तो चलूँगा । मैंने कहा - हे राजन ! स्वर्ग में बड़े 


बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्य वाले होते हैं । वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं । जो मध्यम पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं । और जो कनिष्ठ पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं । वे तो तुमसे कहे । अब स्वर्ग के जो दोष हैं । वे भी सुनो । हे राजन ! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं । और उत्तम सुख भोगते हैं । उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है । क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं । उनको देखकर क्रोध उपजता है कि - ये मेरे समान क्यों बैठे है । और जो आपसे नीचे बैठे हैं । उनको देखकर अभिमान उपजता है कि - मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि - जब पुण्य क्षीण होते हैं । तब जीव को उसी काल में मृत्यु लोक में गिरा देते हैं । एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं । हे भद्रे ! जब इस प्रकार मैंने राजा से कहा । तो राजा बोला - हे देवदूत ! उस स्वर्ग के योग्य हम नहीं हैं । और हमको उसकी इच्छा भी नहीं है । जैसे सर्प अपनी त्वचा को पुरातन जानकर त्याग देता है । वैसे ही हम उग्र तप करके यह देह त्याग देंगे । हे देवदूत ! तुम अपने विमान को जहाँ से लाये हो । वहीं ले जाओ । हमारा नमस्कार है ।
हे देवि ! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा । तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया । और सम्पूर्ण वृतान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ । और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला - हे दूत ! तुम फिर जहाँ राजा है । वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्म पद की इच्छा हुई है । इसलिये तुम

उसको अपने साथ वाल्मीकि के पास । जिसने आत्म तत्व को आत्माकार जाना है । ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि - हे महा ऋषे ! इस राजा को तत्व बोध का उपदेश करना । क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों भी इच्छा नहीं । इससे तुम इसको तत्व बोध का उपदेश करो । और यह तत्व बोध को पाकर संसार दुख से मुक्त हो ।
हे सुभद्रे ! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा । तब मैं वहाँ से चलकर राजा के निकट आया । और उससे कहा कि - हे राजन ! तुम संसार समुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकि जी के पास चलो । वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकि जी स्थान पर आया । और उस स्थान में राजा को बैठा । और प्रणाम कर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकि जी ने कहा - हे राजन ! कुशल तो है ? राजा बोले - हे भगवन ! आप परम तत्वज्ञ । और वेदान्त जानने वालों में श्रेष्ठ हैं । मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ । और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ । कृपा करके उत्तर दीजिए कि - संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो ?
इतना सुन वाल्मीकि बोले - हे राजन ! महा रामायण औषध तुमसे कहता हूँ । उसको सुन कर उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे । तब जीवन मुक्त होकर बिचरोगे । हे राजन ! वह वशिष्ठ और राम का संवाद है । और उसमें मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन कर जैसे राम अपने स्वभाव में स्थित हुए । और जीवन मुक्त होकर बिचरे हैं । वैसे ही तुम भी बिचरोगे ।

ज्ञान वान को भेद नहीं भासता

वशिष्ठ बोले - हे राम ! जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में कुछ भेद नहीं है । जैसे जल स्थिर हैं । तो भी जल है । और तरंग है । तो भी जल है । वैसे ही जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में कुछ भेद नहीं है । हे राम ! जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति का अनुभव तुमको प्रत्यक्ष नहीं भासता । क्योंकि स्व संवेद है । और उनमें जो भेद भासता है । सो सम्यक दर्शी को भासता है । ज्ञान वान को भेद नहीं भासता । हे मनन कर्ताओं में श्रेष्ठ राम ! जैसे वायु स्पन्द रूप होती है । तो भी वायु है । और निस्पन्द होती है । तो भी वायु है । निश्चय करके कुछ भेद नहीं । पर और जीव को स्पन्द होती है । तो भासती । और निस्स्पन्द होती है । तो नहीं भासती । वैसे ही ज्ञान वान पुरुष को जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में कुछ भेद नहीं । वह सदा अद्वैत निश्चय वाला और इच्छा से रहित है । जब जीव को उसका शरीर भासता है । तब जीवन मुक्ति कहते हैं । और जब शरीर अदृश्य होता है । तब विदेह मुक्ति कहते हैं । पर उसको दोनों तुल्य है ।
हे राम ! अब प्रकृत प्रसंग को । जो श्रवण का भूषण है । सुनिये । जो कुछ सिद्ध होता है । सो अपने पुरुषार्थ से सिद्ध होता है । पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं होता । लोग जो कहते हैं कि दैव करेगा । सो होगा । यह मूर्खता है । चन्द्रमा जो हृदय को शीतल और उल्लास कर्ता भासता है । इसमें यह शीतलता पुरुषार्थ से हुई है ।
हे राम ! जिस अर्थ की प्रार्थना और यत्न करे । और उससे फिरे नहीं । तो अवश्य पाता है । पुरुष प्रयत्न किसका नाम है । सो सुनिये । सन्त जन और सत्य शास्त्र के उपदेश रूप उपाय से । उसके अनुसार चित्त का विचरना पुरुषार्थ ( प्रयत्न ) है । और उससे इतर । जो चेष्टा है । उसका नाम उन्मत्त चेष्टा है । जिस निमित्त यत्न करता है । सोई पाता है । एक 


जीव पुरुषार्थ ( प्रयत्न ) करके इन्द्र की पदवी पाकर त्रिलोकी का पति हो सिंहासन पर आरूढ़ हुआ है । हे राम ! आत्म तत्व में जो चैतन्य संवित है । सो संवेदन रूप होकर फुरती है । और सोई अपने पुरुषार्थ से बृह्म पद को प्राप्त हुई है । इसलिए देखो । जिसको कुछ सिद्धता प्राप्त हुई है । सो अपने पुरुषार्थ से ही हुई है । केवल चैतन्य आत्म तत्व है । उसमें चित्त संवेदन स्पन्द रूप है । यह चित्त संवेदन ही अपने पुरुषार्थ से गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णु रूपी होता है । और पुरुषोत्तम कहाता है । और यही चित्त संवेदन अपने पुरुषार्थ से रुद्र रूप हो । अर्द्धांग में पार्वती । मस्तक में चन्द्रमा । और नीलकण्ठ परम शान्ति रूप को धारण करता है । इससे जो कुछ सिद्ध होता है । सो पुरुषार्थ से ही होता है ।
हे राम ! पुरुषार्थ से सुमेरु का चूर्ण किया चाहे । तो भी वह भी कर सकता है । यदि पूर्व दिन में दुष्कृत किया हो । और अगले दिन में सुकृत करे । तो दुष्कृत दूर हो जाता है । जो अपने हाथ से चरणामृत भी ले  नहीं सकता । वह यदि पुरुषार्थ करे । तो वह पृथ्वी को खण्ड खण्ड करने को समर्थ होता है ।

जीव को उसी समय मृत्युलोक 84 में गिरा देते हैं

हे राजन ! स्वर्ग में बड़े बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्य वाले होते हैं । वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं । जो मध्यम पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं । और जो कनिष्ठ पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं । वे तो तुमसे कहे । अब स्वर्ग के जो दोष हैं । वे भी सुनो ।
हे राजन ! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं । और उत्तम सुख भोगते हैं । उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है । क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं । उनको देखकर क्रोध उपजता है कि ये मेरे समान क्यों बैठे है । और जो आपसे नीचे बैठे हैं । उनको देखकर अभिमान उपजता है कि मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि जब पुण्य क्षीण होते हैं । तब जीव को उसी काल में मृत्यु लोक 84 में गिरा देते हैं । एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं ।

पंच 5 भूत का ये शरीर वासना रूप ही है

हे शिष्य ! संसार भृम मात्र सिद्ध है । इसको भृम मात्र जानकर विस्मरण करना । यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है । और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय । तब परम पद की प्राप्ति हो । वासना का एक पुतला है । उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ़ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है । और फिर सूर्य के ताप से पिघल कर जल होता है । तो केवल शुद्ध ही रहता है । वैसे ही आत्मा रूपी जल है । उसमें संसार की सत्यता रूपी जड़ता शीतलता है । और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञान रूपी सूर्य उदय होगा । तब संसार की सत्यता रूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत्त हुई । तब मन नष्ट हो जावेगा । और जब मन नष्ट हुआ । तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है । और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना दो प्रकार की है । एक शुद्ध । और दूसरी अशुद्ध । अशुद्ध वासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा को देह आदि हैं । उनमें अहंकार करता है । और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ । तब नाना प्रकार की वासना उपजती हैं । जिससे घटी यंत्र की तरह भृमता रहता है ।
हे साधो ! यह जो पंच 5 भूत का शरीर तुम देखते हो । सो सब वासना रूप है । और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं । और जब धागा टूट जाता है । तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं । और नहीं ठहरते । वैसे ही वासना के क्षय होने पर । पंच 5 भूत का शरीर नहीं रहता । इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है । शुद्ध वासना में जगत का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है । हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है । और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कच्चा बीज उगता है । और जो दग्ध हुआ है । सो फिर नहीं उगता । वैसे ही अज्ञानी की वासना रस सहित है । इससे जन्म का कारण है । और ज्ञानी की वासना रस रहित है । वह जन्म का कारण नहीं । ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक

होती है । वह किसी गुण से मिल कर अपने में चेष्टा नहीं देखता । वह खाता । पीता । लेता । देता । बोलता चलता । एवम और अन्य व्यवहार करता है । पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है । कदाचित द्वैत भावना उसको नहीं फुरती । वह अपने स्वभाव में स्थित है । इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कुम्हार के चक्र को जब तक घुमावे । तब तक फिरता है । और जब घुमाना छोड़ दे । तब स्थीयमान गति से उतरते उतरते स्थिर रह जाता है । वैसे ही जब तक अहंकार सहित वासना होती है । तब तक जन्म पाता है । और जब अहंकार से रहित हुआ । तब फिर जन्म नहीं पाता ।
हे साधो ! इस अज्ञान रूपी वासना के नाश करने को एक बृह्म विद्या ही श्रेष्ठ उपाय है । जो मोक्ष उपायक शास्त्र है । यदि इसको त्याग कर । और शास्त्र रूपी गर्त्त में गिरेगा । तो कल्प पर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा । जो बृह्म विद्या का आश्रय करेगा । वह सुख से आत्म पद को प्राप्त होगा । हे भारद्वाज ! यह मोक्ष उपाय राम और वशिष्ठ का संवाद है । यह विचारने योग्य है । और बोध का परम कारण है ।

भोग और जगत सब भृम मात्र हैं

हे मुनीश्वर ! जितने कुछ पदार्थ हैं । वह सब मन से उत्पन्न होते हैं । सो मन ही भृम मात्र है । अन होता मन दुखदायी हुआ है । मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है । और सुखदायक जानता है । सो मृग तृष्णा के जलवत है । जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं । और दौड़ते दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं । तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता । वैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं । और शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों के भोग सर्प वत है । जिनका मारा हुआ जन्म । मरण । और जन्म से जन्मान्तर पाता है । भोग और जगत । सब भृम मात्र हैं । उनमें जो आस्था करते हैं । वह महा मूर्ख हैं । मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि - सब आगमा पायी है । अर्थात आते भी हैं । और जाते भी हैं । इससे जिस पदार्थ का नाश न हो । वही पदार्थ पाने योग्य है । इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है ।
हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदा रूप पदार्थ भासते हैं । वह सब आपदा हैं । इनमें रंचक भी सुख नहीं । जब इनका वियोग होता है । तब कण्टक की तरह मन में चुभते हैं । जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं । तब जीव राग द्वेष से जलता है । और जब नहीं प्राप्त होते । तब तृष्णा से जलता है । इससे भोग दुख रूप ही है । जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता । वैसे ही भोग रूपी दुख की शिला में । सुख रूप छिद्र नहीं होता । हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ । जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो । तो धुँवा हो । थोड़ा थोड़ा जलता रहता है । वैसे ही भोग रूपी अग्नि से मन जलता रहता है । विषयों में कुछ भी सुख नहीं है । दुख बहुत हैं । इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है । जैसे खाईं के ऊपर तृण और पात होते हैं । और उससे खाईं आच्छादित हो जाती है । उसको देख हिरण कूदकर दुख पाता है । वैसे ही मूर्ख भोग को सुख रूप जानकर भोगने की इच्छा करता है । और जब भोगता है । तब जन्म से जन्मान्तर रूपी खाईं में जा पड़ता है । और दुख पाता है ।


हे मुनीश्वर ! भोग रूपी चोर । अज्ञान रूपी रात में । आत्मा रूपी धन लूट ले जाता है । पर उसके वियोग से महा दीन रहता है । जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है । वह दुख रूप है । उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती । और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है । वह शरीर क्षण भंगुर और असार है । जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है । वह मूर्ख और जड़ है । उसका बोलना । और चलना भी ऐसा है । जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है । और उसके वेग से शब्द होता है । जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता । वैसे ही दुख जानकर मैं भोग की इच्छा नहीं करता । लक्ष्मी भी परम अनर्थकारी है । जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती । तब तक उसके पाने का यत्न होता है । और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है । जब लक्ष्मी प्राप्त हुई । तब सब सदगुण अर्थात शीलता । सन्तोष । धर्म । उदारता । कोमलता । वैराग्य । विचार दया आदि का नाश कर देती है । जब ऐसे गुणों का नाश हुआ । तब सुख कहाँ से हो । तब तो परम आपदा ही प्राप्त होती है । इसको परम दुख का कारण जानकर । मैंने त्याग दिया है ।
हे मुनीश्वर ! इस जीव में गुण तब तक हैं । जब तक लक्ष्मी नहीं प्राप्त हुई । जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब सब गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे बसन्त ऋतु की मंजरी तब तक हरी रहती है । जब तक ज्येष्ठ आषाढ़ नहीं आता । और जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया । तब मंजरी जल जाती है । वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब शुभ गुण जल जाते हैं । मधुर वचन तभी तक बोलता है । जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं है । और जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । तब कोमलता का अभाव होकर कठोर हो जाता है । जैसे जल पतला तब तक 


रहता है । जब तक शीतलता का संयोग नहीं हुआ । और जब शीतलता का संयोग होता है । तब बरफ होकर कठोर दुखदायक हो जाता है । वैसे यह जीव लक्ष्मी से जड़ हो जाता है ।
हे मुनीश्वर ! जो कुछ संपदा है । वह आपदा का मूल है । क्योंकि जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । तब बड़े बड़े सुख भोगता है । और जब उसका अभाव होता है । तब तृष्णा से जलता है । और जन्म से जन्मान्तर पाता है  । लक्ष्मी की इच्छा करना ही मूर्खता है । यह तप क्षण भंगुर है । इससे भोग उपजते । और नष्ट होते हैं । जैसे जल से तरंग उपजते । और मिट जाते हैं । और जैसे बिजली स्थिर नहीं होती । वैसे ही भोग भी स्थिर नहीं रहते । पुरुष में शुभ गुण तब तक हैं । जब तक तृष्णा का स्पर्श नहीं । और जब तृष्णा हुई । तब गुणों का अभाव हो जाता है । जैसे दूध में मधुरता तब तक है । जब तक उसे सर्प ने स्पर्श नहीं किया । और सर्प ने स्पर्श किया । तब वही दूध विष रूप हो जाता है ।

जीवों का आश्रय संसार माया रूप है

हे राम !  यह संसार महा दीर्घ रूप है । और जैसे दृढ़ थम्भ के आश्रय गृह होता है । वैसे ही राजसी जीवों का आश्रय संसार माया रूप है । तुम सरीखे । जो सात्विक में स्थित हैं । वे शूरमा हैं । जो वैराग । विवेक । आदि गुणों से सम्पन्न हैं । वे लीला करके । यत्न बिना ही संसार माया को त्याग देते हैं । और जो बुद्धिमान सात्विक जागे हुए हैं । और जो राजस । और सात्विक हैं । वे भी उत्तम पुरुष हैं । वे पुरुष जगत के पूर्व अपूर्व को विचारते हैं । जो सन्त जन और सत शास्त्रों का संग करता है । उसके आचरण पूर्वक । वे बिचरते हैं । और उससे ईश्वर परमात्मा के देखने की उन्हें बुद्धि उपजती है । और दीपक वत ज्ञान प्रकाश उपजता है ।
हे राम ! जब तक मनुष्य । अपने विचार से । अपना स्वरूप नहीं पहचानता । तब तक उसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता । जो उत्तम कुल । निष्पाप । सात्विक । राजसी जीव हैं । उन्हीं को विचार उपजता है । और उस विचार से वे अपने आपसे आपको पाते हैं । वे दीर्घ दर्शी । संसार के । जो नाना प्रकार के आरम्भ हैं । उनको बिचारते हैं । और बिचार द्वारा आत्म पद पाते हैं । और परमानन्द सुख में प्राप्त होते हैं । इससे तुम इसी को विचारो कि - सत्य क्या है ? और असत्य क्या है ? ऐसे विचार से । असत्य का त्याग करो । और सत्य का आश्रय करो । जो पदार्थ आदि में न हो । और अन्त में भी न रहे । उसे मध्य में भी असत्य जानिये । जो आदि । अन्त । एक रस है । उसको सत्य जानिये । और जो आदि अन्त में नाश रूप है । उसमें जिसको प्रीति है । और उसके राग से जो रंचित है । वह मूढ़ पशु है । उसको विवेक का रंग नहीं लगता ।

संसार रूपी वृक्ष का मूल बीज मन है

हे राम ! जब अहं त्वं आदि रात विचार रूपी सूर्य से क्षीण हो जावेगी । तब परमात्मा का प्रकाश साक्षात होगा । भेद कल्पना नष्ट हो जावेगी । और अनन्त बृह्माण्ड में जो व्यापक आत्म तत्व है । वह प्रकाशित होगा । जैसे अपने विचार से जनक ने अहंकार रूपी वासना का त्याग किया है । वैसे ही तुम भी विचार करके अहंकार रूपी वासना का त्याग करो । अहंकार रूपी मेघ जब नष्ट होगा । और चित्त आकाश निर्मल होगा । तब आत्म रूपी सूर्य प्रकाशित होगा । जब तक अहंकार रूपी मेघ आवरण है । तब तक आत्म रूपी सूर्य नहीं भासता । विचार रूपी वायु से । जब अहंकार रूपी मेघ नाश हो । तब आत्म रूपी सूर्य प्रकट भासेगा ।
हे राम ! ऐसे समझो कि - मैं हूँ । न कोई । और है । न नास्ति है । न अस्ति है । जब ऐसी भावना दृढ़ होगी । तब मन शान्त हो जावेगा । और हेयो पादेय बुद्धि । जो इष्ट पदार्थों मे होती है । उसमें न डूबोगे । इष्ट अनिष्ट के गृहण त्याग में । जो भावना होती है । यही मन का रूप है । और यही बन्धन का कारण है । इससे भिन्न बन्धन कोई नहीं । इससे तुम इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट में हेयो पादेय बुद्धि मत करो । और दोनों के त्यागने से जो शेष रहे । उसमें स्थित हो । इष्ट अनिष्ट की भावना उसकी की जाती है । जिसको हेयो पादेय बुद्धि नहीं होती । और जब तक हेयो पादेय बुद्धि क्षीण नहीं होती । तब तक समता भाव नहीं उपजता । जैसे मेघ के नष्ट हुए बिना । चन्द्रमा की चाँदनी नहीं भासती । वैसे ही जब तक पदार्थों में इष्ट अनिष्ट बुद्धि है । और मन लोलुप होता है । तब तक समता उदय नहीं होती । जब तक युक्त । अयुक्त । लाभ । अलाभ । इच्छा नहीं मिटती । तब तक शुद्ध समता और निरसता नहीं उपजती । एक बृह्म तत्व । जो निरामय रूप । और नाना तत्व से रहित है । उसमें युक्त क्या ? और अयुक्त क्या ? जब तक इच्छा । अनिच्छा । और वांछित । अवांछित । यह दोनों बातें स्थित हैं । अर्थात फुरते और क्षोभ करते हैं । तब तक सौम्यता भाव नहीं होता । जो हेयो पादेय बुद्धि से रहित । ज्ञान वान है

। उस पुरुष को यह शक्ति आ प्राप्त होती है । जैसे राजा के अन्तःपुर में पटु ( चतुर ) रानी स्थित होती हैं । वह शक्ति यह है । भोगों में नीरसता । देह अभिमान से रहित । निर्भयता । नित्यता । समता । पूर्ण आत्मा दृष्टि । ज्ञान निष्ठा । निर इच्छता । निर अहंकारता । अपने आपको सदा अकर्ता जानना । इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में सम चित्तता । निर्विकल्पता । सदा आनन्द  स्वरूप रहना । धैर्य से सदा एक रस रहना । स्व रूप से भिन्न वृत्ति न फुरना । सब जीवों से मैत्री भाव । सत्य बुद्धि । निश्चयात्मक रूप से तुष्टता । मुदिता । और मृदु भाषणा । इतनी शक्ति हेयो पादेय से रहित पुरुष को आ प्राप्त होती है ।
हे राम ! संसार के पदार्थों की ओर । जो चित्त धावता है । उसको वैराग्य से उलटा कर खींचना । जैसे पुल से जल के वेग का निवारण होता है । वैसे ही । जगत से रोक कर मन को आत्म पद में लगाने से आत्म भाव प्रकाशता है । इससे हृदय से सब वासना का त्याग करो । और बाहर से सब क्रिया में रहो । वेग चलो । स्वांस लो । और सर्वदा । सब प्रकार चेष्टा करो । पर सर्वदा सब प्रकार की वासना त्याग करो । संसार रूपी समुद्र में वासना रूपी जल है । और चिन्ता रूपी सिवार है । उस जल में तृष्णा वान रूपी मच्छ फँसे हैं । यह विचार । जो तुमसे कहा है । उस विचार रूपी शिला से । बुद्धि को तीक्ष्ण करो । और इस जाल को छेदो । तब संसार से मुक्त होगे । संसार रूपी वृक्ष का । मूल बीज मन है । ये वचन जो कहे हैं । उनको हृदय में धरकर धैर्य वान हो । तब आधि व्याधि दुखों से मुक्त होगे । मन से मन को छेदो । जो बीती है । उसका स्मरण न करो । और भविष्य की चिन्ता न करो । क्योंकि वह असत्य रूप है । और वर्तमान को भी असत्य जान कर । उसमें बिचरो । जब मन से संसार का विस्मरण होता है । तब मन में फिर न फुरेगा । मन असत्य भाव जान कर चलो । बैठो । स्वांस लो । निस्वांस करो । उछलो । सोवो । सब 


चेष्टा करो । परन्तु भीतर सब असत्य रूप जानो । तब खेद न होगा । अहं । मम । रूपी मल का त्याग करो । प्राप्ति में बिचरो । अथवा राज आ प्राप्त हो । उसमें बिचरो । परन्तु भीतर से । इसमें आस्था न हो । जैसे आकाश का सब पदार्थों में अन्वय है । परन्तु किसी से स्पर्श नहीं करता । वैसे ही बाहर कार्य करो । परन्तु मन से किसी में बन्धाय मान न हो । तुम चेतन रूप । अजन्मा । महेश्वर पुरुष हो । तुमसे भिन्न कुछ नहीं । और सब में व्याप रहे हो । जिस पुरुष को सदा यही निश्चय रहता है । उसको संसार के पदार्थ चलाय मान नहीं कर सकते । और जिनको संसार में आसक्त भावना है । और स्वरूप भूले हैं । उनको संसार के पदार्थों से विकार उपजता है । और हर्ष । शोक । और भय खींचते हैं । उससे वे बँधे हुए हैं । जो ज्ञान वान पुरुष राग द्वेष से रहित हैं । उनको लोहा । बट्टा  ( ढेला ) पाषाण । और सुवर्ण सब एक समान है । संसार वासना के ही त्यागने का नाम मुक्ति है ।

उस सर्वात्मा को नमस्कार है

राजा बोले - हे भगवान ! राम कौन थे ? कैसे थे ? और कैसे होकर बिचरे । सो कृपा करके कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे राजन ! शाप के वश से विष्णु ने । जो अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं । अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया । इतना सुन राजा ने पूछा - हे भगवान !  चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ । और किसने दिया । सो कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे राजन ! एक काल में सनत कुमार । जो निष्काम हैं । बृह्मपुरी में बैठे थे । और त्रिलोक पति विष्णु भगवान भी वैकुण्ठ से उतरकर बृह्मपुरी में आये । तब बृह्मा सहित सब सभा उठकर खड़ी हुई । और उनका पूजन किया । पर सनत कुमार ने पूजन नहीं किया । इस बात को देखकर विष्णु  बोले - हे सनत कुमार ! तुमको निष्कामता का अभिमान है । इससे तुम काम से आतुर होगे । और स्वामि कार्तिक तुम्हारा नाम होगा । सनत कुमार बोले - हे विष्णु ! सर्वज्ञता का अभिमान तुमको भी है । इसलिये कुछ काल के लिए तुम्हारी सर्वज्ञता निवृत्त होकर अज्ञानता प्राप्त होगी ।
हे राजन ! एक तो यह शाप हुआ । दूसरा एक और भी शाप है सुनो । एक काल में भृगु की स्त्री जाती रही थी । उसके वियोग से वह ऋषि क्रोधित हुआ था । उसको देखकर विष्णु हँसे । तब भृगु ब्राह्मण ने शाप दिया - हे विष्णु ! मेरी तुमने हँसी की है । सो मेरी तरह तुम भी स्त्री के वियोग से आतुर होगे । और एक दिवस देव शर्मा ब्राह्मण ने नर सिंह भगवान को शाप दिया था । सो भी सुनिये । एक दिन नर सिंह भगवान गंगा के तीर पर गये । और वहाँ देव शर्मा ब्राह्मण की स्त्री को देखकर नर सिंह भयानक रूप दिखाकर हँसे । निदान उनको देखकर ऋषि की स्त्री ने भय पाय प्राण छोड़ दिया । तब देव शर्मा ने शाप दिया - तुमने मेरी स्त्री का वियोग किया । इससे तुम भी स्त्री का वियोग पावोगे ।
हे राजन ! सनत कुमार । भृगु । और देव शर्मा के । शाप से विष्णु ने मनुष्य का शरीर धारण किया । और दशरथ 


के घर में प्रकटे । हे राजन ! वह जो शरीर धारण किया । और आगे जो वृतान्त हुआ । सो सावधान होकर सुनो । अनुभवात्मक मेरा आत्मा जो त्रिलोकी अर्थात स्वर्ग । मृत्यु । और पाताल का प्रकाश कर्ता और भीतर बाहर आत्म तत्व से पूर्ण है । उस सर्वात्मा को नमस्कार है । हे राजन ! यह शास्त्र जो आरम्भ किया है । इसका विषय । प्रयोजन और सम्बन्ध क्या है ? और अधिकारी कौन है ? सो सुनो ।
यह शास्त्र सत । चित्त । आनन्द रूप । अचिन्त्य चिन्मात्र आत्मा को जताता है । यह तो विषय है । परमानन्द आत्मा की प्राप्ति । और अनात्म अभिमान । दुख की निवृत्ति प्रयोजन है । और बृह्म विद्या और मोक्ष उपाय से आत्म पद प्रतिपादन सम्बन्ध है । जिसको यह निश्चय है कि - मैं अद्वैत बृह्म अनात्म देह से बाँधा हुआ हूँ । सो किसी प्रकार छूटूँ । वह न अति ज्ञान वान है । न मूर्ख है । ऐसा विकृति आत्मा यहाँ अधिकारी है । यह शास्त्र मोक्ष ( परमानन्द की प्राप्ति ) करने वाला है । जो पुरुष इसको विचारेगा । वह ज्ञान वान होकर फिर जन्म मृत्यु रूप संसार में न आवेगा । हे राजन ! यह महा रामायण पावन है । श्रवण मात्र से ही सब पाप का नाश कर्त्ता है । जिसमें राम कथा है । यह मैंने प्रथम अपने शिष्य भारद्वाज को सुनाई थी ।
एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये । और मैंने उसको उपदेश किया था । वह उसको सुनकर । वचन रूपी समुद्र से । सार रूपी रत्न निकाल । और हृदय में धरकर । एक समय सुमेरु पर्वत पर गया । वहाँ बृह्मा बैठे थे । उसने उनको प्रणाम किया । और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई । तब बृह्मा ने प्रसन्न होकर उससे कहा - हे पुत्र ! कुछ वर माँग । मैं तुझ पर प्रसन्न हुआ हूँ । भारद्वाज ने । जिसका उदार आशय था । उनसे कहा - हे भूत भविष्य के ईश्वर ! जो तुम प्रसन्न हुए हो । तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार सुख से मुक्त हों । और परम पद पावें । और उसी का उपाय भी कहो ।

बृह्मा बोले -  हे पुत्र ! तुम अपने गुरु वाल्मीकि के पास जाओ । उसने आत्म बोध महा रामायण शास्त्र का जो परम पावन संसार समुद्र के तरने का पुल है । आरम्भ किया है । उसको सुनकर जीव महा मोह जनक संसार समुद्र से तरेंगे । निदान परमेष्ठी बृह्मा जिनकी सर्व भूतों के हित में प्रीति है । आप ही भारद्वाज को साथ लेकर मेरे आश्रम में आये । और मैंने भले प्रकार से उनका पूजन किया । उन्होंने मुझसे कहा - हे मुनियों में श्रेष्ठ वाल्मीकि ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का आरम्भ किया है । इस उद्यम का त्याग न करना । इसकी आदि से अन्त पर्यन्त समाप्त करना । क्योंकि यह मोक्ष उपाय संसार रूपी समुद्र के पार करने का जहाज । और इससे सब जीव कृतार्थ होंगे ।
इतना कहकर बृह्मा जैसे समुद्र से चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठ कर फिर लीन हो जावे । वैसे ही अंतर्ध्यान हो गये । तब मैंने भारद्वाज से कहा - हे पुत्र ! बृह्मा ने क्या कहा ? भारद्वाज बोले - हे भगवन ! बृह्मा ने तुमसे यह कहा कि - हे मुनियों में श्रेष्ठ ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का उद्यम किया है । उसका त्याग न करना । इसे अन्त पर्यन्त समाप्त करना । क्योंकि संसार समुद्र के पार करने को यह कथा जहाज है । और इससे अनेक जीव कृतार्थ होकर संसार संकट से मुक्त होंगे । इतना कह कर फिर वाल्मीकि बोले - हे राजन ! जब इस प्रकार बृह्मा ने मुझसे कहा । तब उनकी आज्ञा अनुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया । हे पुत्र ! वशिष्ठ के उपदेश को पाकर जिस प्रकार राम निशंक हो बिचरे हैं । वैसे ही तुम भी बिचरो । तब उसने प्रश्न किया - हे भगवान ! जिस प्रकार राम जीवन मुक्त होकर बिचरे । वह आदि से कृम करके मुझसे कहिये ? वाल्मीकि बोले - हे भारद्वाज ! राम । लक्ष्मण । भरत । शत्रुघन । सीता । कौशल्या । सुमित्रा । और दशरथ । ये 8 तो जीवन मुक्त हुए हैं । और 8 मन्त्री । अष्ट गण । वशिष्ठ और वामदेव से आदि अष्टा विंशति जीवन मुक्त हो बिचरे हैं । उनके नाम सुनो । राम से लेकर दशरथ पर्यन्त 8 तो ये कृतार्थ होकर परम बोध वान हुए हैं । और 1 कुन्तभासी । 2 शतवर्धन । 3 सुखधाम । 4 विभीषण । 5 इन्द्रजीत । 6 हनुमान । 7 वशिष्ठ । और 8 वामदेव । ये 8 मन्त्री निश्शंक हो चेष्टा करते भये । और सदा अद्वैत निष्ठ हुए हैं । इनको कदाचित स्वरूप से द्वैत भाव नहीं फुरा है । ये अनामय पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्ध परम पावनता को प्राप्त हुए हैं ।
इति श्री योग वशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे कथारम्भ वर्णनो नाम प्रथम सर्गः

लेकिन ज्ञानी की वासना रस रहित है

भारद्वाज बोले - हे भगवान ! जीवन मुक्त की स्थिति कैसी है ? और राम कैसे जीवन मुक्त हुए ? वह आदि से अन्त पर्यन्त सब कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे पुत्र ! यह जगत जो भासता है । सो वास्तविक कुछ नहीं उत्पन्न हुआ । अविचार करके भासता है । और विचार करने से निवृत्त हो जाता है । जैसे आकाश में नीलता भासती है । सो भृम से वैसे ही है । यदि विचार करके देखिए । तो नीलता की प्रतीति दूर हो जाती है । वैसे ही अविचार से जगत भासता है । और विचार से लीन हो जाता है । हे शिष्य ! जब तक सृष्टि का अत्यन्त अभाव नहीं होता । तब तक परम पद की प्राप्ति नहीं होती । जब दृश्य का अत्यन्त अभाव हो जावे । तब शुद्ध चिदाकाश आत्म सत्ता भासेगी । कोई इस दृश्य का महा प्रलय में अभाव कहते हैं । परन्तु मैं तुमको तीनों कालों का अभाव कहता हूँ । जब इस शास्त्र को । श्रद्धा संयुक्त । आदि से अन्त तक । सुनकर धारण करे । भ्रान्ति निवृत्ति हो जावे । और अव्याकृत पद की प्राप्ति हो । हे शिष्य ! संसार भृम मात्र सिद्ध है । इसको भृम मात्र जानकर विस्मरण करना यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है । और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय । तब परम पद की प्राप्ति हो । वासना का एक पुतला है । उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ़ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है । और फिर सूर्य के ताप से पिघल कर जल होता है । तो केवल शुद्ध ही रहता है । वैसे ही आत्मा रूपी जल है । उसमें संसार की सत्यता रूपी जड़ता शीतलता है । और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञान रूपी सूर्य उदय होगा । तब संसार की सत्यता रूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत हुई । तब मन नष्ट हो जावेगा । और जब मन नष्ट हुआ । तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है । और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना 2 प्रकार की है । एक शुद्ध । और दूसरी अशुद्ध । 


अशुद्ध वासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा को देह आदि हैं । उनमें अहंकार करता है । और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ । तब नाना प्रकार की वासना उपजती हैं । जिससे घटी यंत्र की तरह भृमता रहता है ।
हे साधो ! यह जो पंच 5 भूत का शरीर तुम देखते हो । सो सब वासना रूप है । और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं । और जब धागा टूट जाता है । तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं । और नहीं ठहरते । वैसे ही वासना के क्षय होने पर पंच 5 भूत का शरीर नहीं रहता । इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है । शुद्ध वासना में जगत का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है ।
हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है । और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कच्चा बीज उगता है । और जो दग्ध हुआ है । सो फिर नहीं उगता । वैसे ही अज्ञानी की वासना रस सहित है । इससे जन्म का कारण है । और ज्ञानी की वासना रस रहित है । वह जन्म का कारण नहीं । ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक होती है । वह किसी गुण से मिलकर अपने में चेष्टा नहीं देखता । वह खाता । पीता । लेता । देता । बोलता । चलता एवम और अन्य व्यवहार करता है । पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है । कदाचित द्वैत भावना उसको नहीं फुरती । वह अपने स्वभाव में स्थित है । इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कुम्हार के चक्र को । जब तक घुमावे । तब तक फिरता है । और जब घुमाना छोड़ दे । तब स्थीयमान गति से उतरते उतरते स्थिर रह जाता है । वैसे ही जब तक अहंकार सहित वासना होती है । तब तक जन्म पाता है । और जब अहंकार से रहित हुआ । तब फिर जन्म नहीं पाता ।
हे साधो ! इस अज्ञान रूपी वासना के नाश करने को एक बृह्म विद्या ही श्रेष्ठ उपाय है । जो मोक्ष उपायक शास्त्र है ।

यदि इसको त्याग कर । और शास्त्र रूपी गर्त्त में गिरेगा । तो कल्प पर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा । जो बृह्म विद्या का आश्रय करेगा । वह सुख से आत्मपद को प्राप्त होगा ।
हे भारद्वाज ! यह मोक्ष उपाय । राम और वशिष्ठ का संवाद है । यह विचारने योग्य है । और बोध का परम कारण है । इसे आदि से अन्त पर्यन्त सुनो । और जैसे राम जीवन मुक्त हो विचरे हैं । सो भी सुनो । एक दिन राम अध्ययन शाला से विद्या पढ़ कर अपने गृह में आये । और सम्पूर्ण दिन विचार सहित व्यतीत किया । फिर मन में तीर्थ ठाकुर द्वारे का संकल्प धरकर अपने पिता दशरथ के पास । जो अति प्रजा पालक थे आये । और जैसे हंस सुन्दर कमल को गृहण करे । वैसे ही उन्होंने उनका चरण पकड़ा । जैसे कमल के फूल के नीचे कोमल तरैयाँ होती हैं । और उन तरैयों सहित कमल को हंस पकड़ता है । वैसे ही दशरथ की अँगुलियों को उन्होंने गृहण किया । और बोले - हे पिता ! मेरा चित्त तीर्थ और ठाकुर द्वारों के दर्शनों को चाहता है । आप आज्ञा कीजिये । तो मैं दर्शन कर आऊँ । मैं तुम्हारा पुत्र हूँ । आगे मैंने कभी नहीं कहा । यह प्रार्थना अब ही की है । इससे यह वचन मेरा न फेरना । क्योंकि ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं है कि जिसका मनोरथ इस घर से सिद्ध न हुआ हो । इससे मुझको भी कृपा कर आज्ञा दीजिये ।
इतना कह कर वाल्मीकि बोले - हे भारद्वाज ! जिस समय इस प्रकार राम ने कहा । तब वशिष्ठ पास बैठे थे । उन्होंने दशरथ से कहा - हे राजन ! इनका चित्त उठा है । राम को आज्ञा दो । तीर्थ कर आवें । और इनके साथ सेना । धन । मंत्री और ब्राह्मण भी दीजिये कि विधि पूर्वक दर्शन करें । तब महाराज दशरथ ने शुभ मुहुर्त दिखाकर राम को आज्ञा दी । जब वे चलने लगे । तो पिता और माता के चरणों में पड़े । और 


सबको कण्ठ लगाकर रुदन करने लगे । इस प्रकार सबसे मिलकर लक्ष्मण आदि भाई । मन्त्री । और वशिष्ठ आदि ब्राह्मण । जो बिधि जानने वाले थे । बहुत सा धन और सेना साथ ली । और दान पुण्य करते हुए गृह के बाहर निकले । उस समय वहाँ के लोगों और स्त्रियों ने राम के ऊपर फूलों और कलियों की माला की । जैसे बरफ बरसती है । वैसी ही वर्षा की । ओर राम की मूर्ति हृदय में धर ली । इसी प्रकार राम वहाँ से ब्राह्मणों और निर्धनों को दान देते गंगा । यमुना । सरस्वती आदि तीर्थों में विधि पूर्वक स्नान कर पृथ्वी के चारों ओर पर्यटन करते रहे । उत्तर । दक्षिण । पूर्व । और पश्चिम में दान किया । और समुद्र के चारों ओर स्नान किया । सुमेरु और हिमालय पर्वत पर भी गये । और शालिग्राम । बद्री । केदार आदि में स्नान और दर्शन किये । ऐसे ही सब तीर्थ स्नान । दान । तप । ध्यान और विधि संयुक्त यात्रा करते करते एक वर्ष में अपने नगर में आये ।
इति श्री योग वशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे तीर्थ यात्रा वर्णनन्नाम द्वितीय सर्गः

इसी अवस्था को शांत बृह्म कहते हैं

श्री योग वशिष्ठ रामायण में कहा है - सर्व शक्ति मयो आत्मा । आत्मा ( परमात्मा ) सब शक्तियों से युक्त है । वह जिस शक्ति की भावना जहां करे । वहीं अपने संकल्प द्बारा । उसे प्रकट हुआ देखता है - सर्वशक्ति हि भगवानयैव तस्मै हि रोचते ।
भगवान ही सब प्रकार की शक्तियों वाला तथा सब जगह वर्तमान है । वह जहां चाहे अपनी शक्ति को प्रकट कर सकता है । वास्तव में नित्य । पूर्ण । और अक्षय बृह्म में ही समस्त शक्तियाँ मौजूद हैं । संसार में कोई वस्तु ऐसी है ही नहीं । जो सर्व रूप से प्रतिष्ठित बृह्म में मौजूद न हो । शांत आत्मा । बृह्म में ज्ञान शक्ति । क्रिया शक्ति आदि अनेकानेक शक्तियाँ वर्तमान हैं  । बृह्म की चेतना शक्ति शरीर धारी जीवों में दिखाई देती है । तो उसकी स्पंदन शक्ति । जिसे क्रिया शक्ति भी कहते हैं । हवा में दिखती है । उसी शक्ति रूप बृह्म की जड़ शक्ति पत्थर में है । तो दृव शक्ति ( बहने की शक्ति ) जल में दिखती है । चमकने की शक्ति का दर्शन हम आग में कर सकते हैं । शून्य 0 शक्ति आकाश में । सब कुछ होने की भव शक्ति संसार की स्थिति में । सबको धारण करने की शक्ति दशों दिशाओं में । नाश शक्ति नाशों में । शोक शक्ति शोक करने वालों में । आनन्द शक्ति प्रसन्न चित्त वालों में । वीर्य शक्ति योद्धाओं में । सृष्टि करने की शक्ति सृष्टि में देख सकते हैं । कल्प के अन्त में सारी शक्तियाँ स्वयं बृह्म में रहती हैं ।
परमेश्वर की स्वाभाविक स्पन्दन शक्ति प्रकृति कहलाती है । वही जगन्माया नाम से भी प्रसिद्ध है । यह स्पन्दन शक्ति रूपी भगवान की इच्छा इस दृश्य जगत की रचना करती है । जब शुद्ध संवित में जड़ शक्ति का उदय हुआ । तो संसार की विचित्रता उत्पन्न हुई । जैसे चेतन मकड़ी से जड़ जाले की उत्पत्ति हुई । वैसे ही चेतन बृह्म से प्रकृति उदभूत हुई । बृह्मानन्द स्वरूप आत्मा ही भाव की दृढ़ता से मिथ्या रूप में प्रकट हो रहा है ।
प्रकृति के 3 प्रकार हैं - सूक्ष्म । मध्यम । और स्थूल । तीनों अवस्थाओं में प्रकृति स्थित रहती है । इसी कारण

प्रकृति भी 3 प्रकार की कहलाई । इसके भी 3 भेद हुए - सत्व । रज । तम । त्रिगुणात्मक प्रकृति को अविद्या भी कहते हैं । इसी अविद्या से प्राणियों की उत्पत्ति हुई । सारा जगत अविद्या के आश्रय गत है । इससे परे पार बृह्म है । जैसे फूल और उसकी सुगन्ध । धातु और आभूषण । अग्नि और उसकी ऊष्णता 1 रूप है । वैसे ही चित्त और स्पन्दन शक्ति 1 ही है । मनोमयी स्पन्दन शक्ति उस बृह्म से भिन्न हो ही नहीं सकती । जब चित्त शक्ति क्रिया से निवृत्त होकर । अपने अधिष्टान की ओर । यानी बृह्म में लौट आती है । और वहीं शांत भाव से स्थित रहती है । तो उसी अवस्था को शांत बृह्म कहते हैं । जैसे सोना किसी आकार के बिना नहीं रहता । वैसे ही पार बृह्म भी चेतनता के बिना । जो कि उसकी स्व भान है । स्थित नहीं रहता । जैसे तिक्तता के बिना मिर्च । मधुरता के बिना गन्ने का । रस नहीं रहता । वैसे चित्त की चेतनता स्पन्दन के बिना नहीं रहती ।
प्रकृति से परे स्थित पुरूष सदा ही शरद ऋतु के आकाश की तरह स्वच्छ । शांत व शिव रूप है । भृम रूप वाली प्रकृति परमेश्वर की इच्छा रूपी स्पन्दनात्मक शक्ति है । वह तभी तक संसार में भृमण करती है कि जब तक वह नित्य तृप्त और निर्विकार शिव का दर्शन नही करती । जैसे नदी समुद्र में पड़ कर अपना रूप छोड़ कर समुद्र ही बन जाती है । वैसे ही प्रकृति पुरूष को प्राप्त करके पुरूष रूप हो जाती है । चित्त के शांत हो जाने पर परम पद को पाकर तद रूप हो जाती है ।
जिससे जगत के सब पदार्थों की उत्पत्ति होती है । जिसमें सब पदार्थ स्थित रहते हैं । और जिसमें सब लीन हो जाते हैं । जो सब जगह । सब कालों में । और सब वस्तुओं में मौजूद रहता है । उस परम तत्व को बृह्म कहते हैं ।

यत: सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च । यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नम: ।
ज्ञाता ज्ञानं तथाज्ञेयं दृष्टादर्शनदृश्यभू: । कर्ता हेतु: क्रिया यस्मात्तस्मै ज्ञत्यात्मने नम: ।
स्फुरन्तिसीकरा यस्मादानन्दरस्याम्बरेवनौ । सर्वेषां जीवनं तस्मै बृह्मानन्दात्मने नम: ।
श्री योग वशिष्ठ महा रामायण: ।
जिससे सब प्राणी प्रकट होते हैं । जिसमें सब स्थित हैं । और जिसमें सब लीन हो जाते हैं । उस सत्य रूप तत्व को नमस्कार हो । जिससे ज्ञाता । ज्ञान । ज्ञेय का दृष्टा । दर्शन । दृश्य का तथा कर्ता । हेतु और क्रिया का उदय होता है । उस ज्ञान स्वरूप तत्व को नमस्कार हो । जिससे पृथ्वी और स्वर्ग में आनंन्द की वर्षा होती है । और जिससे सबका जीवन है । उस बृह्मानंद स्वरूप तत्व को नमस्कार हो ।
बृह्म केवल उसको जानने वाले के अनुभव में ही आ सकता है । उसका वर्णन नहीं हो सकता । वह अवाच्य । अनभिव्यक्त । और इन्द्रियों से परे है । बृह्म का ज्ञान । केवल अपने अनुभव द्वारा ही होता है । वह परम पराकाष्ठा स्वरूप है । वह सब दृष्टियों की सर्वोत्तम दृष्टि है । वह सब महिमाओं की महिमा है । वह सब प्राणि रूपी मोतियों का तागा है । जो कि उनके हृदय रूपी छेदों में पिरोया हुआ है । वह सब प्राणि रूपी मिर्चों की तीक्ष्णता है । वह पदार्थ का पदार्थ तत्व है । वह सर्वोत्तम तत्व है । उस परमेश्वर तत्व को प्राप्त करना । उसी सर्वेश्वर में स्थिति करना । यही मानव जीवन की सार्थकता है ।
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