शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

मोक्ष का कारण कर्म है या ज्ञान ?

उस सत्चित आनन्द रूप आत्मा को नमस्कार है । जिससे सब भासते हैं । और जिसमें सब लीन और स्थिर होते हैं । एवं जिससे ज्ञाता । ज्ञान । ज्ञेय । दृष्टा । दर्शन । दृश्य । और कर्ता । करण । कर्म । सिद्ध होते हैं । जिस आनन्द के समुद्र के कण से सम्पूर्ण विश्व आनन्द वान है । और जिस आनन्द से सब जीव जीते हैं ।
अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण के मन में एक संशय उत्पन्न हुआ । तब वह उसके निवृत्त करने के अर्थ अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर विधि संयुक्त प्रणाम करके स्थित हुआ । और नमृता पूर्वक प्रश्न किया - हे भगवान ! आप सर्व तत्वज्ञ और सर्व शास्त्रों के ज्ञाता हो । एक संशय मुझको है । सो कृपा करके निवृत्त करो । मोक्ष का कारण कर्म है । या ज्ञान ? अथवा दोनों ?
अगस्त्य बोले - हे ब्रह्मण्य ! केवल कर्म मोक्ष का कारण नहीं । और केवल ज्ञान से भी । मोक्ष प्राप्त नहीं होता । मोक्ष की प्राप्ति । दोनों से ही होती है । कर्म करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है । मोक्ष नहीं होता । और अतःकरण की शुद्धि के बिना केवल ज्ञान से भी मुक्ति नहीं होती । इससे दोनों से मोक्ष की सिद्धि होती है । कर्म करने से अतःकरण शुद्ध होता है । फिर ज्ञान उपजता है । और तब मोक्ष होता है । जैसे दोनों पंखों से पक्षी आकाश मार्ग में सुख से उड़ता है । वैसे ही कर्म और ज्ञान दोनों से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
हे ब्रह्मण्य ! इसी आशय के अनुसार एक पुरातन इतिहास है । वह तुम सुनो ।
अग्निवेष का पुत्र कारण नाम ब्राह्मण गुरु के निकट जा षट अंगों सहित चारों वेद अध्ययन करके गृह में आया । और कर्म से रहित होकर तूष्णीं हो स्थित रहा । अर्थात संशय युक्त हो कर्मों से रहित हुआ ।
जब उसके पिता ने देखा कि - यह कर्मों से रहित हो गया है । तो उससे कहा कि - हे पुत्र ! तुम कर्म क्यों नहीं करते ? तुम कर्म के न करने से सिद्धता को कैसे प्राप्त होगे ? जिस कारण तुम कर्म से रहित हुए हो । वह कारण कहो ?
कारण बोला - हे पिता ! मुझको एक संशय उत्पन्न हुआ है । इसलिये कर्म से निवृत्त हुआ हूँ । वेद में एक ठौर तो

कहा है कि - जब तक जीता रहे । तब तक कर्म अर्थात अग्निहोत्र आदि करता रहे । और एक ठौर कहा है कि - न धन से मोक्ष होता है । न कर्म से मोक्ष होता है । न पुत्र आदि से मोक्ष होता है । और न केवल त्याग से ही मोक्ष होता है । इन दोनों में क्या कर्तव्य है ? मुझको यही संशय है । सो आप कृपा करके निवृत्त करो । और बतलाओ कि - क्या कर्तव्य है ?
अगस्त्य बोले - हे सुतीक्ष्ण ! जब कारण ने पिता से ऐसा कहा । तब अग्निवेष बोले - हे पुत्र ! एक कथा जो पहले हुई है । उसको सुन कर हृदय में धारण कर । फिर जो तेरी इच्छा हो । सो करना । एक काल में सुरुचि नामक अप्सरा । जो सम्पूर्ण अप्सराओं में उत्तम थी । हिमालय पर्वत के सुन्दर शिखर पर । जहाँ देवता और किन्नर गण जिनके हृदय कामना से तृप्त थे । अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करते थे । और जहाँ गंगा के पवित्र जल का प्रवाह लहर ले रहा था । बैठी थी । उसने इन्द्र का एक दूत अन्तरिक्ष से चला आता देखा । और जब निकट आया । तो उससे पूछा - अहो भाग्य । देवदूत ! तुम देवगणों में श्रेष्ठ हो । कहाँ से आये हो । और अब कहाँ जाओगे । सो कृपा करके कहो ?
देवदूत बोला - हे सुभद्रे ! अरिष्ट नेमि नामक एक धर्मात्मा राजर्षि ने अपने पुत्र को राज्य देकर वैराग्य लिया । और सम्पूर्ण विषयों की अभिलाषा त्याग करके । गन्धमादन पर्वत में जा तप करने लगा । उसी से मेरा एक कार्य था । और उस कार्य के लिये मैं उसके पास गया था । अब इन्द्र के पास जिसका मैं दूत हूँ । सम्पूर्ण वृतान्त निवेदन करने को जाता हूँ ।
अप्सरा ने पूछा - हे भगवान ! वह वृतान्त कौन सा है । मुझसे कहो ? मुझको तुम अति प्रिय हो । यह जानकर पूछती हूँ । महापुरुषों से जो कोई प्रश्न करता है । तो वे उद्वेग रहित होकर उत्तर देते हैं । देवदूत बोला - हे भद्रे ! वह वृतान्त मैं विस्तार पूर्वक तुमसे कहता हूँ । मन लगाकर सुनो ।
जब उस राजा ने गन्धमादन पर्वत पर बड़ा तप किया । तब देवताओं के राजा इन्द्र ने मुझको बुलाकर आज्ञा दी - हे दूत ! तुम गन्धमादन पर्वत पर जो नाना प्रकार की लताओं और वृक्षों से पूर्ण है । विमान । अप्सरा । और नाना प्रकार की सामग्री । एवं गन्धर्व । यक्ष । सिद्ध । किन्नर । ताल । मृदंग आदि वाध संग ले जाकर राजा को विमान पर बैठा के यहाँ ले आओ । तब मैं विमान और सामग्री सहित जहाँ राजा था आया । और राजा से कहा - हे राजन ! तुम्हारे कारण विमान ले आया हूँ । इस पर आरूढ़ होकर तुम स्वर्ग को चलो । और देवताओं के भोग भोगो ।
तब राजा बोला - हे दूत ! प्रथम तुम स्वर्ग का वृतान्त मुझे सुनाओ । तुम्हारे स्वर्ग में क्या क्या दोष और गुण हैं । तो उनको सुन कर मैं हृदय में विचारूँ । पीछे जो मेरी इच्छा होगी । तो चलूँगा । मैंने कहा - हे राजन ! स्वर्ग में बड़े 


बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्य वाले होते हैं । वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं । जो मध्यम पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं । और जो कनिष्ठ पुण्य वाले हैं । वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं । वे तो तुमसे कहे । अब स्वर्ग के जो दोष हैं । वे भी सुनो । हे राजन ! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं । और उत्तम सुख भोगते हैं । उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है । क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं । उनको देखकर क्रोध उपजता है कि - ये मेरे समान क्यों बैठे है । और जो आपसे नीचे बैठे हैं । उनको देखकर अभिमान उपजता है कि - मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि - जब पुण्य क्षीण होते हैं । तब जीव को उसी काल में मृत्यु लोक में गिरा देते हैं । एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं । हे भद्रे ! जब इस प्रकार मैंने राजा से कहा । तो राजा बोला - हे देवदूत ! उस स्वर्ग के योग्य हम नहीं हैं । और हमको उसकी इच्छा भी नहीं है । जैसे सर्प अपनी त्वचा को पुरातन जानकर त्याग देता है । वैसे ही हम उग्र तप करके यह देह त्याग देंगे । हे देवदूत ! तुम अपने विमान को जहाँ से लाये हो । वहीं ले जाओ । हमारा नमस्कार है ।
हे देवि ! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा । तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया । और सम्पूर्ण वृतान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ । और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला - हे दूत ! तुम फिर जहाँ राजा है । वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्म पद की इच्छा हुई है । इसलिये तुम

उसको अपने साथ वाल्मीकि के पास । जिसने आत्म तत्व को आत्माकार जाना है । ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि - हे महा ऋषे ! इस राजा को तत्व बोध का उपदेश करना । क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों भी इच्छा नहीं । इससे तुम इसको तत्व बोध का उपदेश करो । और यह तत्व बोध को पाकर संसार दुख से मुक्त हो ।
हे सुभद्रे ! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा । तब मैं वहाँ से चलकर राजा के निकट आया । और उससे कहा कि - हे राजन ! तुम संसार समुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकि जी के पास चलो । वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकि जी स्थान पर आया । और उस स्थान में राजा को बैठा । और प्रणाम कर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकि जी ने कहा - हे राजन ! कुशल तो है ? राजा बोले - हे भगवन ! आप परम तत्वज्ञ । और वेदान्त जानने वालों में श्रेष्ठ हैं । मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ । और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ । कृपा करके उत्तर दीजिए कि - संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो ?
इतना सुन वाल्मीकि बोले - हे राजन ! महा रामायण औषध तुमसे कहता हूँ । उसको सुन कर उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे । तब जीवन मुक्त होकर बिचरोगे । हे राजन ! वह वशिष्ठ और राम का संवाद है । और उसमें मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन कर जैसे राम अपने स्वभाव में स्थित हुए । और जीवन मुक्त होकर बिचरे हैं । वैसे ही तुम भी बिचरोगे ।

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