शनिवार, मई 01, 2010

राम कहो राम कहो राम कहो बावरे

ना वह रीझे जप तप कीन्हे ना आतम का जारे।ना वह रीझे धोती टांगे ना काया के पखारे॥दया करे धरम मन राखे घर में रहे उदासी।अपना सा दुख सबका जाने ताहि मिले अबिनासी॥सहे कुसब्द बाद हू त्यागे छाड़े गरब गुमाना।यही रीझ मेरे निरंकारकी कहत मलूक दिवाना॥

राम कहो राम कहो राम कहो बावरे।अवसर न चूक भोंदू पायो भला दाव रे॥जिन तोको तन दीन्हों ताको न भजन कीन्हों।जनम सिरानो जात लोहे कैसो ताव रे॥रामजी को गाय गाय रामजी को रिझाव रे।रामजी के चरन कमल चित्त माहिं लाव रे॥कहत मलूकदास छोड़ दे तें झूठी आसरे ।आनंद मगन होइ के हरि गुन गाव रे॥

सदा सोहागिन नारि सो जाके राम भतारा।मुख मांगे सुख देत है जगजीवन प्यारा॥कबहु न चढे रंडपुरा जाने सब कोई।अजर अमर अबिनासिया ताको नास न होईनर देही दिन दोय की सुन गुरुजन मेरी।क्या ऐसों का नेहरा मुए बिपति घनेरीना उपजे ना बीनसि संतन सुखदाई।कहें मलूक यह जानि के मैं प्रीति लगाई

हमसे जनि लागे तू माया।थोरे से फिर बहुत होयगी सुनि पैहे रघुराया॥अपने में है साहेब हमारा अजहू चेत दिवानी।काहु जनके बस परि जैहो भरत मरहुगी पानीतरह्वै चिते लाज करु जनकी डारु हाथ की फांसी।जन तें तेरो जोर न लहि है रच्छपाल अबिनासी॥कहे मलूका चुप करु ठगनी औगुन राउ दुराई।जो जन उबरे राम नाम कहि ताते कछु न बसाई॥

हरि समान दाता कोउ नांही सदा बिराजे संतन मांहीनाम बिसंभर बिस्व जिआवे सांझ बिहान रिजक पहुंचावेदेइ अनेकन मुख पर ऐने औगुन करे सोगुन करि माने॥काहू भांति अजार न देई जाही को अपना कर लेई॥घरी घरी देता दीदार जन अपने का खिजमतगार॥तीन लोक जाके औसाफ जनका गुनह करे सब माफ॥गरुवा ठाकुर है रघुराई कहे मूलक क्या करूं बड़ाई॥

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...