शनिवार, मई 01, 2010

साध संगति बिना भाव नहीं उपजे

माया मोहिला कान्ह। मैं जन सेवक तोरा।।संसार परपंच मैं ब्याकुल परमानंदा। त्राहि त्राहि अनाथ नाथ गोबिंदारैदास बिनवे कर जोरी। अबिगत नाथ कवन गति मोरी

मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते। साध संगति पाइ परम गतेमैले कपरे कहा लउ धोवउ, आवेगी नीद कहा लगु सोवउ।।जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटयो। झूठे बनज उठि ही गई हाटयोकहु रविदास भइयो जब लेखो। जोई जोई कीनो सोई सोई देखो
मेरी प्रीति गोपाल सू जिनि घटे हो। मैं मोलि महंगी लई तन सटे हो।।हिरदे सुमिरन करों नैन आलोकना, श्रवना हरि कथा पूरि राखू। मन मधुकर करो चरणा चित धरो राम रसाइन रसना चाखू।।साध संगति बिना भाव नहीं उपजे भाव बिन भगति क्यूं होइ तेरी। बंदत रैदास रघुनाथ सुन बीनती, गुर प्रसादि क्रिया करो मेरी।।

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