शनिवार, मई 01, 2010

आठ पहर यो झूमते ज्यों मात हाथी

दया धरम हिरदे बसे बोले अमरत बैन
तेई ऊंचे जानिये जिनके नीचे नैन॥आदर मान महत्व सत बालापन को नेह ।यह चारों तब ही गए जबहि कहा कछु देहु॥इस जीने का गर्व क्या कहा देह की प्रीत।बात कहत ढर जात है बालू की सी भीत॥अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।दास मलूका कह गए सबके दाता राम॥

दरद दिवाने बावरे अलमस्त फकीरा।एक अकीदा ले रहे ऐसे मन धीरा॥प्रेमी पियाला पीवते बिदरे सब साथी।आठ पहर यो झूमते ज्यों मात हाथी॥उनकी नजर न आवते कोइ राजा रंक।बंधन तोड़े मोह के फिरते निहसंक॥साहेब मिल साहेब भये कछु रही न तमाई।कहें मलूक किस घर गये जहं पवन न जाई॥

दीनदयाल सुनी जबते तब ते हिय में कुछ ऐसी बसी है।तेरो कहाय के जांऊ कहाँ मैं तेरे हित की पट खेंचि कसी है॥तेरो इ एक भरोसो मलूक को तेरे समान न दूजो जसी है।ए हो मुरारि पुकारि कहों अब मेरी हसी नहीं तेरी हसी है॥
नाम हमारा खाक है हम खाकी बन्देखाक ही ते पैदा किये अति गाफिल गन्देकबहु न करते बंदगी दुनिया में भूले।आसमान को ताकते घोड़े चढ़ि फूले॥जोरू लड़के खुस किये साहेब बिसराया।राह नेकी की छोड़ि के बुरा अमल कमायाहरदम तिस को यादकर जिन वजूद संवारा।सबे खाक दर खाक है कुछ समुझ गंवाराहाथी घोड़े खाक के खाक खानखानी।कहें मलूक रह जायगा औसाफ निसानी

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