शनिवार, मई 01, 2010

अबिगत नाथ निरंजन देवा

अबिगत नाथ निरंजन देवा। मैं का जांनू तुम्हारी सेवाबांधू न बंधन छांऊ न छाया तुमहीं सेऊ निरंजन रायाचरन पताल सीस असमाना सो ठाकुर कैसे संपटि समानासिव सनिकादिक अंत न पाया खोजत ब्रह्मा जनम गवायातोडूँ न पाती पूजों न देवा सहज समाधि करों हरि सेवानख प्रसेद जाके सुरसुरी धारा रोमावली अठारह भाराचार बेद जाके सुमृत सासा भगति हेत गावे रैदासा

अहो देव तेरी अमित महिमा, महादेवी माया। मनुज दनुज बन दहन, कलि विष कलि किरत सबे समय समंन।। निरबांन पद भुवन, नाम बिघनोघ पवन पातगरग उत्तम बामदेव, विस्वामित्र ब्यास जमदग्नि श्रिंगी ऋषि दुर्बासा। मारकंडेय बालमीक भृगु अंगिरा, कपिल बगदालिम सुकमातंम न्यासा।।अत्रिय अष्टावक्र गुर गजानन, अगस्त पुलस्त्य पारासर सिव विधाता। रिष जड़ भरत सऊ भरिष, चवन बसिष्टि जिह्वनि ज्यागबलिक तव ध्यानि राता।।ध्रुव अंबरीक प्रहलाद नारद, विदुर द्रोण अक्रूर पांडव सुदामा। भीषम उधव विभीषन चंद्रहास, बलि कलि भक्ति जुक्ति जयदेव नामा।।गरुड़ हनूमान मांन जनकात्मजा, जय बिजय द्रोपदी गिरि सुता श्री प्रचेता। रुकमांगद अंगद बसदेव देवकी, अवर अगिनत भक्त कहूं केता।।हे देव सेष सनकादि श्रुति भागवत, भारती स्तवत अनवरत गुणर्दुबगेवं। अकल अबिछन ब्यापक ब्रह्ममेक रस सुध चैतंनि पूरन मनेवं।।सगुण निरगुण निरामय निरबिकार, हरि अज निरंजन बिमल अप्रमेव। परमात्मा प्रकृति पर प्रमुचित, सचिदानंद गुर ग्यान मेव।।हे देव पवन पावक अवनि, जलधि जलधर तरनि। काल जाम मिति ग्रह ब्याध्य बाधा, गज भुजंग भुवपाल। ससि सक्र दिगपाल, आग्या अनुगत न मुचत मृजादा।।अभय बर ब्रिद प्रतग्या सत संकल्प, हरि दुष्ट तारन चरन सरन तेरे। दास रैदास यह काल ब्याकुल, त्राहि त्राहि अवर अवलंबन नहीं मेरे।।
आज दिवस लेऊँ बलिहारा ।मेरे घर आया राम का प्यारा आंगन बंगला भवन भयो पावन ।हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥करूं दंडवत चरन पखारूं ।तन मन धन उन उपर वारूं ॥कथा कहे अरु अरथ बिचारें ।आप तरें औरन को तारें ॥कह रैदास मिले निज दासा ।जनम जनम के काटे पासा ॥

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