शनिवार, मई 01, 2010

संतो अनन भगति यह नांही

रे मन माछला संसार समंदे, तू चित्र बिचित्र बिचारि रे। जिहि गाले गिलिया ही मरिये, सो संग दूरि निवारि रेजम छेड़ि गणि डोरि छे कंकन, पर त्रिया गालो जान रे। होइ रस लुबधि रमे यू मूरख, मन पछतावे न्याणि रेपाप गिलयो छे धरम निबोली, तू देख देख फल चाख रे। पर त्रिया संग भलो जे होवे, तो राणा रावन देखि रेकहे रैदास रतन फल कारन , गोबिंद का गुन गाइ रे। काचो कुंभ भरयो जल जैसे, दिन दिन घटतो जाइ रे

संत की संगति संत कथा रस। संत प्रेम माझे दीजे देवा देवसंत तुझी तनु संगति प्रान। सतगुर ग्यान जाने संत देवा देवसंत आचरन संत को मारग। संत क ओल्हग ओल्हगणी।।अउर इक मागउ भगति चिंतामणि। जणी लखावहु असंत पापी सणि।।रविदास भणै जो जाने सो जान । संत अनंतह अंतर नाही।।
संतो अनन भगति यह नांही। जब लग सत रज तम पांचू गुण ब्यापत हैं या मांहीसोइ आन अंतर करे हरि सू अपमारग कू आने। काम क्रोध मद लोभ मोह की पल पल पूजा ठाने।।सति सनेह इष्ट अंगि लावे अस्थल अस्थल खेले। जो कुछ मिले आंनि अखित ज्यूं सुत दारा सिरि मेले।।हरिजन हरि बिन और न जाने तजे आन तन त्यागी। कहे रैदास सोई जन निरमल निसदिन जो अनुरागी।।

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