बुधवार, फ़रवरी 01, 2012

जहँ ॐ ओंकार निरंजन नाहीं बृह्मा विष्णु वेद नहीं जाँहीं

अनन्त कोटि अवतार हैं माया के गोविन्द । कर्ता हो हो अवतरे बहुर पङे जग फ़ँद ।
बृह्मा विष्णु महेश्वर माया और धर्मराय कहिये । इन पाँचों मिल प्रपंच बनाया वाणी हमरी लहिये ।
इन पाँचों मिल जीव अटकाये । जुगन जुगन हम आन छुटाये ।
बन्दी छोङ हमारा नाम । अजर अमर स्थीर है ठाम ।
पीर पैगम्बर कुतुब औलिया । सुर नर मुनि जन ज्ञानी । ये ताको राह न पाया । जम के बँधे प्रानी ।
धर्मराय की धूमा धामी जम पर जंग चलाऊँ । जोरा को तो जान न दूँगा । बाँध अदल घर लाऊँ ।
काल अकाल दोऊ को मोसूँ । महाकाल सिर मूँङूँ । मैं तो तखत हजूरी हुकुमी । चोर खोज के ढूँङूँ ।
मूला माया मग में बैठी हँसा चुन चुन खाई । ज्योति स्वरूपी भया निरंजन मैं ही कर्ता भाई ।
सहस अठासी दीप मुनीश्वर बँधे मुला डोरी । एत्या में जम का तलबाना चलिये पुरुष की शोरी ।
मूला का तो माथा दागूँ सत की मोहर करूँगा । पुरुष दीप को हँस चलाऊँ दरा न रोकन दूँगा ।
हम तो बन्दी छोङ कहावा धर्मराय है चकवे । सतलोक की सकल सुनावा वाणी हमरी अखवे ।
नौ लख पट्टन ऊपर खेलूँ साहदरे कू रोकूँ । द्वादश कोटि कटक सब काटूँ हँस पठाऊँ मोखूँ ।
चौदह भुवन गमन है मेरा जल थल में सरबंगी । खालिक खलक खलक में खालिक अविगत अचल अभंगी ।
अगर अलील चक्र है मेरा जित से हम चल आये । पाँचों पर परवाना मेरा बाँध छुटावन्न धाये ।
जहँ ॐ ओंकार निरंजन नाहीं बृह्मा विष्णु वेद नहीं जाँहीं ।
जहाँ करता नहीं जान भगवाना । काया माया पिण्ड न प्राणा ।
पाँच तत्व तीनों गुण नाहीं । जोरा काल दीप नहिं जाही ।
अमर करूँ सतलोक पठाऊँ । ताते बन्दी छोङ कहाऊँ ।
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शिव बृह्मा का राज इन्द्र गिनती कहाँ । चार मुक्ति बैकुण्ठ समझ येता लहया ।
शंख जुगन की जूनी उमृ बङ धारिया । जा जननी कुर्बान सु कागज पारिया ।
येती उमृ बुलन्द मरेगा अन्त रे । सतगुरु लगे न कान भेंटे न सन्त रे ।

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