शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

पंच 5 भूत का ये शरीर वासना रूप ही है

हे शिष्य ! संसार भृम मात्र सिद्ध है । इसको भृम मात्र जानकर विस्मरण करना । यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है । और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय । तब परम पद की प्राप्ति हो । वासना का एक पुतला है । उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ़ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है । और फिर सूर्य के ताप से पिघल कर जल होता है । तो केवल शुद्ध ही रहता है । वैसे ही आत्मा रूपी जल है । उसमें संसार की सत्यता रूपी जड़ता शीतलता है । और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञान रूपी सूर्य उदय होगा । तब संसार की सत्यता रूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत्त हुई । तब मन नष्ट हो जावेगा । और जब मन नष्ट हुआ । तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है । और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना दो प्रकार की है । एक शुद्ध । और दूसरी अशुद्ध । अशुद्ध वासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा को देह आदि हैं । उनमें अहंकार करता है । और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ । तब नाना प्रकार की वासना उपजती हैं । जिससे घटी यंत्र की तरह भृमता रहता है ।
हे साधो ! यह जो पंच 5 भूत का शरीर तुम देखते हो । सो सब वासना रूप है । और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं । और जब धागा टूट जाता है । तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं । और नहीं ठहरते । वैसे ही वासना के क्षय होने पर । पंच 5 भूत का शरीर नहीं रहता । इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है । शुद्ध वासना में जगत का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है । हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है । और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कच्चा बीज उगता है । और जो दग्ध हुआ है । सो फिर नहीं उगता । वैसे ही अज्ञानी की वासना रस सहित है । इससे जन्म का कारण है । और ज्ञानी की वासना रस रहित है । वह जन्म का कारण नहीं । ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक

होती है । वह किसी गुण से मिल कर अपने में चेष्टा नहीं देखता । वह खाता । पीता । लेता । देता । बोलता चलता । एवम और अन्य व्यवहार करता है । पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है । कदाचित द्वैत भावना उसको नहीं फुरती । वह अपने स्वभाव में स्थित है । इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती । जैसे कुम्हार के चक्र को जब तक घुमावे । तब तक फिरता है । और जब घुमाना छोड़ दे । तब स्थीयमान गति से उतरते उतरते स्थिर रह जाता है । वैसे ही जब तक अहंकार सहित वासना होती है । तब तक जन्म पाता है । और जब अहंकार से रहित हुआ । तब फिर जन्म नहीं पाता ।
हे साधो ! इस अज्ञान रूपी वासना के नाश करने को एक बृह्म विद्या ही श्रेष्ठ उपाय है । जो मोक्ष उपायक शास्त्र है । यदि इसको त्याग कर । और शास्त्र रूपी गर्त्त में गिरेगा । तो कल्प पर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा । जो बृह्म विद्या का आश्रय करेगा । वह सुख से आत्म पद को प्राप्त होगा । हे भारद्वाज ! यह मोक्ष उपाय राम और वशिष्ठ का संवाद है । यह विचारने योग्य है । और बोध का परम कारण है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...