शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

उस सर्वात्मा को नमस्कार है

राजा बोले - हे भगवान ! राम कौन थे ? कैसे थे ? और कैसे होकर बिचरे । सो कृपा करके कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे राजन ! शाप के वश से विष्णु ने । जो अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं । अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया । इतना सुन राजा ने पूछा - हे भगवान !  चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ । और किसने दिया । सो कहो ?
वाल्मीकि बोले - हे राजन ! एक काल में सनत कुमार । जो निष्काम हैं । बृह्मपुरी में बैठे थे । और त्रिलोक पति विष्णु भगवान भी वैकुण्ठ से उतरकर बृह्मपुरी में आये । तब बृह्मा सहित सब सभा उठकर खड़ी हुई । और उनका पूजन किया । पर सनत कुमार ने पूजन नहीं किया । इस बात को देखकर विष्णु  बोले - हे सनत कुमार ! तुमको निष्कामता का अभिमान है । इससे तुम काम से आतुर होगे । और स्वामि कार्तिक तुम्हारा नाम होगा । सनत कुमार बोले - हे विष्णु ! सर्वज्ञता का अभिमान तुमको भी है । इसलिये कुछ काल के लिए तुम्हारी सर्वज्ञता निवृत्त होकर अज्ञानता प्राप्त होगी ।
हे राजन ! एक तो यह शाप हुआ । दूसरा एक और भी शाप है सुनो । एक काल में भृगु की स्त्री जाती रही थी । उसके वियोग से वह ऋषि क्रोधित हुआ था । उसको देखकर विष्णु हँसे । तब भृगु ब्राह्मण ने शाप दिया - हे विष्णु ! मेरी तुमने हँसी की है । सो मेरी तरह तुम भी स्त्री के वियोग से आतुर होगे । और एक दिवस देव शर्मा ब्राह्मण ने नर सिंह भगवान को शाप दिया था । सो भी सुनिये । एक दिन नर सिंह भगवान गंगा के तीर पर गये । और वहाँ देव शर्मा ब्राह्मण की स्त्री को देखकर नर सिंह भयानक रूप दिखाकर हँसे । निदान उनको देखकर ऋषि की स्त्री ने भय पाय प्राण छोड़ दिया । तब देव शर्मा ने शाप दिया - तुमने मेरी स्त्री का वियोग किया । इससे तुम भी स्त्री का वियोग पावोगे ।
हे राजन ! सनत कुमार । भृगु । और देव शर्मा के । शाप से विष्णु ने मनुष्य का शरीर धारण किया । और दशरथ 


के घर में प्रकटे । हे राजन ! वह जो शरीर धारण किया । और आगे जो वृतान्त हुआ । सो सावधान होकर सुनो । अनुभवात्मक मेरा आत्मा जो त्रिलोकी अर्थात स्वर्ग । मृत्यु । और पाताल का प्रकाश कर्ता और भीतर बाहर आत्म तत्व से पूर्ण है । उस सर्वात्मा को नमस्कार है । हे राजन ! यह शास्त्र जो आरम्भ किया है । इसका विषय । प्रयोजन और सम्बन्ध क्या है ? और अधिकारी कौन है ? सो सुनो ।
यह शास्त्र सत । चित्त । आनन्द रूप । अचिन्त्य चिन्मात्र आत्मा को जताता है । यह तो विषय है । परमानन्द आत्मा की प्राप्ति । और अनात्म अभिमान । दुख की निवृत्ति प्रयोजन है । और बृह्म विद्या और मोक्ष उपाय से आत्म पद प्रतिपादन सम्बन्ध है । जिसको यह निश्चय है कि - मैं अद्वैत बृह्म अनात्म देह से बाँधा हुआ हूँ । सो किसी प्रकार छूटूँ । वह न अति ज्ञान वान है । न मूर्ख है । ऐसा विकृति आत्मा यहाँ अधिकारी है । यह शास्त्र मोक्ष ( परमानन्द की प्राप्ति ) करने वाला है । जो पुरुष इसको विचारेगा । वह ज्ञान वान होकर फिर जन्म मृत्यु रूप संसार में न आवेगा । हे राजन ! यह महा रामायण पावन है । श्रवण मात्र से ही सब पाप का नाश कर्त्ता है । जिसमें राम कथा है । यह मैंने प्रथम अपने शिष्य भारद्वाज को सुनाई थी ।
एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये । और मैंने उसको उपदेश किया था । वह उसको सुनकर । वचन रूपी समुद्र से । सार रूपी रत्न निकाल । और हृदय में धरकर । एक समय सुमेरु पर्वत पर गया । वहाँ बृह्मा बैठे थे । उसने उनको प्रणाम किया । और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई । तब बृह्मा ने प्रसन्न होकर उससे कहा - हे पुत्र ! कुछ वर माँग । मैं तुझ पर प्रसन्न हुआ हूँ । भारद्वाज ने । जिसका उदार आशय था । उनसे कहा - हे भूत भविष्य के ईश्वर ! जो तुम प्रसन्न हुए हो । तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार सुख से मुक्त हों । और परम पद पावें । और उसी का उपाय भी कहो ।

बृह्मा बोले -  हे पुत्र ! तुम अपने गुरु वाल्मीकि के पास जाओ । उसने आत्म बोध महा रामायण शास्त्र का जो परम पावन संसार समुद्र के तरने का पुल है । आरम्भ किया है । उसको सुनकर जीव महा मोह जनक संसार समुद्र से तरेंगे । निदान परमेष्ठी बृह्मा जिनकी सर्व भूतों के हित में प्रीति है । आप ही भारद्वाज को साथ लेकर मेरे आश्रम में आये । और मैंने भले प्रकार से उनका पूजन किया । उन्होंने मुझसे कहा - हे मुनियों में श्रेष्ठ वाल्मीकि ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का आरम्भ किया है । इस उद्यम का त्याग न करना । इसकी आदि से अन्त पर्यन्त समाप्त करना । क्योंकि यह मोक्ष उपाय संसार रूपी समुद्र के पार करने का जहाज । और इससे सब जीव कृतार्थ होंगे ।
इतना कहकर बृह्मा जैसे समुद्र से चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठ कर फिर लीन हो जावे । वैसे ही अंतर्ध्यान हो गये । तब मैंने भारद्वाज से कहा - हे पुत्र ! बृह्मा ने क्या कहा ? भारद्वाज बोले - हे भगवन ! बृह्मा ने तुमसे यह कहा कि - हे मुनियों में श्रेष्ठ ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का उद्यम किया है । उसका त्याग न करना । इसे अन्त पर्यन्त समाप्त करना । क्योंकि संसार समुद्र के पार करने को यह कथा जहाज है । और इससे अनेक जीव कृतार्थ होकर संसार संकट से मुक्त होंगे । इतना कह कर फिर वाल्मीकि बोले - हे राजन ! जब इस प्रकार बृह्मा ने मुझसे कहा । तब उनकी आज्ञा अनुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया । हे पुत्र ! वशिष्ठ के उपदेश को पाकर जिस प्रकार राम निशंक हो बिचरे हैं । वैसे ही तुम भी बिचरो । तब उसने प्रश्न किया - हे भगवान ! जिस प्रकार राम जीवन मुक्त होकर बिचरे । वह आदि से कृम करके मुझसे कहिये ? वाल्मीकि बोले - हे भारद्वाज ! राम । लक्ष्मण । भरत । शत्रुघन । सीता । कौशल्या । सुमित्रा । और दशरथ । ये 8 तो जीवन मुक्त हुए हैं । और 8 मन्त्री । अष्ट गण । वशिष्ठ और वामदेव से आदि अष्टा विंशति जीवन मुक्त हो बिचरे हैं । उनके नाम सुनो । राम से लेकर दशरथ पर्यन्त 8 तो ये कृतार्थ होकर परम बोध वान हुए हैं । और 1 कुन्तभासी । 2 शतवर्धन । 3 सुखधाम । 4 विभीषण । 5 इन्द्रजीत । 6 हनुमान । 7 वशिष्ठ । और 8 वामदेव । ये 8 मन्त्री निश्शंक हो चेष्टा करते भये । और सदा अद्वैत निष्ठ हुए हैं । इनको कदाचित स्वरूप से द्वैत भाव नहीं फुरा है । ये अनामय पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्ध परम पावनता को प्राप्त हुए हैं ।
इति श्री योग वशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे कथारम्भ वर्णनो नाम प्रथम सर्गः

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