शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

इसी अवस्था को शांत बृह्म कहते हैं

श्री योग वशिष्ठ रामायण में कहा है - सर्व शक्ति मयो आत्मा । आत्मा ( परमात्मा ) सब शक्तियों से युक्त है । वह जिस शक्ति की भावना जहां करे । वहीं अपने संकल्प द्बारा । उसे प्रकट हुआ देखता है - सर्वशक्ति हि भगवानयैव तस्मै हि रोचते ।
भगवान ही सब प्रकार की शक्तियों वाला तथा सब जगह वर्तमान है । वह जहां चाहे अपनी शक्ति को प्रकट कर सकता है । वास्तव में नित्य । पूर्ण । और अक्षय बृह्म में ही समस्त शक्तियाँ मौजूद हैं । संसार में कोई वस्तु ऐसी है ही नहीं । जो सर्व रूप से प्रतिष्ठित बृह्म में मौजूद न हो । शांत आत्मा । बृह्म में ज्ञान शक्ति । क्रिया शक्ति आदि अनेकानेक शक्तियाँ वर्तमान हैं  । बृह्म की चेतना शक्ति शरीर धारी जीवों में दिखाई देती है । तो उसकी स्पंदन शक्ति । जिसे क्रिया शक्ति भी कहते हैं । हवा में दिखती है । उसी शक्ति रूप बृह्म की जड़ शक्ति पत्थर में है । तो दृव शक्ति ( बहने की शक्ति ) जल में दिखती है । चमकने की शक्ति का दर्शन हम आग में कर सकते हैं । शून्य 0 शक्ति आकाश में । सब कुछ होने की भव शक्ति संसार की स्थिति में । सबको धारण करने की शक्ति दशों दिशाओं में । नाश शक्ति नाशों में । शोक शक्ति शोक करने वालों में । आनन्द शक्ति प्रसन्न चित्त वालों में । वीर्य शक्ति योद्धाओं में । सृष्टि करने की शक्ति सृष्टि में देख सकते हैं । कल्प के अन्त में सारी शक्तियाँ स्वयं बृह्म में रहती हैं ।
परमेश्वर की स्वाभाविक स्पन्दन शक्ति प्रकृति कहलाती है । वही जगन्माया नाम से भी प्रसिद्ध है । यह स्पन्दन शक्ति रूपी भगवान की इच्छा इस दृश्य जगत की रचना करती है । जब शुद्ध संवित में जड़ शक्ति का उदय हुआ । तो संसार की विचित्रता उत्पन्न हुई । जैसे चेतन मकड़ी से जड़ जाले की उत्पत्ति हुई । वैसे ही चेतन बृह्म से प्रकृति उदभूत हुई । बृह्मानन्द स्वरूप आत्मा ही भाव की दृढ़ता से मिथ्या रूप में प्रकट हो रहा है ।
प्रकृति के 3 प्रकार हैं - सूक्ष्म । मध्यम । और स्थूल । तीनों अवस्थाओं में प्रकृति स्थित रहती है । इसी कारण

प्रकृति भी 3 प्रकार की कहलाई । इसके भी 3 भेद हुए - सत्व । रज । तम । त्रिगुणात्मक प्रकृति को अविद्या भी कहते हैं । इसी अविद्या से प्राणियों की उत्पत्ति हुई । सारा जगत अविद्या के आश्रय गत है । इससे परे पार बृह्म है । जैसे फूल और उसकी सुगन्ध । धातु और आभूषण । अग्नि और उसकी ऊष्णता 1 रूप है । वैसे ही चित्त और स्पन्दन शक्ति 1 ही है । मनोमयी स्पन्दन शक्ति उस बृह्म से भिन्न हो ही नहीं सकती । जब चित्त शक्ति क्रिया से निवृत्त होकर । अपने अधिष्टान की ओर । यानी बृह्म में लौट आती है । और वहीं शांत भाव से स्थित रहती है । तो उसी अवस्था को शांत बृह्म कहते हैं । जैसे सोना किसी आकार के बिना नहीं रहता । वैसे ही पार बृह्म भी चेतनता के बिना । जो कि उसकी स्व भान है । स्थित नहीं रहता । जैसे तिक्तता के बिना मिर्च । मधुरता के बिना गन्ने का । रस नहीं रहता । वैसे चित्त की चेतनता स्पन्दन के बिना नहीं रहती ।
प्रकृति से परे स्थित पुरूष सदा ही शरद ऋतु के आकाश की तरह स्वच्छ । शांत व शिव रूप है । भृम रूप वाली प्रकृति परमेश्वर की इच्छा रूपी स्पन्दनात्मक शक्ति है । वह तभी तक संसार में भृमण करती है कि जब तक वह नित्य तृप्त और निर्विकार शिव का दर्शन नही करती । जैसे नदी समुद्र में पड़ कर अपना रूप छोड़ कर समुद्र ही बन जाती है । वैसे ही प्रकृति पुरूष को प्राप्त करके पुरूष रूप हो जाती है । चित्त के शांत हो जाने पर परम पद को पाकर तद रूप हो जाती है ।
जिससे जगत के सब पदार्थों की उत्पत्ति होती है । जिसमें सब पदार्थ स्थित रहते हैं । और जिसमें सब लीन हो जाते हैं । जो सब जगह । सब कालों में । और सब वस्तुओं में मौजूद रहता है । उस परम तत्व को बृह्म कहते हैं ।

यत: सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च । यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नम: ।
ज्ञाता ज्ञानं तथाज्ञेयं दृष्टादर्शनदृश्यभू: । कर्ता हेतु: क्रिया यस्मात्तस्मै ज्ञत्यात्मने नम: ।
स्फुरन्तिसीकरा यस्मादानन्दरस्याम्बरेवनौ । सर्वेषां जीवनं तस्मै बृह्मानन्दात्मने नम: ।
श्री योग वशिष्ठ महा रामायण: ।
जिससे सब प्राणी प्रकट होते हैं । जिसमें सब स्थित हैं । और जिसमें सब लीन हो जाते हैं । उस सत्य रूप तत्व को नमस्कार हो । जिससे ज्ञाता । ज्ञान । ज्ञेय का दृष्टा । दर्शन । दृश्य का तथा कर्ता । हेतु और क्रिया का उदय होता है । उस ज्ञान स्वरूप तत्व को नमस्कार हो । जिससे पृथ्वी और स्वर्ग में आनंन्द की वर्षा होती है । और जिससे सबका जीवन है । उस बृह्मानंद स्वरूप तत्व को नमस्कार हो ।
बृह्म केवल उसको जानने वाले के अनुभव में ही आ सकता है । उसका वर्णन नहीं हो सकता । वह अवाच्य । अनभिव्यक्त । और इन्द्रियों से परे है । बृह्म का ज्ञान । केवल अपने अनुभव द्वारा ही होता है । वह परम पराकाष्ठा स्वरूप है । वह सब दृष्टियों की सर्वोत्तम दृष्टि है । वह सब महिमाओं की महिमा है । वह सब प्राणि रूपी मोतियों का तागा है । जो कि उनके हृदय रूपी छेदों में पिरोया हुआ है । वह सब प्राणि रूपी मिर्चों की तीक्ष्णता है । वह पदार्थ का पदार्थ तत्व है । वह सर्वोत्तम तत्व है । उस परमेश्वर तत्व को प्राप्त करना । उसी सर्वेश्वर में स्थिति करना । यही मानव जीवन की सार्थकता है ।

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