शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

ईश्वरों का और मन्दिरों का निर्माण कैसे करें ?

काम करने के दिन । यहाँ पर इतने लोगों को देखना । कुछ अदभुत सा लगता है । नहीं ? पहली बार जब आप यहाँ मिले थे । शनिवार था । हमने चर्चा की थी कि - प्रेम क्या है । यदि आप यहाँ थे । तो शायद आपको याद होगा । हम सब लोग मिलकर । मेरा अभिप्राय है साथ साथ । इस पूरे मसले के संबंध में खोज बीन कर रहे हैं । यह अत्यंत जटिल है । यदि आप बुरा न मानें । तो आपको विचार करना है । केवल सहमत नहीं हो जाना है । इसे विचारने में आपको अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल पूरी ताकत से करना होगा । तो हम लोग एक साथ इस प्रश्न की छानबीन करने जा रहे हैं कि - प्रेम क्या है ? साथ साथ आप और हम एक ही मार्ग पर साथ चल रहे हैं । आप वक्ता का केवल अनुमोदन नहीं कर रहे हैं । और यह नहीं कह रहे हैं - हाँ ! सुनने में अच्छा लग रहा है । उपनिषद का । गीता का भी यही कहना है इत्यादि । यह सब बकवास है ।
सर्वप्रथम अपने अनुभवों । निष्कर्षों । विचारों के सम्बंध में । किसी बात को स्वीकार न करें । मेरी भी नहीं । मैं तो एक पथिक हँ । मेरा महत्व नहीं है । हम । आप । और मैं । मिलकर पता लगाने जा रहे हैं कि - क्या स्पष्ट है । क्या स्पष्ट नहीं है । हम लोग मिलकर जाँच कर रहे हैं । सन्देह कर रहे हैं । वक्ता का क्या कहना है  । उसे हम कतई भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं । यह मार्गदर्शन । निर्देश । या सहायता के लिए कोई भाषण नहीं है । यह तो अत्यधिक नादानी की बात होगी । उस तरह की सहायता तो हमें पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती रही है । और इसके बावजूद हम जहाँ थे । वहीं हैं । हम जैसे अभी हैं । वहीं से आरंभ करना है । अतीत में हम कहां थे ? अथवा भविष्य में हम क्या होंगे ? उससे नहीं । अभी हम जैसे हैं । भविष्य में भी वैसे ही होंगे । हमारा लोभ । हमारा द्वेष । हमारी ईर्ष्या । हमारा प्रबल अंधविश्वास । किसी को पूजने की हमारी कामना ।  अभी तो हम यही हैं ।
इस प्रकार हम मिलकर एक बहुत लंबे पथ पर चल रहे हैं । इसके लिए ऊर्जा चाहिये । और हम इस मसले पर गौर करने जा रहे हैं कि - प्रेम क्या है ? बहुत गहरी और सूक्ष्म छानबीन हम इस बारे में भी करें कि - ऊर्जा क्या है ? आपकी प्रत्येक चेष्टा ऊर्जा पर आधारित है । अभी जब आप वक्ता को सुन रहे हैं । आप अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं । घर के निर्माण में । वृक्ष लगाने में । कोई भी मुद्रा बनाने में । बात करने में । इन सबको लिए ऊर्जा की आवश्यकता है 


। कौवे की काँव काँव । सूर्योदय । और सूर्यास्त । यह सब कुछ ऊर्जा है । जन्म लेते ही बच्चे का रोना । ऊर्जा का ही अंग है । वायलिन बजाना । बोलना । विवाह करना । यौन क्रिया । धरती की हर बात में ऊर्जा आवश्यक है ।
अतः हम पूछते हैं । ऊर्जा क्या है ? यह है । वैज्ञानिक प्रश्नों में से एक । वैज्ञानिक कहते हैं । ऊर्जा पदार्थ है । हो सकता है कि - वह पदार्थ हो । पर उसके पहले मूलभूत ऊर्जा क्या है ? उसका उदगम स्रोत क्या है ? किसने इस ऊर्जा का सृजन किया ? सावधान । यह नहीं कह दें कि ईश्वर ने । और ऐसा कह कर चल दीजिए । ईश्वर को मैं नहीं मानता । वक्ता का कोई ईश्वर नहीं है । इतना स्पष्ट है न ?
तो ऊर्जा क्या है ? हम पता लगा रहे हैं । वैज्ञानिकों के कथन को । हम स्वीकार नहीं कर रहे हैं । और यदि आप कर सकें । तो जो कुछ भी प्राचीन लोगों ने कहा है । हम उस सबको त्याग दें । छोड़ दें उन्हें । राह के किनारे छोड़कर हम साथ साथ आगे बढ़ें ।
आपका मस्तिष्क । जो एक पदार्थ है ? दस लाख वर्षों के ? एकत्रित अनुभवों का भण्डार है । और उस तमाम विकास का अर्थ है - ऊर्जा । और मैं स्वयं से पूछ रहा हूं । आप स्वयं से पूछ रहे हैं । क्या कोई ऊर्जा है ? जो ज्ञान के क्षेत्र में अर्थात विचार के क्षेत्र में चालित और आबद्ध नहीं है ? क्या कोई ऐसी ऊर्जा है ? जो विचार की गतिविधि से परे है ?
विचार आपको प्रबल ऊर्जा देता है । प्रत्येक सुबह नौ बजे आफिस जाने के लिए । पैसा अर्जित करने के लिए । ताकि आप बेहतर घर बना लें । अतीत के संबंध में विचार । भविष्य का विचार । वर्तमान की योजना बनाना । इस तरह विचार प्रचण्ड ऊर्जा  देता है । धनी बन जाने के लिए आप प्रबल अग्नि शिखा के वेग की भांति कार्य करते हैं । विचार ऊर्जा उत्पन्न करता है । अतः अब हमें विचार के स्वरूप का ही गहराई से पता लगाना है ।
विचार ने इस समाज को योजना बद्ध किया है । इसने इस संसार को विभाजित कर दिया है । साम्यवादी । समाजवादी । जनतंत्र वादी । गणतंत्र वादी । थल सेना । जल सेना । वायु सेना । ना केवल देश से निकाल बाहर करना । वरन वध करना भी शासकों सैनिकों का कार्य है । इस प्रकार हमारे जीवन में विचार बड़ा ही महत्वपूर्ण है । क्योंकि विचार के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते । हर चीज विचार की प्रक्रिया में निहित है । तो विचारणा क्या है ? आप पता लगाईए । मेरी बात ही नहीं सुनिए । वक्ता ने तो इस पर बहुत चर्चा की है । इसलिए उसकी किताबें नहीं देखिए । यह नहीं कहिए । यह सब मैं पहले सुन चुका हूँ । यहां आप समस्त किताबों को । अब तक आपने जितनी सारी चीजें पढ़ी हैं । सबको भुला दीजिए । यह इसलिए कि इस पर प्रत्येक बार बिलकुल नये ढंग से हम गौर करें ।
विचारणा या विचारना ज्ञान पर आधारित है । और हमने असीम ज्ञान एकत्र कर लिया है । कैसे हम एक दूसरे को

बेच डालें । एक दूसरे का शोषण किस प्रकार करें । ईश्वरों का और मन्दिरों का निर्माण कैसे करें ? आदि हम जानते हैं ।
बिना अनुभव के ज्ञान नहीं हो सकता है । अनुभव स्मृति के रूप में मस्तिष्क में संग्रहित ज्ञान ? यही विचार का प्रारंभ है । अनुभव सदैव सीमित है । क्योंकि आप इसमें और और जोड़ रहे हैं । इस प्रकार अनुभव सीमित है । ज्ञान सीमित है । स्मृति सीमित है । अतः विचार सीमित है । ईश्वर जिन्हें विचारों ने निर्मित किया है । आपके ईश्वर ? आपकी विचारणा सदैव सीमित रहेंगें । सीमितता से हम उदगम की । ऊर्जा की खोज का प्रयास करते हैं । आप समझ रहे हैं न ? हम उदगम सृष्टि का प्रारंभ खोजने की कोशिश करते हैं ।
विचार ने भय का निर्माण किया । ठीक ? आगे चलकर क्या होगा । क्या आप इससे भयभीत नहीं हैं ? नौकरी कहीं खो न दें ? परीक्षा में असफल ना हो जाएं । सफलता की सीढ़ी पर शायद ऊपर न चढ़ पाएं ? और आप भयभीत हैं कि - आप अपनी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर पाए । अकेले खड़े रह पाने में असमर्थ हैं । आप स्वयं में एक ताकत नहीं बन पाए । आप हमेशा किसी न किसी पर निर्भर रहते हैं । और यह बात प्रचण्ड भय उत्पन्न करती है ।
हमारे नित्य जीवन का यही तथ्य है कि - हम भयभीत लोग हैं । और इसी से सुरक्षा चाहते हैं । इसी से भय उत्पन्न होता है । भय प्रेम को विनष्ट कर देता है । जहां भय है । वहां प्रेम का अस्तित्व हो ही नहीं सकता । भय स्वयं में ही एक प्रबल उर्जा है । प्रेम का भय से कोई संबंध ही नहीं है । वे एक दूसरे से पूर्णतया अलग हैं । तो भय का उदगम क्या है ? इस सब पर प्रश्न करना ही जीवन्तता है । विचारणा ने भय उत्पन्न किया है । भविष्य । अतीत के संबंध में विचार । वातावरण से शीघ्रता पूर्वक समायोजित नहीं हो पाना । शायद कहीं कुछ हो न जाये । मेरी पत्नी कहीं मेरा परि त्याग न कर दे । अथवा कहीं उसकी मृत्यु ना हो जाए । तब मैं बिल्कुल अकेला रह जाऊंगा । मैं तब क्या करूंगा ? मेरे अनेक बच्चे हैं । इसलिए किसी से पुनर्विवाह कर लेना बेहतर होगा । कम से कम वह मेरे बच्चों की देखभाल तो करेगी । ऐसे ही और विचार । यह है अतीत पर आधारित भविष्य के संबंध में विचारणा । इस प्रकार विचार और समय इसमें निहित है । भविष्य के सबंध में विचार । भविष्य अर्थात आने वाला कल । वह विचारणा ही भय का कारण है । इस प्रकार समय और विचार भय के केन्द्रीय तत्व हैं ।
तो जीवन के प्रधान तत्व हैं - समय और विचार । समय आन्तरिक और बाहरी दोनों है । भीतरी मैं यह हूँ । मैं वह बनूंगा । और बाहरी । और समय है - विचार । ये दोनों ही गतियां हैं ।
मृत्यु । पीड़ा । चिन्ता । दुख । एकाकीपन । हताशा । इन तमाम भयावह स्थितियों से मैं गुजरता हूँ । क्या स्थान है । इनका मेरे जीवन में ? तमाम तीवृ पीड़ाओं से अपने जीवन में आदमी गुजरता है । बस यही है । हमारी जिन्दगी ? मैं पूछ रहा हूँ । क्या आपकी जिन्दगी बस इतनी ही है ?
यही है आपका जीवन । आपकी चेतना जिन अन्तर्वस्तुओं से निर्मित है । वे हैं आपकी सोच । आपकी परम्परा । आपकी शिक्षा । आपकी जानकारी । आपका भय । आपका अकेलापन । आप सावधानी से गौर करके देख लीजिए । यही हैं आप । आपकी व्यथा । आपका दर्द । आपकी चिन्ता । आपका अकेलापन । आपका ज्ञान । यह सब प्रत्येक मनुष्य की साझा अवस्था है । यह एक तथ्य है । पृथ्वी का हर आदमी । पीड़ा । कष्ट । चिन्ता । झगड़े । प्रलोभन । इसकी कामना । इसकी उपेक्षा । आदि से गुजरता है । अतः आप एक व्यक्ति नहीं हैं । आप एक पृथक 


प्राण । एक प्रथक आत्मा नहीं हैं । आपकी चेतना वही है । शारीरिक रूप में ही नहीं । वरन मनोवैज्ञानिक रूप में । जो संपूर्ण मानव जाति की चेतना है ।
हम पता लगाने की । छानबीन करने की । कोशिश कर रहे हैं कि - जीवन क्या है ? हम कह रहे हैं कि जब तक किसी भी प्रकार का भय है । कोई भी दूसरी चीज अस्तित्व में नहीं आयेगी । अगर किसी भी प्रकार की आसक्ति है । दूसरा अस्तित्व में आयेगा ही नहीं । और वह दूसरा है - प्रेम । यानि किसी भी प्रकार की आसक्ति हो । तो प्रेम असंभव है ।
अतः हम गौर करने जा रहे हैं कि - संसार क्या है । और मृत्यु क्या है ? हम इनका पता लगा रहे हैं । हम सभी मृत्यु से इस कदर भयभीत क्यों हैं ? आप जानते हैं । मरने का क्या अर्थ है ? क्या आपने दर्जनों लोगों को मरते । घायल होते नहीं देखा है ? क्या कभी आपने गहराई से पता लगाया है कि - मृत्यु क्या है ? यह प्रश्न बड़ा ही महत्वपूर्ण है । उतना ही महत्वपूर्ण जितना कि यह प्रश्न कि - जीवन क्या है ? हम लोगों ने कहा कि जीवन है । यही सब व्यर्थ की बातें । जानकारी । प्रतिदिन नौ बजे आफिस जाना आदि । विवाद । संघर्ष । इसको नहीं चाहना । उसकी कामना रखना । जीवन क्या है ? शायद हम जानते हैं । हमने गंभीरता पूर्वक कभी भी यह पता नहीं लगाया कि - मरण क्या है ?
क्या है मरण ? निश्चित ही मृत्यु एक असाधारण चीज होनी चाहिए । प्रत्येक चीज आपसे ले ली जाती है । आपकी आसक्ति । आपका पैसा । आपकी पत्नी । आपके बच्चे । आपका देश । आपके अन्धविश्वास । आपके तमाम गुरू । आपके समस्त भगवान । आपकी यह कामना हो सकती है कि - आप इन सभी को दूसरी दुनिया में लेते जाएं । पर आप ऐसा कर ही नहीं सकते । अतः मृत्यु कहती है । पूर्णतया अनासक्त हो जाएं । मृत्यु जब आती है । तो ठीक यही होता । किसी भी व्यक्ति पर आप निर्भर नहीं रहते । कुछ भी नहीं रह जाता । फिर भी आप शरीर धारण करेंगे । ऐसा आप विश्वास करते हैं । यह कल्पना बहुत ही आराम पहुंचाने वाली है । पर यह यथार्थ नहीं है ।
हम लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं । जीवित रहते हुए मरने का क्या अर्थ है ? आत्म हत्या कर लेना नहीं । उस तरह की मूर्खता के संबंध में मैं बात नहीं कर रहा । मृत्यु का क्या अर्थ है ? मैं खुद ही पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ ? जिसका आशय है । क्या खुद अपने समेत आदमी ने जो कुछ भी निर्मित किया है । उस सबसे आदमी पूरी तरह मुक्त हो सकता है ?
मरने का अर्थ क्या है ? प्रत्येक चीज का परि त्याग । मृत्यु अत्यधिक तेज छुरे से काटकर । आपको तमाम आसक्तियों से । आपके ईश्वर से । देवताओं से । अन्धविश्वासों से । आराम की कामना से । अगले जीवन आदि से बिलकुल अलग कर देती है । मैं पता लगाने जा रहा हूँ कि - मरण का अर्थ क्या है ? क्योंकि यह उतना ही महत्वपूर्ण है । जितना कि जीवन । तो हम किस प्रकार पता लगाएंगे ? सचमुच में सैद्धांतिक रूप में नहीं । क्या अर्थ है मरण का ? मैं सचमुच पता लगाना चाहता हूँ ? वैसे ही जैसे आप पता लगाना चाहते हैं कि - मैं आपके लिए बोल रहा हूँ । अतः सो मत जाइए । मरण का क्या अर्थ है ? यह प्रश्न कीजिए । अपने आपसे । हम युवा हैं । या अधिक वृद्ध । यह प्रश्न सदैव कायम है । इसका अर्थ है । पूरी तरह से मुक्त हो जाना । आदमी ने जो भी गढ़ा है । उन सबों से पूरी तरह अनासक्त हो जाना । कोई आसक्ति नहीं । कोई भविष्य नहीं । कोई अतीत नहीं । जीवित रहते हुए मृत हो जाना । इसके सौन्दर्य को । इसकी श्रेष्ठता को । इसकी असाधारण शक्ति को । आप नहीं देख रहे हैं । इसका अर्थ क्या है । आप समझ रहे हैं ? आप जीवित हैं । लेकिन प्रत्येक क्षण आपका मरण हो रहा है । और इस प्रकार पूरे जीवन में आप किसी भी चीज से आसक्त नहीं ।  यही है अर्थ मरण का ।
इस प्रकार का मरण है - जीवन । आप समझ रहे हैं ? जीवित होने का अर्थ है । प्रत्येक दिन अपनी आसक्ति की प्रत्येक चीज का परि त्याग करते जा रहे हैं । क्या आप यह कर सकते हैं ? बड़ा ही स्पष्ट सरल यथार्थ है । पर विस्मयकारी हैं । इसके गूढ़ार्थ । इस प्रकार प्रत्येक दिन नया दिन है । प्रत्येक दिन आपकी मृत्यु हो रही है । और आप पुर्नजीवित हो रहे हैं । इसमें विस्मयकारी ओजस्विता है । उर्जा है । क्योंकि आप अब किसी भी चीज से भयभीत नहीं हैं । ऐसी कोई भी चीज नहीं । जो आपको आहत कर सके । आहत होने का अस्तित्व ही नहीं ।
आदमी ने जो कुछ भी गढ़ा है । उन सबों का पूर्णतया परि त्याग करना होगा । यही है - मरण का अर्थ । क्या आप ऐसा कर सकते हैं ? क्या आप ऐसा प्रयास करेंगे ? क्या आप इसक प्रयोग करेंगे ? महज एक दिन नहीं । वरन प्रत्येक दिन । नहीं श्रीमान ! आप ऐसा नहीं कर पाएंगे । इसके लिए आपका मस्तिष्क प्रशिक्षित नहीं है । क्योंकि आपकी शिक्षा । आपकी परम्पराओं । आपकी पुस्तकों । और आपके प्रोफेसरों द्वारा । आपका मस्तिष्क गहराई से प्रशिक्षित है । गंभीर रूप से संस्कारित है । इसके लिए यह पता लगाना आवश्यक है कि - प्रेम क्या है ? प्रेम और मरण बिलकुल साथ साथ कार्यशील हैं । मृत्यु कहती है - मुक्त हो जाओ । मुक्त हो जाओ आसक्ति से । आप अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते । और प्रेम कहता है - प्रेम कहता है - इसके लिए कोई शब्द नहीं है । प्रेम का अस्तित्व मुक्त अवस्था में ही है । आपको पत्नी से । नयी लड़की से । अथवा नये पति से । मुक्ति नहीं । वरन विपुल शक्ति । ओजस्विता । पूर्ण मुक्ति की उर्जा की अनुभूति । जे कृष्णमूर्ति  पुस्तक - अन्तिम वार्ताएं । अध्याय: मद्रास वार्ता 1 जनवरी, 1986 पृष्ठ 129 से 135
जिन्दगी का मतलब जीने में है । जब हम डरे हुए रहते हैं । या किसी के कहे मुताबिक चलते हैं । या हम किसी की नकल करते हुए जिन्दगी जीते हैं । तो क्या इसे जीना कहेंगे ? क्या तब जिन्दगी लीने लायक होती है ? किसी प्रमाणित व्यक्ति के रूप में स्थापित व्यक्ति का पिछलग्गू बनना । क्या जिन्दगी जीना है ? जब हम किसी के पिछलग्गू बने होते हैं । चाहे वे महान संत । राजनेता या विद्वान हो । तब क्या हम जी रहे होते हैं ?
यदि आप ध्यान पूर्वक अपने तौर तरीकों को देखें । तो आप पाएंगे कि - आप किसी ना किसी के पदचिह्नों पर चलने के अलावा कुछ अन्य नहीं कर रहे हैं ? दूसरों के कदमों पर कदम रखते हुए चलने के सिलसिले को हम जीना कह देते हैं । और इसके अंत में हम यह सवाल भी करते हैं कि - जिन्दगी की अर्थवत्ता क्या है ? लेकिन यह सब करते हुए जिन्दगी का कोई मतलब नहीं रह जाता है । जिन्दगी में अर्थवत्ता तब ही हो सकती है । जब हम कई तरह की मान्यताओं और प्रमाणिकताओं को एक ओर रख दें । जो कि सरल नहीं है ।
आप जानते हैं कि - कैसे एक ग्रामीण व्यक्ति या किसान उस प्रतिमा को ईश्वर मान लेता है । जिस पर वह कुछ फल फूल आदि चढ़ाता है । आदिम मानव बादलों के गरजने को ईश्वर का इशारा समझता था । कुछ अन्य मनुष्य पेड़ पौधों प्रकृति को भगवान मानते हैं । जैसे हमारे देश में पीपल । बरगद का पूजन किया जाता है । वैसे ही यूरोप में सेब और जैतून के वृक्षों की पूजा की जाती रही है । ये सब आज भी चला आ रहा है ।
बहुत पुराने शहरों से लेकर अभी अभी बने शहरों तक सभी जगह मन्दिर होते हैं । मन्दिरों में मूर्तियां होती हैं । जिन पर तेल । फूलों के हार । आभूषण चढ़ाकर पूजा जाता हैं । इसी तरह आप भी कोई नई कल्पना रच सकते हैं । जो कि आपके वंश की परम्परा आपकी पारिवारिक पृष्ठ भूमि से उपजी हो । और उसे आप ईश्वर कह सकते हैं । शायद आपको मालूम ना हो । जिस व्यक्ति ने संसार में पहले पहल परमाणु बम गिराये थे । उसने भी सोचा था कि - ईश्वर उसके साथ है । हिटलर से लेकर किचनर तक सभी युद्धोन्मादी सेना में छोटे बड़े ओहदों पर आसीन सभी नायक ईश्वर के नाम पर युद्ध करने में जरा नहीं हिचकते । तो क्या यह सब प्रतिमा । विचार और कर्मकाण्ड ईश्वर हो सकता है ? या क्या ईश्वर कोई ऐसी चीज है ? जिसका आकलन हम अपने मन से नहीं कर सकते । जो हमारी कल्पना से परे की चीज है ।
ईश्वर की गूढ़ता की थाह ले पाना हमारे लिए असंभव है । ईश्वर के सत्य का अनुभव कभी कभी तब होता है  । जब हम पूर्णतः मौन में होते हैं । जब हमारा मन प्रक्षेपण में रत नहीं होता । जब हम अन्दर ही अन्दर खुद से ही युद्ध और संघर्ष की स्थिति में नहीं होते । जब मन निश्चल होता है । शायद तब हम जान पाते हैं कि ईश्वर क्या है ?
इसलिये यह बहुत महत्वपूर्ण है कि - कम उमृ से ही हम ईश्वर शब्द में अटकें नहीं । ईश्वर के बारे में हमें दूसरों द्वारा जो कुछ भी बताया समझाया जाता है । उसे स्वीकारें नहीं । लाखों लोग हैं । जो ईश्वर के सम्बंध में आपको सिखाने । बताने । समझाने के लिए उत्सुक हैं । परन्तु हमें यह करना है कि - जो कुछ भी वो कहें । हम उस सबकी जांच करें । इसी तरह कुछ ऐसे भी लोग हैं । जो कहते हैं । ईश्वर वगैरह कुछ नहीं होता । तो हम इन लोगों की भी ना सुनें । पर बारीकी और सावधानी से हर बात की जांच पड़ताल करें । ना विश्वास करने वालों पर अंधविश्वास करें । ना ईश्वर को नकारने वाले को ही मानें । जब हमारा मन विश्वास और अविश्वास दोनों से ही आजाद होता है । तब मन निश्चल होता है । केवल तभी संभावना बनती है कि - ईश्वर संबंधित सत्य का बोध हो सके ।
इन सब पहलुओं के बारे में खुले मन से सोचने समझने की जरूरत है । इन सबके बारे में किसी व्यक्ति को कहां से शुरूआत करनी है । यह सब कोई नहीं बताता ।
जब आप किसी महान गुरू नुमा व्यक्ति के पास जाते हैं । तो वह आपको सिद्ध करके बताने की कोशिश करेगा कि - ईश्वर है ? वह कई विधियां बतायेगा कि किस किस तरह से क्या क्या करने पर । यह मंत्र जपो । तो ये होगा । इस प्रकार पूजा करो । तो ये होगा । इस वृत उपवास अनुशासन का पालन करने पर यह परिणाम होगा आदि । यह सब करने के बाद भी आप पायेंगे कि - जो प्राप्त होगा । वह ईश्वर नहीं । आपको वही प्राप्त होगा । जिस चीज को आपका मन प्रक्षेपित कर रहा है । जिस चीज की रचना मन कर रहा है । यह सब आपकी मानसिक इच्छाओं की ही एक छवि होगी । पर ईश्वर कदापि नहीं ।
तो ईश्वर उसके बारे में जानना समझना इतना भी सरल नहीं है । ईश्वर सम्बंधित बातों को जानने समझने के लिए बहुत अधिक चिंतन मनन खोजबीन की जरूरत है । पहले तो अपने आपको सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होगा । अपने आपको इस योग्य बनाना होगा कि - आप स्वयं इसका पता लगा सकें । स्वयं ही इन सब बातों के पीछे के रहस्यों को जान सकें । इस कार्य में कोई दूसरा आपका आधार नहीं बन सकता । आपको अपनी सहायता स्वयं करनी होगी । स्वयं ही ईश्वर को तलाशना होगा । जे. कृष्णमूर्ति

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