बुधवार, अगस्त 11, 2010

मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है ।

मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । अजब है गुरुओं का दरबार । भरा जहां भक्ती का भंडार ।
शबद अनमोल सुनाते हैं । कि मन का भरम मिटाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । गुरूजी सत का देते ग्यान । जीव का हो ईश्वर से ध्यान ।
वो अमृत खूब पिलाते हैं । कि मन की प्यास बुझाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । गुरूजी नही लेते कुछ दान । फ़िर भी रखते दुखियों का ध्यान ।
वो अपना ग्यान लुटाते हैं । अनेकों कष्ट मिटाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । कर लो गुरु चरणों का ध्यान । तुझसे करे भक्त बखान ।
गुरूजी सारे दुख मिटाते हैं । कि भव से पार लगाते हैं । मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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