शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

भारतवर्ष का वर्णन

जम्बूदीप के मध्यभाग में इलावृत नाम का वर्ष है । उसके पूर्व में भद्राश्ववर्ष । तथा उसके पूर्व दक्षिण मेंहिरण्वान नामक वर्ष है । मेरु के दक्षिण में किम्पुरुषवर्ष माना गया है । उसके दक्षिण भाग में भारतवर्ष है । मेरु के दक्षिण पश्चिम में हरिवर्ष । पश्चिम में केतुमालवर्ष । पश्चिम उत्तर में रम्यक । और उत्तर में कुरुवर्ष स्थित है । जो कल्पवृक्षों से भरा हुआ है । भारतवर्ष को छोडकर अन्य सभी वर्षों में सिद्धि स्वभाव से ही प्राप्त होती है । यानी निश्चित है । यहां इन्द्रदीप । कशेरुमान । ताम्रवर्ण । गभस्तिमान । नागदीप । कटाह । सिंहल । वारूण । नाम के आठ वर्ष है । नवां भारतवर्ष है । जो चारों ओर समुद्र से घिरा हुआ है । भारतवर्ष के पूर्व में किरात तथा पश्चिम में यवन देश स्थित हैं । इस्के दक्षिण में आन्ध्र । उत्तर में तुरुष्का आदि देश हैं ।
भारत में ब्राह्मण । वैश्य । क्षत्रिय । शूद्र रहते हैं । यहां महेन्द्र । मलय । सह्य । शुक्तिमान । ऋक्ष । विन्ध्य ।
पारयात्र । ये सात पर्वत हैं । भारतवर्ष में । वेद । स्मृति । नर्मदा । वरदा । सुरसा । शिवा । तापी । पयोष्णी
। सरयू । कावेरी । गोमती । गोदावरी । भीमरथी । कृष्णवेणी । केतुमाला । ताम्रपर्णी । चन्द्रभागा । सरस्वती । ऋषिकुल्या । कावेरी । मत्तगंगा । पयस्विनी । विदर्भा । शतद्रू । नाम की पवित्र नदियां हैं ।
पांच्चाल । कुरु । मत्स्य । यौधेय । पटच्चर । कुन्त । शूरसेन । ये मध्यदेश के निवासी हुये । पाद्म । सूत । मगध । चेदि । काशेय । विदेह । ये पूर्व के देश हैं । कोशल । कलिंग । वंग । पुण्ड्र । अंग । विदर्भ । मूलकजनों के देश हैं । विन्ध्यपर्वत के अतर्गत विधमान देश पूरब तथा दक्षिण के तटवर्ती भूभाग में बसे हैं । पुलिंद । अश्मक । जीमूत । नय । देश में निवास करने वाले । कर्णाटक । कम्बोज तथा घण । ये दक्षिण भाग के निवासी हैं । अम्बष्ठ । द्रविड । लाट । कम्भोज । स्त्रीमुख । शक । आनर्तवासी । दक्षिण पश्चिम के निवासी हैं । स्त्रीराज्य । सैन्धव । म्लेच्छ । नास्तिक । यवन । मथुरा । निषध । के रहने वाले लोगों का देश पश्चिमी भूभाग है । माण्डव्य । तुषार । मूलिका । अश्वमुख । खश । महाकेश । महानास । देश उत्तर पश्चिम में हैं । लम्बक । स्तननाग । माद्र । गान्धार । बाह्यिक । म्लेच्छ देश हिमाचल के उत्तरतटवर्ती भूभाग में है । त्रिगर्त । नील । कोलात । ब्रह्मपुत्र । सटड्क्ण । अभीषाह । कश्मीर । उत्तरपूर्व में हैं ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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