गुरुवार, जुलाई 15, 2010

श्री विनय शर्मा

श्री विनय शर्मा ( जी ) ब्लागर हैं । और एक व्यक्ति के तौर पर भले इंसानो की श्रेणी में आते हैं । धार्मिक प्रवृति के विनय जी अक्सर दूसरों की सहायता करने में विश्वास रखतें हैं । इनके दो ब्लाग " मेरे ब्लाग " vinay-mereblog.blogspot.com और " स्नेह परिवार " snehparivar.blogspot.com हैं । विनय जी क्योंकि प्राचीन ग्यान तन्त्र मन्त्र ज्योतिष आदि में भरपूर आस्था रखते हैं । और इस तरह के लोगों के सम्पर्क में काफ़ी समय से हैं । और इन्होंने इस तरह की कुछ साधनायें भी की हैं । इसलिये निसंकोच यह कहा जा सकता है कि ये संसारी होते हुये भी मन से बेहद धार्मिक हैं । और सांसारिक कार्यों से बचा समय साधु संत मन्दिर या
धार्मिक साहित्य के अध्ययन में लगाते हैं । मेरा पहले विनय जी से कोई परिचय नहीं था । पर क्योंकि मेरा लेखन विनय जी की रुचि के अनुकूल था । अतः विनय जी ने किन्ही क्षणों में मेरे ब्लाग का अवलोकन किया होगा और वे मेरे ब्लागों के नियमित reader और सदस्य बन गये । अक्सर वे मेरे लेखों पर
brief comments भी किया करते थे । पर समय का बेहद अभाव होने के कारण मैं ध्यान नहीं दे पाया । लेकिन प्रेत जगत की मेरी एक रचना " काली चिङिया का रहस्य@ नगर कालका " पर विनय जी ने एक comment किया । " डौली की भलाई के लिये आपने ठीक ही किया ।लेकिन मैंने मां काली और भैंरो के दरबार में बहुतो को ठीक होते हुये देखा है । " मैं एक लम्बे समय से इस ग्यान के सम्पर्क में रहने के कारण इस comment का मतलब समझ गया । मैंने सोचा देखें ये सज्जन कौन हैं ? जो इस तरह की रुचि वाले हैं । मैं इनके ब्लाग पर गया और इनकी सभी रचनाओं का अवलोकन किया । जिसमें एक लेख ने मुझे आकर्षित किया । उस लेख में इनके द्वारा english में chatting करने की बात कही गयी थी । मेरे मन में तुरन्त ख्याल आया कि एक अध्यात्म रुचि वाला इंसान अपने ग्यान को अगर जीवों को चेताने में प्रयुक्त करें । तो स्वयं उसका भी । सामने वाले का भी । और समाज का बेहद लाभ होता है । संतो की यही भावना होती है । हमें यही कर्तव्य सर्वोपरि सिखाया जाता है । और फ़िर सच्चे
अध्यात्म मार्ग पर चलने से इंसान सुकून तो महसूस करता ही है । उसे अनमोल सम्पदा की भी प्राप्ति होती है । तब तक विनय जी मेरी काफ़ी रचनाये अध्ययन कर चुके थे ।यही सोचकर मैंने उनके ब्लाग पर comment दिया कि आप यदि अपने english ग्यान का उपयोग अध्यात्म हेतु करें तो चहुं ओर भला होगा । खैर । इसके बाद हम लोग अक्सर सम्पर्क में रहने लगे । और आज विनय जी अपने व्यस्त समय में से समय निकालकर spiritualismfromindia.blogspot.com ब्लाग लिख रहें हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरुपूर्णिमा उत्सव पर आप सभी सादर आमन्त्रित हैं ।


गुर्रुब्रह्मा गुर्रुविष्णु गुर्रुदेव महेश्वरा । गुरुः साक्षात पारब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।श्री श्री 1008 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज " परमहँस " अनन्तकोटि नायक पारब्रह्म परमात्मा की अनुपम अमृत कृपा से ग्राम - उवाली । पो - उरथान ।
बुझिया के पुल के पास । करहल । मैंनपुरी । में सदगुरुपूर्णिमा उत्सव बङी धूमधाम से सम्पन्न होने जा रहा है । गुरुपूर्णिमा उत्सव का मुख्य उद्देश्य इस असार संसार में व्याकुल पीङित एवं अविधा से ग्रसित श्रद्धालु भक्तों को ग्यान अमृत का पान कराया जायेगा । यह जीवात्मा सनातन काल से जनम मरण की चक्की में पिसता हुआ धक्के खा रहा है व जघन्य यातनाओं से त्रस्त एवं बैचेन है ।
जिसे उद्धार करने एवं अमृत पिलाकर सदगुरुदेव यातनाओं से अपनी कृपा से मुक्ति करा देते हैं । अतः ऐसे सुअवसर को न भूलें एवं अपनी आत्मा का उद्धार करें । सदगुरुदेव का कहना है । कि मनुष्य यदि पूरी तरह से ग्यान भक्ति के प्रति समर्पण हो । तो आत्मा को परमात्मा को जानने में सदगुरु की कृपा से पन्द्रह मिनट का समय लगता है । इसलिये ऐसे पुनीत अवसर का लाभ उठाकर आत्मा की अमरता प्राप्त करें ।
नोट-- यह आयोजन 25-07-2010 को उवाली ( करहल ) में होगा । जिसमें दो दिन पूर्व से ही दूर दूर से पधारने वाले संत आत्म ग्यान पर सतसंग करेंगे । विनीत -
राजीव कुलश्रेष्ठ । आगरा । पंकज अग्रवाल । मैंनपुरी । पंकज कुलश्रेष्ठ । आगरा । अजब सिंह परमार ।
जगनेर ( आगरा ) । राधारमण गौतम । आगरा । फ़ौरन सिंह । आगरा । रामप्रकाश राठौर । कुसुमाखेङा । भूरे बाबा उर्फ़ पागलानन्द बाबा । करहल । चेतनदास । न . जंगी मैंनपुरी । विजयदास । मैंनपुरी ।
बालकृष्ण श्रीवास्तव । आगरा । संजय कुलश्रेष्ठ । आगरा । रामसेवक कुलश्रेष्ठ । आगरा । चरन सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । उदयवीर सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । मुकेश यादव । उवाली । मैंनपुरी । रामवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । सत्यवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । कायम सिंह । रमेश चन्द्र । नेत्रपाल सिंह । अशोक कुमार । सरवीर सिंह ।

शनिवार, जुलाई 10, 2010

जय हो मायावती..?

आपने माया माया बहुत सुना होगा । संत महात्मा अक्सर कहते रहते हैं कि माया से दूर रहो । माया महा ठगिनी हम जानी । तिरगुन फ़ांस लिये कर डोले । बोले मधुरी वाणी । तुलसीदास ने कहा है ।
मात पिता भगिनी सुत दारा । ये सब माया कृत परिवारा । बताओ । तुलसीदास ने पूरा खानदान ही " माया " बता दिया । माता पिता बहन पुत्र पत्नी । सब माया । अपनी पत्नी ने झिङक दिया । तो दूसरों के घर बुरे लगने लगे । पहले इतने व्याकुल थे । कि पत्नी से मिलने के लिये सर्प पर चङकर ससुराल के घर में कूद गये । तब पत्नी माया नहीं थी ? तब काम आतुरता में सर्प रस्सी का भेद भी नहीं समझ में आया । पहले में नासमझ था । तुलसीदास जैसों की बात में आ के गेरुआ पहन लिये । पर बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया । कि सब माया कैसे हैं । इधर तुलसी ये भी कहते हैं । प्रातकाल उठकर रघुनाथा । मात पिता गुरु नावहि माथा । अन्य जगहों पर भी सबके प्रति आपस में आदर प्रेम भाव सम्मान आदि की बात कही है । और एक तरफ़ सबको माया भी बता दिया । कबीर साहब ने भी कहा है । गांठी दाम न बांधहि । नहिं नारी से नेह । कह कबीर उन संत की । हम लें चरनन की खेह । अब कबीर साहब ये बताओ । आदमी गांठ ( जेब ) में पैसा नहीं रखेगा । तो उसका काम चल जायेगा । और नारी से नेह नहीं करेगा । तो शाम की रोटी भी मुश्किल से पल्ले पङेगी । आप करघा पर कपङा क्यूँ बुनते थे ? आप की भी लोई नाम की स्त्री थी । तो क्या लोई से हर वक्त लङते झगङते रहते थे ? इक्का दुक्का संतो को छोङकर प्रत्येक संत की स्त्री थी । या नहीं । तो ये तो वही बात हो गयी । कि शादी वो लड्डू जो खाये सो पछताये
और जो ना खाये सो भी पछताये । तो कबीर साहब ये तो वही बात हो गयी । कि आप भी लड्डू खाकर ही पछताये ?
मेरे नियमित पाठक अक्सर एक बात कहते हैं । कि उन्हें मेरी बात का अर्थ पल्ले ही नहीं पङता है । कि आखिर मैं कहना क्या चाह रहा हूँ ? आपने एक कहावत सुनी है । " संत की बातें अटपटी । चटपट लखी न जाय ।" बहुत लोग ये नहीं समझ पाते कि मैं किसी बात के पक्ष में बोल रहा हूँ । अथवा विपक्ष में ? वास्तविकता ये है । कि मेरा सिद्धांत है । धर्म को बोझिल तरीके से । भय पैदा हो ऐसे तरीके से । सिर्फ़ श्रद्धा जागे ऐसे तरीके से । पेश करना एक बङी भूल है । और इसी भूल के कारण धर्म या तो श्रद्धा की वस्तु बनकर रह गया । या एक ऐसा डरावना " हौवा " बन गया । जिसकी बात उल्टी या सीधी कैसी भी लग रही हो । बस सिर झुकाकर स्वीकार कर लो । और इस तरह धार्मिक ग्यान की अनमोल सम्पदा से बहुत से लोग वंचित रह गये । अब ऊपर का कबीर या तुलसी का जिक्र ले लो । मैंने ये एक तरीके से मजाक किया है । क्योंकि मैं संतो की बिरादरी का हूँ । मैं भगवान से मजाक कर लेता हूँ । भगवान कोई हौवा नहीं है ? भगवान कोई तोप नहीं है ? और अगर ये लोग तोप हैं । तो मैं भी किसी से कम
नहीं हूँ । " तू अजर अनामी वीर । भय किसकी खाता । तेरे ऊपर । कोई न दाता । "
इसलिये यदि मेरे ख्याल से धर्म को धर्म के ठेकेदारों ने हौवा न बनाया होता । तो आज बच्चा बच्चा धार्मिक
होता । चन्दन विष व्यापत नहीं । लपटे रहत भुजंग । शीतलता सुख शांति देने वाला धर्म उल्टे भुजंग के समान डरावना लगने लगा ( मगर वास्तव में है नहीं । )
तो अब माया को जानिये । माया के दो प्रकार है । जिसे खानी माया यानी मोटी माया । और वाणी माया यानी झीनी माया कहा जाता है । खानी माया में । स्त्री । पुत्र । परिवार । घर । धन आदि आते हैं । इसी को मोटी माया भी कहते हैं । वाणी माया में । मान । बङाई । ईर्ष्या । कल्पित । स्वर्गलोक । उपाधि आदि आते हैं । इसी को झीनी माया कहते हैं । " मोटी माया सब तजे । झीनी तजी न जाय । मान बङाई ईर्ष्या । लख चौरासी लाय । " वास्तविक संतो की महफ़िल में इस बात की बेहद चर्चा होती है । घर । परिवार । स्त्री आदि मोटी माया सब कोई छोङ देता है । पर मान बङाई ईर्ष्या आदि झीनी माया उच्च स्थिति के संत साधक भी मुश्किल से छोङ पाते हैं ? और अक्सर काफ़ी ऊँचाई पर पहुँचकर उनका पतन हो जाता है । अगर वास्तविक रूप में " माया " की परिभाषा समझने की कोशिश करें । तो जिस चीज में आपका मन अटक जाय । बस वही माया है । और यह सकल सृष्टि ही माया के परदे में बनी है । देखें रामायण क्या कहती है । ब्रह्माण्ड निकाया । निर्मित माया । रोम रोम । प्रति वेद कहे । मम उर । सो वासी । यह उपहासी । सुनत धीर । मति थिर न रहे । मन्दोदरी भी कह रही है । सुन रावन । ब्रह्माण्ड निकाया ।
पाय जासु बल विरचित माया । तो है सब माया । कि नहीं । और संसार व्यर्थ में " फ़ांय फ़ांय " कर रहा है । चलिये लेख खत्म करके मैं भी किसी " माया । माया देवी । मायावती । माया कुमारी । की तलाश में निकलता हूँ । क्योंकि । तुलसी भरोसे राम के । निर्भय हो के सोय । अनहोनी होनी नही । होनी हो सो होय । तो बनी रहेगी । माया या मायाबती । फ़िलहाल तो मौज करो ?
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
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