गुरुवार, जुलाई 15, 2010

नारि कहावै पीव की



तन वोहित मन काग है । लक्ष जो जन उडि जाए ।
कबहीं भरमें अगम दरिया । कबहीं गगन समाए ।

ग्यान रतन की कोठरी । चुम्बक दीन्हो ताल ।
पारषी आगे षोलिया । कुंजी बचन रसाल ।

स्वर्ग पताल के बीच में । दुई तुमरी एक बिद्धि ।
षट दरसन संसय परा । लष चौरासी सिद्धि ।

सकलौ दुरमति दूर कर । अच्छा जन्म बनाव ।
काग गवन गति छोड के । हंस गवन चलि आव ।

जैसी कहै करै जो तैसी । राग दोस निरुवारै ।
जामें घटै बढै रतियो नहिं । वोहि बिधि आप सँवारे ।

द्वारे तेरे राम जी । मिलो कबीरा मोहिं ।
तैतो सबमें मिलि रहा । मैं न मिलूँगा तोहिं ।

भर्म बढा तिहुँ लोक में । भर्म भंडा सब ठाँव ।
कहै कबीर बिचार के । बसेहु भर्म के गाँव ।

रत्न अडाइन रेत में । कंकर चुनि चुनि षाय ।
कहैं कबीर पुकार के । पिडे होय के जाए ।

जेते भार वनसंपती । आ गंगा की रैन ।
पंडित विचारा क्या कहै । कबीर कही मुष बैन ।

हौं जाना कुलहंस हो । ताते कीन्हा संग ।
जो जानते बक बावला । छुवै न देतेउँ अंग ।

गुनवंता गुन को गहै । निरगुनिया गुनहि घिनाए ।
बैलहि दीजे जायफर । क्या बूझै क्या षाए ।

अहिरहु तजी षसमहु तजी । बिना दाँत की ढोर ।
मुक्ति परे बिललात है । बिन्दावन की षोर ।

मुष की मीठी जो कहै हृदया है मतिआन ।
कहैं कबीर ता लोग से रामहु अधिक सयान ।

इतने सब कोई गये भार लदाए लदाए ।
उतते कोई न आइया जासो पूछिय धाए ।

भक्ति पियारी राम की जैसी पियारी आगि ।
सारा पाटन जरि मुआ बहुरि ल्यावै माँगि ।

नारि कहावै पीव की । रहे और संग सोए ।
जारमीत हृदया बसे । षसम षुसी क्यों होए ।

सज्जन से दुरजन भया सुनि काहू के बोल ।
काँसा ताँबा होइ रहा हता टिकोका मोल ।

बिरहिन साजी आरती दरसन दीजै राम ।
मुए दरसन देहुगे आवै कौने काम ।

पल में परलय बीतिया लोगहि लागु तुमारि ।
आगिल सोच निवारि के पाछल करो गोहारि ।

एक समाना सकल में सकल समाना ताहि ।
कबीर समाना बूझ में जहाँ दुतिया नाहिं ।

एक साधे सब साधिया सब साधे एक जाए ।
जैसा सीचे मूल को फूलै फरै अघाए ।

जेहि बन सिंह ना संचरै पंछी ना उडि जाए ।
सो बन कबीर न हीँडिया सून्य समाधि लगाए ।

सांच कहौं तो है नहीं झूटहि लागु पियारि ।
मो सिर ढारै ढेकुला सींचै और की क्यारि ।

बोली एक अमोल है जो कोइ बोले जान ।
हिया तराज तौल के तब मुष बाहर आन ।

कर बहिया बल आपनी । छोड बिरानी आस ।
जाके अंगना नदिया बहैं । सो कस मरै पियास ।

वो तो वैसा ही हुआ तू मन होहु अयान ।
जै निर्गुनिया तै गुनवंता मत एकहि में सान ।

जो मतवारे राम के मगन होय मन माँहि ।
ज्यों दर्पन की सुन्दरी गहे न आवै बाँहि ।

साधू होना चाहिये तो पक्के होके षेल ।
कच्चा सरसों पेरि के षरी भया नहिं तेल ।

सिंहों केरी षोलरी मेंढा पैठर धाए ।
बानी से पहचानिये सब्दहि देत लषाए ।

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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