शनिवार, जुलाई 10, 2010

रही एक की भै अनेक की


काजर केरी कोठरी । बूडत है संसार ।
बलिहारी तेहि पुरुस की । पैठि के निकसनहार ।

काजर ही की कोठरी । काजर ही का कोट ।
तोदीकारी ना भई । रहा सो वोटहि वोह ।

अर्ब षर्व लैं द्रव्य है । उदय अस्त लैं राज । अरब खरब
भक्ति महातम ना तुलै । ई सभ कौने काज ।

मच्छ बिकाने सब चले । धीमर के दरबार ।
अषियाँ तेरी रतनारी । तू क्यों पहिरा जार ।

पानी भीतर घर किया । संजया किया पतार ।
पासा परा करीम का । तब मैं पहिरा जार ।

मच्छ होय नहि बांचि हौ । धीमार तेरा काल ।
जेहि जेहि डाबर तुम फिरे । तहँ तहँ मेलै जाल ।

बिनु रसरी गर सब बँधा । ताते बँधा अलेष ।
दीन्हो दर्पन दस्त में । चस्म बिना क्या देष ।

समुझाये समुझै नहीं । परहथ आपु बिकाए ।
मैं षैंचत हों आपुको । चला सो जमपुर जाए ।

नित षरसनि लोहा गुन छूटै । नितकी गोस्ट माया मोह टूटे ।

लोहा केरी नाव री । पाहन गरुवा भार ।
सिर पर बिस की मोटरी । चाहे उतर न पार ।

कृस्न समीपी पंडवा । गले हिवारे जाए । हिमालय
लोहा को पारस मिलै । तो काहे को काई षाए ।

पूरब ऊगै पस्चिम अथवै । भषे पवन का फूल ।
ताहू को तो राहू ग्रसै । मानुष काहे के भूल ।

नैनन आगे मन बसै । पलक पलक करे दौर ।
तीन लोक मन भूप है । मन पूजा सब ठौर ।

मन स्वारथी आप रस । बिषय लहरि फहराय ।
भन के चलाये तन चलै । ताते सरबस जाए ।

कैसी गति संसार की । ज्यों गाडर की ठाट ।
एक परी जो गाड में । सबै गाड में जात ।

मारग तो वह कठिन है । वहाँ कोइ मत जाए ।
गये ते बहुरै नहीं । कुसल कहै को आए ।

मारी मरै कुसंग की । केरी साथे बेर ।
वो हालै ये चींथरैं । बिधिना संग निबेर ।

केरा तबहि न चेतिया । जब ढिग लागी बेर ।
अब के चेते क्या भया । जब कांटन लीन्ह घेर ।

जीव मर्म जाने नहीं । अंध भये सब जाए ।
बादी द्वारे दादि नहीं । जन्म जन्म पछिताए ।

जाको सतगुरु ना मिला । ब्याकुल दहु दिस धाए ।
आँषि न सूझै बावरा । घर जरै घूर बुताए ।

बस्तू अंतै षोजे अंतै । क्यों कर आवै हाथ ।
सज्जन सोई सराहिये । पारष राषै साथ ।

सुनिये सब की निबेरिये अपनी ।
सेंधुर का सेंधौरा झपनी की झपनी ।

बाजन दे बाजंतरी । कल कुकूही मत छेड ।
तुझे बिरानी क्या परी । तू अपनी आप निबेर ।

गावैं कथै बिचारै नाहीं । अनजाने का दोहा ।
कहैं कबीर पारस परसै बिन । जस पाहन भीतर लोहा ।

प्रथम एक जी हौं किया । भयो सो बारह बान ।
कसत कसौटी ना टिका । पीतर भया निदान ।

कबिरन भक्ति विगारिया । कंकर पत्थर धोय ।
अंतर में विस राषि के । अमृत डारिन षोए ।

रही एक की भै अनेक की । वेस्या बहुत भतारी ।
कहैं कबीर काके संग जरिहैं । बहु पुरुसन की नारी ।

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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