शनिवार, जुलाई 10, 2010

जय हो मायावती..?

आपने माया माया बहुत सुना होगा । संत महात्मा अक्सर कहते रहते हैं कि माया से दूर रहो । माया महा ठगिनी हम जानी । तिरगुन फ़ांस लिये कर डोले । बोले मधुरी वाणी । तुलसीदास ने कहा है ।
मात पिता भगिनी सुत दारा । ये सब माया कृत परिवारा । बताओ । तुलसीदास ने पूरा खानदान ही " माया " बता दिया । माता पिता बहन पुत्र पत्नी । सब माया । अपनी पत्नी ने झिङक दिया । तो दूसरों के घर बुरे लगने लगे । पहले इतने व्याकुल थे । कि पत्नी से मिलने के लिये सर्प पर चङकर ससुराल के घर में कूद गये । तब पत्नी माया नहीं थी ? तब काम आतुरता में सर्प रस्सी का भेद भी नहीं समझ में आया । पहले में नासमझ था । तुलसीदास जैसों की बात में आ के गेरुआ पहन लिये । पर बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया । कि सब माया कैसे हैं । इधर तुलसी ये भी कहते हैं । प्रातकाल उठकर रघुनाथा । मात पिता गुरु नावहि माथा । अन्य जगहों पर भी सबके प्रति आपस में आदर प्रेम भाव सम्मान आदि की बात कही है । और एक तरफ़ सबको माया भी बता दिया । कबीर साहब ने भी कहा है । गांठी दाम न बांधहि । नहिं नारी से नेह । कह कबीर उन संत की । हम लें चरनन की खेह । अब कबीर साहब ये बताओ । आदमी गांठ ( जेब ) में पैसा नहीं रखेगा । तो उसका काम चल जायेगा । और नारी से नेह नहीं करेगा । तो शाम की रोटी भी मुश्किल से पल्ले पङेगी । आप करघा पर कपङा क्यूँ बुनते थे ? आप की भी लोई नाम की स्त्री थी । तो क्या लोई से हर वक्त लङते झगङते रहते थे ? इक्का दुक्का संतो को छोङकर प्रत्येक संत की स्त्री थी । या नहीं । तो ये तो वही बात हो गयी । कि शादी वो लड्डू जो खाये सो पछताये
और जो ना खाये सो भी पछताये । तो कबीर साहब ये तो वही बात हो गयी । कि आप भी लड्डू खाकर ही पछताये ?
मेरे नियमित पाठक अक्सर एक बात कहते हैं । कि उन्हें मेरी बात का अर्थ पल्ले ही नहीं पङता है । कि आखिर मैं कहना क्या चाह रहा हूँ ? आपने एक कहावत सुनी है । " संत की बातें अटपटी । चटपट लखी न जाय ।" बहुत लोग ये नहीं समझ पाते कि मैं किसी बात के पक्ष में बोल रहा हूँ । अथवा विपक्ष में ? वास्तविकता ये है । कि मेरा सिद्धांत है । धर्म को बोझिल तरीके से । भय पैदा हो ऐसे तरीके से । सिर्फ़ श्रद्धा जागे ऐसे तरीके से । पेश करना एक बङी भूल है । और इसी भूल के कारण धर्म या तो श्रद्धा की वस्तु बनकर रह गया । या एक ऐसा डरावना " हौवा " बन गया । जिसकी बात उल्टी या सीधी कैसी भी लग रही हो । बस सिर झुकाकर स्वीकार कर लो । और इस तरह धार्मिक ग्यान की अनमोल सम्पदा से बहुत से लोग वंचित रह गये । अब ऊपर का कबीर या तुलसी का जिक्र ले लो । मैंने ये एक तरीके से मजाक किया है । क्योंकि मैं संतो की बिरादरी का हूँ । मैं भगवान से मजाक कर लेता हूँ । भगवान कोई हौवा नहीं है ? भगवान कोई तोप नहीं है ? और अगर ये लोग तोप हैं । तो मैं भी किसी से कम
नहीं हूँ । " तू अजर अनामी वीर । भय किसकी खाता । तेरे ऊपर । कोई न दाता । "
इसलिये यदि मेरे ख्याल से धर्म को धर्म के ठेकेदारों ने हौवा न बनाया होता । तो आज बच्चा बच्चा धार्मिक
होता । चन्दन विष व्यापत नहीं । लपटे रहत भुजंग । शीतलता सुख शांति देने वाला धर्म उल्टे भुजंग के समान डरावना लगने लगा ( मगर वास्तव में है नहीं । )
तो अब माया को जानिये । माया के दो प्रकार है । जिसे खानी माया यानी मोटी माया । और वाणी माया यानी झीनी माया कहा जाता है । खानी माया में । स्त्री । पुत्र । परिवार । घर । धन आदि आते हैं । इसी को मोटी माया भी कहते हैं । वाणी माया में । मान । बङाई । ईर्ष्या । कल्पित । स्वर्गलोक । उपाधि आदि आते हैं । इसी को झीनी माया कहते हैं । " मोटी माया सब तजे । झीनी तजी न जाय । मान बङाई ईर्ष्या । लख चौरासी लाय । " वास्तविक संतो की महफ़िल में इस बात की बेहद चर्चा होती है । घर । परिवार । स्त्री आदि मोटी माया सब कोई छोङ देता है । पर मान बङाई ईर्ष्या आदि झीनी माया उच्च स्थिति के संत साधक भी मुश्किल से छोङ पाते हैं ? और अक्सर काफ़ी ऊँचाई पर पहुँचकर उनका पतन हो जाता है । अगर वास्तविक रूप में " माया " की परिभाषा समझने की कोशिश करें । तो जिस चीज में आपका मन अटक जाय । बस वही माया है । और यह सकल सृष्टि ही माया के परदे में बनी है । देखें रामायण क्या कहती है । ब्रह्माण्ड निकाया । निर्मित माया । रोम रोम । प्रति वेद कहे । मम उर । सो वासी । यह उपहासी । सुनत धीर । मति थिर न रहे । मन्दोदरी भी कह रही है । सुन रावन । ब्रह्माण्ड निकाया ।
पाय जासु बल विरचित माया । तो है सब माया । कि नहीं । और संसार व्यर्थ में " फ़ांय फ़ांय " कर रहा है । चलिये लेख खत्म करके मैं भी किसी " माया । माया देवी । मायावती । माया कुमारी । की तलाश में निकलता हूँ । क्योंकि । तुलसी भरोसे राम के । निर्भय हो के सोय । अनहोनी होनी नही । होनी हो सो होय । तो बनी रहेगी । माया या मायाबती । फ़िलहाल तो मौज करो ?
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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