मंगलवार, जून 21, 2011

सतपदी रमैणी


                          ॥सतपदी रमैणी॥

कहन सुनन कौ जिहि जग कीन्हा, जग भुलान सो किनहुँ न चीन्हा ।
सत रज तम थें कीन्हीं माया, आपण माझै आप छिपाया ।

तुरक सरीअत जनिये, हिंदू बेद पुरान ।
मन समझन कै कारनै, कछु एक पढ़िये ज्ञान ।

सहजै राम नाम ल्यौ लाई, राम नाम कहि भगति दिढाई ।
राम नाम जाका मन माना, तिन तौ निज सरूप पहिचाना ।

निज सरूप निरंजना निराकार, अपरंपार अपार ।
राम नाम ल्यौ लाइस जिय, रे जिनि भूलै बिस्तार ।

करि बिस्तार जग धंधै लाया, अंत काया थैं पुरिष उपाया ?
जिहि जैसी मनसा तिहि तैसा भावा, ताकूँ तैसा कीन्ह उपावा ।
ते तौ माया मोह भुलाना, खसम राम सो किनहूँ न जाना ।
ता मुखि बिष आवै बिष जाई, ते बिष ही बिष में रहै समाई ।
माता जगत भूत सुधि नांहीं, भ्रमि भूले नर आवैं जाहीं ।
जानि बूझि चेते नहीं अंधा, करम जठर करम के फंधा ।

करम का बाँधा जीयरा, अहनिसि आवै जाइ ?
मनसा देही पाइ करि, हरि बिसरै तौ फिर पीछै पछिताइ ।

तौ करि त्राहि चेति जा अंधा, तजि पर की रति भजि चरन गोब्यंदा ।
उदर कूप तजौ ग्रभ बासा, रे जीव राम नाम अभ्यासा ।
जगि जीवन जैसे लहरि तरंगा ? खिन सुख कूँ भूलसि बहु संगा ।
भगति कौ हीन जीवन कछू नांहीं, उतपति परलै बहुरि समाहीं ।

भगति हीन अस जीवना, जनम मरन बहु काल ।
आश्रम अनेक करसि रे जियरा, राम बिना कोइ न करै प्रतिपाल ।

सोई उपाय करि यहु दुख जाई, ए सब परहरि बिसै सगाई । बिसै = विषय
माया मोह जरै जग आगी, ता संगि जरसि कवन रस लागी ।
त्राहि त्राहि करि हरी पुकारा, साधु संगति मिलि करहु बिचारा ।
रे रे जीवन नहीं बिश्रामा, सुख दुख खंउन राम को नामा ।
राम नाम संसार में सारा, राम नाम भौ तारन हारा ।

सुम्रित बेद सबै सुनै, नहीं आवै कृत काज ।
नहीं जैसे कुंडिल बनित मुख, मुख सोभित बिन राज ।

अब गहि राम नाम अबिनासी, रि तजि जिनि कतहूँ कैं जासी ।
जहाँ जाइ तहाँ तहाँ पतंगा, अब जिनि जरसि समझि बिष संगा ।
चोखा राम नाम मनि लीन्हा, भिंग्री कीट भ्यंग नहीं कीन्हा ?
भौसागर अति वार न पारा, ता तिरबे का करहु बिचारा ?
मनि भावै अति लहरि बिकारा, नहीं गमि सूझै वार न पारा ।
भौसागर अथाह जल, तामैं बोहिथ राम अधार ।
कहै कबीर हम हरि सरन, तब गोपद खुद बिस्तार ।3

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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