बुधवार, जून 22, 2011

अष्टपदी रमैणी


                ॥बड़ी अष्टपदी रमैणी॥

एक बिनानी रच्या बिनान, सब अयान जो आपै जान ।
सत रज तम थें कीन्हीं माया, चारि खानि बिस्तार उपाया ।
पंच तत ले कीन्ह बंधान, पाप पुनि मान अभिमान ।
अहंकार कीन्हें माया मोहू, संपति बिपति दीन्हीं सब काहू ।
भले रे पोच अकुल कुलवंता, गुणी निरगुणी धन नीधनवंता ।
भूख पियास अनहित हित कीन्हो, हेत मोर तोर करि लीन्हा ।
पंच स्वाद ले कीन्हा बंधू, बँधे करम जा आहि अबंधू ।
अचर जीव जंत जे आही, संकट सोच बियापैं ताही ।
निंद्या अस्तुति मान अभिमाना, इनि झूठै जीव हत्या गियाना ।
बहु बिधि करि संसार भुलावा, झूठै दो जगि सांच लुकावा ।

माया मोह धन जोबना, इनि बँधे सब लोइ ।
झूठै झूठ बियापियां, कबीर अलख न लखई कोइ ।

झूठनि झूठ साँच करि जाना, झूठनि में सब साँच लुकाना ।
धंध बंध कीन्ह बहुतेरा, क्रम बिवर्जित रहै न नेरा ।
षट दरसन षट आश्रम कीन्हा, षट रस खाटि काम रस लीन्हां ।
चारि बेद छह सास्त्र बखानैं, विद्या अनंत कथैं को जानै ।
तप तीरथ ब्रत कीन्हें पूजा, धरम नेम दान पुन्य दूजा ।
और अगम कीन्हें ब्यौहारा, नहीं गमि सूझै वार न पारा ।
लीला करि करि भेख फिरावा, ओट बहुत कछू कहत न आवा?
गहन ब्यंद नहीं कछू नहीं सूझै, आपन गोप भयौ आगम बूझै ।
भूलि परो जीव अधिक डराई ? रजनी अंध कूप ह्नै धाई ।
माया मोह उनवै भरपूरी, दादुर दामिनि पवना पूरी ।
तरिपै बरिषै अखंड धारा, रैनि भामिनी भया अँधियारा ।
तिहि बियोग तजि भये अनाथा, परे निकुंज न पावै पंथा ।
वेद न आहि कहूँ को मानै, जानि बूझि में मया अयानै ।
नट बहुरूप खेलै सब जानै ? कला केर गुन ठाकुर माने ।
ओ खेले सब ही घट मांही, दूसर के लेखै कछु नाहीं ?
जाके गुन सोई पै जानै, और को जानै पार अयानै ?
भले रे पोच औसर जब आवा, करि सनामान पूरि जम पावा ।
दान पुन्य हम दिहूँ निरासा, कब लग रहूँ नटारंभ काछा ।
फिरत फिरत सब चरन तुरानै, हरि चरित अगम कथै को जानै ।
गण गंध्रप मुनि अंत न पावा, रह्यो अलख जग धंधै लावा ।
इहि बाजी सिव बिरंचि भुलाना, और बपुरा को क्यंचित जाना ।
त्राहि त्राहि हम कीन्ह पुकारा, राखि राखि साई इहि बारा ।
कोटि ब्रह्मंड गडि दीन्ह फिराई, फल कर कीट जनम बहुताई ।
ईश्वर जोग खरा जब लीन्हा, टरो ध्यान तप खंड न कीन्हा ।
सिध साधिका उन थै कहु कोई, मन चित अस्थिर कहुँ कैसै होई ?
लीला अगम कथै को पारा, बसहु समीप कि रहौ निनारा ।

खग खोज पीछै नहीं, तूँ तत अपरंपार ।
बिन परसै का जांनिये, सब झूठे अहंकार ।

अलख निरंजन लखै न कोई, निरभै निराकार है सोई ।
सुनि असथूल रूप नहीं रेखा, द्रिष्टि अद्रिष्टि छिप्यौ नहीं पेखा?
बरन अबरन कथ्यौ नहीं जाई, सकल अतीत घट रह्यौ समाई ।
आदि अंत ताहि नहीं मधे, कथ्यौ न जाई आहि अकथे ।
अपरंपार उपजै नहीं बिनसै, जुगति न जानिये कथिये कैसे ।

जस कथिये तस होत नहीं, जस है तैसा सोइ ?
कहत सुनत सुख उपजै, अरु परमारथ होइ ?

जांनसि नहीं कस कथसि अयाना, हम निरगुन तुम्ह सरगुन जाना ।
मति करि हीन कवन गुन आंही, लालचि लागि आसिरै रहाई ।
गुन अरु ग्यान दोऊ हम हीना, जैसी कुछ बुधि बिचार तस कीन्हा ।
हम मसकीन कछु जुगति न आवै, ते तुम्ह दरवौ तौ पूरि जन पावै ।
तुम्हरे चरन कवल मन राता, गुन निरगुन के तुम्ह निज दाता ।
जहुवां प्रगटि बजावहु जैसा, जस अनभै कथिया तिनि तैसा ।
बाजै जंत्रा नाद धुनि होई, जे बजावै सो औरै कोई ?
बांजी नाचै कौतिग देखा, जो नचावै सो किनहूँ न पेखा ?

आप आप थैं जानिये, है पर नाहीं सोइ ?
कबीर सुपिनै केर धन ज्यूँ, जागत हाथि न होइ ।

जिनि यहु सुपिना फुर करि जाना, और सब दुखि यादि न आना ।
ग्यान हीन चेत नहीं सूता, मैं जाया बिष हार भै भूता । सूता = सोया हुआ
पारधी बान रहै सर साँधे, बिषम बान मारै बिष बाधै ।
काल अहेड़ी संझ सकारा, सावज ससा सकल संसारा ।
दावानल अति जरै बिकारा, माया मोह रोकि ले जारा ।
पवन सहाइ लोभ अति भइया, जम चरचा चहुँ दिसि फिरि गइया ।
जम के चर चहुँदिसि फिरि लागे, हंस पखेरुवा अब कहाँ जाइवे ।
केस गहै कर निस दिन रहई, जब धरि ऐंचे तब धरि चहई ।
कठिन पासु कछू चलै न उपाई, जम दुवारि सीझे सब जाई ।
सोई त्रास सुनि राम न गावै, मृग त्रिष्णा झूठी दिन धावै ।
मृत काल कीनहूँ नहीं देखा, दुख कौ सुख करि सबहीं लेखा ।
सुख करि मूल न चीन्हसि अभागी, चीन्है बिना रहै दुख लागी ।
नीम कीट रस नीम पियारा, यूँ विष कूँ अमृत कहै संसारा । 
अछित रोज दिन दिनहि सिराई, अमृत परहरि करि बिष खाई ।
जांनि अजानि जिन्हैं बिष खावा, परे लहरि पुकारै धावा ।
बिष के खांये का गुन होई, जा बेदन जानै परि सोई ।
मुरछि मुरछि जीव जरिहै आसा, कांजी अलप बहुखीर बिनासा ।
तिल सुख कारनि दुख अस मेरू, चौरासी लख लीया फैरू ।
अलप सुख दुख आहि अनंता, मन मैंगल भूल्यौ मैमंता ।
दीपक जोति रहै इक संगा, नैन नेह मांनू परै पतंगा ।
सुख विश्राम किनहूँ नहीं पावा, परहरि सांच झूठे दिन धावा ।
लालच लागे जनम सिरावा, अंति काल दिन आइ तुरावा ।
जब लग है यहु निज तन सोई, तब लग चेति न देखै कोई ।
जब निज चलि करि किया पयांना, भयौ अकाज तब फिर पछिताना ।

मृगत्रिष्णा दिन दिन ऐसी, अब मोहि कछू न सोहाइ ।
अनेक जतन करि टारिये, करम पासि नहीं जाइ ।

रे रे मन बुधिवत भंडारा, आप आप ही करहुँ बिचारा ।
कवन सयाना कौन बौराई, किहि दुख पइये किहि दुख जाई ।
कवन सार को आहि असारा, को अनहित को आहि पियारा ।
कवन साच कवन है झूठा, कवन करू को लागै मीठा ।
किहि जरिये किहि करिले अनंदा, कवन मुकति को मल के फंदा ।

रे रे मन मोहि ब्यौरि कहि, हौ तत पूछौ तोहि ।
संसै मूल सबै भई, समझाई कहि मोहि ।

सुनि हंसा मैं कहूँ बिचारी, त्रिजुग जोति सबै अँधियारी ।
मनिषा जनम उत्तिम जो पावा, जानू राम तौ सयान कहावा ।
नहीं चेतै तो जनम गँवाया, परौ बिहान तब फिरि पछतावा ।
सुख करि मूल भगति जो जानै, और सबै दुखया दिन आनै ।
अमृत केवल राम पियारा, और सबै बिष के भंडारा ।
हरि आहि जौ रमियै रामा, और सबै बिसमा के कांमा ।
सार आहि संगति निरवाना, और सबै असार करि जाना ।
अनहित आहि सकल संसारा, हित करि जानियै राम पियारा ।
साच सोई जे थिरह रहाई, उपजै बिनसै झूठ ह्नै जाई?
मीठा सो जो सहजै पावा, अति कलेस थै करू कहावा ।
ना जरियै ना कीजै मैं मेरा, तहाँ अनंद जहाँ राम निहोरा ।
मुकति सोज आपा पर जानै, सो पद कहाँ जु भरमि भुलानै ।

प्रान नाथ जग जीवना, दुरलभ राम पियार ।
सुत सरीर धन प्रग्रह कबीर, जीये रे तर्वर पंख बसियार ।

रे रे जीव अपना दुख न संभारा, जिहि दुख ब्याप्या सब संसारा ।
माया मोह भूले सब लोई, क्यंचित लाभ मानिक दीयौ खोई ।
मैं मेरी करि बहुत बिगूला, जननी उदर जन्म का सूला ।
बहुत रूप भेष बहु कीन्हा, जरा मरन क्रोध तन खीना ।
उपजै बिनसै जोनि फिराई, सुख कर मूल न पावै चाही ।
दुख संताप कलेस बहु पावै, सो न मिलै जे जरत बुझावै ।
जिहि हित जीव राखिहै भाई, सो अनहित है जाइ बिलाई ।
मोर तोर करि जरे अपारा, मृगतृष्णा झूठी संसारा ।
माया मोह झूठ रह्यौ लागी, को भयौ इहाँ का ह्नै है आगी ।
कछु कछु चेति देखि जीव अबहीं, मनिषा जनम ज पावै कबही ।
सारि आहि जे संग पियारा, जब चेतै तब ही उजियारा ।
त्रिजुग जोनि जे आहि अचेता, मनिषा जनम भयौ चित चेता ।
आतमा मुरछि मुरछि जरि जाई, पिछले दुख कहता न सिराई ।
सोई त्रास जे जानै हंसा, तौ अजहुँ न जीव करै संतोसा ।
भौसागर अति वार न पारा, ता तिरिबे को करहु बिचारा ।
जा जल की आदि अंति नहीं जानिये, ताकौ डर काहे न मानिये?
को बोहिथ को खेवट आही, जिहि तिरिये सो लीजै चाही ।
समझि बिचारि जीव जब देखा, यहु संसार सुपन करि लेखा ।
भई बुधि कछू ग्यान निहारा, आप आप ही किया बिचारा?
आपण में जे रह्यौ समाई ? नेड दूरि कथ्यौ नहीं जाई?
ताके चीन्है परचौ पावा, भई समझि तासूँ मन लावा ।

भाव भगति हित बोहिया, सतगर खेवनहार ।
अलप उदिक तब जाणिये, जब गोपद खुर बिस्तार ।4


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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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