बुधवार, जून 22, 2011

साधु का मार्ग बहुत ही कठिन है ।

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! इस मनुष्य को कौवे की चाल स्वभाव ( जो साधारण मनुष्य की होती है ) आदि दुर्गुणों को त्यागकर हँस स्वभाव को अपनाना चाहिये । सदगुरु के शब्द उपदेश को गृहण कर मन वचन वाणी कर्म से सदाचार आदि सदगुणों से हँस के समान होना चाहिये ।
हे धर्मदास ! जीवित रहते हुये यह मृतक स्वभाव का अनुपम ग्यान तुम ध्यान से सुनो । इसे गृहण करके ही कोई बिरला मनुष्य जीव ही परमात्मा की कृपा को प्राप्त कर साधना मार्ग पर चल सकता है । तुम मुझसे उस मृतक भाव का गहन रहस्य सुनो । शिष्य मृतक भाव होकर सत्यग्यान का उपदेश करने वाले सदगुरु के श्रीचरणों की पूरे भाव से सेवा करे । मृतक भाव को प्राप्त होने वाला कल्याण की इच्छा रखने वाला जिग्यासु अपने ह्रदय में क्षमा दया प्रेम आदि गुणों को अच्छी प्रकार से गृहण करे । और जीवन में इन गुणों के वृत नियम का निर्वाह करते हुये स्वयँ को संसार के इस आवागमन के चक्र से मुक्त करे ।
जैसे प्रथ्वी को तोङा खोदा जाने पर भी वह विचलित नहीं होती । क्रोधित नहीं होती । बल्कि और अधिक फ़ल फ़ूल अन्न आदि प्रदान करती है । अपने अपने स्वभाव के अनुसार कोई मनुष्य चन्दन के समान प्रथ्वी पर फ़ूल फ़ुलवारी आदि लगाता हुआ सुन्दर बनाता है । तो कोई विष्ठा मल आदि डालकर गन्दा करता है । कोई कोई उस पर कृषि खेती आदि करने के लिये जुताई खुदाई आदि करता है । लेकिन प्रथ्वी उससे कभी विचलित न होकर शांत भाव से सभी दुख सहन करती हुयी सभी के गुण अवगुण को समान मानती है । और इस तरह के कष्ट को और अच्छा मानते हुये अच्छी फ़सल आदि देती है ।

हे धर्मदास ! अब और भी मृतक भाव सुनो । ये अत्यन्त दुरूह कठिन बात है । मृतक भाव में स्थित संत गन्ने की भांति होता है । जैसे किसान गन्ने को पहले काट छाँटकर खेत में बोकर उगाता है । फ़िर नये सिरे से पैदा हुआ गन्ना किसान के हाथ में पङकर पोरी पोरी से छिलकर स्वयँ को कटवाता है । ऐसे ही मृतक भाव का संत सभी दुख सहन करता है ।
फ़िर वह कटा छिला हुआ गन्ना अपने आपको कोल्हू में पिरवाता है । जिसमें वह पूरी तरह से कुचल दिया जाता है । और फ़िर उसमें से सारा रस निकल जाने के बाद उसका शेष भाग खो बन जाता है । फ़िर आप स्वरूप उस रस को कङाहे में उबाला जाता है । उसके अपने शरीर के रस को आग पर तपाने से गुङ बनता है । और फ़िर उसे और अधिक आँच देकर तपा तपाकर रगङ रगङकर खाँड बनायी जाती है ।
खाँड बन जाने पर फ़िर से उसमें ताप दिया जाता है । और फ़िर तव उसमें से जो दाना बनता है । उसे चीनी कहते हैं । चीनी हो जाने पर फ़िर से उसे तपाकर कष्ट देकर मिश्री बनाते हैं ।
हे धर्मदास ! मिश्री से पककर कंद कहलाया । तो सबके मन को अच्छा लगा । इस विधि से गन्ने की भांति जो शिष्य गुरु की आग्या अनुसार आचरण व्यवहार करता हुआ सभी प्रकार के कष्ट दुख सहन करता है । वह सदगुरु की कृपा से सहज ही भवसागर को पार कर लेता है ।
हे धर्मदास ! जीवित रहते हुये मृतक भाव अपनाना बेहद कठिन है । इसे लाखों करोंङो में कोई सूरमा संत ही अपना पाता है । जबकि इसे सुनकर ही सांसारिक विषय विकारों में डूबा कायर व्यक्ति तो भय के मारे तन मन से जलने लगता है । स्वीकारना अपनाना तो बहुत दूर की बात है । और वह डर के मारे भागा हुआ इस ओर ( भक्ति की तरफ़ ) मुङकर भी नहीं देखता ।

जैसे गन्ना सभी प्रकार के दुख सहन करता है । ठीक ऐसे ही शरण में आया हुआ शिष्य गुरु की कसौटी पर दुख सहन करता हुआ सबको संवारे । और सदा सबको सुख प्रदान करने वाले सर्वहित के कार्य करे । वह मृतक भाव को प्राप्त गुरु के ग्यान भेद को जानने वाला मर्मग्य साधक शिष्य निश्चय ही सत्यलोक को जाता है ।
वह साधु सांसारिक कलेशों और निज मन इन्द्रियों के विषय विकारों को समाप्त कर देता है । ऐसी उत्तम वैराग्य स्थिति को प्राप्त अविचल साधु से सामान्य मनुष्य तो क्या देवता तक अपने कल्याण की आशा करते हैं ।  
हे धर्मदास ! साधु का मार्ग बहुत ही कठिन है । जो साधुता की उत्तम सत्यता पवित्रता निष्काम भाव में स्थित होकर साधना करता है । वही सच्चा साधु है । वही सच्चे अर्थों में साधु है । जो अपनी पाँचों  इन्द्रियों आँख कान नाक जीभ कामेंद्री को वश में रखता है । और सदगुरु द्वारा दिये सत्यनाम अमृत के दिन रात चखता है ।

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