सोमवार, जून 20, 2011

कौवा और कोयल से भी सीखो ?

कबीर साहब बोले- हे धर्मदास ! कोयल के बच्चे का स्वभाव सुनो । और उसके गुणों को जानकर विचार करो । कोयल मन से चतुर तथा मीठी वाणी बोलने वाली होती है । जबकि उसका वैरी कौवा पाप की खान होता है । कोयल कौवे के घर ( घोंसले ) में अपना अण्डा रख देती है ।
विपरीत गुण वाले दुष्ट मित्र कौवे के प्रति कोयल ने अपना मन एक समान किया । तब सखा मित्र सहायक समझकर कौवे ने उस अण्डे को पाला । और वह काल बुद्धि कागा ( कौवा ) उस अण्डे की रक्षा करता रहा ।
समय के साथ कोयल का अण्डा बङकर पक्का हुआ । और समय आने पर फ़ूट गया । तब उससे बच्चा निकला । कुछ दिन बीत जाने पर कोयल के बच्चे की आँखे ठीक से खुल गयी । और वह समझदार होकर जानने समझने लगा । फ़िर कुछ ही दिनों में उसके पँख भी मजबूत हो गये । तब कोयल समय समय पर आ आकर उसको शब्द सुनाने लगी ।
वह अपना निज शब्द सुनते ही कोयल का बच्चा जाग गया । यानी सचेत हो गया । और सच का बोध होते ही उसे

अपने वास्तविक कुल का वचन वाणी प्यारी लगी । फ़िर जब भी कागा कोयल के बच्चे को दाना खिलाने घुमाने ले जाये । तब तब कोयल अपने उस बच्चे को वह मीठा मनोहर शब्द सुनाये ।
कोयल के बच्चे में जब उस शब्द द्वारा अपना अंश अंकुरित हुआ । यानी उसे अपनी असली पहचान का बोध हुआ । तो उस बच्चे का ह्रदय कौवे की ओर से हट गया । और एक दिन कौवे को अंगूठा दिखलाकर वह कोयल का बच्चा उससे पराया होकर उङ चला ।
कोयल का बच्चा अपनी वाणी बोलता हुआ चला । और तब घबराकर उसके पीछे पीछे कागा व्याकुल बेहाल होकर दौङा । उसके पीछे पीछे भागता हुआ कागा थक गया । परन्तु उसे नहीं पा सका । फ़िर वह बेहोश हो गया । और बाद में होश आने पर निराश होकर अपने घर लौट आया ।
कोयल का बच्चा जाकर अपने परिवार से मिलकर सुखी हो गया । और निराश कागा झक मारकर रह गया ।
हे धर्मदास ! जिस प्रकार कोयल का बच्चा होता है कि वह कौवे के पास रहकर भी अपना शब्द सुनते ही उसका साथ छोङकर अपने परिवार से मिल जाता है ।
इसी विधि से जब कोई भी समझदार जीव मनुष्य अपने निज नाम और निज आत्मा की पहचान के लिये सचेत हो जाता है । तो वह मुझसे ( सदगुरु से ) स्वयँ ही मिल जाता है । और अपने असली घर परिवार सत्यलोक में पहुँच जाता है । तब मैं उसके 101 वंश तार देता हूँ ।
कोयल सुत जस शूरा होई । यह विधि धाय मिले मोहि कोई ।
निज घर सुरत करे जो हँसा । तारों ताहि एकोत्तर वंशा ।

हे धर्मदास ! इसी तरह कोयल के बच्चे की भांति कोई शूरवीर मनुष्य काल निरंजन की असलियत को जानकर सदगुरु के प्रति शब्द ( नाम उपदेश ) के लिये मेरी तरफ़ दौङता है । और निज घर सत्यलोक की तरफ़ अपनी सुरति ( पूरी एकाग्रता ) रखता है । मैं उसके  101 वंश तार देता हूँ ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास !  कौवे की नीच चाल चलन नीच बुद्धि को छोङकर हँस की रहनी सत्य आचरण सदगुण प्रेम शील स्वभाव शुभ कार्य जैसे उत्तम लक्षणों को अपनाने से मनुष्य जीव सत्यलोक जाता है । जिस प्रकार कागा की कर्कश वाणी कांव कांव किसी को अच्छी नहीं लगती । परन्तु कोयल की मधुर वाणी कुहु कुहु सबके मन को भाती है । इसी प्रकार कोयल की तरह हँस जीव विचार पूर्वक उत्तम वाणी बोले ।
जो कोई अग्नि की तरह जलता हुआ क्रोध में भरकर भी सामने आये । तो हँस जीव को शीतल जल के समान उसकी तपन बुझानी चाहिये । ग्यान अग्यान की यही सही पहचान है । जो अग्यानी होता है । वही कपटी उग्र तथा दुष्ट बुधि वाला होता है । गुरु का ग्यानी शिष्य शीतल और प्रेम भाव से पूर्ण होता है । उसमें सत्य विवेक संतोष आदि सदगुण समाये होते हैं ।
ग्यानी वही है । जो झूठ पाप अनाचार दुष्टता कपट आदि दुर्गुणों से युक्त दुष्ट बुद्धि को नष्ट कर दे । और काल निरंजन रूपी मन को पहचान कर उसे भुला दे । उसके कहने में न आये । जो ग्यानी होकर कटु वाणी बोलता है । वह ग्यानी अग्यान ही बताता है । उसे अग्यानी ही समझना चाहिये ।
जो मनुष्य शूरवीर की तरह धोती खोंसकर मैदान में लङने के लिये तैयार होता है । और युद्ध भूमि में आमने सामने जाकर मरता है । तब उसका बहुत यश होता है । और वह सच्चा वीर कहलाता है । इसी प्रकार जीवन में अग्यान से उत्पन्न समस्त पाप दुर्गुण और बुराईयों को परास्त करके जो ग्यान बिग्यान उत्पन्न होता है । उसी को ग्यान कहते हैं ।
मूर्ख अग्यानी के ह्रदय में शुभ सतकर्म नहीं सूझता । और वह सदगुरु का सार शब्द और सदगुरु के महत्व को नहीं समझता । मूर्ख इंसान से अधिकतर कोई कुछ कहता नहीं है । यदि किसी नेत्रहीन का पैर यदि विष्ठा ( मल ) पर पङ जाये । तो उसकी हँसी कोई नहीं करता । लेकिन यदि आँख होते हुये भी किसी का पैर विष्ठा से सन जाये । तो सभी लोग उसको ही दोष देते हैं ।
हे धर्मदास ! यही ग्यान और अग्यान है । ग्यान और अग्यान विपरीत स्वभाव वाले ही होते हैं । अतः ग्यानी पुरुष हमेशा सदगुरु का ध्यान करे । और सदगुरु के सत्य शब्द ( नाम या महामंत्र ) को समझे । सबके अन्दर सदगुरु का वास है । पर वह कहीं गुप्त तो कहीं प्रकट है । इसलिये सबको अपना मानकर जैसा मैं अविनाशी आत्मा हूँ । वैसे ही सभी जीवात्माओं को समझे । और ऐसा समझकर समान भाव से सबसे नमन करे । और ऐसी गुरु भक्ति की निशानी लेकर रहे ।
रंग कच्चा होने के कारण । इस देह को कभी भी नाशवान होने वाली जानकर भक्त प्रहलाद की तरह अपने सत्य संकल्प में दृण मजबूत होकर रहे । यधपि उसके पिता हिरण्यकश्यप ने उसको बहुत कष्ट दिये । लेकिन फ़िर भी प्रहलाद ने अडिग होकर हरि गुण वाली प्रभु भक्ति को ही स्वीकार किया । ऐसी ही प्रहलाद कैसी पक्की भक्ति करता हुआ । सदगुरु से लगन लगाये रहे । और 84 में डालने वाली मोह माया को त्याग कर भक्ति साधना करे । तब वह अनमोल हुआ हँस जीव अमरलोक सत्यलोक में निवास पाता है । और अटल होकर स्थिर होकर जन्म मरण के आवागमन से मुक्त हो जाता है ।

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