शनिवार, जून 25, 2011

विदेह स्वरूप सार शब्द

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मोक्ष प्रदान करने वाला सार शब्द विदेह स्वरूप वाला है । और उसका वह अनुपम रूप निःअक्षर है । 5 तत्व और 25 प्रकृति को मिलाकर सभी शरीर बने हैं । परन्तु सार शब्द इन सबसे भी परे विदेह स्वरूप वाला है ।
कहने सुनने के लिये तो भक्त संतो के पास वैसे लोक वेद आदि के कर्मकांड उपासना कांड ग्यानकांड योग मंत्र आदि से सम्बन्धित सभी तरह के शब्द हैं । लेकिन सत्य यही है कि सार शब्द से ही जीव का उद्धार होता है । परमात्मा का अपना सत्यनाम ही मोक्ष का प्रमाण है । और सत्यपुरुष का सुमिरन ही सार है ।
बाह्य जगत से ध्यान हटाकर अंतर्मुखी होकर शांत चित्त से जो साधक इस नाम के अजपा जाप में लीन होता है । उससे काल भी मुरझा जाता है । सार शब्द का सुमरन सूक्ष्म और मोक्ष का पूरा मार्ग है । इस सहज मार्ग पर शूरवीर होकर साधक को मोक्ष यात्रा करनी चाहिये ।
हे धर्मदास ! सार शब्द न तो वाणी से बोला जाने वाला शब्द है । और न ही उसका मुँह से बोलकर जाप किया जाता है । सार शब्द का सुमरने करने वाला काल के कठिन प्रभाव से हमेशा के लिये मुक्त हो जाता है । इसलिये इस गुप्त आदि शब्द की पहचान कराकर इन वास्तविक हँस जीवों को चेताने की जिम्मेवारी तुम्हें मैंने दी है ।
हे धर्मदास ! इस मनुष्य शरीर के अंदर अनंत पंखुङियों वाले कमल हैं । जो अजपा जाप की इसी डोरी से जुङे हुये हैं । तब उस बेहद सूक्ष्म द्वार द्वारा मन बुद्धि से परे इन्द्रियों से परे सत्य पद का स्पर्श होता है । यानी उसे प्राप्त किया जाता है ।
शरीर के अन्दर स्थित शून्य आकाश में अलौकिक प्रकाश हो रहा है । वहाँ आदि पुरुष का वास है । उसको पहचानता हुआ कोई सदगुरु का हँस साधक वहाँ पहुँच जाता है । और आदि सुरति ( मन बुद्धि चित्त अहम का योग से एक होना ) वहाँ पहुँचाती है ।
हँस जीव को सुरति जिस परमात्मा के पास ले जाती है । उसे " सोहंग " कहते हैं । अतः हे धर्मदास ! इस कल्याणकारी सार शब्द को भलीभांति समझो ।
सार शब्द के अजपा जाप की यह सहज धुनि अंतर आकाश में स्वतः ही हो रही है । अतः इसको अच्छी तरह से जान समझकर सदगुरु से ही लेना चाहिये । मन तथा प्राण को स्थिर कर मन तथा इन्द्रिय के कर्मों को उनके विषय से हटाकर सार शब्द का स्वरूप देखा जाता है । वह सहज स्वाभाविक ध्वनि बिना वाणी आदि के स्वतः ही हो रही है । इस नाम के जाप को करने के लिये हाथ में माला लेकर जाप करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है । इस प्रकार वेदेह स्थित में इस सार शब्द का सुमरन हँस साधक को सहज ही अमरलोक सत्यलोक पहुँचा देता है ।
सत्यपुरुष की शोभा अगम अपार मन बुद्धि की पहुँच से परे है । उनके एक एक रोम में करोंङो सूर्य चन्द्रमा के समान प्रकाश है । सत्यलोक पहुँचने वाले एक हँस जीव का प्रकाश सोलह सूर्य के बराबर होता है ।
अनुराग सागर को एक साथ किताब रूप में पढने के लिये हमारे एक सहयोगी द्वारा उपलब्ध कराये गये विभिन्न ऐड्रेस - PUNJAB में -
1 amritsar में khalsa college के पास main market में किसी भी बङी धार्मिक बुक्स की दुकान पर
2 jalandhar में bus stand  के पास old market  में religious books की दुकान पर
3 beas river जहाँ radha soami main ashram है । वहाँ साथ में वहाँ और भी सन्तमत की बुक्स मिल जायेंगी ।
4 chandigarh में 17-c sector market  में
HARYANA में 1 panchkula में national sports centre के पास जो मार्केट है । वहाँ sachdeva book stall par.
2 bhivani में clothes market  के साथ  books market है वहाँ ।
RAJASTHAN में 1 jodhpur में main market में religious books की दुकान पर
 DELHI में purani delhi bade bazaar में धार्मिक किताबों की दुकान पर ।
UP में mathura
MP में indore में nutan girls college के पास जो books market है । वहाँ पर ।

बुधवार, जून 22, 2011

साधु का मार्ग बहुत ही कठिन है ।

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! इस मनुष्य को कौवे की चाल स्वभाव ( जो साधारण मनुष्य की होती है ) आदि दुर्गुणों को त्यागकर हँस स्वभाव को अपनाना चाहिये । सदगुरु के शब्द उपदेश को गृहण कर मन वचन वाणी कर्म से सदाचार आदि सदगुणों से हँस के समान होना चाहिये ।
हे धर्मदास ! जीवित रहते हुये यह मृतक स्वभाव का अनुपम ग्यान तुम ध्यान से सुनो । इसे गृहण करके ही कोई बिरला मनुष्य जीव ही परमात्मा की कृपा को प्राप्त कर साधना मार्ग पर चल सकता है । तुम मुझसे उस मृतक भाव का गहन रहस्य सुनो । शिष्य मृतक भाव होकर सत्यग्यान का उपदेश करने वाले सदगुरु के श्रीचरणों की पूरे भाव से सेवा करे । मृतक भाव को प्राप्त होने वाला कल्याण की इच्छा रखने वाला जिग्यासु अपने ह्रदय में क्षमा दया प्रेम आदि गुणों को अच्छी प्रकार से गृहण करे । और जीवन में इन गुणों के वृत नियम का निर्वाह करते हुये स्वयँ को संसार के इस आवागमन के चक्र से मुक्त करे ।
जैसे प्रथ्वी को तोङा खोदा जाने पर भी वह विचलित नहीं होती । क्रोधित नहीं होती । बल्कि और अधिक फ़ल फ़ूल अन्न आदि प्रदान करती है । अपने अपने स्वभाव के अनुसार कोई मनुष्य चन्दन के समान प्रथ्वी पर फ़ूल फ़ुलवारी आदि लगाता हुआ सुन्दर बनाता है । तो कोई विष्ठा मल आदि डालकर गन्दा करता है । कोई कोई उस पर कृषि खेती आदि करने के लिये जुताई खुदाई आदि करता है । लेकिन प्रथ्वी उससे कभी विचलित न होकर शांत भाव से सभी दुख सहन करती हुयी सभी के गुण अवगुण को समान मानती है । और इस तरह के कष्ट को और अच्छा मानते हुये अच्छी फ़सल आदि देती है ।

हे धर्मदास ! अब और भी मृतक भाव सुनो । ये अत्यन्त दुरूह कठिन बात है । मृतक भाव में स्थित संत गन्ने की भांति होता है । जैसे किसान गन्ने को पहले काट छाँटकर खेत में बोकर उगाता है । फ़िर नये सिरे से पैदा हुआ गन्ना किसान के हाथ में पङकर पोरी पोरी से छिलकर स्वयँ को कटवाता है । ऐसे ही मृतक भाव का संत सभी दुख सहन करता है ।
फ़िर वह कटा छिला हुआ गन्ना अपने आपको कोल्हू में पिरवाता है । जिसमें वह पूरी तरह से कुचल दिया जाता है । और फ़िर उसमें से सारा रस निकल जाने के बाद उसका शेष भाग खो बन जाता है । फ़िर आप स्वरूप उस रस को कङाहे में उबाला जाता है । उसके अपने शरीर के रस को आग पर तपाने से गुङ बनता है । और फ़िर उसे और अधिक आँच देकर तपा तपाकर रगङ रगङकर खाँड बनायी जाती है ।
खाँड बन जाने पर फ़िर से उसमें ताप दिया जाता है । और फ़िर तव उसमें से जो दाना बनता है । उसे चीनी कहते हैं । चीनी हो जाने पर फ़िर से उसे तपाकर कष्ट देकर मिश्री बनाते हैं ।
हे धर्मदास ! मिश्री से पककर कंद कहलाया । तो सबके मन को अच्छा लगा । इस विधि से गन्ने की भांति जो शिष्य गुरु की आग्या अनुसार आचरण व्यवहार करता हुआ सभी प्रकार के कष्ट दुख सहन करता है । वह सदगुरु की कृपा से सहज ही भवसागर को पार कर लेता है ।
हे धर्मदास ! जीवित रहते हुये मृतक भाव अपनाना बेहद कठिन है । इसे लाखों करोंङो में कोई सूरमा संत ही अपना पाता है । जबकि इसे सुनकर ही सांसारिक विषय विकारों में डूबा कायर व्यक्ति तो भय के मारे तन मन से जलने लगता है । स्वीकारना अपनाना तो बहुत दूर की बात है । और वह डर के मारे भागा हुआ इस ओर ( भक्ति की तरफ़ ) मुङकर भी नहीं देखता ।

जैसे गन्ना सभी प्रकार के दुख सहन करता है । ठीक ऐसे ही शरण में आया हुआ शिष्य गुरु की कसौटी पर दुख सहन करता हुआ सबको संवारे । और सदा सबको सुख प्रदान करने वाले सर्वहित के कार्य करे । वह मृतक भाव को प्राप्त गुरु के ग्यान भेद को जानने वाला मर्मग्य साधक शिष्य निश्चय ही सत्यलोक को जाता है ।
वह साधु सांसारिक कलेशों और निज मन इन्द्रियों के विषय विकारों को समाप्त कर देता है । ऐसी उत्तम वैराग्य स्थिति को प्राप्त अविचल साधु से सामान्य मनुष्य तो क्या देवता तक अपने कल्याण की आशा करते हैं ।  
हे धर्मदास ! साधु का मार्ग बहुत ही कठिन है । जो साधुता की उत्तम सत्यता पवित्रता निष्काम भाव में स्थित होकर साधना करता है । वही सच्चा साधु है । वही सच्चे अर्थों में साधु है । जो अपनी पाँचों  इन्द्रियों आँख कान नाक जीभ कामेंद्री को वश में रखता है । और सदगुरु द्वारा दिये सत्यनाम अमृत के दिन रात चखता है ।

मंगलवार, जून 21, 2011

धर्मदास यह कठिन कहानी..गुरुमत ते कोई बिरले जानी ।

 कबीर साहब बोले - सत्यग्यान बल से सदगुरु काल पर विजय प्राप्त कर अपनी शरण में आये हुये हँस जीव को सत्यलोक ले जाते हैं । जहाँ पर हँस जीव मनुष्य सत्यपुरुष के दर्शन पाता है । और अति आनन्द को प्राप्त करता है । फ़िर वह वहाँ से लौटकर कभी भी इस कष्टदायक दुखदायी संसार में वापस नहीं आता । यानी उसका मोक्ष हो जाता है ।
हे धर्मदास ! मेरे वचन उपदेश को भली प्रकार से गृहण करो । जिग्यासु इंसान को सत्यलोक जाने के लिये सत्य के मार्ग पर ही चलना चाहिये । जैसे शूरवीर योद्धा एक बार युद्ध के मैदान में घुसकर पीछे मुढकर नहीं देखता । बल्कि निर्भय होकर आगे बढ जाता है । ठीक वैसे ही कल्याण की इच्छा रखने वाले जिग्यासु साधक को भी सत्य की राह पर चलने के बाद पीछे नहीं हटना चाहिये ।

अपने पति के साथ सती होने वाली नारी और युद्ध भूमि में सिर कटाने वाले वीर के महान आदर्श को देख समझकर जिस प्रकार मनुष्य दया संतोष धैर्य क्षमा वैराग विवेक आदि सदगुणों को गृहण कर अपने जीवन में आगे बढते हैं । उसी अनुसार दृण संकल्प के साथ सत्य सन्तमत स्वीकार करके जीवन की राह में आगे बढना चाहिये । जीवित रहते हुये भी मृतक भाव अर्थात मान अपमान हानि लाभ मोह माया से रहित होकर सत्यगुरु के बताये सत्यग्यान से इस घोर काल कष्ट पीङा का निवारण करना चाहिये ।
हे धर्मदास ! लाखो करोंङो में कोई एक विरला मनुष्य ही ऐसा होता है । जो सती शूरवीर और संत के बताये हुये उदाहरण के अनुसार आचरण करता है । और तब उसे परमात्मा के दर्शन साक्षात्कार प्राप्त होता है ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! मुझे मृतक भाव क्या होता है ? इसे पूर्ण रूप से स्पष्ट बताने की कृपा करें ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! जीवित रहते हुये जीवन में मृतक दशा की कहानी बहुत ही कठिन है । इस सदगुरु के सत्यग्यान से कोई बिरला ही जान सकता है । सदगुरु के उपदेश से ही यह जाना जाता है ।
धर्मदास यह कठिन कहानी । गुरुमत ते कोई बिरले जानी । 
जीवन में मृतक भाव को प्राप्त हुआ सच्चा मनुष्य अपने परम लक्ष्य मोक्ष को ही खोजता है । वह सदगुरु के शब्द विचार को अच्छी तरह से प्राप्त करके उनके द्वारा बताये गये सत्य मार्ग का अनुसरण करता है । उदाहरण स्वरूप जैसे भृंगी  ( पंख वाला चींटा जो दीवाल खिङकी आदि पर मिट्टी का घर बनाता है । ) किसी मामूली से कीट के पास जाकर उसे अपना तेज शब्द घूँ घूँ घूँ सुनाता है । तव वह कीट उसके गुरु ग्यान रूपी शब्द उपदेश को गृहण करता है । गुंजार करता हुआ भृंगी अपने ही तेज शब्द स्वर की गुंजार सुना सुनाकर कीट को प्रथ्वी पर डाल देता है । और जो कीट उस भृंगी शब्द को धारण करे । तब भृंगी उसे अपने घर ले जाता है । तथा गुंजार गुंजार कर उसे अपना स्वाति शब्द सुनाकर उसके शरीर को अपने समान बना लेता है । भृंगी के महान शब्द रूपी स्वर गुंजार को यदि कीट अच्छी तरह से स्वीकार कर ले । तो वह मामूली कीट से भृंगी के समान शक्तिशाली हो जाता है । फ़िर दोनों में कोई अंतर नहीं रहता । समान हो जाता है ।

असंख्य झींगुर कीटों में से कोई कोई  बिरला कीट ही उपयुक्त और अनुकूल सुख प्रदान कराने वाला होता है । जो भृंगी के प्रथम शब्द गुंजार को ह्रदय से स्वीकारता है । अन्यथा कोई दूसरे और तीसरे शब्द को ही शब्द स्वर मानकर स्वीकार कर लेता है । तन मन से रहित भृंगी के उस महान शब्द रूपी गुंजार को स्वीकार करने में ही झींगुर कीट अपना भला मानते हैं ।
भृंगी के शब्द स्वर गुंजार को जो कीट स्वीकार नहीं करता । तो फ़िर वह कीट योनि के आश्रय में ही पङा रहता है । यानी वह मामूली कीट से शक्तिशाली भृंगी नहीं बन सकता ।
हे धर्मदास ! यह मामूली कीट का भृंगी में बदलने का अदभुत रहस्य है । जो कि महान शिक्षा प्रदान करने वाला है । इसी प्रकार जङ बुद्धि शिष्य जो सदगुरु के उपदेश को ह्रदय से स्वीकार करके गृहण करता है । उससे वह विषय विकारों से मुक्त होकर अग्यान रूपी बंधनों से मुक्त होकर कल्याणदायी मोक्ष को प्राप्त होता है ।
हे धर्मदास ! भृंगी भाव का महत्व और श्रेष्ठता को जानों । भृंगी की तरह यदि कोई मनुष्य निश्चय पूर्ण बुद्धि से गुरु के उपदेश को स्वीकार करे । तो गुरु उसे अपने समान ही बना लेते हैं । जिसके ह्रदय में गुरु के अलावा दूसरा कोई भाव नहीं होता । और वह सदगुरु को समर्पित होता है । वह मोक्ष को प्राप्त होता है । इस तरह वह नीच योनि में बसने वाले कौवे से बदलकर उत्तम योनि को प्राप्त हो हँस कहलाता है ।

सोमवार, जून 20, 2011

कौवा और कोयल से भी सीखो ?

कबीर साहब बोले- हे धर्मदास ! कोयल के बच्चे का स्वभाव सुनो । और उसके गुणों को जानकर विचार करो । कोयल मन से चतुर तथा मीठी वाणी बोलने वाली होती है । जबकि उसका वैरी कौवा पाप की खान होता है । कोयल कौवे के घर ( घोंसले ) में अपना अण्डा रख देती है ।
विपरीत गुण वाले दुष्ट मित्र कौवे के प्रति कोयल ने अपना मन एक समान किया । तब सखा मित्र सहायक समझकर कौवे ने उस अण्डे को पाला । और वह काल बुद्धि कागा ( कौवा ) उस अण्डे की रक्षा करता रहा ।
समय के साथ कोयल का अण्डा बङकर पक्का हुआ । और समय आने पर फ़ूट गया । तब उससे बच्चा निकला । कुछ दिन बीत जाने पर कोयल के बच्चे की आँखे ठीक से खुल गयी । और वह समझदार होकर जानने समझने लगा । फ़िर कुछ ही दिनों में उसके पँख भी मजबूत हो गये । तब कोयल समय समय पर आ आकर उसको शब्द सुनाने लगी ।
वह अपना निज शब्द सुनते ही कोयल का बच्चा जाग गया । यानी सचेत हो गया । और सच का बोध होते ही उसे

अपने वास्तविक कुल का वचन वाणी प्यारी लगी । फ़िर जब भी कागा कोयल के बच्चे को दाना खिलाने घुमाने ले जाये । तब तब कोयल अपने उस बच्चे को वह मीठा मनोहर शब्द सुनाये ।
कोयल के बच्चे में जब उस शब्द द्वारा अपना अंश अंकुरित हुआ । यानी उसे अपनी असली पहचान का बोध हुआ । तो उस बच्चे का ह्रदय कौवे की ओर से हट गया । और एक दिन कौवे को अंगूठा दिखलाकर वह कोयल का बच्चा उससे पराया होकर उङ चला ।
कोयल का बच्चा अपनी वाणी बोलता हुआ चला । और तब घबराकर उसके पीछे पीछे कागा व्याकुल बेहाल होकर दौङा । उसके पीछे पीछे भागता हुआ कागा थक गया । परन्तु उसे नहीं पा सका । फ़िर वह बेहोश हो गया । और बाद में होश आने पर निराश होकर अपने घर लौट आया ।
कोयल का बच्चा जाकर अपने परिवार से मिलकर सुखी हो गया । और निराश कागा झक मारकर रह गया ।
हे धर्मदास ! जिस प्रकार कोयल का बच्चा होता है कि वह कौवे के पास रहकर भी अपना शब्द सुनते ही उसका साथ छोङकर अपने परिवार से मिल जाता है ।
इसी विधि से जब कोई भी समझदार जीव मनुष्य अपने निज नाम और निज आत्मा की पहचान के लिये सचेत हो जाता है । तो वह मुझसे ( सदगुरु से ) स्वयँ ही मिल जाता है । और अपने असली घर परिवार सत्यलोक में पहुँच जाता है । तब मैं उसके 101 वंश तार देता हूँ ।
कोयल सुत जस शूरा होई । यह विधि धाय मिले मोहि कोई ।
निज घर सुरत करे जो हँसा । तारों ताहि एकोत्तर वंशा ।

हे धर्मदास ! इसी तरह कोयल के बच्चे की भांति कोई शूरवीर मनुष्य काल निरंजन की असलियत को जानकर सदगुरु के प्रति शब्द ( नाम उपदेश ) के लिये मेरी तरफ़ दौङता है । और निज घर सत्यलोक की तरफ़ अपनी सुरति ( पूरी एकाग्रता ) रखता है । मैं उसके  101 वंश तार देता हूँ ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास !  कौवे की नीच चाल चलन नीच बुद्धि को छोङकर हँस की रहनी सत्य आचरण सदगुण प्रेम शील स्वभाव शुभ कार्य जैसे उत्तम लक्षणों को अपनाने से मनुष्य जीव सत्यलोक जाता है । जिस प्रकार कागा की कर्कश वाणी कांव कांव किसी को अच्छी नहीं लगती । परन्तु कोयल की मधुर वाणी कुहु कुहु सबके मन को भाती है । इसी प्रकार कोयल की तरह हँस जीव विचार पूर्वक उत्तम वाणी बोले ।
जो कोई अग्नि की तरह जलता हुआ क्रोध में भरकर भी सामने आये । तो हँस जीव को शीतल जल के समान उसकी तपन बुझानी चाहिये । ग्यान अग्यान की यही सही पहचान है । जो अग्यानी होता है । वही कपटी उग्र तथा दुष्ट बुधि वाला होता है । गुरु का ग्यानी शिष्य शीतल और प्रेम भाव से पूर्ण होता है । उसमें सत्य विवेक संतोष आदि सदगुण समाये होते हैं ।
ग्यानी वही है । जो झूठ पाप अनाचार दुष्टता कपट आदि दुर्गुणों से युक्त दुष्ट बुद्धि को नष्ट कर दे । और काल निरंजन रूपी मन को पहचान कर उसे भुला दे । उसके कहने में न आये । जो ग्यानी होकर कटु वाणी बोलता है । वह ग्यानी अग्यान ही बताता है । उसे अग्यानी ही समझना चाहिये ।
जो मनुष्य शूरवीर की तरह धोती खोंसकर मैदान में लङने के लिये तैयार होता है । और युद्ध भूमि में आमने सामने जाकर मरता है । तब उसका बहुत यश होता है । और वह सच्चा वीर कहलाता है । इसी प्रकार जीवन में अग्यान से उत्पन्न समस्त पाप दुर्गुण और बुराईयों को परास्त करके जो ग्यान बिग्यान उत्पन्न होता है । उसी को ग्यान कहते हैं ।
मूर्ख अग्यानी के ह्रदय में शुभ सतकर्म नहीं सूझता । और वह सदगुरु का सार शब्द और सदगुरु के महत्व को नहीं समझता । मूर्ख इंसान से अधिकतर कोई कुछ कहता नहीं है । यदि किसी नेत्रहीन का पैर यदि विष्ठा ( मल ) पर पङ जाये । तो उसकी हँसी कोई नहीं करता । लेकिन यदि आँख होते हुये भी किसी का पैर विष्ठा से सन जाये । तो सभी लोग उसको ही दोष देते हैं ।
हे धर्मदास ! यही ग्यान और अग्यान है । ग्यान और अग्यान विपरीत स्वभाव वाले ही होते हैं । अतः ग्यानी पुरुष हमेशा सदगुरु का ध्यान करे । और सदगुरु के सत्य शब्द ( नाम या महामंत्र ) को समझे । सबके अन्दर सदगुरु का वास है । पर वह कहीं गुप्त तो कहीं प्रकट है । इसलिये सबको अपना मानकर जैसा मैं अविनाशी आत्मा हूँ । वैसे ही सभी जीवात्माओं को समझे । और ऐसा समझकर समान भाव से सबसे नमन करे । और ऐसी गुरु भक्ति की निशानी लेकर रहे ।
रंग कच्चा होने के कारण । इस देह को कभी भी नाशवान होने वाली जानकर भक्त प्रहलाद की तरह अपने सत्य संकल्प में दृण मजबूत होकर रहे । यधपि उसके पिता हिरण्यकश्यप ने उसको बहुत कष्ट दिये । लेकिन फ़िर भी प्रहलाद ने अडिग होकर हरि गुण वाली प्रभु भक्ति को ही स्वीकार किया । ऐसी ही प्रहलाद कैसी पक्की भक्ति करता हुआ । सदगुरु से लगन लगाये रहे । और 84 में डालने वाली मोह माया को त्याग कर भक्ति साधना करे । तब वह अनमोल हुआ हँस जीव अमरलोक सत्यलोक में निवास पाता है । और अटल होकर स्थिर होकर जन्म मरण के आवागमन से मुक्त हो जाता है ।
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