मंगलवार, अगस्त 17, 2010

स्थायी ख़ुशी की प्रतीक्षा है ??


लेखकीय - यह सिर्फ़ विनय जी की ही बात नहीं है । प्रत्येक इंसान अपने जीवन में ऐसी स्थिति से कभी न कभी दो चार होता ही है । प्रभु की कृपा है । लगभग अठारह साल की निरन्तर तलाश और अथक मेहनत के बाद महाराज जी की कृपा से आज मेरे जीवन में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं है । मुझे श्री महाराज जी की छत्रछाया में सात साल हो चुके हैं । और जीवन की तमाम भटकन अब समाप्त हो चुकी है । इस लेख में मुझे एक गलती ने आकर्षित किया । जो प्रायः हम सभी करते हैं । क्या है । वो गलती ? विनय जी के लेख के बाद नीचे पढें । साभार । श्री विनय शर्मा । मेरे बलोग । जब भगवान से साक्षात्कार की ख़ुशी नहीं,मिलती तो इंसान क्षणिक ख़ुशी खोजता है । अभी अभी पंडित डी.के वत्स जी का लेख पड़ा । मन्त्र । कर्मकांड । उपासना से लाभ क्यों नहीं मिलता । में पंडित जी के लेख बहुत मनोयोग से पड़ता हूँ । पंडित जी ने लिखा है । हमें इस योग्य होना चाहिए कि हम इन चीजों का लाभ उठा सकें । मेरे मन में बहुत से अनसुलझे प्रश्न उठते हैं । ईश्वर के एक बार दर्शन करने के बाद यहाँ वहाँ भटकता रहा कि पुन: दर्शन हो जाएँ । किसी ने कहा कोई गुरु बनाओ । फिर गुरु की खोज में भटकता रहा । यह भी कहा जाता है । पानी पियो छान के । गुरु बनाओ जान के । एक गुरु भी बनाये । प्रारंभ में तो वो गुरु तो मुझे अच्छे लगे । और लगभग तीन साल के बाद मुझे लगा कि उनकी अपने सब शिष्यों पर सम दृष्टि नहीं है । लेकिन यह बात मैंने प्रकट नहीं करी । लेकिन एक दिन मैंने उन गुरु जी से जिज्ञासावश कोई प्रश्न पूछा तो उन्होंने मुझे बहुत बुरी तरह से दुत्कार दिया । और मेरे को चार दिन तक तो रात को नींद ही नहीं आई । और तो और उनके एक और शिष्य हैं । मुझे ज्ञात नहीं वो मेरे मनोभावों को कैसे पड़ लेते थे । मेरी उनके उन शिष्य से अच्छी मित्रता हो गयी थी । उनके पास मुझे कुछ मानसिक आराम मिलता था । परन्तु वो तथाकथित गुरु जी । अपने उन शिष्य और मेरे मित्र के पास सुबह शाम आया करते थे । मेरे पास भी वही समय होता था । इसलिए मैंने अपने उन मित्र के पास जाना छोड़ दिया । मेरी विडंबना यह रही । मैंने श्री परमहंस योगानंद जी को गुरु बनाने के लिए आवेदन किया था । योगानंद जी तो इस दुनिया में नहीं थे । परन्तु उनके अध्याय ही गुरु की तरह प्रेरणा देते थे । वो केवल एक माह में एक ही प्रति आती थी । और उन अध्यायों का मेरी बहुत मानसिक,शारीरिक और अध्यात्मक उन्नति कर रहे थे । आप विश्वास करें या न करें । में लोगों की चिकित्सा योग से करने लगा । और उक्त घटना के बाद मेरे मन में वो अध्याय पड़ने की रूचि बिलकुल समाप्त हो गयी थी । और एक और विद्या जो कि संभवत: चीन कि थी । प्राणिक हीलिंग । जिसमें दूरस्थ या समीप लोगों की चिकित्सा बिना छुये और बिना दवाइयों के में कर लेता था । और यही काम में योग द्वारा कर लेता था । परन्तु यह विद्याएँ मेरे में उस घटना के बाद समाप्त हो चुकीं हैं । पंडित जी का वो लेख भी पड़ा है । जिसमें उन्होंने अंत:करण को गुरु बताया है । यह बात तो यहीं पर छोड़ता हूँ । जब यह सब समाप्त हो गया । तो में तो क्षणिक ख़ुशी की खोज करता हूँ । मुझे मालूम हैं । यह क्षणिक खुशियाँ क्षणिक ही हैं । स्थायी नहीं हैं । और यह क्षणिक खुशियाँ नहीं मिल पातीं । तो मन बहुत खिन्न हो जाता है । फिर भी मन क्षणिक खुशियों की ओर भागता है । यह सब मेरे मन के उदगार हैं । पंडित जी का वो लेख पड़ कर में भावुक हो उठा । मैंने एक बार लिखा था कि में विवादित लेख नहीं लिखूंगा । पर क्या करुँ दिल है कि मानता नहीं । पुन: कहता हूँ । यह मेरे ह्रदय से निकले हुए उदगार हैं । कोई माने या नहीं माने । पंडित जी की इस सार्थक लिखी हुई पोस्ट से भावुक हो गया । इसी प्रतीक्षा में हूँ । क्षणिक ख़ुशी के स्थान पर वास्तविक और स्थायी ख़ुशी मिल जाये । स्थायी ख़ुशी की प्रतीक्षा है ?
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@ ..किसी ने कहा कोई गुरु बनाओ । एक गुरु भी बनाये । मैंने श्री परमहंस योगानंद जी को गुरु बनाने के लिए आवेदन किया था । ( विनय जी के लेख से )
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मेरी बात -- यह सिर्फ़ विनय जी की बात नहीं है । 99 % लोग अग्यानतावश यह गलती करते हैं । लोग अक्सर कहते हैं कि मैं ने उन्हें गुरु बनाया है । या हमने तो वो गुरु करे हैं । तुमने गुरु कर लिये । तुमने गुरु बना लिये । शायद आप लोग इसमें छिपा रहस्य समझ गयें होंगे ? जरा सोचिये । आपने गुरु बनाये ?इसका क्या अर्थ है ? गुरु को बनाने वाले आप हैं । आपने गुरु किये । कैसे किये ? इसको सही तरह से ऐसे कहते हैं । मेरे गुरु वो हैं । मैंने उनसे उपदेश लिया है । मैंने उनसे नामदान लिया है । मैंने उनको गुरु माना है । और इसका सबसे आखिर में जब आप गुरु के रहस्यों से परिचित हो जाते हैं । तब कहते हैं । मैंने उनको गुरु जाना है । हालांकि ये कहने वाले बहुत ही कम गिने चुने लोग होते हैं ।वास्तव में पहले गुरु के शब्दों या मौखिक आध्यात्मिक ग्यान के प्रभाव से उन्हें माना ही जाता है । और फ़िर गुरु के द्वारा बतायी साधना को करते हुये साधना की ऊंची स्थितियों में गुरु को जाना जाता है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

बुधवार, अगस्त 11, 2010

भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
जब तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुये फ़न्दे ।
भगवान के इंसाफ़ पर सब छोड दे बन्दे ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
खुद ही तेरी मुश्किल । को वो आसान करेगा । जो तू नही कर पाया । वो भगवान करेगा ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
कहने की जरूरत नहीं आना ही बहुत है ।
इस दर पर तेरा शीश झुकाना ही बहुत है ।
जो कुछ है तेरे दिल में वो उसको भी खबर है । बन्दे तेरे हर हाल पर मालिक की नजर है ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है ।
भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
बिन मांगे भी मिलती हैं यहां मन की मुरादें ।
दिल साफ़ है जिनका वो खुद ही पधारें ।
मिलता है जहां न्याय । वो दरवार यही है । संसार की सबसे बडी सरकार यही है ।
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है । भगवान के घर देर है । अन्धेर नहीं है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है ।

मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । अजब है गुरुओं का दरबार । भरा जहां भक्ती का भंडार ।
शबद अनमोल सुनाते हैं । कि मन का भरम मिटाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । गुरूजी सत का देते ग्यान । जीव का हो ईश्वर से ध्यान ।
वो अमृत खूब पिलाते हैं । कि मन की प्यास बुझाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । गुरूजी नही लेते कुछ दान । फ़िर भी रखते दुखियों का ध्यान ।
वो अपना ग्यान लुटाते हैं । अनेकों कष्ट मिटाते हैं ।
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है । कर लो गुरु चरणों का ध्यान । तुझसे करे भक्त बखान ।
गुरूजी सारे दुख मिटाते हैं । कि भव से पार लगाते हैं । मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।

तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला ।
एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
आज अवध की शोभा लगती । स्वर्गपुरी से भी प्यारी ।
चौदह बरस बाद राम के । राजतिलक की तैयारी ।
हनुमत के दिल की मत पूछो । झूम रहा है मतवाला ।
एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
( जितने राजा आधीन अवध के । सभी सभा में आये थे । )
रत्न जडित हीरों का हार जब । लंकापति ने भेंट किया ।
राम ने सोचा आभूषण है । सीताजी की ओर किया ।
सीता ने हनुमत को दे दिया । इसे पहन मेरे लाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
हार हाथ में लेकर हनुमत । घुमा फ़िरा कर देख रहे । नहीं समझ में आया तो । तोड तोडकर फ़ेंक रहे ।
लंकापति मन में पछताया । पडा है बन्दर से पाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
लंकापति का धीरज टूटा । क्रोध की भडक उठी ज्वाला । भरी सभा में बोल उठा । पागल हो अंजनी लाला ।
हार कीमती तोड दिया । क्या पेड का फ़ल समझ डाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला । हाथ जोडकर हनुमत बोले । मुझे है क्या कीमत से काम ।
मेरे काम की चीज वही है । जिसमें बसे है मेरे राम । राम नजर न आया इसमें ।यूं बोले बजरंग वाला ।
एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला । तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला ।
इतनी बात सुनी हनुमत की । बोल उठा लंकावाला । तेरे में क्या राम बसा है । सभा बीच में कह डाला ।
चीर के सीना हनुमत ने । राम का दरस करा डाला । एक जरा सी बात पे हनुमत । सीना फ़ाड दिखा डाला ।
तेरे जैसा राम भक्त कोई । हुआ न होगा मतवाला ।

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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।

गुरु पारब्रह्म परमेश्वर निखलेश्वरमय जग सारा ।
गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
गुरु दोष मेरे सब लेलो । मेरे अंतर के पट खोलो ।
बस जाओ मेरे ह्रदय में । मुझे अपनी शरण में लेलो ।
मेरा मन माया में भटके । तुम दे दो जरा सहारा ।
गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
मैं भटक न जाऊं पथ से । मेरी बांहे थामे रखना ।
तुम समरथ हो मेरे गुरुवर । केवल ये ध्यान में रखना ।
मेरा कुछ भी नहीं है जग में । जो है गुरुदेव तुम्हारा । गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
जब से गुरु शरण मिली है । देखा गुरु रूप तुम्हारा । भाता ही नहीं है मुझको । दुनिया का कोई नजारा ।
नहीं बोल फ़ूटते मुख से । बहती है केवल धारा । गुरु नाम जपे हर धडकन बोले मन का इकतारा ।
ओम गुरु । ओम गुरु । ओम गुरु ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

जब सीना फ़ाड दिया श्री राम नजर आये ।

भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
जब सीना फ़ाड दिया श्री राम नजर आये ।
राणा ने मीरा को जहर जब खिलाया था ।
उस जहर के प्याले में घनश्याम नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
शबरी ने संकट में श्रीराम को पुकारा था ।
जब बेर खिलाये तो श्रीराम नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
द्रोपदी ने संकट में श्रीकृष्ण को पुकारा था ।
साडी के चीर में श्रीकृष्ण नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
कलियुग में भक्तों ने श्रीराम को पुकारा था ।
भक्तों के कीर्तन में श्रीराम नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
प्रहलाद ने संकट में श्रीकृष्ण को पुकारा था ।
महलों के खम्बों में नरसिंह नजर आये ।
भक्ति के रंग में हनुमान नजर आये ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

भारतवर्ष का वर्णन

जम्बूदीप के मध्यभाग में इलावृत नाम का वर्ष है । उसके पूर्व में भद्राश्ववर्ष । तथा उसके पूर्व दक्षिण मेंहिरण्वान नामक वर्ष है । मेरु के दक्षिण में किम्पुरुषवर्ष माना गया है । उसके दक्षिण भाग में भारतवर्ष है । मेरु के दक्षिण पश्चिम में हरिवर्ष । पश्चिम में केतुमालवर्ष । पश्चिम उत्तर में रम्यक । और उत्तर में कुरुवर्ष स्थित है । जो कल्पवृक्षों से भरा हुआ है । भारतवर्ष को छोडकर अन्य सभी वर्षों में सिद्धि स्वभाव से ही प्राप्त होती है । यानी निश्चित है । यहां इन्द्रदीप । कशेरुमान । ताम्रवर्ण । गभस्तिमान । नागदीप । कटाह । सिंहल । वारूण । नाम के आठ वर्ष है । नवां भारतवर्ष है । जो चारों ओर समुद्र से घिरा हुआ है । भारतवर्ष के पूर्व में किरात तथा पश्चिम में यवन देश स्थित हैं । इस्के दक्षिण में आन्ध्र । उत्तर में तुरुष्का आदि देश हैं ।
भारत में ब्राह्मण । वैश्य । क्षत्रिय । शूद्र रहते हैं । यहां महेन्द्र । मलय । सह्य । शुक्तिमान । ऋक्ष । विन्ध्य ।
पारयात्र । ये सात पर्वत हैं । भारतवर्ष में । वेद । स्मृति । नर्मदा । वरदा । सुरसा । शिवा । तापी । पयोष्णी
। सरयू । कावेरी । गोमती । गोदावरी । भीमरथी । कृष्णवेणी । केतुमाला । ताम्रपर्णी । चन्द्रभागा । सरस्वती । ऋषिकुल्या । कावेरी । मत्तगंगा । पयस्विनी । विदर्भा । शतद्रू । नाम की पवित्र नदियां हैं ।
पांच्चाल । कुरु । मत्स्य । यौधेय । पटच्चर । कुन्त । शूरसेन । ये मध्यदेश के निवासी हुये । पाद्म । सूत । मगध । चेदि । काशेय । विदेह । ये पूर्व के देश हैं । कोशल । कलिंग । वंग । पुण्ड्र । अंग । विदर्भ । मूलकजनों के देश हैं । विन्ध्यपर्वत के अतर्गत विधमान देश पूरब तथा दक्षिण के तटवर्ती भूभाग में बसे हैं । पुलिंद । अश्मक । जीमूत । नय । देश में निवास करने वाले । कर्णाटक । कम्बोज तथा घण । ये दक्षिण भाग के निवासी हैं । अम्बष्ठ । द्रविड । लाट । कम्भोज । स्त्रीमुख । शक । आनर्तवासी । दक्षिण पश्चिम के निवासी हैं । स्त्रीराज्य । सैन्धव । म्लेच्छ । नास्तिक । यवन । मथुरा । निषध । के रहने वाले लोगों का देश पश्चिमी भूभाग है । माण्डव्य । तुषार । मूलिका । अश्वमुख । खश । महाकेश । महानास । देश उत्तर पश्चिम में हैं । लम्बक । स्तननाग । माद्र । गान्धार । बाह्यिक । म्लेच्छ देश हिमाचल के उत्तरतटवर्ती भूभाग में है । त्रिगर्त । नील । कोलात । ब्रह्मपुत्र । सटड्क्ण । अभीषाह । कश्मीर । उत्तरपूर्व में हैं ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता
है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
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