शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 40


गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गंता नागंता किमेनमनुशोचसि । 15-9 
गुणों से निर्मित । यह शरीर स्थिति । जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है । और न ही जाती है । अतः तुम क्यों शोक करते हो । 9
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः । 15-10 
यह शरीर । सृष्टि के अंत तक रहे । अथवा । आज ही । नाश को प्राप्त हो जाये । तुम तो चैतन्य स्वरुप हो ।  इससे तुम्हारी क्या हानि या लाभ है । 10
त्वय्यनंतमहांभोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः । 15-11
अनंत महासमुद्र रूप तुम में । लहर रूप । यह विश्व । स्वभाव से ही । उदय और अस्त । को प्राप्त होता है । इसमें तुम्हारी । क्या वृद्धि या क्षति है । 11
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 15-12 
हे प्रिय ! तुम केवल चैतन्य रूप हो । और यह विश्व । तुमसे अलग नहीं है । अतः किसी की किसी से । श्रेष्ठता या निम्नता । की कल्पना । किस प्रकार की जा सकती है । 12
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

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