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सोमवार, दिसंबर 12, 2011

साधु को अंग 11


साधू के घर जाय के, सुधि न लीजै कोय।
पीछै करी न देखिये, आगे ह्वै सो होय॥

साधु विहंगम सुरसरी, चेल विहंगम चाल।
जो जो गलियां नीकसे, सो सो करै निहाल॥

साधू सोई सराहिये, पाँचौ राखै चूर।
जिनके पांचौ बस नही, तिनते साहिब दूर॥

निहकामी निरमल दसा, पकङे चारौं खूंट।
कहै कबीर वा दास का, आस करै बैकुंठ॥

रति एक धुँवा संत का, भूत ऊधरे चार।
जले जलाये फ़िर जले, कहैं कबीर विचार॥

साधू सरवन सांभरी, छोङ चले ग्रह काम।
डग डग पै असमेध जग, यौं कहि श्री भगवान॥

साधु दरस को जाइये, जेता धरिये पांय।
डग डग पै असमेध जग, कहैं कबीर समुझाय॥

साधू दरसन महाफ़ल, कोटि जज्ञ फ़ल लेह।
इक मंदिर की का पङी, सहर पवित्र करि लेह॥

साधु मिले सूख ऊपजे, साधु गये दुख होय।
ताते देही दूबली, नैनन दीन्हा रोय॥

जाकी धोति अधर तपै, ऐसे मिले असंख।
सब रिषियन के देखतां, सुपच बजाया घंट॥

साहिब का बाना सही, संतन पहिरा जानि।
पांडव जग पूरन भयो, सुपच बिराजे आन।

कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।
सुपचि भक्त की पनहि में, तुलै न काहू सीस॥

हरि सेती हरिजन बङे, जानै संत सुजान।
सेतु बांधि रघुवर चले, कूदि गये हनुमान॥

ज्ञान ध्यान मन धनुष गहि, खैंचनहार अलेख।
केते दुरजन मारिया, आप कढ़ै या भेख॥

साधू ऐसा चाहिये, जहाँ रहै तहाँ गैब।
बानी के विस्तार में, ताकूं कोटिक ऐब॥

सन्तमता गजराज का, चाले बंधन छोङ।
जग कुत्ता पीछै फ़िरै, सुनै न वाका सोर॥

आज काल दिन पांच में, बरस पंच जुग पंच।
जब तब साधु तारसी, और सकल परपंच॥

सतगुरू केरा भावता, दूरहि ते दीसंत।
तन छीन मन उनमुनी, झूठा रूठ फ़िरंत॥

ज्यौं जल में मच्छी रहैं, साहिब साधू मांहि।
सब जग में साधू रहै, असमझ चीन्है नांहि॥

समझे घट कूं यूं बनै, ये तो बात अगाध।
सबही सों निरवैरता, पूजन कीजै साध॥

मिलता सेती मिलि रहै, बिछुरे सें वैराग।
साहिब सेती यौं रहै, विमन के गल ताग॥

हाजी कूं दुख बहुत हैं, नाजी कू दुख नांहि।
कबीर हाजी ह्वै रहो, अपने ही दिल मांहि॥

सन्त कहि सो साधु कहि, वेद कही मति जानि।
कहैं कबीर एकै रही, ताते होत पिछान॥

साधू ऐसा चाहिये, जाका पूरन मन।
विपति पङै छाङै नही, चढ़ै चौगुना रंग।।

कबीर साधू दुरमति, ज्यौं पानी में लात।
पल एकै विरजत रहै, पीछै इक ह्वै जात॥

साधू ऐसा चाहिये, जामें लछन बतीस।
विरचाया बिरचै नहीं, पांव चढ़े दे सीस॥

साधु को अंग 10


सोई साधु पति बरत जु, सदा जरै पिय आग।
लाभ हानि बिसराय के, रहु गुरू चरनन लाग॥

दया गरीबी बंदगी, समता सील सुभाव।
येते लच्छन साधु के, कहै कबीर सदभाव॥

मान नहि अपमान नहीं, ऐसे सीतल संत।
भवसागर ऊतर पङे, तोरै जम के दंत॥

आसा तजि माया तजै, मोह तजै अरु मान।
हरख सोक निन्दा तजै, कहै कबिर संत जान॥

साधु सोई सराहिये, कनक कामिनी त्याग।
और कछू इच्छा नहीं, निसदिन रह अनुराग॥

साधू ऐसा चाहिये, जैसा फ़ोफ़ल भग।
आप करावै टूकङा, पर राखै रंग॥

तनहि ताप जिनको नही, माया मोह संताप।
हरख सोक आसा नहीं, सो हरिजन हरि आप॥

संतन के मन भय रहे, भय धरि करै विचार।
निसदिन नाम जपउ करै, बिसरत नहीं लगार॥

आसन तो इकान्त करै, कामिनी संगत दूर।
सीतल संत सिरोमनी, उनका ऐसा नूर॥

साधु साधु मुख से कहै, पाप भसम ह्वै जाय।
आप कबीर गुरू कहत हैं, साधू सदा सहाय॥

हौं साधुन के संग रहूं, अंत न कितहूं जाऊं।
जु मोहि अरपै प्रीति सों, साधुन मुख ह्वै खाऊं॥

यह कलियुग आयो अवै, साधु न मानै कोय।
कामी क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय॥

संत संत सब कोइ कहै, संत समुंदर पार।
अनल पंख कोइ एक है, पंखी कोटि हजार॥

कबीर सेवा दोउ भली, एक संत इक राम।
राम है दाता मुक्ति का, संत जपावै नाम॥

साधू खारा यौं तजै, सीप समुंदर मांहि।
वासो तो वामें रहै, मन चित वासों नाहिं॥

साधु मिले साहिब मिले, ये सुख कहो न जाय।
अंतरगत अंगीठडी, ततचिन टाढी थाय॥

साहिब संग राचै भंवर, कबहू न छूटै रंग।
जैसे जैसे कीजिये, उन संतन को संग॥

साधू के घर जाय के, किरतन दीजै कान।
ज्यौं उद्यम त्यौं लाभ है, ज्यौं आलस त्यौं हानि॥


साधु को अंग 9


सन्त समागम परम सुख, जान अलप सुख और।
मान सरोवर हंस है, बगुला ठौरै ठौर॥

संत मिले सुख ऊपजे, दुष्ट मिले दुख होय।
सेवा कीजै संत की, जनम कृतारथ होय॥

हरिजन मिले तो हरि मिले, मन पाया विश्वास।
हरिजन हरि का रूप है, ज्यूं फ़ूलन में वास॥

संत मिले तब हरि मिले, कहिये आदि रु अन्त।
जो संतन को परिहरै, सदा तजै भगवंत॥

राम मिलन के कारनै, मो मन बङा उदास।
संत संग में सोधि ले, राम उनों के पास॥

सरनै राखौ साइयां, पूरो मन की आस।
और न मेरे चाहिये, संत मिलन की प्यास॥

कलियुग एकै नाम है, दूजा रूप है संत।
सांचे मन से सेइये, मेटै करम अनंत॥

संत जहाँ सुमरन सदा, आठों पहर अमूल।
भरि भरि पीवै रामरस, प्रेम पियाला फ़ूल॥

फ़ूटा मन बदलाय दे, साधू बङे सुनार।
तूटी होवै राम सों, फ़ेर संधावन हार॥

राज दुवार न जाइये, कोटिक मिले जु हेम।
सुपच भगत के जाइये, यह विस्नू का नेम॥

संगत कीजै साधु की, कदी न निस्फ़ल होय।
लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय॥

सो दिन गया अकाज में, संगत भई न संत।
प्रेम बिना पशु जीवना, भाव बिना भटकंत॥

संत मिले तब हरि मिले, यूं सुख मिलै न कोय।
दरसन ते दुरमत कटै, मन अति निरमल होय॥

साहिब मिला तब जानिये, दरसन पाये साध।
मनसा वाचा करमना, मिटे सकल अपराध॥


साधु को अंग 8

उडगन और सुधाकरा, बसत नीर की संध।
यौं साधू संसार में, कबीर पङत न फ़ंद॥

जौन भाव ऊपर रहै, भितर बसावै सोय।
भीतर औ न बसावई, ऊपर और न होय॥

तन में सीतल सब्द है, बोलै वचन रसाल।
कहैं कबीर ता साधु को, गंजि सकै नहि काल॥

तीन लोक उनमान में, चौथा अगम अगाध।
पंचम दसा है अलख की, जानैगा कोई साध॥

सब वन तो चंदन नहीं, सूरा के दल नांहि।
सब समुद्र मोती नहि, यौं साधू जग मांहि॥

सिंघन के लेहङा नहीं, हँसों की नहि पांत।
लालन की नहि बोरियां, साधु न चले जमात॥

स्वांगी सब संसार है, साधू समज अपार।
अलल पंछि कोइ एक है, पंछी कोटि हजार॥

ऐसा साधू खोजि के, रहिये चरनों लाग।
मिटै जनम की कलपना, जाके पूरन भाग॥

ऊंडा चित अरु सम दसा, साधू गुन गंभीर।
जो धोखा बिचलै नहीं, सोई संत सुधीर॥

चित चैन में गरकि रहा, जागि न देख्यौ मित्त।
कहाँ कहाँ सल पारि हो, गल बल सहर अनित्त॥

कबीर हमरा कोइ नहि, हम काहू के नांहि।
पारै पहुँची नाव ज्यौं, मिलि के बिछुरी जांहि॥

आज काल के लोग हैं, मिलि के बिछुरी जांहि।
लाहा कारन आपने, सौगंद राम की खांहि॥

कबीर सब जग हेरिया, मेल्यौ कंध चढ़ाय।
हरि बिन अपना कोइ नहि, देखा ठोकि बजाय॥

निसरा पै बिसरा नहीं, तो निसरा ना काहि।
पहिली खाद उखालिया, सो फ़िर खाना नाहिं॥

जो विभूति साधुन तजी, मूढ़ ताहि लपटाय।
ज्यौंहि वमन करि डारिया, स्वान स्वाद करि खाय॥

दुनिया बंधन पङि गई, साधू हैं निरबंध।
राखै खंग जु ज्ञान का, काटत फ़िरै जु फ़ंद॥

कबीर कमलन जल बसै, जल बसि रहे असंग।
साधूजन तैसे रहें, सुनि सदगुरू परसंग॥

मुर्गाबी को देखकर, मन उपजा यह ज्ञान।
जल में गोता मार कर, पंख रहे अलगान॥

जुआ चोरी मुखबिरी, ब्याज विरानी नारि।
जो चाहै दीदार को, इतनी वस्तु निवारि॥

साधु को अंग 7



निहचल मत अरु दृढ़ मता, ये सब लच्छन जान।
साधू सोई जगत में, जो यह लच्छनवान॥ 

मन रंजन पर दुखहरन, वैर भाव बिसराय।
छिपा ज्ञान हिंसा रहित, सो नर साधु कहाय॥

इन्द्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय।
सदा शुद्ध आचार में, रह विचार में सोय॥

और देव नहि चित बसै, मन गुरूचरन बसाय।
स्वल्पाहार भोजन करु, तृस्ना दूर पराय॥

और देव नहि चित बसै, बिन प्रतीत भगवान।
मिला (अ)हार भोजन करै, तृस्ना चलै न जान॥

षङ विकार यह देह के, तिनको चित्त न लाय।
सोक मोह प्यासहि छुधा, जरा मृत्यु नसि जाय॥

कपट कुटिलता छांङि के, सबसों मित्रहि भाव।
कृणवान सम ज्ञानवत, वैर भाव नहि काव॥

कपट कुटिलता दुरवचन, त्यागी सबसों हेत।
कृपाबन्त आसारहित, गुरूभक्ति सिख देत॥

रवि को तेज घटै नहीं, जो घन जुरै घमंड।
साधु वचन पलटै नहीं, पलटि जाय ब्रह्मंड॥

जौन चाल संसार की, तौन साधु की नांहि।
डिंभ चाल करनी करै, साधु कहो मति ताहि॥

गांठी दाम न बांधई, नहि नारी सों नेह।
कहैं कबीर ता साधु की, हम चरनन की खेह॥

कोई आवै भाव ले, को अभाव ले आव।
साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव॥

रक्त छांङि पय को गहै, ज्यौं रे गउ का बच्छ।
औगुन छाङै गुन गहै, ऐसा साधु लच्छ॥

संत न छाङै संतता, कोटिक मिले असन्त।
मलय भुवंगम बेधिया, सीतलता न तजन्त॥

साकट ब्राह्मन मति मिलो, साधु मिलो चंडाल।
जाहि मिलै सुख ऊपजै, मानो मिले दयाल॥

कमल पत्र है साधुजन, बसै जगत के मांहि।
बालक केरी धाय ज्यौं, अपना जानत नांहि॥

हरि दरिया सूभर भरा, साधू का घट सीप।
तामें मोती नीपजै, चढ़ै देसावर दीप॥

बहता पानी निरमला, बंधा गन्दा होय।
साधू जन रमता भला, दाग न लागे कोय॥

बंधा पानी निरमला, जो टुक गहिरा होय।
साधूजन बैठा भला, जो कछु साधन होय॥

ढोल दमामा गङगङी, सहनाई औ तूर।
तीनों निकसि न बाहुरै, साधु सती औ सूर।

तूटै बरत अकास सों, कौन सकत है झेल।
साधु सती औ सूर का, अनी उपर का खेल॥

हांसी खेल हराम है, जो जन राते नाम।

माया मंदिर इस्तरी, नहि साधु का काम॥

WELCOME

मेरी फ़ोटो
Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।