गुरुवार, नवंबर 17, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 13


अष्टावक्र उवाच - विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरं कुरु । 10-1
अष्टावक्र बोले - कामना । और अनर्थों के समूह । धन रूपी । शत्रुओं को त्याग दो । इन दोनों के । त्याग रूपी धर्म से । युक्त होकर । सर्वत्र विरक्त ( उदासीन ) हो जाओ । 1
स्वप्नेन्द्रजालवत पश्य दिनानि त्रीणि पंच वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसंपदः । 10-2
मित्र । जमीन । कोषागार । पत्नी । और अन्य संपत्तियों को । स्वपन की । माया के समान । तीन या पाँच दिनों में । नष्ट होने वाला देखो । 2
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव । 10-3
जहाँ जहाँ । आसक्ति हो । उसको ही । संसार जानो । इस प्रकार । परिपक्व वैराग्य के । आश्रय में । तृष्णा रहित होकर । सुखी हो जाओ । 3
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः । 10-4
तृष्णा ( कामना ) मात्र ही । स्वयं का । बंधन है । उसके नाश को ।  मोक्ष कहा जाता है । संसार में । अनासक्ति से ही । निरंतर । आनंद की प्राप्ति होती है । 4
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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