शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 33


आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं । विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः । 12-5
आश्रम । अनाश्रम । ध्यान और मन द्वारा । स्वीकृत । और निषिद्ध । नियमों को देखकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 5
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद यथैवोपरमस्तथा । बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः । 12-6
कर्मों के । अनुष्ठान रूपी । अज्ञान से । निवृत्त होकर । और तत्त्व को । सम्यक रूप से जानकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 6
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तदभावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः । 12-7
अचिन्त्य के । सम्बन्ध में । विचार करते हुए भी । विचार पर ही । चिंतन । किया जाता है । अतः । उस विचार का भी । परित्याग करके । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 7
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ । 12-8
जो । इस प्रकार से । आचरण करता है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । जिसका । इस प्रकार का । स्वभाव है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । 8
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।




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