गुरुवार, नवंबर 17, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 10


कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात । 9-4
ऐसा । कौन सा समय । अथवा उम्र है । जब मनुष्य के । संशय । नहीं रहे है । अतः । संशयों की । उपेक्षा करके । अनायास । सिद्धि को प्राप्त करो । 4
ना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा  दृष्टवा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः । 9-5
महर्षियों । साधुओं । और योगियों के । विभिन्न मतों को देखकर । कौन मनुष्य । वैराग्यवान होकर । शांत नहीं हो जायेगा । 5
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः । निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः । 9-6
चैतन्य का । साक्षात ज्ञान प्राप्त करके । कौन वैराग्य । और समता से युक्त । कौन गुरु । जन्म और मृत्यु के । बंधन से । तार नहीं देगा । 6 
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान यथार्थतः । तत्क्षणाद बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि । 9-7
तत्त्वों के । विकार को । वास्तव में । उनकी मात्रा के । परिवर्तन के । रूप में देखो । ऐसा देखते ही । उसी क्षण । तुम । बंधन से मुक्त होकर । अपने स्वरुप में । स्थित हो जाओगे । 7 
वासना एव संसार इति सर्वा विमुंच ताः । तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा । 9-8
इच्छा ही । संसार है । ऐसा जानकर । सबका । त्याग कर दो । उस त्याग से । इच्छाओं का । त्याग हो जायेगा । और तुम्हारी । यथारूप । अपने स्वरुप में । स्थिति हो जाएगी । 8
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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