शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 38


भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 15-17 
यह विश्व केवल भृम ( स्वप्न की तरह असत्य ) है । और कुछ भी नहीं । ऐसा निश्चय करो । इच्छा और चेष्टा रहित हुए । बिना कोई भी । शांति को प्राप्त नहीं होता है । 17
एक एव भवांभोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर । 15-18 
एक ही भवसागर ( सत्य ) था । है । और रहेगा । तुममें न मोक्ष है । और न बंधन । आप्त काम होकर सुख से विचरण करो । 18
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे । 15-19 
हे चैतन्यरूप ! भाँति भाँति के संकल्पों । और विकल्पों से । अपने चित्त को । अशांत मत करो । शांत होकर । अपने आनंद रूप में । सुख से स्थित हो जाओ । 19
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किंचिद् हृदि धारय । आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि । 15-20 
सभी स्थानों से अपने ध्यान को हटा लो । और अपने हृदय में कोई विचार न करो । तुम आत्मरूप हो । और मुक्त ही हो । इसमें विचार करने की क्या आवश्यकता है । 20
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।




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