शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 39


 एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च । 15-13 
इस अव्यय । शांत । चैतन्य । निर्मल आकाश में । तुम अकेले ही हो । अतः तुममें जन्म । कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है । 13
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथक भासते स्वर्णात कटकांगदनूपुरम । 15-14 
तुम एक होते हुए भी । अनेक रूप में । प्रतिबिंबित होकर । दिखाई देते हो । क्या स्वर्ण कंगन । बाज़ूबन्द और पायल से अलग दिखाई देता है । 14
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति संत्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव । 15-15 
यह मैं हूँ । और यह मैं नहीं हूँ । इस प्रकार के भेद को त्याग दो । सब कुछ आत्मस्वरूप तुम ही हो । ऐसा निश्चय करके । और कोई संकल्प न करते हुए । सुखी हो जाओ । 15
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन । 15-16 
अज्ञानवश तुम ही । यह विश्व हो । पर ज्ञान दृष्टि से । देखने पर । केवल एक तुम ही हो । तुमसे अलग कोई । दूसरा संसारी । या असंसारी । किसी भी प्रकार से नहीं है । 16
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

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