गुरुवार, नवंबर 17, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 11


अष्टावक्र उवाच - कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद भव त्यागपरोऽव्रती । 9-1
अष्टावक्र बोले - यह कार्य । करने योग्य है । अथवा । न करने योग्य । और ऐसे ही । अन्य द्वंद्व ( हाँ या न रूपी संशय ) कब । और किसके । शांत हुए हैं । ऐसा विचार करके । विरक्त ( उदासीन ) हो जाओ । त्यागवान बनो । ऐसे किसी नियम का । पालन न करने वाले बनो । 1
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात । जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः । 9-2
हे पुत्र ! इस संसार की ( व्यर्थ ) चेष्टा को । देखकर । किसी धन्य पुरुष की ही । जीने की इच्छा । भोगों के । उपभोग की इच्छा । और भोजन की इच्छा । शांत हो पाती है । 2
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितम । असरं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति । 9-3
यह सब । अनित्य है । तीन प्रकार के कष्टों ( दैहिक । दैविक । और भौतिक ) से घिरा है । सारहीन है । निंदनीय है । त्याग करने योग्य है । ऐसा निश्चित करके ही । शांति प्राप्त होती है । 3
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात । 9-4
ऐसा । कौन सा समय । अथवा उम्र है । जब मनुष्य के । संशय । नहीं रहे है । अतः । संशयों की । उपेक्षा करके । अनायास । सिद्धि को प्राप्त करो । 4
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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