शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 34


जनक उवाच - कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्माद एवमेवाहमास्थितः । 12-1
जनक बोले - पहले मैं । शारीरिक कर्मों से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । फिर वाणी से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । अब चिंता से । निरपेक्ष ( उदासीन ) होकर । अपने स्वरुप में स्थित हूँ । 1प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः । 12-2
शब्द आदि । विषयों में । आसक्ति रहित होकर । और आत्मा के । दृष्टि का । विषय न होने के कारण । मैं निश्चल । और एकाग्र ह्रदय से । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 2
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये । एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः । 12-3
अध्यास ( असत्य ज्ञान ) आदि । असामान्य स्थितियों । और समाधि को । एक नियम के । समान देखते हुए । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 3
हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे बृह्मन्न एवमेवाहमास्थितः । 12-4
हे बृह्म को । जानने वाले । त्याज्य ( छोड़ने योग्य ) और संगृहणीय से । दूर होकर । और सुख दुःख के । अभाव में । मैं अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।




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