शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 32


अष्टावक्र उवाच - भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी  । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति । 11-1
अष्टावक्र बोले - भाव ( सृष्टि । स्थिति ) और अभाव ( प्रलय । मृत्यु ) रूपी विकार । स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से । जानने वाला । विकार रहित । दुख रहित होकर । सुख पूर्वक । शांति को । प्राप्त हो जाता है । 1
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी । अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते । 11-2
ईश्वर । सबका । सृष्टा है । कोई अन्य नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाले की । सभी । आन्तरिक इच्छाओं का । नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष । सर्वत्र । आसक्ति रहित । हो जाता है । 2
आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी । तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति । 11-3
संपत्ति ( सुख ) और विपत्ति ( दुःख ) का समय । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) है । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । संतोष । और निरंतर । संयमित इन्द्रियों से । युक्त हो जाता है । वह न । इच्छा करता है । और न शोक । 3
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।



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