शनिवार, मार्च 27, 2010

पोथी पढ पढ जग मुआ ,

पोथी पढ पढ जग मुआ , पंडित भया न कोय .ढाई अक्षर प्रेम के पढे सो पंडित होय . आमतौर पर कई कक्षाओं में पढाया जाने वाला ये दोहा वास्तव में कितना कीमती है इसका अंदाजा लगाना उन लोगों के लिये बेहद कठिन है जिन्होंने कभी आत्मग्यान या संतमत का सतसंग नही सुना .वास्तव में ये ढाई अक्षर आत्मबोध कराने वाले उस नाम के बारे में है जो हमें जन्म मरण के चक्करों से छुटा सकता है .इसी नाम के द्वारा जीव स्रष्टि के आदि से मोक्ष प्राप्त करता रहा है .इस नाम के अतिरिक्त मुक्ति देने वाला दूसरा नाम नहीं है .
ये नाम किसी पूर्ण गुरु या सतगुरु से ही लेने का विधान
है .सुनकर या पढकर इस नाम को जपने से भारी हानि
हो सकती है . गर्भ योगेश्वर गुरु बिना लागा हरि की सेव .
कह कबीर बैकुन्ठ से फ़ेर दिया शुकदेव . जीव के लिये गुरु का महत्व कितना अधिक है .यह इस दोहे से भलीभाँति स्पष्ट होता है .श्री शुकदेव जी को इतना अधिक ग्यान था कि वे गर्भ में ही योगेश्वर कहलाते थे लेकिन उनका ग्यान तप आदि से अर्जित था और योग साधना से वे बैकुंठ जाने के अधिकारी हो गये .श्री शुकदेव जी बैकुंठ पहुँचे भी पर विष्णु भगवान ने उन्हे यह कहकर वापस कर दिया कि बिना गुरु से उपदेश लिये कोई भी बैकुंठ में रहने का अधिकारी नहीं होता चाहे वह कितना ही बङा क्यों न हो जाय तब शुकदेव जी ने वापस आकर गुरु से उपदेश लिया .नींद निशानी मौत की उठ कबीरा जाग . और रसायन छोङ के नाम रसायन लाग .इस दोहे का अर्थ है कि ये जीव अग्यान की नींद में है और संसार रूपी सपना देख रहा है तथा तरह तरह के व्यसनों (रसायन ) में खोया हुआ है इसलिये कबीर साहेब जीव को चेताते हैं कि इन भोग पदार्थों से आसक्ति हटाकर नाम रसायन में (ढाई अक्षर का महामन्त्र ) का जाप कर तो तू मौत को त्यागकर अमरता को प्राप्त हो जायेगा .

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