रविवार, मार्च 28, 2010

पहले हँसे फ़िर रोये ??..

आज से लगभग पाँचसौ बरस पहले जब प्रथ्वी पर धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबोला था और इस्लाम की कट्टरता से लोंगो का जीना मुश्किल हो रहा था .तब इस प्रथ्वी पर जीव को अग्यान निद्रा से जगाने के लिये सत्य प्रकट हुआ और कई संत आत्माएं इस प्रथ्वी पर मनुष्य शरीर लेकर उतरीं .इनमें संत कबीर , रैदास जी रिहाई जी , तुलसीदास जी , मीराबाई आदि प्रमुख थे .
एक बार संत रिहाई जी कबीर साहेब से मिलने के लिये आये तब तक कबीर साहेब के अनेकों शिष्य बन चुके थे . जब रिहाई जी आये तो शिष्यों ने सोचा कि आज तो दो महान संत इकठ्ठा हुये हैं . आज बहुत उच्चकोटि का सतसंग सुनने को मिलेगा लेकिन कबीर साहेब रिहाई जी को देखते ही उनके गले लग गये और फ़िर दोनों खूब हँसे इसके बाद दोनों खूब रोये और फ़िर दोनों एक दूसरे की आँख में आँख डाले सुबह तक एक दूसरे को देखते रहे...बाद में शिष्यों ने पूछा कि महाराज जी हम तो सोचते थे कि आज दुर्लभ सत्संग सुनने को मिलेगा लेकिन आप लोग तो कुछ बोले तक नहीं और आप लोग हँसे और बाद में रोये भी...इसका क्या कारण था . कबीर साहेब ने उत्तर दिया कि हम लोग एक दूसरे से मिलने की खुशी में आनंदित हुये इसलिये हँसे और ये संसार प्रतिक्षण काल के गाल में जा रहा है और फ़िर भी जीव अपने उद्धार की चिंता छोङकर विषय वासनाओं में फ़ँसा हुआ है . सो हम जीव की इस स्थिति को देखकर रोये और बाद में निर्वाणी (जो वाणी से न कहा जाय ) सत्संग किया यह सुनकर सभी शिष्य संतों की महान लीला जानकर चकित रह गये .
धीरे धीरे रे मना धीरे से सब होय . माली सींचे सौ घङा ऋतु आये फ़ल होय .
प्रत्येक कार्य में समय लगता ही है यदि माली किसी पेङ को इकठ्ठा सौ घङे से भी सींचे तो भी उस पर ऋतु आने पर ही फ़ल आयेंगे इसलिये इंसान को कर्म करते हुये धीरज रखना चाहिये .

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