रविवार, मार्च 28, 2010

भगवान जल्दी से नहा लो..??

ये सत्य आपको मेरे किसी लेख मे ही पङने को मिल जायेगा कि कबीर रामानंद का शिष्य होने का नाटक मात्र कर रहे थे .वास्तव में तो वह सतपुरुष की आग्या से रामानंद को इस भवसागरसे निकालने के लिये आये थे और समय समय पर
उनको चेताते रहते थे .रामानंद वैष्णव मत को मानते थे और शालिगराम की (गोल पत्थर की बटिया जो गंगा आदि से निकलती है उसको हिन्दूधर्म में शालिगराम कहते हैं और उसकी पूजा भी करते हैं ) पूजा करते थे .वह प्रतिदिन उन पत्थरों को किसी शिष्य के द्वारा गंगा का स्नान कराते और
उनकी पूजा आदि के बाद ही खाना खाते .एक दिन पत्थरों को स्नान कराने का कबीर का नम्बर आया कबीर ने उन पत्थरों को ले जाकर गंगा में फ़ेंक दिया..और वहीं किनारे बैठकर कहने लगे कि भगवान जल्दी से नहा लो और बाहर आ जाओ ..जब बहुत देर तक कबीर लौटकर नहीं आये तो रामानंद ने एक शिष्य को भेजा कि देखकर आओ कबीर अभी तक क्यों नहीं लौटा है . जब वह शिष्य कबीर के पास पहुँचा तो कबीर वही बात कह रहे थे कि भगवान जल्दी से नहा लो और बाहर आ जाओ .वह शिष्य कबीर को साथ लेकर रामानंद के पास पहुँचा तो रामानंद के पूछने पर कबीर ने कह दिया कि उन्होने पत्थरों को गंगा में फ़ेंक दिया और उनसे कह दिया कि जल्दी से नहाकर निकल आओ .रामानंद माथे पर हाथ मारकर बोले कि वह पत्थर के भगवान किस तरह बाहर आ सकते है ?/..इस पर कबीर ने कहा कि फ़िर पत्थर के भगवान तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकते हैं ??.इस बात ने रामानंद के ह्रदय पर सीधी चोट की ..

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