रविवार, मार्च 28, 2010

कबीर और गोरखनाथ

मंछदरनाथ के शिष्य गोरखनाथ को प्रायः धर्म में आस्था
रखने वाले सभी लोग जानते हैं . गोरखनाथ कबीर साहेब
के समय में ही हुये और इनका सिद्धी ग्यान विलक्षण था .
उन दिनों काशी में प्रत्येक हफ़्ते विद्धानों की सभा होती
थी और सभा के नियमानुसार चोटी के विद्धान आपस में
शास्त्रार्थ करते थे और बाद में जीतने वाला ग्यानी हारने
वाले का तिलक चाट लेता था और जीतने वाला विजयी
घोषित कर दिया जाता था .उन दिनों कबीर के नाममात्र
के गुरु (ये रहस्य है कि रामानन्द कबीर के गुरु कहलाते थे
पर वास्तव में ये सत्य नहीं था ) रामानन्द का विद्धता में
बेहद बोलबाला था सो गोरखनाथ ने उनसे शास्त्रार्थ किया .
शास्त्रग्यान और वैष्णव पद्धति का आचरण करने वाले
रामानन्द गोरख की सिद्धियों के आगे नहीं टिक सके और
गोरख ने उनका तिलक चाट लिया इससे रामानन्द बेहद
आहत हुये क्योंकि उनकी गिनती चोटी के विद्धानों में
होती थी . इस घटना से उनका बेहद अपमान हुआ था .
कबीर उन दिनों रामानन्द के नये नये शिष्य बने थे और
उनकी अपारशक्ति का किसी को बोध नहीं था .कबीर
साहेब ने रामानन्द से आग्रह किया कि वे अपने अखाङे
की तरफ़ से गोरख से ग्यानयुद्ध करना चाहते हैं इस पर
रामानन्द ने उनका बेहद उपहास किया .उनकी नजर में
कबीर एक कपङे बुनने बाला जुलाहा मात्र था वो ग्यानकी बातें क्या जाने .सो सभी ने उनकी बेहद खिल्ली उङाई लेकिन फ़िर भी कबीर ने रामानन्द से बार बार आग्रह किया कि वे एक बार उन्हे गोरख से ग्यानयुद्ध कर लेने दे .हारकर रामानन्द ने उन्हें इजाजत दे दी . कबीर ने अपने मस्तक से लेकर नाभि तक एक लम्बा तिलक लगाया और गोरख से युद्ध करने पहुँचे गोरख उनका तिलक देखकर चिङ गया .कबीर और गोरख का युद्ध युद्ध शुरु हुआ और गोरख ने कबीर की खिल्ली सी उङाते हुये अपना त्रिशूल निकाला और अपनी सिद्धी के बल पर त्रिशूल की बीच की नोंक पर जा बैठा और बोला कि में तो यहाँ बैठकर युद्ध करूँगा...क्या तुम मुझसे लङोगे .कबीर साहेब मुस्कराये और अपनी जेब से कपङे बुनने वाली कच्चे सूत की गुल्ली निकालकर उसका छोक पकङकर गुल्ली आसमान की तरफ़ उछाल दी . गुल्ली आसमान में चली गयी कबीर साहेब कच्चे सूत पर चङकर आसमान में पहुँच गये और बोले गोरख मैं तो यहाँ से युद्ध करूँगा .गोरख के छक्के छूट गये और वह बेहद तिलमिलाया फ़िर भी गोरख ने अपने अहम में कई टेङेमेङे सवाल किये और कबीर का जवाव सुनकर उसके छक्के छूट गये और गोरख को विद्धानों की उस सभा में अपनी हार माननी पङी .उसका घमंड चूर चूर हो गया और वह कबीर के पैरों में गिर पङा और उनका शिष्य भी बना .

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