बुधवार, जनवरी 04, 2012

गुरू भक्ति योग यह योग अद्भुत है

गुरू भक्ति योग की भावना - जिस प्रकार शीघ्र ईश्वर दर्शन के लिये कलियुग में साधना के रूप में कीर्तन साधना है । ठीक उसी प्रकार इस संशय । नास्तिकता । अभिमान और अहंकार के युग में योग की 1 सनातन प्रद्धति यहां प्रस्तुत है । जिसको कहते हैं - गुरू भक्ति योग । यह योग अद्भुत है । इसकी शक्ति असीम है । इसका प्रभाव अमोघ है । इसकी महत्ता अवर्णनीय है । इस युग के लिये उपयोगी इस विशेष योग पद्धति के द्वारा आप इस हाड चाम के पार्थिव देह में रहते हुए सदगुरु भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं । इसी जीवन में आप उन्हें अपने साथ विचरण करते हुए देख सकते हैं ।
गुरू की यह सर्वोच्च विभावना है । और हर साधक को यह प्राप्त करना है । व्यक्तिगत गुरू को स्वीकार करना है । यह साधक की परबृह्म में विलीन होने की तैयारी है । और उस दिशा में 1 सोपान है । गुरू की विभावना के विकास के लिये व्यक्ति की गुरू के प्रति शरणागति 1 महत्त्वपूर्ण सोपान है । फ़िर साधना के किसी भी सोपान पर गुरू की आवश्यकता का इन्कार कभी नहीं हो सकता । क्योंकि आत्म साक्षात्कार के लिये तङपते हुए साधक को होने वाली परबृह्म की अनुभूति का नाम गुरू है । उसी  को गुरू तत्त्व भी कहते हैं ।
सन्त महापुरूष उपदेश देते हैं कि - एकाग्रता ही प्रत्येक काम की सफ़लता की कुंजी है । जिस काम को एकाग्र चित्त होकर किया जाय । वह कठिन से कठिन कार्य भी सफ़ल हो जाता है । ऐसे ही प्रभु प्राप्ति में भी यदि मन को सांसारिक कामनाओं और चिन्तन से हटाकर और मन को एकाग्र चित्त कर श्री सदगुरू के भजन । सुमिरन । ध्यान में लगाया जाय । तो अपने लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है ।
अभ्यास का अर्थ ही यह है कि किसी भी कार्य को नियम पूर्वक करना । अर्थात मन की चित्त वृत्तियों को एकाग्र

करने के लिये । हर समय अपने मन पर ध्यान रखना । यह ख्याल में रखना चाहिए कि सुरत को भजन । ध्यान में लीन करते हुए समाधि trance अवस्था तक पहुंचना ही जीवन का परम लक्ष्य है ।
इस प्रकार प्रभु प्राप्ति के अभिलाषी जिज्ञासु जन इन साधनों को ध्यान में रखते हुए अपनी चित्तवृत्तियों को माया की ओर से समेट कर श्री सदगुरू की भक्ति की ओर लगाते हैं । तथा अपने ध्यान को श्री सदगुरू के स्वरूप पर ठहराते हैं । श्री सदगुरू के नाम का भजन उनकी पूजा बन जाती है । इस प्रकार वे अपने जीवन को श्री सदगुरू के उपदेश अनुसार बनाकर लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग सुगम बनाते हैं । तथा लक्ष्य को प्राप्त करते हैं ।
गुरू वास्तव में उस परम ईश्वरीय शक्ति का नाम है । जो अपनी अपार दया से जीवों को ऊपर उठाने । नाम भजन के द्वारा । उनके ज्ञान नेत्र 3rd eye खोलने । मन को शुद्ध व पवित्र बनाने । तथा श्री सदगुरू देव जी महाराज की असीम दया से अपनी तरफ़ आकर्षित करने का काम करती है ।
श्री सदगुरु देव जी महाराज के वचन तो महामोह रूपी घने अन्धकार को नाश करने के लिये सूर्य की किरणों के सदृश होते हैं । उनका हर वचन जीवन में नव क्रान्ति लाने वाला होता है । प्रेमीजन उनके एक एक वचन को ह्रदय में धारण करके । उन्हें व्यवहार में लाकर । परम लाभ का अनुभव करते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज अपने भक्तों को सीधे सादे शब्दों में यानी अपनी सहज व सरल बोलचाल की भाषा में धर्म । ज्ञान । नीति । भक्तियोग ।

सेवा का भाव । भजन । सुमिरन । पूजा । दर्शन । ध्यान के तरीके समझा दिया करते थे ।
श्री सदगुरू देव जी महाराज के मुखारविन्द के वाक्य आज भी भौतिकवाद से संतप्त प्राणियों को परम शान्ति और दिव्यता प्रदान करने में समर्थ हैं । आज भी हजारों लाखों साधक जिज्ञासु उन अमर वाक्यों का मनन करके अपने जीवन के परम लक्ष्य सत्य स्वरूप निज पर की प्राप्ति कर सकते हैं ।
भक्तजनों को भक्ति रस पिलाने और सत्य मार्ग दर्शाने के लिये श्री सदगुरू देव जी महाराज युग युग में नाना रूप धारण कर आते हैं । आगे भी मेरे श्री स्वामी जी भक्तों को दर्शन देने के लिये आते ही रहेंगे ।
श्री सदगुरू देव का श्रद्धा, विश्वास तथा भाव पूर्वक जो उनके अमृतरूप सतसंग के तीर्थ में गोता लगाते रहते हैं । उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । और अन्त में वे सभी पापों से छूटकर सायुज्य मुक्ति को पाते हैं । दया । क्षमा । और शान्ति स्वरूप श्री सदगुरू देव की शरण में जाने पर ही साधक परम पद एवं भक्ति का अधिकारी बनता है ।

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